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Journalist and writer, Writes on Northeast India, Bangladesh, Myanmar

रविवार, 9 अक्टूबर 2016

बांग्लादेश का सत्ता समीकरण और सेना

भारत के एक उर्दू अखबार ने हाल ही में सुर्खी लगाई कि बांग्लादेश में हसीना सरकार पर सेना का खतरा। उस अखबार के ढाका संवाददाता के हवाले छपी इस खबर में अटकलबाजी के अलावा कुछ नहीं था। वैसे भी यह जाहिर सी बात है कि सेना यदि तख्तापलट करेगी तो अखबार वालों को पहले से बोलकर नहीं करेगी। 

लेकिन सवाल है कि क्या सचमुच बांग्लादेश में जमाते इस्लामी के नेताओं की फांसी से सेना इतनी विचलित है कि वहां तख्तापलट हो सकता है? बांग्लादेश की राजनीति की बारीकियों को जानने वाले जानते हैं कि एक तो वहां की सेना कट्टरवादियों की फांसी से विचलित जैसी कुछ नहीं है। वह स्वयं कट्टरवादियों को पसंद नहीं करती। दूसरे, सेना को शेख हसीना ने इतनी चतुराई के साथ साध रखा है कि वे तख्तापलट जैसी किसी कार्रवाई के बारे में सोचना भी पसंद नहीं करेंगे।

शेख हसीना सरकार ने पुलिस और सेना को इतने अधिक अधिकार दे रखे हैं कि वहां मानव अधिकार जैसी कोई चीज रह ही नहीं गई है। इसके अलावा सेना में नीचे स्तर से लेकर शीर्ष स्तर तक के अधिकारियों के आर्थिक लाभ में कोई कमी न आए इसकी भी पूरी व्यवस्था शेखा हसीना ने कर रखी है। पैसे की ताकत से शेख हसीना बखूबी वाकिफ हैं और सैन्य अधिकारियों को साधने में उन्होंने अपने इस ज्ञान का पूरा सदुपयोग किया है। 

अन्य सरकारी अधिकारियों की तुलना में सैन्य अधिकारियों के वेतनमान में अधिक वृद्धि तो हुई ही है, बांग्लादेश में कई व्यावसायिक उपक्रम भी सेना के अंतर्गत परिचालित होते हैं। इन व्यावसायिक उपक्रमों के मुखिया सेना के बड़े अफसर होते हैं और वे जब तक वहां तैनात होते हैं उनके पास जमकर पैसा बनाने के अवसर होते हैं। इस तरह शेख हसीना ने सेना के अफसरों के दिमाग में यह बात कभी आने ही नहीं दी कि वे स्वयं सत्ता पर काबिज हो जाएं तो उन्हें आर्थिक रूप से अधिक लाभ होगा।

अफसरों और जवानों को संतुष्ट करने का एक और तरीका है उन्हें राष्ट्र संघ के शांतिरक्षक बल (यूएनपीकेएफ) में डेपुटेशन पर जाने का मौका देना। बांग्लादेश भारत सहित उन कुछ देशों में से है जिसके सैनिक यूएनपीकेएफ में बड़ी संख्या में हैं। जहां पश्चिमी देशों के सैनिक और अफसर यूएनपीकेएफ में जाने से कतराते हैं वहीं बांग्लादेश के सैनिक और अफसर इसमें जाने के लिए लालायित रहते हैं। 

इसका कारण है इसमें जाने से होने वाला आर्थिक लाभ। कुछ साल तक राष्ट्र संघ की सेना में रहने पर एक सैनिक के आर्थिक स्तर में आमूल सुधार आ जाता है। और कोई भी सैनिक इस मौके को छोड़ना नहीं चाहता।

बांग्लादेश की सेना को सत्ता पर काबिज होने से रोकने में भी राष्ट्र संघ की सेना की एक बड़ी भूमिका है। अमरीका और यूके जैसे बड़े देश इस बात को तय करते हैं कि किस देश से कितने सैनिक राष्ट्र संघ की फौज में लिए जाएंगे। इसलिए बांग्लादेश में सेना के अधिकारियों के साथ होने वाली गुप्त बैठकों में इन देशों के राजदूत साफ-साफ कह देते हैं कि फौज ने यदि राजनीतिक महत्वाकांक्षाएं पनपने दी तो राष्ट्र संघ की सेना में उनके सैनिकों की संख्या में कटौती कर दी जाएगी। 

इस तरह यूएनपीकेएफ बांग्लादेश में सेना की महत्वाकांक्षा को सीमा में रखने के लिए एक बहुत ही कारगर हथियार साबित हुआ है। साथ ही यह देश के राजनीतिक नेतृत्व को भी अपनी मांग के सामने झुकने पर मजबूर करने वाला एक अस्त्र है। क्योंकि यदि यूएनपीकेएफ में बांग्लादेशी सेनिकों की संख्या में कटौती होती है तो सेना में राजनीतिक नेतृत्व यानी प्रधानमंत्री शेख हसीना के विरुद्ध असंतोष पनपेगा, जो वे कभी नहीं चाहेंगी।

बांग्लादेश सहित विश्व के कई देशों में प्रतिबंधित संगठन हिजबुत तहरीर की ओर से ढाका की दीवारों पर बीच बीच में पोस्टर चिपकाए मिलते हैं। इन पोस्टरों में बांग्लादेश के “ईमानदार” सैन्य अधिकारियों के नाम अपील होती है कि आपलोग सत्ता को अपने हाथ में ले लें। हिजबुत में सिर्फ उच्च शिक्षित युवकों को सदस्य बनाया जाता है। 

इन उच्च शिक्षित युवकों को शायद यह व्यावहारिक ज्ञान नहीं है कि सत्ता में आने से सैन्य अधिकारियों को जो लाभ मिल सकते हैं वे लाभ उन्हें बिना सत्ता के ही मिल रहे हैं। फिर वे क्यों जान को जोखिम में डालें।

2014 के जिन चुनावों के माध्यम से शेख हसीना लगातार दूसरी बार के लिए सत्ता में आई उन्हें प्रहसन मात्र कहा जा सकता है। इन चुनावों में विपक्षी बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (बीएनपी) ने हिस्सा ही नहीं लिया था। इसलिए सत्ताधारी अवामी लीग के अधिकांश सांसद बिना किसी प्रतिद्वंद्विता के ही जीत गए थे। अमरीका और ब्रिटेन की अगुवाई में पश्चिमी देश काफी दिनों तक इन चुनावों को मान्यता देने से ना-नुकर करते रहे। 

उन्हें यह स्वीकार नहीं था कि एक कठपुतली चुनाव आयोग की अध्यक्षता में हुए चुनाव को वैध चुनाव मान लिया जाए। इसी तरह जिस ट्राइब्यूनल में जमाते इस्लामी के नेताओं पर मुकदमा चलाया जा रहा है उसकी प्रक्रिया से भी पश्चिमी देश खुश नहीं हैं। लेकिन शेख हसीना बड़ी होशियारी से इस स्थिति से निपट रही हैं। इसमें भारत का समर्थन उनके लिए काफी राहत देने वाला है। 

2014 के चुनावों को जब अमरीका, ब्रिटेन आदि किसी भी बड़े देश ने मान्यता नहीं दी थी तब भी भारत शेख हसीना के साथ खड़ा रहा। इसी के बल पर हसीना ने फिर से चुनाव करवाने के पश्चिमी देशों के दबाव के सामने झुकने से इनकार कर दिया।

हसीना समर्थक एक बुद्धिजीवी बिना झिझक इस बात स्वीकार करते हैं कि उनके यहां भारत जैसा लोकतंत्र फिलहाल संभव नहीं है। न ही ट्राइब्यूनल में पश्चिमी मानदंडों के अनुसार कानूनी प्रक्रिया अपनाते हुए युद्ध के अपराधियों पर मुकदमा चलाना। उनके अनुसार बांग्लादेश में अभी भी एक युद्ध चल ही रहा है। 

पाकिस्तान को हराने के बाद भी पाकिस्तानी मानसिकता को हराना अभी बाकी है। जमाते इस्लामी इसी मानसिकता का प्रतिनिधित्व करती है। ये लोग जमाते इस्लामी पर प्रतिबंध लगवाने के लिए दबाव बढ़ा रहे हैं। हर तरफ से घिर जाने के बाद पाकिस्तानी मानसिकता वाली जमाते इस्लामी के लोग आतंकवाद को अपना आखिरी अस्त्र मानते हैं। 

अपने नेताओं की फांसी और अपनी राजनीतिक सहयोगी बीएनपी के राजनीतिक मैदान में मात खाते जाने के बाद उसे आतंकवाद ही एक मात्र सहारा नजर आ रहा है। ऐसे में आईएस के लिटरेचर में जमाते इस्लामी की तीखी आलोचना को पढ़ना काफी दिलचस्प होता है। 

आईएस को जमाते इस्लामी की नीतियां इसलिए पसंद नहीं क्योंकि ये लोग चुनावों में हिस्सा लेते हैं। लोकतंत्र को आईएस वाले आदमी का बनाया हुआ नियम मानते हैं, जबकि शासन सिर्फ अल्लाह के बनाए हुए नियमों के अनुसार होना चाहिए।

शनिवार, 27 अगस्त 2016

कट्टरवाद बबुआ धीरे-धीरे आई

बांग्लादेश के एक अखबार के संपादक से मैंने कहा कि आपका नाम भी तो हिटलिस्ट में आया है। इस पर वे कहते हैं – मेरा नाम तो हर हिटलिस्ट में रहता है। उनके होठों पर हल्की सी मुस्कुराहट आती है और चली जाती है। शायद यह अभ्यासवश आई होगी। बांग्लादेश में ब्लागिंग का काफी प्रचलन है। ब्लाग के माध्यम से लोग अपने विचार स्वतंत्र रूप से प्रकाशित करते हैं। ब्लाग संपादकीय रोक-टोक से मुक्त होते हैं। रोकटोक न होने के कारण लोग धार्मिक विषयों पर भी खुलकर टिप्पणी करते हैं। मुस्लिम प्रधान होने के कारण अधिकतर इस्लाम को ही निशाना बनाया जाता है। ब्लागर ऐसी बातें भी लिख डालते हैं जो भारत में कोई उदार से उदार संपादक भी कभी छापने का साहस नहीं कर पाएगा।

ब्लागरों की वैचारिक स्वतंत्रता से हर इस्लामवादी को आपत्ति है लेकिन अल कायदा ने तो ऐसे ब्लागरों का खात्मा कर देने का बीड़ा ही उठा लिया है। अल कायदा नेताओं का कहना है कि उन्हें उनकी कलम की स्वतंत्रता है तो हमें भी हमारे छूरे की स्वतंत्रता है। पिछले तीन सालों में बांग्लादेश में अल कायदा के नाम से ऐसी कई हिटलिस्टें प्रकाशित हुईं और कहा गया कि इन-इन ब्लॉगरों या लेखकों को इस संगठन के लोग सबसे पहले खत्म करेंगे। इनमें कुछ सूचियां फर्जी थीं जिनके बारे में स्पष्टीकरण भी जारी हुए।

अल कायदा की धमकी सिर्फ धमकी नहीं थी। उसने शहबाग आंदोलन (2013) के बाद से अब तक कम से कम 8 ब्लॉगरों और प्रकाशकों की हत्या कर दी है। एक प्रकाशक की हत्या के बाद कहा गया कि प्रकाशक लेखक से भी ज्यादा खतरनाक होते हैं। अमरीकी नागरिक अभिजित रॉय की ढाका पुस्तक मेले से निकलते समय हत्या कर दी गई थी, जिसके बाद में अमरीकी सरकार ने भी बांग्लादेश सरकार पर अपना दबाव बढ़ाया। सभी हत्याओं का एक ही पैटर्न है। छूरा घोंपकर हत्या करना और शरीर को क्षत-विक्षत कर देना।

सरकार का रवैया अल कायदा की इन कार्रवाइयों पर बड़ा लचर और निराश करने वाला है। सरकार उल्टे ब्लॉगरों से ही कहती है कि वे अपनी लेखनी को लगाम दें। इसी साल एक ब्लॉगर निजामुद्दीन समद की हत्या के बाद गृह मंत्री ने कहा कि किसी को भी धार्मिक नेताओं पर लेखकीय हमला करने का अधिकार नहीं है। सरकार देखेगी कि निजामुद्दीन ने अपने ब्लॉग में क्या लिखा था। कुछ ब्लॉगरों को धार्मिक भावनाओं को आघात पहुंचाने के कथित जुर्म में जेल में भी डाल दिया गया है। एक ब्लॉगर बताते हैं कि वे जब सुरक्षा की गुहार लेकर थाने गए तो उन्हें सलाह दी गई कि जिंदा रहना चाहते हैं तो देश छोड़कर कहीं और चले जाइए।

दरअसल बांग्लादेश के ब्लॉगर देश छोड़कर जा भी रहे हैं। उनमें से ज्यादातर यूरोपीय देशों में शरण ले रहे हैं और कुछ अमरीका भी जा रहे हैं। जो नहीं जा पा रहे वे अपनी पहचान छुपाकर घूमते हैं। कोई कोई बताता है कि उसने अमुक ब्लॉगर को हेलमेट पहनकर सड़क पर पैदल घूमते देखा। लेकिन ऐसे भी हैं जो अब भी बांग्लादेश में ही रहते हुए कट्टरपंथियों को अपनी लेखनी का लक्ष्य बना रहे हैं। ऐसे ही एक निर्भीक शख्स हैं इमरान एच सरकार। इमरान सरकार गण जागरण मंच के संयोजक भी हैं और आतंकवादियों तथा कट्टरपंथियों के मुख्य निशाने पर हैं। गण जागरण मंच के ही बैनर तले कादेर मुल्ला को फांसी की सजा देने की मांग करने वाला शहबाग आंदोलन हुआ था।

एक विदेशी न्यूज़ एजेंसी ने जब इमरान सरकार से कहा कि वह उनके बयान के साथ उनका नाम नहीं छापेगी। इस पर सरकार ने कहा कि वे चाहेंगे कि उनका नाम अवश्य छापा जाए। क्योंकि नाम छुपाने पर आतंकवादियों के हौसले और बुलंद होंगे। वे लोग सोचेंगे कि स्वाधीन चिंतक (वैसे ब्लॉगरों को कट्टरपंथी खेमा नास्तिक कहकर पुकारता है) डर गए हैं, बयान के साथ अपना नाम नहीं दे रहे, उनकी योजना सफल हो रही है। इमरान सरकार अपनी सरकार और गृह मंत्री के रवैये से बिल्कुल नाराज हैं। उनका कहना है कि गृह मंत्री के बयान से हत्यारों के हौसले बढ़ेंगे।

इमरान सरकार अकेले ऐसे निर्भीक ब्लॉगर नहीं हैं। मारुफ रसूल भी इमरान सरकार की तरह ही अपने नाम के साथ बयान देने की जिद करते हैं। मारे गए एक प्रकाशक फैज़ल अरेफिन दीपन के पिता विश्वविद्यालय में प्रोफेसर हैं। उनका बयान सरकार और प्रशासन को सुनने में कड़वा तो लगा होगा लेकिन उससे सरकार के रवैये पर कोई फर्क नहीं पड़ा। दीपन के पिता ने अपने बेटे की हत्या के बाद कहा था कि वे इस सरकार से न्याय की मांग नहीं करेंगे। क्योंकि इस देश में न्याय है ही नहीं। ब्लॉगर आरिफ जेबतिक कहते हैं जब किसी ब्लॉगर की हत्या की खबर आती है तब उन्हें एक अजीब सी राहत की अनुभूति होती है। राहत यह कि चलो इस बार भी शिकार मैं नहीं कोई और बना है।

बांग्लादेश में एक चरम निराशा का वातावरण है। आरिफ कहते हैं मुख्यधारा की राजनीतिक पार्टियों ने कट्टरपंथी हत्यारों और अतिवादियों के लिए रास्ता साफ और चौड़ा किया है। ज्यादा दिन नहीं हुए जब सबसे बड़ी विपक्षी पार्टी बीएनपी ने तथाकथित नास्तिक ब्लॉगरों को फांसी देने की मांग करते हुए एक रैली की थी। इस रैली में पूर्व प्रधानमंत्री बेगम खालिदा जिया ने फरमाया था कि ये ब्लॉगर इस देश के लिए पराए लोग हैं। इन्हें फांसी दी जानी चाहिए। यह बात आरिफ की नजरों से छुपती नहीं कि इस बार पोइला बैशाख (बांग्ला नववर्ष दिवस जिसे बांग्लादेश में बड़े उत्साह के साथ मनाया जाता रहा है और जो बांग्ला राषट्रवाद का एक प्रतीक भी है) के दिन पिछले सालों की अपेक्षा काफी कम उत्साह था।



भारत में वामपंथी विचारक और कवि स्वर्गीय गोरख पांडेय ने किसी समय एक व्यंगात्मक कविता लिखी थी ‘समाजवाद बबुआ धीरे-धीरे आई’। समाजवाद तो धीरे धीरे भी नहीं आया लेकिन बांग्लादेश के संदर्भ में हम जरूर कह सकते हैं कि ‘कट्टरवाद बबुआ धीरे-धीरे आई’। कट्टरवाद बांग्लादेश में धीरे-धीरे अपने पांव पसार रहा है और लगता है सिर्फ बुद्धिजीवियों को ही उसकी पदचाप सुनाई दे रही है। शायद इसीलिए बुद्धिजीवी बुद्धिजीवी है।

इस्लाम की हिफाजत या महिलाओं को रोजगार

सात को ईद थी और दस को ढाका शहर अलसाया हुआ सा फिर से पटरी पर लौटने की कोशिश करता दिखा। अभी भी बड़ी संख्या में दुकानें खुली नहीं थीं। ढाका के ट्रैफिक जाम से और एक-दो दिनों के लिए राहत रहेगी। सुप्रीम कोर्ट में अभी कामकाज शुरू नहीं हुआ है लेकिन वकील लोग अपनी देशेर बाड़ी से शहर लोटने लगे हैं। 

सुप्रीम कोर्ट के वकील सुब्रत चौधरी का भी आज से व्यस्तता भरा दिन शुरू हो गया है। बांग्लादेश में अल्पसंख्यकों के हितों के लिए हिंदू, ईसाई और बौद्धों की संयुक्त संस्था के वे भी एक बड़े नेता हैं। सुब्रत को साफ दिखाई दे रहा है कि हालात दिन पर दिन बदतर होते जा रहे हैं। अपने बिंदास अंदाज में वे बताते हैं कि दाढ़ी रखने और सर पर टोपी पहनने का रिवाज बढ़ने लगा है। उनके चैंबर में उनके साथ और भी कई वकील बैठते हैं। ईद मनाकर लौटने पर सुब्रत ने उन्हें बधाई दी थी। इससे पता चला कि वे मुसलमान हैं। मैं कनखियों से देखता हूं उनकी सुब्रत की बातों पर क्या प्रतिक्रिया है। सभी अपने काम में व्यस्त दिखे। सुब्रत की असिस्टैंट लैपटाप पर टाइप करने में मुब्तिला थी। 

पिछले चालीस सालों में बांग्लादेश में आया अंतर सुब्रत को ज्यादा कचोट है। इस अंतर को हमने भी एक अलग तरीके से महसूस किया। बांग्लादेश के राष्ट्रीय म्यूजियम में वहां के प्रशासक ने विशेष अनुरोध कर हमें एक 22 मिनट की फिल्म दिखाई। उस फिल्म में 21 फरवरी 1952 को शुरू हुए भाषा आंदोलन से लेकर 1971 में बांग्लादेश के स्वतंत्र राष्ट्र बनने तक की गाथा को बड़े ही प्रामाणिक तरीके से दर्शाया गया है। फिल्म में सभी वास्तविक फुटेज हैं। 

हमने इस बात को खास तौर पर नोट किया कि छठे और सातवें दशक के फुटेज में शायद ही कोई ऐसा था जिसने अपने शरीर पर अपने धर्म को प्रचारित करने वाले प्रतीक धारण कर रखे थे। ढाका में आज भी अधिकतर मुस्लिम महिलाएं माथे पर बिंदी लगाती हैं और बुर्के का प्रचलन बहुत कम है। और उन फुटेज में तो आपको बिरला ही कोई टोपी या दाढ़ी वाला मिलेगा। 

उस फिल्म के दृश्यों को आधार बनाकर हम इस बात पर चिंतन कर सकते हैं कि आखिर वे कौन-सी शक्तियां हैं जिनके कारण दुनिया जाने-अनजाने में एक खास दिशा में बढ़ती जा रही है। पिछली आधी सदी में इस्लामिज्म या इस्लामवाद किस तरह फैला है इसका एक अंदाजा बांग्लादेश में इस्लाम के प्रतीक धारण करने वाले लोगों की संख्या में हुए इजाफे से लगाया जा सकता है। 

सुब्रत चौधरी सरकार की नीतियों से खफा हैं। उन्हें लगता है कि शेख हसीना भी अंततः इस्लामवादी ताकतों के सामने यदि घुटने नहीं टेक रही तो उन्हें संतुष्ट करने की कोशिश तो कर ही रही हैं। उदाहरण के रूप में वे हिफाजते इस्लाम के साथ सरकार के अच्छे रिश्तों को गिनाते हैं। बांग्लादेश में हिफाजते इस्लाम के त्वरित उत्थान और पतन की अपनी ही एक अनूठी कहानी है। 

बांग्लादेश में पुरानी और नई पीढ़ी के लोगों ने 1971 की यादों को भुलाया नहीं है। पाकिस्तान के साथ इस युद्ध में 30 लाख लोगों की जानें गई थीं। पाकिस्तान को तो बांग्लादेश के फेसबुक पोस्टर गंदी गालियों से संबोधित करते ही हैं, उनका अधिक गुस्सा अपने ही देश के उनलोगों के खिलाफ है जिन लोगों ने पाकिस्तानी सेना की मदद की थी। इसमें बांग्लादेश की जमाते इस्लामी नामक राजनीतिक पार्टी और अल बदर नामक संस्था अग्रणी थीं। 

कुल मिलाकर पाकिस्तान आज भी बांग्लादेश के बहुसंख्यक लोगों की घृणा का मुख्य केंद्र है। बांग्लादेश का समाज अपने नए राष्ट्र के उदय के समय से ही दो भागों में बंटा हुआ है। एक बहुसंख्यक समाज उनलोगों का है जिनलोगों ने पाकिस्तान की उर्दू थोपने की जिद के खिलाफ आवाज उठाई थी और इसकी परिणति स्वरूप पैदा हुए स्वाधीनता आंदोलन में हिस्सा लिया था या कम से कम उसकी सफलता चाही थी। 

दूसरा एक बहुत ही छोटा सा वर्ग उनलोगों का है जिसने उस समय पाकिस्तान का समर्थन किया था। इसमें जमाते इस्लामी के लोग तो हैं ही। उर्दूभाषी मुसलमानों को, जिन्हें वहां बिहारी मुसलमान कहा जाता है, इसीलिए ढाका में अच्छी नजर से नहीं देखा जाता। लोगों का मानना है कि इनलोगों ने 1971 में पाकिस्तानी फौज का साथ दिया था। 

स्वाधीनता समर्थक बहुसंख्यक लोग चाहते हैं कि 30 लाख लोगों की हत्या में पाकिस्तान की मदद करने वाले लोगों में से सभी को नहीं तो कम से कम उनके नेताओं को तो फांसी पर लटका ही दिया जाना चाहिए। शेख हसीना ने 2009 के चुनावों में यह वादा किया था कि फिर से उनकी सरकार आई तो वे ऐसे लोगों को फांसी पर लटकाएंगी। 

सत्ता में आने के बाद शेख हसीना ने ऐसे लोगों पर मुकदमा चलाने के लिए एक ट्राइब्यूनल का गठन किया। जिन लगभग एक दर्जन लोगों पर पाकिस्तानी सेना की मदद में नेतृत्व करने का आरोप था उन्हें गिरफ्तार कर उनके विरुद्ध मुकदमा शुरू कर दिया गया। 2013 आते-आते ऐसे पहले मुजरिम के खिलाफ फैसला भी आ गया। 

लेकिन इस फैसले से लोगों का गुस्सा एक बार फिर फट पड़ा। कारण यह कि मुजरिम अब्दुल कादेर मुल्ला को, जिसे लोग कसाई मुल्ला कहना ज्यादा पसंद करते हैं, ट्राइब्यूनल ने सिर्फ उम्रकैद की सजा सुनाई थी। ढाका में शहबाग नामक चौराहे पर फैसला सुनाने के दिन से ही लोगों का जमावड़ा शुरू हो गया। 

इस आंदोलन के दबाव में सरकार को फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में अपील करनी पड़ी और सुप्रीम कोर्ट ने ट्राइब्यूनल के फैसले को बदलकर सजाए मौत कर दिया। जमाते इस्लामी के बड़े नेताओं पर मुकदमे चल रहे थे और छोटे नेताओं और कार्यकर्ताओं को जेलों में भर दिया गया था, ऐसी स्थिति में इस्लामवादी खेमा पूरी तरह रक्षात्मक स्थिति में चला गया। लेकिन यह स्थिति ज्यादा दिन नहीं चलनी थी और नहीं चली। 

साल बीतते न बीतते हिफाजते इस्लाम नामक संस्था एक बड़ी शक्ति के रूप में उभरी। यह मूलतः कौमी मदरसे चलाने वाली संस्था है। इसके एजेंडा में दो मुख्य बातें थीं और हैं। एक, सरकार को कौमी मदरसों पर निगरानी करने और उनमें दखलंदाजी करने से रोकना, जिसके लिए शेख हसीना आमादा थीं। और दो, सार्वजनिक स्थानों पर पुरुषों और महिलाओं के मेलजोल की बढ़ती कथित रूप से गैर-इस्लामी आदतों को रोकना। 

इसके लिए हिफाजत ने महिलाओं के लिए शिक्षा और रोजगार आदि पर बंदिश लगाने वाले कई प्रस्ताव सरकार के सामने रखे थे। हिफाजत का सबसे बड़ा कार्यक्रम था 5 मई 2013 को ढाका पर कब्जा करने का। हिफाजत चूंकि मदरसों का संचालन करने वाली संस्था है इसलिए इसके पास मदरसों में पढ़ने वाले छात्रों का अच्छा-खासा आधार है। 

इस दिन देश भर से मदरसा छात्रों को ढाका लाया गया। और उन्हें लाने वाले नेताओं का कहना था कि जब तक उनकी मांगों को मान नहीं लिया जाता वे राजधानी से वापस नहीं जाएंगे। 5 मई की रात को पुलिस और सशस्त्र बलों ने बत्तियां गुल करके मोती झील नामक इलाके में आपरेशन चलाया और हिफाजत समर्थकों से ढाका को खाली करवा लिया। 

आज भी आतंकवाद समर्थकों के बयानों में इस घटना का जिक्र आता ही आता है। अल कायदा नेता जवाहिरी का जो बांग्लादेश केंद्रित बयान इंटरनेट के माध्यम से प्रचारित हुआ था उसमें भी इस घटना का जिक्र था। इस्लामवादी ताकतों का कहना है कि इस दिन पुलिस आपरेशन में हजारों छात्रों को मौत के घाट उतार दिया गया था। 

लेकिन जल्दी ही स्थिति फिर उलट गई। हिफाजते इस्लाम को सत्ताधारी दल का पिछलग्गू कैसे बनाया गया इस पर कोई यदि किताब लिखे तो वह राजनीति में साम दाम दंड भेद के सफल प्रयोग की गाइडबुक बन जाएगी। ढाका में पत्रकारों को यह कहने से कोई गुरेज नहीं कि हिफाजत के नेताओं पर एक और तो पुलिस केस की तलवार लटका दी गई और दूसरी और सरकार की बात मानने से उनकी तिजौरियों को मनचाही दौलत से भर दिया गया। आज हिफाजते इस्लाम और शेख हसीना की अवामी लीग के नेता एक मंच पर बैठे दिख जाएं तो कोई बड़ी बात नहीं। 

इसी बात से सुब्रत चौधरी नाराज थे।