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Journalist and writer, Writes on Northeast India, Bangladesh, Myanmar

सोमवार, 15 अगस्त 2016

कहां है आईएस, ये तो घरेलू आतंकवादी हैं

ढाका के गुलशन नामक जिस इलाके में 1 जुलाई को आतंकवादी घटना हुई थी वह काफी पोश इलाका माना जाता है। सुंदर तालाब के किनारे बड़ी तरतीबी से बने इस इलाके में ज्यादातर देशों के दूतावास स्थित हैं। कुछ ही महीनों पहले यहां एक इतालवी नागरिक की हत्या कर दी गई थी। उस हत्या की जिम्मेवारी आईएस यानी इस्लामिक स्टेट ने स्वीकार की थी। 

उस घटना के थोड़े ही दिन बाद पश्चिमी बांग्लादेश में रंगपुर शहर के पास एक जापानी नागरिक की हत्या हुई थी। इसमें भी आईएस ने ऑनलाइन पोस्टिंग कर यह दावा किया था कि यह उसी का काम है। उसने साथ ही धमकी दी थी कि इस्लाम और ईसाई धर्मों के बीच चार सौ सालों तक चले धर्मयुद्ध यानी क्रूसेड में भाग लेने वाले देशों और उनकी मदद करने वाले जापान जैसे देश के नागरिकों पर उसका खतरा इसी तरह मंडराता रहेगा। 

खासकर मुसलमान आबादी वाले देशों में। उस समय भी सरकार की ओर से यह कहने में जरा भी देर नहीं की गई थी कि आईएस का बांग्लादेश में कोई अस्तित्व नहीं है। जो कुछ भी किया है बांग्लादेश के ही आतंकवादियों ने किया है। इस बार भी घटना घटते ही सरकार के उच्चतम स्तर से कह दिया गया कि यह देश के अंदर के आतंकवादियों की ही करतूत है। 

अचरज की बात है कि घटना घटने के साथ-साथ बिना किसी तहकीकात के सरकार को या प्रधानमंत्री को कैसे पता चल जाता है कि इसमें आईएस का हाथ है या नहीं।

जिस हड़बड़ी में प्रधानमंत्री और उनकी सरकार के मंत्री कहते हैं कि नहीं, नहीं आईएस जैसा हमारे यहाँ कुछ भी नहीं है उसी से पता चलता है कि जरूर सरकार को आईएस (या अल कायदा) का नाम सामने आने से घोर आपत्ति है। मैंने कई लोगों से इस बारे में पूछताछ की कि आखिर क्या कारण है कि सरकार आईएस के शामिल होने की बात स्वीकार करने से कतराती है। 

आखिर यही समझ में आया कि यदि आईएस का बांग्लादेश में अस्तित्व होने की बात स्वीकार कर ली जाती है तो उसके बाद ढाका पर अंतर्राष्ट्रीय दबाव काफी बढ़ जाएगा। साथ ही बाहर से आने वाले निवेश पर भी इसका असर पड़ सकता है।

कुछ सुरक्षा विशेषज्ञों का कहना है कि आईएस हो या न हो इससे क्या फर्क पड़ता है। फर्क तो इससे पड़ता है कि आतंकवादी अपना काम करने में सफल कैसे हो जाते हैं। अति सुरक्षित माने जाने वाले इलाके में कैसे आतंकवादी अस्त्र-शस्त्र लेकर घुस पाने में सफल हो गए।

शेख हसीना इस मामले में काफी होशियार हैं। अपने अनुभव से उन्हें पता है कि आईएस के अस्तित्व से वे जब तक इनकार करती रहेंगी तब तक अंतर्राष्ट्रीय मीडिया के लिए बांग्लादेश एक केंद्र बिंदु नहीं बनेगा। 

लेकिन जैसे ही आईएस के अस्तित्व को स्वीकार कर लिया जाएगा वैसे ही अंतर्राष्ट्रीय मीडिया में बांग्लादेश छा जाएगा। हर देश चाहता है कि अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर उसका नाम हो। लेकिन कोई भी देश यह नहीं चाहता कि आतंकवाद के लिए वह अंतर्राष्ट्रीय जगत में पहचाना जाए।

बांग्लादेश की आमदनी का एक अच्छा खासा प्रतिशत आज वहां गारमेंट उद्योग से आता है। यदि अंतर्राष्ट्रीय मीडिया की कृपा से यह संदेश जाता है कि बांग्लादेश में भी आईएस का आतंक पसर गया है तो इसका सीधा असर इस उद्योग पर पड़ेगा। आज बांग्लादेश में जिसके पास भी थोड़ा पैसा है उद्योग में लगाने के लिए वही गारमेंट उद्योग में पैसा लगा रहा है। 

विश्व भर के खरीदार आज ढाका आते हैं और अपनी पसंद की पोशाकें ढाका की गारमेंट फैक्टरियों में बनवाते हैं। गुलशन की आर्टिजन बेकरी में जो इतालवी नागरिक मारे गए थे वे भी गारमेंट के खरीदार ही थे और अपना माल बनवाने ढाका आए थे।

अब सवाल यह है कि क्या अब भी समय वहीं रुका है कि आईएस के अस्तित्व से इनकार किया जाए। गलत प्रचार से बचने के लिए किसी चीज के अस्तित्व से इनकार करने की एक सीमारेखा होती है। 

जब वह सीमा पार हो जाती है तब आपको उसके अस्तित्व को स्वीकार करना ही पड़ता है। वरना लोग उसमें किसी साजिश की बू सूंघने की कोशिश करेंगे। एक तरह से यह साजिश है भी। भारत के असम प्रांत में भी तत्कालीन मुख्यमंत्री काफी समय तक उल्फा जैसे सशस्त्र संगठन के अस्तित्व से इनकार करते रहे। लेकिन एक सीमा के बाद उनका यह इनकार हास्यास्पद हो गया था।

बांग्लादेश में हर दूसरी चीज की तरह उग्रवादी हमले को लेकर भी एक के द्वारा दूसरी पार्टी पर आरोप लगाने का रिवाज है। एक उदाहरण, 12 जुलाई को ढाका में उग्रवाद, जिसे वहां जंगीवाद कहते हैं, के विरुद्ध सत्ताधारी मोर्चे की एक रैली थी। इस रैली में एक बड़े नेता का भाषण - बेगम जिया कैसे कहती हैं कि सही चुनाव करवाएं तो जंगीवाद खत्म हो जाएगा। 

इसका मतलब उन्हें पता है कि कौन यह सब कर रहा है। नेताजी इसका प्रमाण भी देते हैं। वे कहते हैं कि गुलशन की घटना के ठीक बाद विदेश से बेगम जिया के लिए एक फोन आया था। फोन करने वाले ने अपने आपको बेगम के बेटे तारेक रहमान का कर्मचारी बताया। इस फोन के आने के इर्द-गिर्द नेताजी एक रहस्य का जाल बुनते हैं ताकि लोग सोचने लग जाएं कि कहीं आतंकवादी हमले में सचमुच विपक्ष की नेता खालिदा जिया का हाथ तो नहीं। 

इधर एक मीटिंग में बीएनपी (खालिदा जिया की पार्टी) के एक बड़े नेता हन्नान शाह कहते हैं कि किसी की दलाली करने वालों की बातों पर ध्यान न दें। यह सत्ताधारी पार्टी के लिए कहा गया है। वह किसकी दलाली करती है? भारत की। बांग्लादेश में बिना बताए भी लोग इस बात को समझ जाते हैं। हालांकि बीएनपी वालों को खुलेआम भी भारत के विरुद्ध बोलने में कोई संकोच नहीं होता।

गुलशन की घटना के लिए किसी बड़े अखबार या किसी बड़ी पार्टी को भारत पर आरोप लगाते हुए नहीं देखा। लेकिन फेसबुक की पोस्टों पर अक्सर ऐसा होता है। गुलशन की घटना के लिए भी भारत को दोषी करार देने वाले लोगों की फेसबुक पर कमी नहीं। 

पिछले साल बांग्लादेश में कुछ दिनों के लिए सोशल मीडिया पर थोड़ा अंकुश लगाया गया था। लेकिन फिलहाल ऐसा कोई अंकुश नहीं है। जिहादी शक्तियां सोशल मीडिया का भरपूर उपयोग अपनी विचारधारा के प्रचार के लिए करती हैं।

पिछले दिनों अपने आपको बांग्लादेश में आईएस का चीफ बताने वाले शख्स का एक इंटरव्यू इंटरनेट पर पोस्ट किया गया। दरअसल मूल रूप से यह इंटरव्यू आईएस की ही अपनी एक (अंग्रेजी) पत्रिका को दिया गया था। इंटरव्यू में कहा गया कि अभी हमारा भारत पर ध्यान नहीं है। 

जब बंगाल और पाकिस्तान (आईएस और अल कायदा वाले कभी-कभार ही बांग्लादेश शब्द का इस्तेमाल करते हैं, वे ज्यादातर बंगाल शब्द का ही प्रयोग करते हैं। उनकी अपनी शब्दावली है। 

देश के नामों को भी वे अपने हिसाब से पुकारते हैं।) में हमारी ताकत काफी बढ़ जाएगी तब हम हिंदुस्तान पर हमला करेंगे और तब हिंदुस्तान की मुस्लिम आबादी वहां हमारी मदद के लिए तत्पर रहेगी ही। यही बात बर्मा के लिए कही गई है। वहां के मुसलमानों की स्थिति पर चिंता जाहिर की गई है लेकिन कहा गया है कि अभी हम उस पर ज्यादा ध्यान नहीं देना चाहते।

ढाका में आज हर सोचने विचारने वाला व्यक्ति इसी बात से चिंतित है कि इस घटना से गारमेंट उद्योग पर बुरा असर पड़ेगा। मुझे विदेशी पत्रकार जानकर बुद्धिजीवियों का एक वर्ग यह स्वीकार करने में सकुचाता है कि असर पड़ेगा। बांग्लादेश के एक बड़े अखबार के संयुक्त संपादक सोहराब हसन कहते हैं कि नहीं कोई असर नहीं पड़ेगा यदि आगे ऐसी घटनाएं फिर से नहीं घटतीं। 

एक अन्य अखबार के सहायक संपादक अली हबीब कहते हैं नहीं ऐसा कुछ नहीं होगा। गारमेंट उद्योग तभी घट सकता है जब इसके कोई आर्थिक कारण हों, जैसे कि भारत या चीन की प्रतियोगिता में बांग्लादेश का माल महंगा हो जाना।

हबीब कहते हैं कि जब राना प्लाजा की घटना हुई थी तब भी आशंका की गई थी कि गारमेंट उद्योग पर इसका असर पड़ेगा। राना प्लाजा 2013 में घटी बांग्लादेश की एक अत्यंत ही दर्दनाक घटना है जिसमें एक आठमंजिला इमारत के पूरी तरह गिर जाने के कारण उसमें दबकर एक हजार से भी अधिक लोगों की जान चली गई थी। 

काफी दिनों बाद तक मलबे से लाशें निकलती रही थीं। उस इमारत में कई गारमेंट फैक्टरियां थीं और मरने वालों में लगभग सभी उन फैक्टरियों में काम करने वाली महिलाएँ थीं। इस घटना के बाद यूरोप और अन्य देशों में इस बात को लेकर काफी बहस हुई कि उनके देशों की कंपनियाँ बांग्लादेश में इतनी कम लागत पर काम करवाती हैं कि वहाँ कामगारों के काम करने की परिस्थितियाँ अत्यंत जोखिम भरी हैं।

रविवार, 7 अगस्त 2016

वो उदास थे या लेखक तुम खुद उदास थे


ढाका में चप्पे-चप्पे पर पुलिस तैनात रहती है। यहां की पुलिस काफी चुस्त-दुरुत दिखती है। पुलिस वाले बंदूकों से लैस रहते हैं। हमारे होटल के बाहर भी विशेष रूप से पुलिस तैनात थी क्योंकि इस होटल में ज्यादाततर विदेशी रुकते हैं। 

होटल का नाम है होटल 71। 71 का मतलब है 1971 का मुक्ति युद्ध या स्वाधीनता संग्राम। बांग्लादेश में स्वाधीनता संग्राम को बात बात में याद किया जाता है। लोग अपने ईमेल आईडी अमूमन इस तरह बनाते हैं। जैसे – विनोद71, विनोद21 या विनोद52।

71 का मतलब तो हमने ऊपर बता ही दिया है, 21 का मतलब हुआ 21 फरवरी 1952 जिस दिन बांग्ला भाषा के लिए आंदोलन शुरू हुआ था और जो अंततः स्वाधीनता युद्ध में बदल गया। 52 भी 1952 को याद करते हुए रखा जाता है। टीवी चैनल में से भी एक का नाम एकुइशे चैनल है। जिन्ना की बांग्लादेश पर उर्दू थोपने की मूर्खता के कारण ही पाकिस्तान के दो टुकड़े हो गए।

हमारे होटल की पूरी थीम ही स्वाधीनता संग्राम पर थी। इसकी सजावट में पश्चिमी पाकिस्तान के साथ हुए गृह युद्ध की याद दिलाने वाली कलाकृतियाँ थीं। कमरों के नाम देखिए – लाल-सबुज (यानी लाल-हरा, बांग्लादेश के झंडे के रंग), बिजय। रेस्तरांओं के नाम स्वाधिकार, बिजय स्मरणी।

ढाका में ईद के एक-दो दिन पहले से ही छुट्टियाँ शुरू हो जाती हैं और लोग पूरी तरह दफ्तरों में आने लगे इसमें एक सप्ताह तक लग जाता है। गारमेंट फैक्टरियाँ पूरे दस दिनों के लिए पूरी तरह बंद रहती हैं। वृहस्पति, शुक्रवार और शनिवार को तो ढाका पूरी तरह सुनसान लग रहा था। 

रविवार को अखबारों में तस्वीरों के साथ खबरें छपीं कि देखिए लोग घरों से वापस आने लगे हैं। चूंकि ईद से पहले जाने वालों और अब ईद के बाद आने वालों की भीड़ काफी तगड़ी होती है इसलिए अखबारों में खबर छपना भी लाजिमी है। वैसे भी ईद के बाद खुमारी मिटाते हुए रिपोर्टर और क्या लिखेंगे।




मैंने ढाकेश्वरी मंदिर जाने के लिए एक रिक्शा ठीक किया। और उससे पूछ लिया कि पांच सौ टाका का छुट्टा हो जाएगा न। उसने कहा छुट्टा तो नहीं है। लेकिन गाहक छोड़ना भी नहीं चाहता था। हम दोनों ने ही सोचा देखा जाएगा। 

ढाकेश्वरी मंदिर हमारे होटल से 4.2 किलोमीटर दूर था। ढाका में इतनी दूर रिक्शे पर जाना आम बात है। वो भी तीन-तीन सवारियों को लादकर। लोग सजी-धजी पोशाकों में और लड़कियां होठों पर बेतरतीब-सी लिपस्टिक लगाए शायद अपने आत्तीय (आत्मीय) स्वजनों (रिश्तेदारों) के यहां ईद के आंमत्रण जा रहे थे। सभी रिक्शे में।

ढाकेश्वरी मंदिर एक ऐसे इलाके में है जिसे किसी भी दृष्टि से खास नहीं कहा जा सकता। बख्शी बागान। एक संकरी गली के बाहर रास्ते को रोकते हुए बैंच पर पुलिस वाले हथियार लिए बैठे थे तो मैंने समझ लिया कि यहीं मंदिर होगा। ढाका का नाम ढाकेश्वरी पर पड़ा या ढाकेश्वरी का नाम ढाका पर, इस पर मतभेद हैं। 

कहते हैं ढाक (बंगाल में प्रचलित ढोल जैसा वाद्य) की आवाज जितने इलाके में पहुंचती थी उस सारे इलाके का नाम ढाका पड़ा। ढाका की प्राचीनता की तुलना में कोलकाता बिल्कुल बच्चा है। कहते हैं मंदिर की स्थापना बारहवीं सदी में हुई थी। गली में जाते हुए हमें पुलिस वालों ने कुछ नहीं कहा, जबकि वे एक अन्य दंपति से काफी पूछताछ कर रहे थे। वे हिंदू बंगाली सज्जन कह रहे थे हम तो जमालपुर से आए हैं, आदि आदि।

मंदिर बिल्कुल छोटा-सा है। चूने और गारे से बना हुआ। कहते हैं इस मंदिर को 12वीं सदी के सेन वंश के राजा बिल्लाल सेन ने बनवाया। मंदिर के बाहर चारों ओर अट्टालिकाएं खड़ी हैं जिनके कारण दूर से कौन कहे, गली के बाहर से भी मंदिर दिखाई नहीं देता। मंदिर कई बार टूटा-फूटा और इस समय जो ढांचा खड़ा हुआ है कहते हैं वह ईस्ट इंडिया कंपनी के एजेंट ने बनवाया। 

कुछ विद्वान कहते हैं बनवाने का मतलब है मरम्मत करवाना। गर्भगृह के बाहर एक बड़ी छत और नीचे बैठने का स्थान बना हुआ है, जो बिल्कुल नया और चमाचम है। मंदिर से सटा हुआ एक तालाब है जैसाकि हर पुराने मंदिर के पास हुआ करता था। वहीं एक लाल बिल्डिंग है जिसमें हिंदू नेताओं का काफी आना-जाना होता है। ढाकेश्वरी न सिर्फ बांग्लादेश में हिंदू आस्था का केंद्र है बल्कि हिंदुओं की सुरक्षा को लेकर चिंतित लोगों का जमावड़ा भी वहीं होता है।

ढाकेश्वरी मंदिर को राष्ट्रीय मंदिर का ओहदा प्राप्त है। ढाका के एक इलाके रमना में स्थित काली मंदिर पहले सबसे बड़ा मंदिर हुआ करता था। लेकिन 1971 में उस मंदिर को आतताइयों का शिकार होना पड़ा। उसके बाद से ढाकेश्वरी ही बांग्लादेश में हिंदुओं की आस्था का सबसे बड़ा केंद्र है। 

मंदिर के अंदर भी सुरक्षाकर्मी थे। गर्भगृह के बाहर कोई कथा चल रही थी। गर्भगृह में दुर्गा की एक बहुत छोटी-सी पीली धातु की मूर्ति स्थापित थी। दुर्गा मंदिर के पास ही चतुर्भुज विष्णु का मंदिर है उसी गर्भगृह में। दुर्गा की आठ सौ साल पुरानी असली प्रतिमा यहां इस मंदिर में नहीं है। उसे कोलकाता के कुमारटुली के एक मंदिर में ले जाकर वहीं स्थापित कर दिया गया है। 
यहां के गर्भगृह में जो स्थापित है वह असली विग्रह की प्रतिकृति है। लोग – पुरुष और महिलाएं और युवा - चुपचाप और उदास से बैठे थे। क्या वे सचमुच उदास थे या उदासी हमारे मन के अंदर थी और हमें हर कोई उदास दिखाई दे रहा था। हिंदू समुदाय के लिए माइनॉरिटी शब्द का उच्चारण अब तक कई बार सुन चुका था। इसके लिए हमारे कान अभ्यस्त नहीं थे। हिंदू बहुसंख्यक देश से आए एक व्यक्ति को यह अजीब लगता है।

रविवार, 31 जुलाई 2016

देखिए न इस्लाम के नाम पर क्या कर दिया

जब भी बांग्लादेश जाना होता है उसके पहले पहले वहां हालात असामान्य हो जाते हैं। पिछली बार बांग्लादेश में घुसने से पहले ही वहां विपक्षी दल का पथ अवरोध शुरू हो गया था जिसमें बसों को आग लगाई जा रही थी। उस समय मुझे ट्रेन से होकर ही ढाका पहुंचना था, इसलिए मन में काफी डर था। 

इस बार वीसा बनवाने के बाद ढाका में एक जुलाई 2016 को गुलशन वाली घटना हो गई जिसमें आईएस के आतंकियों ने कई विदेशियों को मार डाला था। इसके तुरंत बाद किशोरगंज (शलोकिया) में ईद की नमाज के इमाम को मारने के लिए आतंकियों ने हमला किया जिसमें पुलिस वाले मारे गए। 

किशोरगंज की घटना के बाद सोचा कि कार्यक्रम रद्द कर दिया जाए। फिर कार्यक्रम को नहीं बदलने का फैसला किया। क्योंकि बार-बार जाना होता नहीं है। और सोचा कि इतनी बड़ी घटना हुई है तो कुछ ज्यादा जानकारियां मिल जाएंगी।

विमान बांग्लादेश एयरलाइंस को बोलचाल की भाषा में विमान या विमान बांग्लादेश कहते हैं। विमान के उड़ते ही उद्घोषक बिस्मालाह से शुरुआत करती है और अंत अल्लाह हाफिज से। बांग्लादेश का राष्ट्रधर्म इस्लाम होने के बाद से यह जरूरी है। 

एयरलाइंस काफी लचर व्यवस्था वाली है। एयरपोर्ट पर जो बस हमें विमान से गेट तक ले जाने के लिए खड़ी थी वह काफी धुंआ फेंक रही थी। उतना धुंआ फेंकने वाली आजकल हमारे यहां की सीटी बसें भी नहीं रहीं।

अंदर इमीग्रेशन के कई काउंटर तो हैं और विदेशियों के लिए अलग काउंटर भी, पर उन पर इतनी धीमी गति से कार्रवाई होती है कि एक-एक यात्री के लिए 7-8 मिनट लग जाते हैं। मैं जहां कतार में खड़ा था वहां किसी ने उल्टी कर दी थी या पता नहीं किस चीज की गंदगी थी। 

थोड़ी देर में हिजाब परिहित एक सफाई करने वाली महिला आई और उसे साफ कर दिया। मेरे आगे पांच लोग ही होंगे लेकिन खड़े-खड़े पांव दुखने लगे। मैं काउंटर के उस पार देख रहा था जहां मनी एक्सचेंज के करीब आधा दर्जन काउंटर थे। मैं सोच रहा था कि किस काउंटर से हमें डालर को टाका में बदलवाना चाहिए। 

ऐसा नहीं हो कि उधर दलाल पीछे पड़ जाएं। देखा कि सोनाली बैंक के काउंटर से लोग पैसे बदलवा रहे हैं। मैंने भी सोच लिया कि सोनाली बैंक के पास ही जाऊँगा। सोनाली बैंक का नाम किसी समय असम के अखबारों में खूब उछला था। उस समय उल्फा का बोलबाला था और खबरें थीं कि उल्फा के नेता परेश बरुवा का करोड़ों रुपया इसी बैंक में है। 

यह खबर भी निकली कि बांग्लादेश सरकार ने जब से सख्ती बढ़ा दी तब से उसका सारा पैसा बैंक में जब्त कर लिया गया। लेकिन इसके बारे में प्रामाणिक जानकारी मिलना मुश्किल है। खबरें तो ये भी थीं कि फुटबाल के शौकीन परेश बरुवा ने करोड़ों रुपए बांग्लादेश के विभिन्न कारोबारों में लगा रखे हैं।

कई फ्लाइटें एक साथ आई थीं। इमिग्रेशन के जिन काउंटरों पर बांग्लादेशी नागरिक अपने पासपोर्ट पर स्टांप लगवा रहे थे उन पर काफी भीड़ थी। लगभग सभी लोग रियाध, अबू धाबी, दम्माम और दुबई से लौटे थे। उनके पास काफी सामान था। इन देशों से भारत आने वाले यात्री भी जमकर खरीदारी करके आते हैं। आने वाले यात्री उन देशों में काम करते हैं। 

काफी यात्रियों के साथ उनकी पत्नियाँ भी थीं जो काले बुर्के में थीं। काफी पुरुष भी अरब शैली के लंबे चोंगे में थे और उनके बच्चे भी। दक्षिण एशियाई देश बांग्लादेश के माहौल में यह हास्यास्पद लग रहा था।

पहली बार किसी एयरपोर्ट पर देखा कि सामान वाले आधे बेल्ट एक तरफ हैं और आधे बेल्ट दूसरी तरफ। इमिग्रेशन अधिकारी ने सरलता से पूछा ढाका क्यों आए हैं। मैंने कहा किसी परिचित से मिलने। तो उसने कहा - सौजन्यमूलक मुलाकात करने? शुद्ध बांग्ला बोलने का टिपिकल बांग्लादेशी स्टाइल।

सोनाली बैंक के काउंटर पर एक डालर के अस्सी टाका और बीस पैसे के हिसाब से टाका मिल गए। बस डालर लिया, उसे देखा, परखा कि असली तो है न और टाका दे दिए। कोई कमीशन वगैरह नहीं। पास के काउंटर से चार सौ टाका में बांग्लालिंक का सिम कार्ड, टॉक टाइम और डाटा भरवा लिया। आगे कौन यह सब करता रहेगा। बाहर निकलने के गेट पर सूटकेश को एक्स रे कराना पड़ा। खैर!

टैक्सी के काउंटर पर पूछा कि अमुक जगह जाने के कितने तो उसने चार्ट देखकर कहा चौदह सौ। मैंने अपनी सूटकेश पकड़ी और कहा कि बाहर तीन सौ में सीएनजी ले लूंगा। यहां ऑटोरिक्शा को सीएनजी कहते हैं क्योंकि वे सीएनजी से चलते हैं। टैक्सी के काउंटर वाले ने कहा कि नाराज क्यों होते हैं चलिए सौ टाका कम दे दीजिएगा।

मैंने कहा सात सौ दे सकता हूं। मेरे लाख रुखापन दिखाने के बावजूद उसने सात की जगह आठ सौ के लिए मुझे मनवा ही लिया। आखिर हमारा होटल था भी 18 किलोमीटर दूर। आते समय इतनी ही दूरी के लिए ऑटो वाले को तीन सौ टाका दिए। ऑटो यानी सीएनजी और टैक्सी में इतना फर्क तो होता ही है।

टैक्सी कंपनी का कर्मचारी हमारी मदद के लिए हमारे साथ हो गया। उसने कहा बस टैक्सी आ ही रही है। उसने ड्राइवर को फोन कर दिया था। कहा कि चेकिंग के लिए पांच मिनट लेट हो रहे हैं। गुलशन की घटना के बाद चेकिंग बढ़ा दी है। देखिए न इस्लाम के नाम पर कितना बुरा काम कर दिया। 

मैंने पूछा यहां जो इतनी पुलिस मिलिटरी है हमेशा रहती है या इस घटना के बाद लगा दी है। उसने कहा हमेशा रहती है। फिर और भी कुछ-कुछ बताने लगा। नई बात यह हुई है कि अब एयरपोर्ट आने वाली हर टैक्सी और गाड़ी के यात्रियों को उतारकर बाकायदा तलाशी ली जाती है।

टैक्सी पर पानी के छींटें लगे हुए थे। पता नहीं धुलाई करके लाया था या और कुछ। यह एक काफी पुरानी टोयोटा कार थी। ढाका में जितनी भी कारें हैं वे सभी टोयोटा हैं। दूसरी कंपनियां अपवाद स्वरूप ही दिखाई देती हैं। टोयोटा भी जापान से पुरानी रीकंडीशंड की हुई आती हैं। 

2012-13 के मॉडल का करीब 22-23 लाख टाका पड़ जाता है। कारों के बहुत दाम हैं क्योंकि आयातित कारों पर 300 फीसदी तक ड्यूटी लगती है। मैंने पूछा कुछ लोगों को ड्यूटी से छूट मिल जाती होगी। 

लेकिन नहीं, यहां सिर्फ संसद सदस्यों को ही यह छूट मिलती है। आखिर जनता के प्रतिनिधियों को जनता से मिलने के लिए काफी घूमना भी तो पड़ता होगा।