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Journalist and writer, Writes on Northeast India, Bangladesh, Myanmar

रविवार, 8 सितंबर 2019

क्या असम में बांग्लादेशियों का होना एक मिथ था


राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर (एनआरसी) एक ऐसा दस्तावेज है जिसके प्रकाशित होने से कोई भी खुश नहीं हुआ। लेकिन यह वैसे ही है जैसे नया टैक्स लगने से कोई खुश नहीं होता। धीरे-धीरे टैक्स को भी तर्कसंगत बनाया जाता है और लोग भी समझने लगते हैं कि टैक्स तो देना ही होगा। इसी तरह एनआरसी को भले खुद सत्ताधारी दल के अध्यक्ष ने रद्दी का टुकड़ा बताया हो लेकिन अंततः सभी को एनआरसी को मानना ही होगा।

इस संदर्भ में असम के मंत्री हिमंत विश्व शर्मा का बयान काफी मायने रखता है। उनके पहले आए बयान से ऐसा लगता था कि सरकार एनआरसी पर न्यायपालिका के निर्णय को पलटने वाला कोई बिल संसद में पारित करवा सकती है। 

लेकिन उनके हाल के बयान में कहा गया है कि वे सुप्रीम कोर्ट से अपील करेंगे कि सीमावर्ती जिलों में कुछ प्रतिशत लोगों के डेटा की फिर से जांच की जाए ताकि पता लग सके कि क्या एनआरसी की प्रक्रिया में ठीक ढंग से काम हुआ या इसमें धांधली हुई।

दूसरे, उन्होंने यह मार्के की बात कही कि किसी का नाम छूट गया है तो उसके लिए प्रक्रिया है और वह देर-सबेर अपना नाम वापस एनआरसी में दर्ज करवा सकता है। हालांकि ऐसा विदेशी ट्राइब्यूनलों के लंबे और थका देने वाले चक्करों के बाद ही होगा। 

और सबका होगा या नहीं यह भी ठीक नहीं है। उनका कहना यह था कि जिन विदेशियों के नाम एनआरसी में शामिल हो गए हैं उन्हें वापस निकालने के लिए कोई प्रक्रिया नहीं है। और यदि सुप्रीम कोर्ट ने उनकी याचिका पर ध्यान नहीं दिया तो जिनके नाम इस बार एनआरसी में शामिल हो गए हैं वे पक्के भारतीय नागरिक बन गए हैं।


एनआरसी को लेकर दो तरह की आपत्तियां हैं। एक, कई भारतीयों के नाम इसमें शामिल नहीं हो पाए। इनमें मुख्य रूप से बंगाली हिंदू, बंगाली मुसलमान और कुछ गोरखा समुदाय के लोग हैं। कहते हैं लगभग पांच लाग हिंदू और साढ़े सात लाख मुसलमान बंगालियों के नाम इसमें आने से छूट गए हैं। काम भले सुप्रीम कोर्ट की निगरानी में हो या सरकार की निगरानी में, हमारे देश में सरकारी काम किस तरह होता है यह हम जानते हैं और नोटबंदी के समय हमने फिर से जान लिया। 

जब तक नया एसओपी नहीं आया था हजारों हिंदीभाषी भारतीय दस्तावेज का जुगाड़ करने के लिए इधर से उधर दौड़ रहे थे। तो फिर बंगाली हिंदू और बंगाली मुसलमानों में से हजारों वास्तविक भारतीयों की क्या हालत हुई होगी और उनमें से बहुतों के नाम निश्चित रूप से छूटे होंगे।

इस लेखक का पिछले साल का एनआरसी से छूटे लोगों की मदद करने का कुछ अनुभव है। एक मामला ऐसा भी आया जिसमें पति-पत्नी दोनों के नाम (दोनों बंग्लाभाषी) तो एनआरसी में आ गए लेकिन उनके 10-12 वर्षीय पुत्र का नाम इसलिए नहीं आ पाया क्योंकि बताया गया कि फोरेनर्स ट्राइब्यूनल ने उसके नाम को अस्वीकार कर दिया था। भारतीय माता-पिता का वह विदेशी बच्चा किसी दिन डिटेन्शन कैंप में भेज दिया जाए तो क्या बड़ी बात है।

मूल असमिया लोगों को एनआरसी से घोर निराशा होने का कारण है कि वे लोग सोच रहे थे एनआरसी प्रक्रिया के कारण कम-से-कम 30-40 लाख मुसलमानों के नाम एनआरसी और फिर मतदाता सूचियों से कट जाएंगें। इसीलिए कुछ लोग अंतिम सूची के प्रकाशित होने के पहले से आंदोलन करने लग गए कि इस सूची में बहुत से विदेशी लोगों के नाम शामिल हो गए हैं।


मूल असमिया लोगों के आतंकित होने के कारणों का विश्लेषण करें तो हम पाएंगें कि असम के एक विशेष इलाके में मुसलमानों की संख्या में 1971 से बहुत बड़ा इजाफा हुआ है। इस विशेष इलाके में पुराना ग्वालपाड़ा, बरपेटा, कामरूप, दरंग और नगांव (सभी पुराने जिले) पड़ते हैं, इसे हम आगे सुविधा के लिए लोअर असम कहेंगे। इस इलाके में मुसलमानों की संख्या सारे भारत की तुलना में अति तीव्र गति से बढ़ी है जो आज इस इलाके की कुल आबादी का पचास प्रतिशत यानी 83.5 लाख है। 

इससे कुछ कम गति से पश्चिम बंलाल के कुछ जिलों की आबादी बढ़ी है। 1971 से 2011 के बीच मुसलमानों की आबादी बढ़कर तिगुना हो गई जबकि भारतीय धर्मावलंबियों की आबादी इस दौरान 1.8 ही बढ़ी। एक और आंकड़ा देखें। 1901 से 2011 तक की समयावधि में पूरे असम में मुसलमानों की आबादी 22 गुना बढ़ गई जबकि बाकी भारतीय धर्मावलंबियों की संख्या 7 गुना ही बढ़ी। और लोअर असम की बात करें तो यहां मुसलमानों की आबादी इन 110 सालों में बढ़कर 40 गुना हो गई।


एक और आंकड़ा देखें। वर्ष 2001 में असम में मुसलमानों की आबादी 82 लाख थी। यदि यह आबादी बाकी धर्मावलंबियों की ही रफ्तार से बढ़ती तो इसे 56 लाख होना चाहिए था। यदि हम इस तथ्य को भी नजर में रखते हैं कि सारे भारत में मुसलमानों की वृद्धि दर औसत से थोड़ी ज्यादा है और यदि असम के मुसलमानों की संख्या भी बाकी भारत के मुसलमानों की वृद्धि दर के अनुसार ही बढ़ती तो यह 72 लाख होती। 

तो फिर हम जिस समयावधि की बात कर रहे हैं सिर्फ उसी अवधि में 10 लाख अतिरिक्त लोग कहां से आए? क्या असम के मुसलमानों की वृद्धि दर ज्यादा है या फिर बांग्लादेश से अतिरिक्त लोग यहां आ गए?

कुछ लोगों का कहना है कि असम में तीस-चालीस लाख बांग्लादेशी लोगों का होना एक मिथ था जो एनआरसी प्रक्रिया ने पूरी तरह तोड़ दिया। लेकिन क्या यह उसी तरह का मिथ था जिस तरह भारत में काले धन का होना था। 

नोटबंदी के बाद सारे नोट रिजर्व बैंक में वापस पहुंच गए, यह क्या प्रमाणित करता है? कि भारत में कभी काला धन रहा ही नहीं और यह एक मिथ था। या भारत की सरकारी व्यवस्था एक बीमार व्यवस्था है जिसके माध्यम से आप न तो काले धन को निकलवा सकते हैं, न ही विदेशी नागरिकों की पहचान कर सकते हैं।


हमारे विचार से एनआरसी को लेकर सुप्रीम कोर्ट में फिर से अपील करने का कोई फायदा नहीं है। काम तो अंततः वही मशीनरी करेगी। यह कहने का भी कोई फायदा नहीं है कि यह एक रद्दी का टुकड़ा है और हम इसे नहीं मानते। कानूनी प्रक्रिया को अंततः मानना ही पड़ेगा भले आप सत्ताधारी दल के अध्यक्ष ही क्यों न हो।

दूसरे, मूल भारतीयों को इस बात से संतोष करना चाहिए कि अंततः सुप्रीम कोर्ट के प्रयास के कारण हमें एक दस्तावेज हासिल हुआ है जिसके आधार पर हम किसी भी पड़ोसी देश से नए आने वाले लोगों की पहचान कर सकते हैं। जो काम 1985-90 तक हो जाना चाहिए था, वह काम आज भी हो गया तो अच्छा ही है। यदि आज भी हमारे पास एक एनआरसी नहीं होती तो आगामी 10 वर्षों में कितने अवैध विदेशी असम में घुस जाते और घुलमिल जाते इसके बारे में भी सोचना चाहिए।


जहां तक लोअर असम की आधी आबादी के मुस्लिम हो जाने का सवाल है तो एनआरसी के बाद असम के सभी निवासियों को इस नई सच्चाई के साथ जीना सीखना होगा। यह विडंबना ही है कि 1978 से विदेशियों के खिलाफ आंदोलन शुरू हुआ और लोअर असम में मुसलमानों की संख्या भी 1971 से 2011 के बीच ही उस सदी में सबसे अधिक बढ़ी। यदि 1978 से ही एनआरसी बनने की प्रक्रिया शुरू हो जाती तो हो सकता है लोअर असम में आबादी का संतुलन इस तरह नहीं बिगड़ता।

हो सकता है उपरोक्त बातों से हम पर सांप्रदायिक होने का आरोप लगे लेकिन हम मानते हैं कि भारत के किसी भी इलाके में किसी एक धर्म के मानने वालों की आबादी इतनी अधिक न बढ़े कि दूसरे धर्म के लोग अपने आपको अल्पसंख्यक में तब्दील होता हुआ देखने लगे। हमारा मानना है कि इससे भविष्य के लिए कई तरह के नए संकट खड़े होंगे।


और अंत में, यदि असम में तीस-चालीस लाख बांग्लादेशियों का होना एक मिथ ही था, तो फिर इस बात के कारण खोजे जाने चाहिए कि सिर्फ लोअर असम और पश्चिम बंगाले में 1971 से 2011 के बीच मुसलमानों की वृद्धि दर सारे भारत में सबसे अधिक क्यों रही।

शनिवार, 17 जून 2017

थाईलैंड 4 - नया धर्म पुरानी मान्यताएं


जब हम पहाड़ पर चढ़ाई चढ़ रहे थे तो अचानक कहीं से किसी चीज के तेजी से गिरने की आवाज आई। मुझे लगा कहीं पटाखे फूट रहे हैं। लेकिन जंगल में पटाखों का क्या काम। आवाज की दिशा में देखा तो एक करीब 50 फुट का पेड़ हरहराकर गिर रहा था। मैंने जीवन में पहली बार किसी पेड़ को इस तरह अपने-आप स्वाभाविक रूप से मरते देखा। गाइड बताता है कि यह पेड़ वहीं पड़ा सड़ जाएगा। इसे इतने घने जंगल से बाहर लाना संभव नहीं है।

चियांग माई के इस राष्ट्रीय पार्क की वनस्पति की विविधता अति समृद्ध है। रास्ते में गाइड हमें दिखाते चलता है देखिए इस छाल का प्रयोग खाने में होता है। हम खाकर देखते हैं, अरे यह तो दालचीनी है। क्या इस पेड़ की छाल को ही हम इतनी कीमत देकर बाजार में खरीदते हैं। 


ज्यादातर दालचीनी बाहर निर्यात होती है, थाई खाने में तीखे मसालों की उतनी प्रधानता नहीं है। हाँ तीखी मिर्च ये लोग जरूर खाते हैं। अलग-अलग मिर्च अलग-अलग तरह से खाने के लिए उपयुक्त होती है। कोई मिर्च कच्ची खाने के लिए, कोई चटनी बनाकर भात के साथ, तो कोई खाने में तीखेपन के लिए मिलाने के लिए।

एक घास जैसी वनस्पति का अंदर का कोमल हिस्सा निकालकर वासे हमें देता है। कहता है इससे पेट में मरोड़े उठे तो ठीक हो जाते हैं। पेट के लिए अच्छी है। एक जगह एक बड़े पाइन पेड़ का तना जला हुआ है। शायद अपने आप आग लग गई होगी। पाइन का मोम जैसा तेल तने से बाहर निकल रहा है। गाइड बताता है कि बचपन में वे लोग इस तरह पाइन से मोम निकालकर उसकी रोशनी में पढ़ा करते थे। आगे बढ़ते हुए कहीं-कहीं गाइड एकाएक रुक जाता है। दिखाता है देखिए ये सांप के यहां से जाने के निशान हैं। सांप लहराती हुई गति से जाता है, कोमल मिट्टी पर अपने निशान छोड़ता हुआ। एक स्थान पर एक छोटी चिड़िया के पंख मिलते हैं। कुंग अंदाजा लगाता है कि किसी चील जैसे शिकारी पक्षी ने किसी छोटी चिड़िया का शिकार किया होगा और उसी के पंख यहां बचे पड़े हैं।

यहां के जंगल में असम के जंगलों की तरह बड़े जानवर बहुतायत में नहीं हैं। बड़े जानवरों में बाघ और भालू हैं। बाकी जंगली मुर्गा, जंगली मोर, जंगली सूअर आदि हैं। जंगल पर निर्भर रहने वाली जनजातियां जंगली सूअर आदि का शिकार करना पंसद करती हैं।

कंचनार के बड़े-बड़े सफेद फूलों से जंगल भरा पड़ा है और इसे एक अनुपम सौंदर्य प्रदान करता है। साथ ही झिंगुरों की अलग-अलग तरह की आवाज का संगीत लगातार हमारे साथ चलता रहता है। एक लीची के पेड़ के पास हम रुकते हैं। वासे इस बात की तहकीकात करता है कि लीची का पेड़ मर क्यों रहा है। ध्यान से देखने पर दिखाई देता है कि पूरे पेड़ को चिंटियों ने अपना बसेरा बना लिया है। 

अब यह पेड़ अपने अंतिम दिन गिन रहा है। इसी तरह एक और पेड़ की ओर दिखाते हुए कुंग बताता है कि इसके पत्तों से भयानक खुजली हो जाती है और वह करीब एक सप्ताह बाद ही जाती है। वह थाई, कारेन और मोंग भाषा में उसका नाम बताता है। थाई भाषा में उसे वान चांग हाइ कहते हैं। वान यानी वनौषध, चांग यानी हाथी और हाइ अर्थात आंसू। यानी हाथी को भी आंसू ला देने वाली वनौषध।

एक समय हम पहाड़ की चोटी पर पहुंच जाते हैं। आदत नहीं होने के कारण सांस फूलती है, और घुटने लगभग जवाब दे चुके होते हैं लेकिन कुंग बताता है कि अब और चढ़ाई नहीं है। यहां से नीचे के कई छोटे-छोटे शहरों की धुंधली-सी आकृति दिखाई देती है। चियांग माई शहर कहीं दिखाई नहीं दे रहा। वह उस पहाड़ी के उस पार छिप गया है। 

यानी हम एक पहाड़ी को पार कर उसके इधर आ गए हैं। मुझे नगा पहाड़ियां पारकर बर्मा में छुपे अलगाववादी नेता परेश बरुवा से मिलने जाने वाले पत्रकार का वह ब्योरा याद आ गया जिसमें वह बताता है कि किस तरह वे लोग सुबह चार-पांच बजे से नौ-दस बजे तक एक-एक चढाई पार कर परेश बरुवा से मिलने बर्मा पहुंचे थे। 

चोटी पर बोर्ड लगा है – यह स्थान समुद्र तल से करीब 1500 मीटर ऊपर है। यहां की वनस्पति भी अब एकरस हो गई है। ज्यादातर बर्च और चीड़ के पेड़ हैं। वहीं एक चिकने को पत्थर को दिखाकर कुंग बताता है यहीं थाईलैंड के राजा ने भोजन किया था। हम भी उस स्थान पर बैठकर फोटो खिंचवाते हैं।

सरकार ने एक जगह बैठने और दोपहर का भोजन करने के लिए लोहे का पुल जैसा बना दिया है। पुल पर एक छोटी-सी बुद्ध प्रतिमा रखी है। हमारे खाने के लिए भात गाइड के झोले में थे। धर्म से ईसाई वासे बुद्ध को भोग लगाने की तैयारी कर रहा है। मैं कनखियों से यह सब देख रहा था और हेनिंग को इशारा कर दिया कि वह भोग लगने से पहले खाना न खाए। वासे मोंग भाषा में गीत गाता है, भगवान को भोग ग्रहण करने की प्रार्थना करता हुआ सा। 

उसके बाद हम थाई शैली में बनाए हुए भात, स्ट्राबेरी और केले का भोजन करते हैं। यहां की तरह फिलीपीन्स में भी मैंने देखा कि लोग अपने पुराने रीति-रिवाजों और मान्यताओं को अब भी छोड़ नहीं पाए हैं। फिलीपीन्स में तो धर्म से कैथोलिक होते हुए भी लोग एक पुराने ऐतिहासिक क्रास के टुकड़ों को ही चाकू से खुरच लाते हैं और उसका ताबीज बनाकर गले में पहन लेते हैं। है न एशिया और यूरोप का अनोखा मेल।

पहाड़ से उतरकर गाड़ी में वापस चियांग माई शहर आने में लगभग दो घंटे समय लगता है। कुंग ने कहा कि आपलोग थोड़ी देर सो सकते हैं। लेकिन दुखते पैरों के साथ नींद किसे आने वाली थी। रास्ते में कुंग ड्राइवर के साथ काफी गंभीरता से बतिया रहा था। फिर उसे लगा कि हमें भी बातचीत में शामिल करना चाहिए। उसने बताया कि उसकी एक लड़की के साथ सगाई लगभग तय हो गई थी, लेकिन फिर पता चला कि लड़की का किसी के साथ प्रेम प्रसंग चल रहा है। 

उसने कहा कि अब मुझे यह सगाई नहीं करनी। सारे रास्ते वह इस प्रकरण की महीन से महीन बातें हमें बताता रहा और हमारी सलाह लेता रहा। मैंने हेनिंग से कहा कि थोड़ी सी संख्या वाले (कारेन लोग मुख्य रूप से बर्मा में रहते हैं, थाईलैंड में इनकी संख्या अधिक नहीं है) जनसमूहों में ऐसी दिक्कते आती हैं जिनकी हम बड़े जनसमूह अक्सर कल्पना भी नहीं कर पाते। समय पर शादी नहीं हो पाना भी ऐसी ही एक समस्या है।

बैंकाक में चने वाला

इस बार फिर से बैंकाक में रुकना हुआ। इस बार मुख्य बाजार से सात-आठ किलोमीटर रुका। होटल के पास ही एक खुले स्थान में शराब और खाने-पीने की दुकानें लगी हुई थीं जो शाम के बाद ही खुलती थीं और देर रात तक खुली रहती थीं, जैसाकि बैंकाक के टूरिस्ट इलाकों में चलन है। जब हम बैठकर कुछ खा रहे थे तो अचानक आवाज आई क्या भैयाजी कैसे हैं। 

नजर उठाकर देखा तो एक भारतीय युवक था, यूपी या बिहार का रहने वाला लग रहा था और सेंकी हुई मुंगफली और चना वगैरह बेच रहा था। अपने यहां लोग मुंगफली और चना आदि के बारे में अच्छी तरह जानते हैं चाहे वह देश के किसी भी राज्य का निवासी हो। लेकिन वहां विदेशी पर्यटकों को पहले बताना पड़ता है कि यह मुंगफली है, जरा चखकर देखिए। उसने हमें भी चम्मच से मुंगफली चखने के लिए दी। वह बिहार का रहने वाला था और पहले किसी दुकान में काम करने के लिए यहां आया था। 

साल भर के वीसा पर है। बैंकाक में भारतीय व्यापारी, दर्जी और दुकानों में काम करने वाले कर्मचारी तो काफी संख्या में हैं, लेकिन इस तरह घूम-घूमकर चना बेचने वाला व्यक्ति पहली बार मिला। याद आया, इसी तरह रंगून में पार्क के बाहर पकोड़ी तलता एक भोजपुरी भाषी खोमचा वाला मिल गया था, जिसे पुलिस वाला वहां से जबरदस्ती हटा रहा था। इसे क्या कहेंगे, एक यूपी-बिहार वाले का जीवट या यूपी-बिहार की बेरोजगारी पर टिप्पणी।

शुक्रवार, 16 जून 2017

मोंग युवक को गुस्सा क्यों आता है


जंगल में काफी दूर तक गाड़ी और मोटरसाइकिल जा सकती है। हमें पार कर एक मोटरसाइकिल वाला आगे बढ़ गया। उसके झोले में एक मुर्गा था। वासे ने वहां जंगली मुर्गा पकड़ने की विधि के बारे में बताया। ये लोग अपना पालतू मुर्गा जो किसी डोर से बंधा होता है, जंगल में छोड़ देते हैं। मुर्गा जब जंगल में जाकर कुकड़ूकू बोलता है तो जंगली मुर्गे उसके पास आ जाते हैं और उसके साथ झगड़ने लगते हैं। 

इस झगड़े के बीच मुर्गे का मालिक अचानक प्रकट होता है और बड़ी चालाकी से जंगली मुर्गे को अपने झोले में डालकर चलता बनता है। यह भी जंगल के लोगों के रोजगार का एक साधन है।

हम धीरे-धीरे चढ़ाई चढ़ रहे हैं। रास्ते पर ही कटे हुए दो डंडे रखे थे, वासे ने वे डंडे हम दोनों को दे दिए। हेनिंग हमेशा हाइकिंग करता रहता है, उसे सहारे के लिए डंडे की जरूरत नहीं। वृक्षों पर कहीं-कहीं अंकों के बोर्ड लगे हैं। ये सेना वालों के संकेत हैं। वे इस रास्ते पर रोजाना ट्रैकिंग के लिए आते हैं। 

पास ही रास्ते के किनारे काफी दूर-दूर तक बड़े-बड़े पत्थर रखे मिलते हैं। इनकी कहानी इस इलाके में अफीम की खेती से जुड़ी हुई है। यह चियांग माई प्रदेश थाईलैंड के अधीन आने के बाद थाईलैंड के राजा ने अफीम की खेती बंद कराने के लिए काफी मशक्कत की। इसी का एक भाग यह था कि पत्थरों को हटाकर एक जगह कर दिया जाए ताकि जिन स्थानों पर पहले पत्थर थे और आम चीजों की खेती संभव नहीं थी वहां साधारण मोंग लोग साधारण चीजों की खेती कर सके। उत्तरी थाईलैंड, लाओस और बर्मा की सीमाओं का संधिस्थल - यही वह इलाका है जिसे अफीम की खेती और अवैध हथियारों के व्यवसाय के कारण सुनहरा त्रिभुज या गोल्डन ट्रैंगल का नाम दिया गया है।

आगे चलकर देखा एक पहाड़ी झरने को रोककर बांध बनाया गया है। हालांकि अभी पानी नहीं है। बारिश जुलाई से शुरू होती है। इस झरने को रोकने से आसपास की पूरी जमीन की सिंचाई हो जाती है और खेती अच्छी होती है। इन्हें मेओ चेकडेम कहा जाता है। मेओ मोंग जनजाति का ही दूसरा नाम है। 

कुंग बताता है कि मेओ नाम में हिकारत का भाव है। इसलिए मोंग लोग अपने आपको मेओ कहे जाने पर गुस्सा हो जाते हैं। जैसे, कारेन लोगों को थाई लोग हिकारत से कारेयानी कहते हैं। यहां भी वही असम और पूर्वोत्तर की कहानी दोहराती-सी लगती है। कार्बी को मिकिर, मिजो को लुशाई, आदि को अका और आपातानी को आबर कहकर अपने आपको सभ्य मानने वाली असम की मैदानी जातियां इन जनजातियों के प्रति अपना हिकारत का भाव व्यक्त करती थीं। जैसे ही इन जनजातियों में थोड़ी जागृति आई इन लोगों ने सबसे पहले अपने नामकरण को ठीक किया। 

उत्तरी थाईलैंड पर भी यही बात लागू होती है। हालांकि हमने महसूस किया कि चीनी, लाओ, विएतनामी और थाई लोगों के साथ मोंग लोगों का एक शत्रुता का भाव है, जो उन्हें मेओ कहकर उनका अपमान करने में व्यक्ति होता है।

मोंग लोग इस इलाके में चीन से आए। विद्वानों का कहना है कि मोंग दरअसल साइबेरिया, मंगोलिया और तिब्बत के बाशिंदे थे जो वहां से पहले चीन चले गए। बाद में विभिन्न कारणों से वे धीरे-धीरे दक्षिण की ओर जाने लगे। इस तरह दक्षिणी चीन, लाओस और विएतनाम, जोकि आपस में जुड़ा हुआ इलाका है, इनकी निवासभूमि बना। 
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लाओस के कम्युनिस्ट गुरिल्लों ने जब फ्रांस द्वारा समर्थित राजा के खिलाफ विद्रोह की घोषणा कर दी तो 1953 से 1975 तक चले गृहयुद्ध के दौरान मोंग जनजाति के लोगों ने फ्रांस और राजा का साथ दिया था। इस युद्ध में अमरीका की बड़ी भूमिका थी, और इसकी खुफिया एजेंसी सीआईए ने पैसों का लालच दिखाकर मोंग युवकों का कम्युनिस्टों के खिलाफ युद्ध में भरपूर इस्तेमाल किया। इसी तरह विएतनाम में मोंग लोगों ने अमरीका का साथ दिया। इसलिए जब 1975 में कम्युनिस्टों की जीत हो गई तो बड़ी संख्या में मोंग लोगों को पलायन करके थाईलैंड में शरण लेनी पड़ी।

आज भी आप सोशल मीडिया पर थोड़ी ताकझांक करें तो लाओ, विएतनामी और मोंग लोगों के बीच तकरार होती देखेंगे। एक अमरीकी युवक ने पूछ लिया कि मेओ का अर्थ क्या होता है। इस पर सोशल मीडिया पर क्रोध भरे जवाब आए। अमरीकी युवक ने कहा कि भई मुझे नहीं पता कि मेओ कहने पर आप क्यों भड़क रहे हैं। दरअसल मैं भी एक मोंग हूँ, मेरा जन्म अमरीका में ही हुआ है, और अपनी मातृभूमि के बारे में मैं जरा भी वाकिफ नहीं हूं। 

दरअसल युद्ध के बाद बड़ी संख्या में मोंग लोगों ने अमरीका, फ्रांस, अर्जेन्टिना और आस्ट्रेलिया में शरण ली। मोंग लोग अधिकतर ईसाई होते हैं, कैथोलिक और प्रोटेस्टेंट। इस कारण भी इनके साथ लाओस और विएतनाम में इनके साथ भेदभाव की घटनाएँ आम हैं। लाओस और विएतनाम के लोग ज्यादातर बौद्ध होते हैं। पूर्वोंत्तर की कई जनजातियों की तरह मोंग लोगों को भी बांसुरी बजाना काफी पसंद है और ये लोग बांस से असम के पेंपा जैसा एक वाद्य भी बनाकर चाव से बजाते हैं।

हमारी यात्रा खत्म होने के बाद हम वासे के घर गए। उसके घर के पास ही उनके समाज का एक कार्यालय बना हुआ है। कार्यालय में एक रजिस्टर रखा हुआ है जिसमें उन लोगों ने अपनी टिप्पणियां लिख छोड़ी है जो वहां मोंग गांव में रहने के लिए आते हैं। दरअसल यह थाई सरकार की एक बहुत ही अच्छी योजना है। वहां कुछ परिवार ऐसे हैं जिनके घर में विदेशी पर्यटकों के रहने लायक सुविधा है। 

इसके लिए उन्हें सरकार से ऋण आदि मिला है। इन परिवारों के पास विदेशी पर्यटक आकर रहते हैं जनजातीय जीवन का जायजा लेने के लिए और प्रकृति की गोद में कुछ दिन बिताने के लिए। हमने रजिस्टर में देखा आने वाले कुछ लोग नृतत्वविद भी थे। 

ये लोग विभिन्न जनजातियों की जीवन शैली पर शोध करते हैं। इस योजना से दोनों ही पक्षों को अच्छा लाभ हो जाता है। शोधार्थियों या पर्यटकों रहने के लिए स्थान मिल जाता है और गांव वालों को कमाई एक जरिया। हेनिंग रजिस्टर में उनलोगों की लिखावट पढ़ रहा था जो उसके देश जर्मनी से आए थे।