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Journalist and writer, Writes on Northeast India, Bangladesh, Myanmar

शुक्रवार, 1 मार्च 2013

थाईलैंड यात्रा : कुछ बिखरे विचार


किसी भी चीज को देखने के लिए एक निश्चित दूरी का होना बहुत जरूरी है| मान लीजिए आपको मैं एक कलम दिखाता हूं और आपकी आंखों के बिल्कुल पास ले जाकर पूछता हूं कि बताएं कि यह किसी कंपनी का कलम है| निश्चित है कि आप कंपनी का नाम पढ़ नहीं पाएंगे| यही बात देश पर भी लागू होती है| जब आप देश के अंदर होते हैं तो बहुत सारी बातें आपकी नजरों में नहीं आतीं| आप उन्हें रोजमर्रा की बातें मानकर उनकी ओर ध्यान नहीं देते| लेकिन जब आप देश से थोड़ी दूर चले जाते हैं तो विभिन्न देशों के लोगों के बीच भारतवासियों को देखकर उनकी खूबियों और खामियों का आपको पता चलता है| मसलन, भारतीय हर कहीं कतार को तोड़ता हुआ और दूसरों को पीछे छोड़कर आगे बढ़ने की तिकड़म करता हुआ मिलेगा| इस बात से भारतीय हर कहीं सहज ही पहचान में आ जाता है| यह बात भारत में रहते हुए जितनी नहीं कचोटती विदेश जाने पर विभिन्न देशों के नागरिकों के बीच सिर्फ भारतीयों को ऐसा करते हुए देखकर ज्यादा कचोटती है| 

थाइलैंड में वैसे तो हमारी त्वचा का रंग देखकर ही वहां के लोगों को समझ में आ जाता है कि हम भारत से हैं| उनकी भाषा के दूसरे शब्द भले समझ में न आए लेकिन इंडिया शब्द समझ में आ ही जाता है और हम समझ जाते हैं कि वे हमारे बारे में ही बात कर रहे हैं| भारतवासी को थाई भाषा में साओ इंडिया कहते हैं| जापानियों का समय अनुशासन काफी प्रसिद्ध है| लेकिन थाइलैंड में देखा कि थाई लोग समय के अनुशासन में किसी से पीछे नहीं हैं| पिछली बार जब मेरे कारण एक मिनी बस वाले को विलंब हो गया तो वह अपनी कंपनी के मैनेजर से थाई भाषा में बात कर देर होने की कैफियत दे रहा था| बार-बार इंडिया शब्द आने के कारण हमने अनुमान लगाया कि वह यह कह रहा होगा इन दो इंडियनों के कारण देर हो गई - आप तो जानते ही हैं ये लोग लेट करते ही हैं| मिनी बस में सिर्फ मैं और मेरा मित्र भी भारत से थे| हमारे कारण सभी को आधा घंटे की देर हो गई थी|

वहां जब कोई पूछता है कि आप कहां से हैं और हम कहते हैं इंडिया से तो उसकी प्रतिक्रिया आम तौर यही होती ‘ओ, इंडिया इज ए बिग कंट्री’| शुरू में अच्छा लगता है लेकिन जब बाद में देखते हैं कि सभी यही बात कहते हैं और कोई भी भारत की दूसरी किसी खूबी की प्रशंसा नहीं करता तो लगता है उनके दिल में भारत के लिए कोई खास सम्मान नहीं है| जबकि हम उम्मीद करते हैं कि एक बौद्ध धर्मावलंबी देश होने के नाते भारत के प्रति उनका विशेष लगाव होना चाहिए था| लेकिन वैसा कोई लगाव उनकी देहभाषा से से प्रकट नहीं होता| भारत की बनिस्पत कोरियन पर्यटकों का थाई दुकानदारों की नजर में विशेष सम्मान होता है| कोरिया एक बौद्ध धर्मावलंबी धनी देश है और वहां की मुद्रा थाई मुद्रा बाट की तुलना में काफी मजबूत है| इसलिए हवाई अड्डे पर लौट रही कोरियाई युवतियों के बैग थाई सामानों से पटे रहते हैं| भारतीयों की रुचि सिर्फ उन्हीं चीजों में रहती है जिनकी कीमत भारत की बनिस्पत वहां काफी कम है| मसलन फ्लैट टीवी और लैपटाप|

थाईलैंड की आर्थिक प्रगति को कोई भी नजरंदाज नहीं कर सकता| माना कि थाईलैंड को कभी उपनिवेश नहीं बनना पड़ा जबकि इसके पड़ोसी बर्मा, मलेशिया और सिंगापुर सभी विदेशी शासन के अधीन रहे| लेकिन फिर भी भारत के असम की तरह ही थाईलैंड को भी कई बार बर्मी हमलावरों ने तहस-नहस किया| आर्थिक प्रगति का अनुमान लगाने के लिए यह उल्लेखनीय है कि सड़कों पर खोमचे वाले भी बड़ी शान से अपना व्यवसाय करते हैं और उनके वहां रहने के नियम बने हुए हैं| एक निश्‍चित समय पर वे आते हैं और रात को निश्‍चित समय पर अपना सामान छोटी ट्रकों में लादकर चले जाते हैं| पुलिस के साथ आंखमिचौली का खेल वहां देखने को नहीं मिला| हर दो में से एक खोमचा किसी महिला का है| हर खोमचा एक मोटरसाइकिल से जुड़ा है जिसकी सीट पर बैठकर उसका मालिक व्यवसाय करता है और काम हो जाने के बाद मोटरसाइकिल को चलाकर अपने घर चला जाता है| इन खोमचों पर जूस, समुद्री खाद्य, ड्रिंक्स या काफी मिलती हैजो एक अनुमान के अनुसार शाम तक अच्छा-खासा व्यवसाय कर लेते हैं| कहने का तात्पर्य यह कि कम-से-कम शहरों में वहां भारत की तरह घोर गरीबी देखने को नहीं मिलती|

एक शहर से दूसरे शहर जाएं तो राजमार्ग के दोनों ओर भूमि के बड़े-बड़े खंडों पर कोरियाई और जापानी कंपनियों के कारखाने दिखाई देते हैं| लगता है थाई सरकार ने इन कंपनियों को उद्योग लगाने के लिए ये भूखंड उपलब्ध कराए हैं| बिजली की आपूर्ति को भी कभी ठप होते नहीं देखा| थाईलैंड का आर्थिक विकास मात्र पिछले तीन दशकों की कहानी है| विदेशी पूंजी और आधुनिक तकनीक - ये दो ही कारक इसके पीछे समझ में आए| आधुनिक विकास की कुंजी पूंजी, बिजली और आधुनिक तकनीक है - इस मंत्र को हृदयंगम करके थाईलैंड ने ऊंची विकास दर हासिल की जिसके नतीजे अब किसी सैलानी की आंखों से भी छुपे नहीं छुपते| 


पर्यटक कैसे-कैसे

थाईलैंड ने पर्यटन के क्षेत्र में चौंकाने वाले नतीजे हासिल किए हैं| इसकी सकल विकास दर का एक महत्वपूर्ण हिस्सा आज पर्यटन से आता है| आज सारे विश्‍व का पर्यटक थाईलैंड आता है और इसकी आर्थिक उन्नति में अपना योगदान देता है| अलग-अलग देशों के पर्यटकों को देखना मुझे किसी प्राकृतिक दृश्य की छटा को देखने से ज्यादा मजेदार लगा| यूरोपियन देशों के पर्यटक मुख्यतः सेक्स, सस्ती शराब और खाने के लिए थाईलैंड का रुख करते हैं| चीनी पर्यटक बड़े-बड़े झुंड में पर्यटन के लिए निकलते हैं| ऐसे समूह में बड़े-बूढ़े भी होते हैं, युवक-युवतियां होते हैं और बच्चे भी होते हैं| इनकी रुचि यूरोपियन पर्यटकों से भिन्न होती है| बहुत कुछ भारतीयों से मिलती-जुलती| ये लोग प्राकृतिक दृश्यों का मजा लेते हैं और तस्वीरें खींचते हैं| भाषा की समस्या चीनी पर्यटकों के लिए एक बड़ी समस्या होती है इसीलिए वे कदाचित ही अपने समूह से बाहर निकलते हैं| वैसे भी थाईलैंड में अंग्रेजी के ज्ञान के स्तर की यदि भारत से तुलना करें तो वह काफी नीचे है| विदेशी लोग जिन इलाकों में रहते हैं वहां से यदि आप बाहर निकल आएं तो भाषा आपके लिए एक बड़ी समस्या बन जाती है| फिर भी लगभग हर थाई नागरिक अंग्रेजी के बुनियादी शब्दों से परिचित होता है इसलिए काम चल जाता है| ऐसा इसलिए है कि अंग्रेजों का उपनिवेश नहीं होने के बावजूद थाईलैंड में अंग्रेजी एक विषय के रूप में पढ़ाई जाती है| 


साफ-सफाई 

थाई लोगों का सफाई प्रेम सहज ही आंखों को आकर्षित करता है| भारत के सार्वजनिक स्थानों से थाईलैंड की साफ-सफाई की तुलना ही नहीं है| साफ-सफाई के प्रति एक तरह से पूरा थाई राष्ट्र समर्पित है| वहां के सार्वजनिक स्थल भी इतने साफ-सुथरे रहते हैं कि भारत में बहुतों के घर और दफ्तर भी नहीं रहते| सार्वजनिक स्थलों की सफाई के बारे में एक घटना का उल्लेक करना चाहूंगा| मेरे होटल की खिड़की से पास के स्काईट्रेन (खंभों के ऊपर से होते हुए शहर के बीच से गुजरने वाली ट्रेन) का स्टेशन साफ नजर आता था| सुबह-सुबह देखा कि एक महिला स्टेशन की सीढ़ियों और रैलिंग पर रगड़-रगड़ कर हाथ से पोंछा लगा रही है| इस तरह हाथ से एक सार्वजनिक स्थल पर पोंछा लगाना देखना एक भारतीय के लिए हैरत में डालने वाली घटना थी| क्योंकि हमारे यहां भी सफाई कर्मचारी पोंछा लगाते हैं लेकिन स्टेशनों की रैलिंग आदि को हाथ से साफ करते कभी नहीं देखा| सफाई के प्रति प्रेम के कारण ही वहां कई तरह के झाड़ू मिलते हैं जिनसे आप कम मेहनत और समय खर्च कर ज्यादा सफाई कर सकते हैं| इन तरह-तरह के झाड़ुओं तथा सफाई करने के अन्य उपकरणों को अपनी ट्राली पर लादकर बेचने वाले आपको बैंकोक शहर में आसानी से नजर आ जाएंगे| ये लोग अपने सामान बेचने के लिए छोटे लाउड स्पीकर का इस्तेमाल करते हैं| लाउडस्पीकर की बात चली तो यह भी बता दें कि बैंकोक में कई भिखारियों को भी लाउड स्पीकर पर गाना गाकर भीख मांगते देखा था| हालांकि वहां भिखारियों की संख्या नगण्य थी|

9 टिप्‍पणियां:

  1. just i remembered one good story.कुछ दोस्त मिलकर दिल्ली घूमने का प्रोग्राम बनाते है और रेलवे स्टेशन से बाहर निकलकर एकआटो रिक्शा किराए पर लेते है , उस आटो रिक्शा का ड्राइवर बुढ्ढा सरदार था, यात्रा के दौरान बच्चो को मस्ती सूझती है और सब दोस्त मिलकर बारी बारी सरदार पर बने जोक्स को एक दुसरे को सुनाते है उनका मकसद उस ड्राइवर को चिढाना था . लेकिन वो बुढ्ढा सरदार चिढना तो दूर पर उनके साथ हर जोक पर हस रहा था , सब साईट सीन को देख बच्चे वापस रेलवे स्टेशन आ जाते है …और तय किया किराया उस सरदार को चुकाते है , सरदार भी वो पैसे ले लेता है , पर हर बच्चे को अपनी और से एक एक रूपया हाथ में देता है एक लड़का बोलता है “बाबा जी हम सुबह से आपके धर्म पर जोक मार रहे है , आप गुस्सा तो दूर पर हर जोक में हमारे साथ हँस रहे थे , और जब ये यात्रा पूरी हो गई आप हर लडके को प्यार से एक-एक रूपया दे रहे है , ऐसा क्यों ? ” सरदार बोला ” बच्चो आप अभी जवान हो आपका नया खून है आप मस्ती नहीं करोगे तो कौन करेगा ? लेकिन मेने आपको एक-एक रूपया इस लिए दिया के जब वापस आप अपने अपने शहर जाओगे तो ये रूपया आप उस सरदार को दे देना जो रास्ते में भीख मांग रहा हो ,
    इस बात को दो साल हो गए है और जितने लडके दिल्ली घूमने गए थे सब के पास वो एक रुपये का सिक्का आज भी जेब में पड़ा है …उन्हें कोई सरदार भीख मांगता नहीं दिखा। वह गैरेज खोलेगा ट्रक चलाएगा लेकिन भीख नहीं माँगेगा। उनकी आबादी देश की आबादी की मात्र 1.4% हैं पर टोटल टैक्स में उनका हिस्सा 35% का हैं, और सेना में भी 50000 से भी अधिक हैं। उनके लंगरों में खाना खाने वालो की जाति और धर्म नहीं पूछा जाता अल्पसंख्यक हैं पर अपने लिए आरक्षण नहीं माँगते स्वंत्रता आन्दोलन में सबसे अधिक अपने बेटो को खोया हैं पर कभी बदले में कुछ माँगा नहीं क्या बाकी के धर्म वाले उनसे कुछ सीखेंगे ??
    Our Sikhs Brother contribute:-
    * 35% of total income tax
    * 67% of total charities
    * 45% of Indian Army
    * 59,000++ Gurudwaras serve LANGAR to 5,900,000+ people everyday !
    .... it is matter of thinking how you think about self....national role towards nationality

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  2. विनोद,
    थाईलैंड की यात्रा कुछ बिखरे विचार पढ़ कर वहां के बारे मे जो जाकारी मिली वह काफी रोचक लगी। खास कर वहां के लोगों की समयानुवर्तिता और साफ सफाई के बारे मे पढ़ कर सुखद आश्चर्य हुआ।
    दिल्ली के ऑटो रिक्सा वाले की कहानी के रुप मे ुल्लेखित टिप्पणी भी रोचक है।

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  3. विनोद जी आपने हमारे थाई प्रवास के दिन याद दिला दिये. वैसे भारतीयों को वे लोग आपसी बातचीत में "खेत" (यानि गेस्ट) कहते हैं और यूरोपियन या अमेरिकन को फलांग (फिरंगी). स्वभाविक है कि खेत की अपेक्षा फलांग से आर्थिक लाभ अधिक होता है...
    थाई लोगों में सबसे प्रचलित वाक्य है, "मई पेन लाई" यानी कोई चिंता नहीं. हर जटिल समस्या का जवाब यही है...
    उत्तर की ओर जाएं तो पता चलेगा कि गरीबी वहां भी है. दक्षिण में पर्यटन के पैसे ने चमक दमक बिखेर रखी है और साथ ही यौन विकृतियाँ भी...

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  4. achcha likha hai mai bhi brunei gayaa tha. ham log vaha jaakar alag dikhai dete hai.

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  5. इसे पर्यटन की वैचारिकता की तरह देखूं या वैचारिक पर्यटन मानूं ? यह अपना दृष्टिकोण निर्धारित करने का प्रश्न हो सकता है। लेकिन सचाई यह है कि इस से पहले थाईलैंड से सम्बंधित जो यात्रा वृत्तांत मेरे देखने में आये (और सुनने में भी ) वो रसीले और चटखारेदार तो होते हैं, लेकिन थाईलैंड की सामाजिक-मानसिक संरचना उसमें नहीं दिखती। टूर ओपरेटर जो दिखाते-बताते हैं, बस उसी का दोहरावा मिलता है। आपने अपना (भारतीय) आत्मालोचन भी किया है। किसी भी अच्छे यात्रा वृतात्न के लिए तो यह ज़रूरी होना चाहिए।

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  6. आपकी थाईलैंड किउ यात्रा का विवरण पढ़कर बहुत कुछ जानने और सीखने को मिलता है ! लेकिन कहीं कहीं ऐसा लगता है जैसे आप बाधा चढ़कर अपनी बात कह रहे हैं ! ओवरआल ठीक ठाक ! और हाँ ! आगे का कुछ हो तो लिखिए जरूर

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  7. रिगानिया जी-बहूत जुलुम किये हें-अपना देश का इज्जत एक दम मिट्टी में मिलाय दिये - आप समझते हें देसबासी आपकोसाबासी देगा-- बिल्कुल नही--थाईलेण्ड में जाकोर बस में बैठने मे देरी पर देरी नही ना करना चाहिये था

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