मेरे बारे में

मेरी फ़ोटो
Journalist and writer, Writes on Northeast India, Bangladesh, Myanmar

रविवार, 12 जून 2016

पोट्सडम की धूप में इतिहास की झलक

आप चाहे तो यहाँ सुन भी सकते है 

यूरोपीय शहरों में सैलानी के तौर पर घूमने वाले यूरोपीय या अमरीकी नागरिकों के लिए आकर्षण का केंद्र वहां के दर्शनीय केंद्र होते हैं, जैसे म्यूजियम और पुराने ऐतिहासिक स्थल। लेकिन जहां तक मुझ जैसे भारतीय पर्यटकों का सवाल है तो सच्चाई यह है कि उनके लिए तो वहां की ट्रैफिक व्यवस्था, समाज व्यवस्था, वहां का आम वास्तुशिल्प, वहां का शिष्टाचार, वहां की ट्रेनें और बसें – ये सब अधिक आकर्षण का केंद्र होते हैं।

अपनी नौ दिन की यूरोपीय यात्रा के दौरान वहां के तीन देशों के चार शहर मेरे लिए नमूने के तौर पर थे और इन शहरों के माध्यम से मैंने यूरोप का अधिक से अधिक अपने अंदर सोखने की कोशिश की।

हर महीने यूरोप-अमरीका की यात्रा पर जाने वालों को यह परम स्वाभाविक लगता होगा कि वहां सड़कों पर आदमी बिल्कुल दिखाई नहीं देते। लेकिन पहली बार पश्चिम जाने वाले के लिए यह किसी सांस्कृतिक धक्के से कम नहीं होता। सड़कों पर इतने कम लोग कि किसी से कुछ पूछना हो तो आप पूछ ही नहीं सकते।

सड़कों पर लोगों की तादाद दिन के तापमान पर काफी हद तक निर्भर करती है। यदि ठंड कम हो तो आपको काफी लोग बाहर मिल जाएंगे वरना ठंड के कारण लोग अंदर रहना ही पसंद करते हैं। 

मौसम यूरोप में बातचीत का एक अहम मुद्दा होता है और अक्सर बातचीत शुरू करने का एक बहाना। हमारे यहां भी मौसम पर काफी बात होती है। लेकिन दोनों में एक फर्क है। हमारे यहां लगभग हमेशा यह कहा जाता है कि ओह, इतनी अधिक गर्मी इससे पहले नहीं पड़ी, या फिर पूर्वोत्तर के राज्यों में यह कहा जाता है इतनी अधिक बारिश पहले कभी नहीं हुई।

लेकिन हमारे यहां तापमान हमारी उम्मीद के अनुसार ही ऊपर-नीचे होता है। जबकि पश्चिमी मौसम का मिजाज पहचानना काफी मुश्किल होता है। आप कहीं दूसरे शहर में दो-तीन दिनों के लिए जाते हैं स्वेटर, जैकेट आदि लेकर और देखते हैं कि वहां तुषारपात यानी स्नोफाल शुरू हो गया। ऐसे में आपकी स्थिति काफी विकट हो जाती है।

मेरी यात्रा का महीना अप्रैल था और दिन के तापमान को 10 – 12 डिग्री के आसपास होना था। लेकिन वापसी के दिन तापमान तेजी के साथ गिरना शुरू हो गया। और वापस आने के बाद मित्रों ने मेल पर बताया कि तापमान काफी नीचे गिर गया और तुषारपात भी हुआ। 


पोट्सडम में सुहानी धूप का एक दिन
धूप को पश्चिम में प्रकृति के तोहफे के तौर पर लिया जाता है। अब समझ में आया कि क्यों पश्चिमी साहित्य में अक्सर ब्राइट सनी डे के बखान के साथ कोई बात शुरू की जाती है। धूप हमारे यहां की तरह वहां साल के बारहों महीने और रोजाना नहीं निकलती। इसलिए धूप निकलने पर उसका आनंद लेने का भी पश्चिम में रिवाज है। 

बर्लिन के पास पुराने प्रुशिया साम्राज्य की राजधानी पोट्सडम में जब मैं किराए की साइकिल से आसापास के इलाके की सैर करने निकला तो उस दिन सौभाग्य से अच्छी धूप निकली थी। पोट्सडम में देखा कि एक ग्रामीण सी दिखती नदी के किनारे लोग एक रेस्तरां के पास आरामकुर्सियों पर लेटे हुए धूप का आनंद ले रहे हैं। वहीं एक बीयर गार्टन में लोग बीयर की चुस्कियां लेकर समय बिता रहे हैं। 

जबकि यह कोई सप्ताहांत नहीं था। जर्मनी में बियर गार्टन की बड़ी महिमा है। चेस्टनट के पेड़ के नीचे घंटों तक बीयर की चुस्कियां लेते लोग आपको किसी भी धूप वाले दिन दिखाई दे जाएंगे।

पोट्सडम का नाम इतिहास में इसलिए भी दर्ज है कि वहीं द्वितीय विश्व युद्ध को समाप्त करने वाली संधि पर हस्ताक्षर हुए थे। विश्व के सभी बड़े राजनीतिक नेता वहां जमा हुए थे। स्टालिन भी आया था। पोट्सडम की किसी ग्रामीण-सी सड़क किनारे बने इन खूबसूरत (आम तौर पर दोमंजिला) भवनों में इन दिनों फिल्म स्टार रहते हैं। कहने का मतलब कि जिनके पास बहुत अधिक पैसा है वैसे लोग। 

जिस मकान में स्टालिन ठहरा था मैंने उसके सामने जाकर फोटो खिंचवाई। उस निर्जन सी सड़क का नाम कार्ल मार्क्स स्ट्रीट रख दिया गया है। पूर्वी जर्मनी के जमाने में यह नाम रखा गया था और दोनों जर्मनी एक होने के बाद भी नाम बदले नहीं गए। बार-बार नाम बदलना कोई अच्छी बात नहीं है। आखिर नाम के माध्यम से भी तो इतिहास का पता चलता है।

पोट्सडम के एक ओर पूर्वी जर्मनी पड़ता है और दूसरी ओर पश्चिमी जर्मनी। लेकिन नदी के पार भी कुछ हिस्सा एक-दूसरे के हिस्से का है। नदी पर जो पुल बने हुए हैं उसका भी आधा-आधा हिस्सा बंटा हुआ था। पुल पर किए गए हरे रंग के फर्क को साफ देखा जा सकता है। 

आधे पुल पर घटिया किस्म का रंग किया हुआ दिखाई देता है वह कम्यूनिस्ट पूर्वी जर्मनी की तरफ का हिस्सा था और दूसरे हिस्सा का रंग ज्यादा चमकदार है। मेरा मित्र माइक मुझे बताते चलता है कि यह देखो यहां-यहां दीवार थी। दीवार कहां-कहां थी उसके चिह्नों को सुरक्षित रखा गया है।

बर्लिन में दीवार की चर्चा के बिना कोई बात पूरी नहीं होती। एक ही शहर, एक ही जाति, एक ही भाषा बोलने वाले लोगों को सिर्फ राजनीति की वजह से अचानक दो भागों में बांट दिया जाता है। इस त्रासदी को हम भारतीय ठीक से नहीं समझ सकते। 

क्योंकि यहां भारत और पाकिस्तान के बंटवारे में दोनों तरफ की आबादी में सांस्कृतिक भेद था। कोई कुछ भी कहे लेकिन अविभाजित भारत के दोनों हिस्सों में ऐसे लोग बहुतायत में थे जो चाहते थे कि बंटवारा हो जाए और आबादी भी अदल-बदल हो जाए। जबकि जर्मनी का बंटवारा बिल्लियों को मूर्ख बनाने वाली बंदरबांट जैसी थी। 

इसलिए जर्मनी (या बर्लिन) के बंटवारे और भारत के बंटवारे में समानता नहीं खोजी जा सकती। जो भी हो, जर्मन लोगों ने इस कटु स्मृति को संजोकर रखा है ताकि आने वाली पीढ़ियां ऐसी त्रासदी को टालने के लिए तैयार रहें।

बंटवारे में मेट्रो ट्रेन (वहां बाह्न कहा जाता है) वहां पूर्वी जर्मनी के हिस्से में आई थी। वह शहर के हिस्से तक जाती और पूर्वी से पश्चिमी बर्लिन जाने वालों को जांच से गुजरना पड़ता। बहुत कम ही लोगों को पूर्वी से पश्चिमी बर्लिन जाने की इजाजत थी। 

जिस स्टेशन पर यह गाड़ियों की बदली होती थी उसे अब हाउस ऑफ टियर्स कहा जाता है, क्योंकि लोग अपने रिश्तेदारों को यहां आंसुओं के साथ विदा करते थे। अब इसे म्यूजियम बना दिया गया है। एक गाइड आपके पास आता है और कहेगा कि सबकुछ मुफ्त है लेकिन आप इतने यूरो दें और आपको और भी अधिक विस्तार से बताया जाएगा। आखिर बिजनेस कहां नहीं है।

8 टिप्‍पणियां:

  1. सचमुच लेख अच्छा लगा। खासकर कहने की कला.....वर्तमान के बहाने इतिहास और जर्मनी के बहाने अपने देश को याद करना।

    उत्तर देंहटाएं
  2. सचमुच लेख अच्छा लगा। खासकर कहने की कला.....वर्तमान के बहाने इतिहास और जर्मनी के बहाने अपने देश को याद करना।

    उत्तर देंहटाएं
  3. आपकी आवाज़ में आपकी कहानी सुनकर बहुत अच्छा लगा। लगा जैसे मै स्वयं वहाँ पर हूँ। साझा करने के लिए शुक्रिया।

    उत्तर देंहटाएं
  4. यात्रा संस्मरण उस यात्री का पता भी देते हैं और उस जगह को देखने का उसका नजरिया भी बताते हैं। एक देखना तो बस देखकर गुजर जाना भर होता है। वह अक्सर, किसी कंडक्टेड टूर मेंं शामिल पर्यटक का रोज़गारी नजरिया होता है। और दूसरा देखना ऐसा होता है कि हम अपने साथ वहां का बताने लायक ऐसा कुछ भी लेकर अा रहे हैं जो मात्र देखा हुअा नहीं है बल्कि छुअा हुअा भी है। वहां के लाग, उनका रहन-सहन,उनकी प्रथा-परम्पराएं और उनका इतिहास भी इस छुए हुए का हिस्सा होता है। वह अापके इस यात्रा सस्मरण को स्पंदित कर रहा है।

    उत्तर देंहटाएं