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Journalist and writer, Writes on Northeast India, Bangladesh, Myanmar

रविवार, 1 जनवरी 2017

वर्ष 2017 में कुछ पहेलियां सुलझाएं

नया साल देखते-देखते बीत गया। देखते-देखते बीत जाना क्या यह सिर्फ एक अहसास है या सचमुच आज की जिंदगी इतनी मसरूफियत भरी हो गई है कि सबकुछ देखते-देखते बीत जाता है और पता ही नहीं चलता। 

कुछ तो बदलाव आया है समाज में कि जिंदगी पहले की अपेक्षा अधिक व्यस्ततापूर्ण हो गई है। ऐसा नहीं है कि हम अपने बुजुर्गों की अपेक्षा कोई अधिक महत्वपूर्ण काम कर रहे हैं, फिर भी हम अपने-अपने बुजुर्गों की जीवन शैली याद करें तो पाएंगे कि उसमें एक लय थी, जो अब आपाधापी में बदलती जा रही है।

व्यस्तता बढ़ने के दो कारण तो बिल्कुल स्पष्ट हैं। एक, आवागमन और संचार के साधनों का बढ़ जाना। पहले दूर किसी राज्य में कोई आयोजन होता था तो जाने के बारे मे सोचते तक नहीं थे। आजकल सोचते ही नहीं बल्कि अधिकतर मामलों में लोग दूर-दराज के आयोजनों में भाग लेने जाते भी हैं। इसी तरह संचार के माध्यम बढ़ जाने के कारण काफी समय बातचीत में चला जाता है। 

पहले लगता था कि अब फोन नंबर डायल नहीं करना पड़ेगा और बटन दबाते ही मनचाहा नंबर लग जाएगा तो समय बचेगा। लेकिन समय बचा नहीं वह ज्यादा खर्च होने लगा। जैसे ही संचार का कोई नया माध्यम आता है वह आपके पाकिट से थोड़ा समय चुरा कर ले जाता है। फेसबुक, इंस्टाग्राम, व्हाट्सएप – सब पर यह बात लागू होती है।

दूसरा कारण है, आबादी का बढ़ना। साठ और सत्तर के दशकों में आबादी में जो बढ़ोतरी हुई उसका नतीजा आज की आपाधापी में दिखाई देता है। आप अपने माता-पिताओं से तुलना कर देखिए। उनके जितने रिश्तेदार हुआ करते थे, उनकी तुलना में आज की पीढ़ी के रिश्तेदार अधिक मिलेंगे। रिश्तेदारियों का संख्या में बढ़ना भी आज की आपाधापी का एक प्रमुख कारण है। हो सकता है आने वाली पीढ़ी इस अर्थहीन व्यस्तता से बच जाएगी क्योंकि आज जनसंख्या के बढ़ने की गति वापस धीमी हो चुकी है।

अक्सर पूछा जाता है कि ज्ञान प्राप्त करने का सबसे अच्छा तरीका क्या है। मुझे लगता है पहेलियां बुझाना ज्ञान प्राप्त करने का सबसे अच्छा तरीका होता है। उत्तर जानने के पहले आपके दिमाग में प्रश्न आना होगा। कक्षा में शिक्षक आते हैं और पाठ्यक्रम से निकालकर ज्ञान की बौछार करने लगते हैं। 

बहुत कम ही छात्र होते हैं जिन्हें इस अनचाही ज्ञानगंगा में भींगना पसंद होता है। इसकी बजाय यदि छात्र की ओर से ही कोई प्रश्न आए और शिक्षक उनका उत्तर दें तो वैसे उत्तर छात्रों का मस्तिष्क पूरी तरह सोख लेगा और वह जानकारी उनके ज्ञान का हिस्सा बन जाएगी।

वर्ष 2016 इस पहेली का उत्तर खोजने में बीत गया कि भारत की जिस चीज को सारी दुनिया पूजती है उसे भारतवासी क्यों अपने यहां से बहिष्कृत कर देते हैं। पिछले ढाइ हजार सालों में भारत में पैदा हुए जिन दो व्यक्तियों ने दुनिया को मौलिक ज्ञान दिया है वे हैं गौतम बुद्ध और गांधी। 

इन दोनों को भारत के बाहर पूजा जाता है। गौतम बुद्ध ने दुनिया को जो दे दिया उसके बाद एक तरह से और कुछ जानने के लिए बाकी नहीं रह जाता। उस पर अमल करने को छोड़कर। और गांधी ने ऐसे प्रश्नों का सामना किया जिनके उत्तर की अधिक तलाश आने वाली पीढ़ियों को होने वाली है। और पिछले डेढ़ हजार वर्षों में भारत में ऐसा क्या हुआ कि इन दोनों की ही विचारधाराओं को भारत से पूरी तरह बहिष्कृत कर दिया गया। गांधी को तो हमने शारीरिक रूप से ही हमारे बीच से हटा दिया। 

गौतम बुद्ध के बारे में यूनिवर्सिटी के किसी प्रतिभावान छात्र से पूछिए तो ज्यादा संभावना इस बात की है कि वह कहेगा – गौतम बुद्ध बौद्ध धर्म के प्रवर्तक थे, उनकी प्रेरणा से सम्राट अशोक ने बौद्ध धर्म ग्रहण कर लिया। 

लेकिन गौतम बुद्ध के इस धरती पर आने और रहने की घटना सिर्फ एक धर्म प्रवर्तक के जन्म लेने की घटना नहीं है। इसी तरह गांधी के बारे में पूछिए तो लोग आपको बताएंगे कि गांधी हमारे राष्ट्रनायक थे, उन्होंने स्वाधीनता आंदोलन का नेतृत्व किया। लेकिन स्वाधीनता आंदोलन सभी उपनिवेशों में हुए और सबके अपने-अपने राष्ट्रनायक थे। लेकिन गांधी इस समूची दुनिया के लिए अनूठे क्यों थे।

बौद्ध पर्यटकों के भारत आने पर हमें थोड़ी देर के लिए अहसास होता है कि ओह बौद्ध धर्म का जन्म भारत और नेपाल की धरती पर ही हुआ था। लेकिन रोजमर्रा की जिंदगी का ऐसा कोई जीवंत अहसास नहीं है जो यह दिखाता हो कि हम ही गौतम बुद्ध की परंपरा के वारिस हैं। 

इसी तरह गांधी की तस्वीर और गांधी के नाम की पूजा होती है लेकिन गांधी किसलिए गांधी थे यह बहुत कम लोग जानते हैं। आश्चर्य ही क्या कि उनकी विचारधारा को आगे बढ़ाने का काम भारत में कहीं दिखाई नहीं देता।

हम सौभाग्यशाली पीढ़ी हैं कि गूगल नाम का एक महान शिक्षक हमलोगों के पीसी और मोबाइल फोन पर हमेशा हमारे प्रश्नों के उत्तर देने के लिए तत्पर रहता है। यदि आप अंग्रेजी भाषा जानते हैं तो अपने मन में बेशक हजार प्रश्न उदित होने दीजिए। क्योंकि उनका उत्तर खोजने के लिए गूगल हमेशा तत्पर रहेगा। 

गौतम बुद्ध और गांधी के अलावा हमें वर्ष 2016 में इस प्रश्न ने भी बहुत सताया कि हम भारतवासियों में ऐसा क्या था कि हम हमेशा युद्धों में हारते गए, हम कई सदियों तक गुलाम बने रहे। ऐसा क्या था कि अंग्रेजों ने इतने बड़े देश को इतनी सहजता के साथ गुलाम बना लिया। 

आज जब हमें यह जानकारी मिलती है कि अंग्रेज अफसरों की आवासी बस्तियों, जैसे सिविल लाइन्स, और शिमला जैसे शहरों की माल रोड जैसी सड़कों पर भारतीयों का आना-जाना वर्जित था, तो जैसे प्रश्नों की मधुमक्खियां क्यों, क्यों, क्यों कहकर हमें डंक मारने के लिए दौड़ पड़ती है। 

उनसे बचने के लिए जो उत्तर का मरहम हमें चाहिए गनीमत है कि वह हमारे इंटरनेट पर आज उपलब्ध है। अंत में मैं इस प्रश्न को फिर दोहराता हूं – बुद्ध और गांधी को इस देश ने बहिष्कृत क्यों कर दिया। आइए वर्ष 2017 में हम इन दोनों पहेलियों को सुलझाएं।

रविवार, 4 दिसंबर 2016

नोटबंदी और हमारी साधारण बुद्धि


कई बार किसी-किसी प्रश्न पर कोई स्टैंड लेना काफी मुश्किल हो जाता है। उदाहरण के लिए नोटबंदी। इस मुद्दे पर पूरा देश दो हिस्सों में बंटा हुआ है। इस तरह बंटा हुआ है कि दोनों खेमें एक दूसरे की बात सुनना तो दूर एक दूसरे के देशप्रेम और नीयत पर भी शक करते हैं। दोनों अपने आपको एक दूसरे से बढ़कर देशप्रेमी और गरीबों का मसीहा सिद्ध करना चाहते हैं।

किसी प्रश्न पर कोई राय बनाने का मेरा तरीका यह है कि इसमें अपनी साधारण बुद्धि का इस्तेमाल करो, और विशेषज्ञ की भी राय सुनो। लेकिन इन सबके बीच जो कोई भी पड़ता है उनकी राय पर बिल्कुल ध्यान मत दो। जैसे राजनीतिक दलों के बड़े नेता, छुटभैया नेता, सरकारी बाबू, किसी न किसी विचारधारा या कारपोरेट स्वार्थ से जुड़े हुए पेशेवर टिप्पणीकार, स्तंभकार, एंकर। जब आपकी साधारण बुद्धि से निकलने वाले निष्कर्ष से विशेषज्ञ की राय भी मिलती हो तो समझ लीजिए कि आपका सोचना पूरी तरह सही है। लेकिन जब यह राय नहीं मिलती तो आपको अपनी राय बनाने के लिए कुछ समय के लिए रुकना चाहिए। यह देखना चाहिए कि विशेषज्ञ निष्पक्ष तो हैं न और वे अपने विश्लेषण के लिए वैज्ञानिक तरीकों का इस्तेमाल तो कर रहे हैं न।

कहने का तात्पर्य यह है कि जिस बात को आपकी साधारण बुद्धि स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं है वैसी बात को आसानी से मानने के लिये आपको तैयार नहीं होना चाहिए भले ही कहने वाला कितना ही बड़ा व्यक्ति क्यों न हो। मैंने अक्सर पाया है कि अंत में साधारण बुद्धि का फैसला ही सही निकलता है और राजनीतिक विचारधारा से प्रभावित विचार अंततः गलत साबित हो जाते हैं।

एक उदाहरण लेते हैं कम्यूनिज्म का। मोटी-मोटी किताबों ने इसके पक्ष में बातें कहीं और मार्क्स और एंगेल्स जैसे दार्शनिक इसके पक्ष में खड़े थे। आपने कम्यूनिज्म के बारे में मोटी-मोटी किताबें पढ़ी होंगी और सोचा होगा कि क्या इतनी मोटी-मोटी किताबें भी कभी गलत हो सकती हैं? लेकिन आपकी साधारण बुद्धि ने कभी यह भी सोचा होगा कि बिना पैसों की प्रेरणा के कोई किस तरह बढ़-चढ़ कर काम कर पाएगा। लाभ, फायदा या पैसा सबसे बड़ी प्रेरक शक्ति है और उसी के कारण एक व्यक्ति काम कर पाता है। जब सत्तर साल तक रूस में कम्यूनिज्म चलता रहा तो बहुतों को अपनी साधारण बुद्धि पर शक होने लगा होगा कि कहीं मात्र धन को प्रेरक शक्ति मानना उनकी भूल तो नहीं थी। लेकिन अंततः 1989 में रूस में कम्यूनिज्म का खात्मा हो गया और इस साधारण सी बात पर सत्यता की मोहर लग गई कि बिना फायदा होने के लालच के इस दुनिया में कुछ भी नहीं चलता।

हमने कम्यूनिज्म का सिर्फ उदाहरण दिया है। यही बात नाजीवाद और फासीवाद को लेकर सही है। यूरोप में दुनिया की हर समस्या का कारण यहूदियों को बताया गया लेकिन बहुत से लोगों की साधारण बुद्धि को यह बात स्वीकार नहीं हो सकी। अंततः लाखों लोगों की जान जाने के बाद यह बात समझ में आई कि यहूदी कौम को खत्म करने मात्र से किसी देश का भला हो जाएगा, इससे बेहूदी बात दूसरी कोई नहीं है।

नोटबंदी प्रसंग

इतनी लंबी भूमिका हमने इसलिए लिखी है कि कुछ लोग आज किसी व्यक्तित्व के प्रभाव में आकर अपनी साधारण बुद्धि को कोई महत्व नहीं देना चाहते। नोटबंदी के प्रसंग में तीन बातें मुख्य रूप से कही जा रही हैं और हमारी साधारण बुद्धि को ये तीनों बातें पच नहीं पा रही।

एक, कहा जा रहा है कि इससे काला धन रखने वालों के जमा कर रखे हुए करेंसी नोट बरबाद गए और उन्हें बहुत बड़ा धक्का लगा है। हमारी साधारण बुद्धि कहती है कि राजनेताओं को छोड़कर शायद ही कोई अपना काला धन करेंसी के रूप में रखता है। जो थोड़ा-सा दस-बीस या तीस लाख रूपयों का धन आम मध्यवर्गीय लोगों के पास रखा था उसे बाहर लाने के लिए निश्चित रूप से यह योजना नहीं लाई गई थी। तो फिर किसके लिए लाई गई थी? क्या जिनके लिए लाई गई उनमें आपने कहीं भी अफरा-तफरी का माहौल देखा?

दो, कहा जा रहा है कि इससे भ्रष्टाचार मिट जाएगा, या कम हो जाएगा। हमारी साधारण बुद्धि कहती है कि जब तक किसी बाबू के पास विवेकाधीन अधिकार रहेगा, पैसे खाने की गुंजाइश बची रहेगी और पकड़े जाने का डर नहीं रहेगा, तब तक भ्रष्टाचार पर अंकुश नहीं लग सकता। पुराने पांच सौ और एक हजार के नोट नहीं रहे तो भ्रष्ट अधिकारी को दो हजार के नोट लेने से किसने रोका है।

तीन, कहा जा रहा है कि इससे इकानोमी कैशलेस हो जाएगी और आर्थिक वृद्धि के लिए तथा भ्रष्टाचार मिटाने के लिए कैशलेस इकानोमी का होना बहुत जरूरी है। इस बात को सिद्ध करने के लिए हमारी तुलना की जा रही है ऐसे देशों के साथ जो आज आर्थिक रूप से पूरी दुनिया में सबसे आगे हैं। जैसे, स्वीडन, डेनमार्क, सिंगापुर आदि। हमारी साधारण बुद्धि कहती है कि दुनिया के सबसे अग्रणी देशों के साथ हमारी तुलना करना तर्कसंगत नहीं है। हमें भारत की तुलना ऐसे देशों के साथ करनी चाहिए जो हमारे समकक्ष हैं और उनकी वृद्धि हमारी वृद्धि दर के आसपास हैं।

इस तर्क से हम इंडोनेशिया, थाइलैंड और चीन जैसे देशों के साथ हमारी तुलना करते हैं तो पाते हैं हमारी अर्थव्यवस्था में जो नगदी का चलन है वह कोई इतना अधिक नहीं है कि हमारी प्राथमिकता नगदी को खत्म करना ही हो जाए। तथ्य यह भी है कि जो विकसित देश हैं वहां की अर्थव्यवस्था से नगदी अपने आप कम होती गई और अर्थव्यवस्था कैशलेस होती गई। इसका उल्टा सही नहीं है। यानी ऐसा नहीं हो सकता कि आप अर्थव्यवस्था को कैशलेस कर दें और विकास अपने आप आ जाएगा।

एक साधारण बनिया अपनी साधारण बुद्धि का इस्तेमाल करते हुए हमेशा कोस्ट-बेनिफिट रेसियो यानी लागत और उससे होने वाले लाभ के अनुपात का हिसाब लगाता है। सरकारी बाबू और सरकारी अर्थशास्त्री सरकार के किसी भी कदम के समर्थन में हर तरह के तर्क देने के लिए मजबूर हैं। उन्हें उसी के पैसे मिलते हैं। लेकिन एक साधारण बनिया अपनी साधारण बुद्धि से यह सवाल किए बिना नहीं रह सकता कि एक पूर्ण गति से चल रही अर्थव्यवस्था की गति को रोककर जैसे लाभ होने का अनुमान किया जा रहा है क्या वे लाभ अर्थव्यवस्था को हुए नुकसान से अधिक होंगे?

और अंत में प्रार्थना


हमारे दिल की ख्वाहिश यही है कि हमारी साधारण बुद्धि गलत साबित हो, सरकारी विशेषज्ञों के अनुमान सही हों और हमारी अर्थव्यवस्था पहले से अधिक गति प्राप्त करे।

रविवार, 27 नवंबर 2016

बात पते की - आयकर विभाग का कैंटीन भी कैशलेस नहीं है


जहांपनाह आज शुरू से ही दो-दो हाथ करने के मूड में थे। दरबार में आते ही वे सीधे बीरबल की ओर मुखातिब हुए। Birbal को आभास हो गया कि नोटबंदी पर उनके रुख से बादशाह नाराज हैं। Akbar ने Birbal से सीधा सवाल पूछा – आखिर इतने पड़े इंकलाबी कदम से भी तुम खुश नहीं हो, तुम्हारे तर्क क्या हैं? क्या तुम्हारे पास भी ढेर सारा काला धन है?

Birbal – गुस्ताखी माफ हो जहांपनाह। कम-से-कम आपसे मैं इस सवाल को अच्छे तरीके से पूछे जाने की उम्मीद करता था। सरकार के किसी कदम का विरोध कर दो तो विरोध करने वाले को ही अपराधी घोषित कर देना – ऐसे वातावरण में तो फिर कोई चर्चा संभव ही नहीं है। इस तरह वही बहस करता है जिसके पास ठोस तर्क नहीं होते और जो अपने कदमों को सुधारने में और जनता का भला करने में विश्वास नहीं रखता।

Akbar – चलो दूसरी बातों को छोड़ देते हैं क्योंकि उससे दरबार का वक्त बरबाद होगा। बस इतना बता दो कि क्या इस कदम से हम cashless economy की ओर आगे नहीं बढ़ेंगे।

Birbal – जहांपनाह, cashless economy की ओर बढ़ने के लिए क्रांति की जरूरत नहीं होती। यह काम सरकार चाहती तो शासन में आने के पहले दिन से ही शुरू कर सकती थी और आज भी देर नहीं हुई है, आज भी शुरुआत हो सकती है। सरकार खुद एक बहुत बड़ी खरीदार है। मैं आपको ऐसे दस स्थान गिना सकता हूं जो या तो सीधे सरकार के दायरे में हैं या फिर सरकार नियंत्रित कंपनियों के नियंत्रण में हैं। ऐसे स्थानों पर सरकार चाहे तो debit card से पेमेंट की व्यवस्था कर सकती है। यह तो अच्छा है कि आज देश में शायद ही कोई बंदा बचा हुआ है जिसके पास debit card न हो, या मोबाइल फोन न हो। इस डेबिट कार्ड की मदद से सरकार यदि अपना पेमेंट ले तो कल्पना कीजिए कि कितने बड़े स्तर पर कार्ड से पेमेंट को बढ़ावा मिलेगा।

उदाहरण के लिए, रेलवे टिकट, पोस्ट आफिस, सरकारी अस्पताल, सरकारी फार्मेसी, सरकार नियंत्रित होटल, पर्यटन स्थलों के टिकट काउंटर, टोल गेट, सरकारी राशन की दुकानें, सरकारी बसें, नगरपालिका का टैक्स, पेट्रोल पंप, रसोई गैस, कोर्ट के वेंडर, सरकारी दफ्तरों, सचिवालयों, विधानसभाओं, आकाशवाणी, दूरदर्शन आदि के कैंटीन, सैनिक छावनियों के अंदर चलने वाली दुकानों - इन स्थानों पर स्वाइप मशीनें लगाना अनिवार्य किया जा सकता है। रेलवे के वेंडरों को आप चाहें तो बाध्य कर सकते हैं कि उन्हें स्वाइप मशीनें रखनी होंगी। यदि सचमुच वित्त मंत्री की मंशा cashless economy की दिशा में कुछ करने की होती तो वे ये सब काम करतें, न कि व्यापारियों को नसीहत देते कि तुम लोग कैशलेस व्यापार करना शुरू कर दो, और न ही बैंकों को टारगेट देते कि इतने लाख करोड़ का लेनदेन अब कैश से cashless हो जाना चाहिए। सच पूछिए तो इस सरकार में सबसे खराब कार्य वित्त मंत्री महोदय का ही रहा है। भले प्रधानमंत्री के व्यक्तित्व के कारण उनकी असफलताओं पर लोग अभी कुछ बोल नहीं रहे।

यदि एक सर्वेक्षण किया जाए तो शायद income tax department के किसी कैंटीन में भी card swipe करने की सुविधा नहीं मिलेगी। तो फिर आप किस मुंह से दूसरों को नसीहत दे सकते हैं।


Akbar – बात तो तूने पते की कही है Birbal।