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Journalist and writer, Writes on Northeast India, Bangladesh, Myanmar

गुरुवार, 27 नवंबर 2008

यह राजनीतिक वर्ग नही कर पाएगा आतंकवाद से मुकाबला

मुंबई में बुधवार को हुए आतंकी हमलों को हम भारतीय पैमाने से अब तक के सबसे बड़े हमले कह सकते हैं। भारत में अब तक जो आतंकी हमले होते आए हैं उनमें अक्सर कोई चुपचाप स्वचालित बम रख जाता है। हमलों की अक्सर कोई भी संगठन जिम्मेवारी नहीं लेता, अगर लेता भी है तो यह पता लगा पाना मुश्किल होता है कि जिस संगठन ने जिम्मेवारी ली है क्या वह सचमुच हमलों के पीछे था। लेकिन बुधवार की रात से हुए हमलों ने भारत में आतंकवाद की घटनाओं में एक नया मोड़ ला दिया।

इन हमलों में आतंकवादी सामने आकर आक्रमण कर रहे थे, इन हमलों में कुछ आतंकवादी मारे गए तो हमने कई जाबांज पुलिस अधिकारियों को भी खो दिया। इन हमलों के बाद भारत वैश्विक इस्लामी आतंकवाद से पूरी तरह जुड़ गया है इसमें कोई शक नहीं रहना चाहिए।

इस्लामी आतंकवाद की घटनाएं सिर्फ भारत में ही नहीं हो रही, बल्कि अमरीका के दो टावरों को गिराने की घटनाओं से इस्लामी आतंकवाद की घटनाओं की शुरुआत हुई। इसके बाद ब्रिटेन में भी आतंकी हमले हुए। मुंबई में १९९३ में हुए बम विस्फोट भी शहर के इतिहास में एक काले अध्याय के रूप में याद किए जाते हैं लेकिन उनका वैश्विक इस्लामी आतंकवाद के साथ कोई रिश्ता नहीं था।

बुधवार के आतंकी हमले में ब्रिटिश और अमरीकी नागरिक मुख्य रूप से निशाने पर थे। शुरुआती रपटों में कहा गया है कि अन्य यूरोपीय देशों के नागरिकों को आतंकवादी छोड़ दे रहे थे।

अमरीका-ब्रिटेन में आतंकवाद के साथ जिस तरह निपटा जा रहा है उसकी भारत के साथ कोई समानता नहीं है। आतंकवाद के साथ निपटने में सबसे बड़ी भूमिका राजनीतिक वर्ग की है। लेकिन अफसोस कि राजनीतिक वर्ग ने, भले वह सत्ता से जुड़ा हो या विपक्ष में हो, अभी तक वैश्विक इस्लामी आतंकवाद के खतरे को पूरी तरह पहचाना नहीं है। ऐसा किसी भी आतंकी घटना के बाद उसके व्यवहार से पता लगता है।

भयंकर से भयंकर आतंकी घटना को भी उसने किसी रोजमर्रा की राजनीतिक परेशानी के रूप में देखा है। मानो यह कोई मजदूरों की हड़ताल हो, कोई छात्रों का दंगा फसाद हो या प्रदर्शनकारियों पर गोली चालन हो। ऐसी घटनाएं होती हैं और बाद में भुला दी जाती हैं। उनका देश के भविष्य पर कोई गहरा असर नहीं पड़ता। राजनीतिक वर्ग की राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता ऐसे मामलों में सामने आती है और उसे लोकतंत्र की आवश्यक बुराई के रूप में आम नागरिक स्वीकार भी कर लेते हैं।

लेकिन आतंकवाद की घटनाओं के बाद जब सत्ताधारी नेता घटनास्थल पर जाकर फोटो खिंचवाते हैं, जब विपक्ष के नेताओं में यह होड़ लग जाती है कि कौन सबसे पहले घटनास्थल पर जाकर टीवी कैमरों के सामने बयान देगा, जब पत्रकारों के सामने राजनीतिक पार्टियों के नेता एक दूसरे पर कीचड़ उछालने की प्रतियोगिता में लिप्त हो जाते हैं, जब एक-एक आतंकवाद को एक-एक धर्म के साथ जोड़ने की कवायद शुरू हो जाती है, जांच एजेंसियों के पहले ही राजनेता यह बताने लग जाते हैं कि आतंकवादी कार्रवाई के पीछे कौन था - तब यह समझना बाकी नहीं रह जाता कि इस वर्ग ने अभी यह समझा ही नहीं है कि विश्व इस्लामी आतंकवाद क्या चीज है?

यह एक नई मुसीबत है और आने वाले दिनों में हमें इसे और भी भुगतना है। अब भी समय है और हमारे राजनीतिक वर्ग को यह तय कर लेना चाहिए कि उन्हें विश्व इस्लामी आतंकवाद के साथ किस तरह एक होकर निपटना है। मान लिया कि भारत की दो दर्जन छोटी-छोटी पार्टियों के बीच कोई समझौता नहीं हो सकता। लेकिन क्या कांग्रेस, भारतीय जनता पार्टी और वामपंथी जैसी बड़ी पार्टियां इस मुद्दे पर एकमत होकर एक आचार संहिता नहीं बना सकतीं?

यदि राजनीतिक वर्ग आतंकवाद को भी चुनाव में जीत हासिल करने के एक जरिए के रूप में ललचाई आंखों से देखेगा तो मुसीबत हमारे गले तक आ जाएगी और उसके बाद इस बात के लिए समय ही नहीं रहेगा कि मिलबैठ कर कोई साझा नीति तय की जाए।

यह भी दिलचस्प है कि बंद कमरों में जब बात होती है तब हर पार्टी का नेता यह स्वीकार करता है कि आतंकवाद का राजनीति के साथ कोई संबंध नहीं है। इसके लिए सुरक्षा मजबूत करनी होगी, सुरक्षा तंत्र को अत्याधुनिक बनाना होगा।

देश में अलग-अलग राज्यों में अलग-अलग राजनीतिक दलों की सरकारें हैं और शायद ही कोई राज्य आतंकवादी घटनाओं से अछूता रहा हो। इससे साबित होता है कि आतंकवाद का मुकाबला करने में सभी राजनीतिक पार्टियां अब तक नाकामयाब साबित हुई हैं। लेकिन यही नेता जब जनता के बीच भाषण देते हैं या पत्रकारों को संबोधित करते हैं तो इस तरह दिखाते हैं मानों उनकी पार्टी ही आतंकवाद पर सबसे ज्यादा कठोर है, दूसरे सभी समझोतावादी हैं।

दरअसल आतंकवाद से मुकाबला करने के लिए राज्यों और केंद्र सरकार दोनों को ही काफी कुछ करना है। असम तथा उत्तर प्रदेश के पूर्व पुलिस प्रमुख प्रकाश सिंह इस विषय पर लगातार लिखते रहे हैं। उन्हीं की पहल पर सुप्रीम कोर्ट ने राज्य सरकारों के लिए निर्देश जारी किए थेताकि पुलिस के काम में बेवजह राजनीतिक दखलंदाजी को रोका जा सके। लेकिन ज्यादातर राज्य सरकारों ने उन निर्देशों पर लीपापोती करने की कोशिश की है। इसमें कांग्रेस, भाजपा, बसपा - सभी पार्टियां दोषी हैं। राजनीतिक वर्ग पुलिस पर अपनी गिरफ्त को ढीली नहीं करना चाहता, उसे काम करने का मौका नहीं देना चाहता, आतंकवाद से मुकाबला किस तरह किया जाए इस विषय पर कभी उसकी सलाह नहीं लेता।
गुवाहाटी के विस्फोटों के बाद इन्हीं कालमों में हमने लिखा था कि सरकारें दबाव में काम करती हैं। यह दबाव बनाने के लिए जनता को सड़कों पर उतरना होगा। गुवाहाटी में पिछले दिनों एक गैर-राजनीतिक छात्र संगठन के बैनर तले जिस तरह हजारों की संख्या में लोगों ने आतंकवाद पर सरकारी अकर्मण्यता के खिलाफ आवाज बुलंद की, वैसी पहल की जरूरत सारे भारत में है। आम जनता के दबाव में ही राजनीतिक वर्ग आतंकवाद पर अपना हार-जीत का खेल खेलने से बाज आ सकता है।

3 टिप्‍पणियां:

  1. भारतीय नेता गा रहे हैं "Who will save the world.. I'm too young to die."

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  2. भारतीय राजनेताओं में इच्छा-शक्ति का घोर अभाव है. वोटों की राजनीति करने वाले ये नेता इस देश की जनता के हित में कभी भी कोई कठोर कदम उठाएंगे, इसमे शक है. अब तो ये देश और देश की जनता भगवन भरोसे ही जी रही है, इसमे किसी को शक नही होना चाहिए.
    - अनिल वर्मा, पटना (बिहार)

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