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Journalist and writer, Writes on Northeast India, Bangladesh, Myanmar

शनिवार, 8 नवंबर 2008

भारत का ओबामा

जो सवाल चिंतनशील भारतीयों के मन में उभर रहा है वह है भारत कब अपना ओबामा पैदा करेगा। ओबामा का उदय अमरीकी इतिहास में एक मील का पत्थर है और ऐसी घटनाएं सदी में एक-दो बार ही हुआ करती हैं। लेकिन भारत तो सदियों से अपने ओबामा के उदय के इंतजार में बैठा हुआ है। क्या हमारे यहां की राजनीतिक व्यवस्था दलित या मुस्लिम समुदाय से आने वाले किसी व्यक्ति को देश के सर्वोच्च पद पर पहुंचा सकती है।

मायावती के कारण कुछ उम्मीद जगती है। लेकिन मायावती भारत की ओबामा नहीं हो सकतीं। मायावती चाहकर भी अपने दलित वोटबैंक को दरकिनार सारे भारतवासियों का समर्थन हासिल नहीं कर सकतीं। उनकी राजनीति दलितों का अपने सत्तारोहण के लिए सीढ़ी के रूप में इस्तेमाल करती है। उनमें ऐसी दलित नारी बनने की क्षमता प्रतीत नहीं होती जिसके माध्यम से सारा देश एक नए युग में प्रवेश करने का सपना देख सके। जिसके सत्तारोहण के माध्यम से देश सदियों से दलित समुदाय पर किए गए अत्याचारों का पश्चाताप कर सके।

क्या कांग्रेस या भारतीय जनता पार्टी में ओबामा जैसे किसी नेतृत्व का विकास करने की क्षमता है? हाल की राजनीति पर नजर डालने से तो ऐसा नहीं लगता। हमारी राजनीतिक पार्टियों में युवाओं के आगे बढ़ने के रास्ते में न जाने कैसी बाधा है कि अपने युवाकाल में वे पार्टी गतिविधि के शीर्ष पर पहुंच ही नहीं पाते। जब तक इस राजनीतिक परिपाटी को तोड़ा नहीं जाएगा तब तक ओबामा जैसी परिघटना की पुनरावृत्ति अपने यहां देखने को नहीं मिलेगी।

हमारी मुख्यधारा की दोनों ही राजनीतिक पार्टियां खुशामद और चापलूसी से संचालित होती हैं। टिकटों के बंटवारे के लिए उनके यहां कोई ऐसी स्वयंक्रिय प्रक्रिया नहीं है जो योग्य उम्मीदवार को अपने आप आगे बढ़ाती जाए। टिकटों के बंटवारे की प्रक्रिया पर बड़े और बुढ़े नेता (कांग्रेस में गांधी परिवार) पूरी तरह कब्जा जमाए हुए हैं, क्योंकि आखिर यही तो वह चीज है जिसके माध्यम से आप अपने प्रति वफादारी को पुरस्कृत और गैर-वफादारी को दंडित कर सकते हैं। इस तरीके से पुराना नेतृत्व कभी भी पार्टी तंत्र पर अपनी पकड़ ढीली नहीं होने देता।

हमारे यहां ओबामा जैसा युवा नेता उभरा होता तो पुराने नेता साजिश रचकर उसका कद छोटा करने में लग जाते। उसे तभी सहन किया जाता जब पुराने नेताओं को उससे कोई खतरा महसूस नहीं होता। पुराने नेताओं को खतरा महसूस न हो इसके लिए उभरते हुए भारतीय ओबामा को पर्याप्त मात्रा में चापलूसी और खुशामद का सहारा लेना पड़ता। मुश्किल यह है कि चापलूसी और खुशामद के द्वारा कोई बड़ा पद भले ही हासिल कर ले, लेकिन ओबामा नहीं बन सकता।

2 टिप्‍पणियां:

  1. "क्या हमारे यहां की राजनीतिक व्यवस्था दलित या मुस्लिम समुदाय से आने वाले किसी व्यक्ति को देश के सर्वोच्च पद पर पहुंचा सकती है। "

    अगर वो ओबामा होगा तो ज़रूर उस पद पर पहुंचेगा |

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  2. मैं विवेक की बात से सहमत हूँ. ओबामा को किसी से अपने अधिकार नहीं चाहिये, उसे कोई दलित या मुसलमान कह कर ऊँचे पद पर पहुँचा भी देगा तो कुछ नहीं बदलेगा. भारत के राष्ट्रपति मुसलमान भी रह चुके हैं और दलित भी. ऐसा नेता जो भारत के जनसामान्य को नयी चेतना दे, यह भुलवा दे कि वह दलित है या मुसलमान या हिंदू, जो अपने दबे पिसे होने का रोना न रोये बल्कि अपनी भिन्नता का वर्व समझा सके, वैसा ओबामा चाहिये हमें.

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