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Journalist and writer, Writes on Northeast India, Bangladesh, Myanmar

रविवार, 19 जून 2016

बर्लिनः दीवार को भूल नहीं पाएगी एक पीढ़ी



जर्मनी की राजधानी बर्लिन में उतरकर वैसा कोई कल्चर शॉक नहीं लगा जैसा कहते हैं पश्चिमी लोगों को एशियाई शहरों, खासकर भारत, में आते ही लगता है। खासकर भारत में आते ही यहां की आबादी उन्हें चौंका देती है। उन्हें सपने में भी यह आभास नहीं होता कि एक देश में इतने लोग हो सकते हैं। हर कहीं कतारें और लाइनें। आपाधापी। यूरोप में ऐसा कुछ नहीं होता। जर्मनी में भी नहीं था।


 इसका हमें पहले से अहसास था। शायद इसीलिए कल्चर शॉक से बच गए। हमारे यहां की तरह आपाधापी नहीं होने के कारण लगता है सबकुछ ठहरा हुआ है। हमारे यहां किसी छुट्टी या हड़ताल के दिन ही इतनी शांति होती है (या उस दिन भी नहीं होती), इसलिए दिमाग में यह बस गया है कि शांति यानी सबकुछ ठहरा हुआ। आपाधापी, धक्कामुक्की, चिल्लपों – यानी सबकुछ तेज गति से चल रहा है। तेज प्रगति।

30 लाख की आबादी वाले बर्लिन में साइकिल वालों की अच्छी खासी तादाद है। साइकिल चलाने के लिए सड़कों के किनारे ही कॉरीडोर बने हुए हैं। ये सड़क से थोड़ा ऊंचे होते हैं, ताकि गाड़ी उस पर न चढ़ पाए, लेकिन इतने भी ऊंचे भी नहीं कि साइकिल से आसानी से सड़क पर नहीं उतरा जा सके। पहली बार पश्चिम जाने वाले किसी भारतीय के लिए हैरत में डाल देने वाली पहली चीज होती है वहां की यातायात व्यवस्था।




 सबकुछ इतना व्यवस्थित कि आप दो-तीन घंटे में ही किसी को भी पूछे बिना वहां अकेले घूमने-फिरने लायक हो जाते हैं। एक ही टिकट से आप मेट्रो, बस और ट्राम में यात्रा कर सकते हैं। मेट्रो से उतरकर बस में चढ़ जाएं, आगे बस नहीं जाती हो तो ट्राम में चढ़ जाएं। बार-बार टिकट कटवाने का झंझट नहीं। पूरे दिन का टिकट कटा लें तो फिर दोनों तरफ जितनी इच्छा यात्रा करें। इसी पैटर्न पर सिंगापुर की यातायात व्यवस्था है।

 इसीलिए उसे पूरब का यूरोपीय शहर कहते हैं। शहर में यातायात के लिए दिन भर के टिकट का 7 यूरो लगता है जबकि महीने भर के पास की कीमत लगभग 80 यूरो है। भारतीय रुपए में बदलें तो यह 6000 रुपए होता है जोकि हमारे लिए बहुत अधिक है।

 लेकिन यदि कीमतों का अंतर समझना है तो एक यूरो को 20 से गुणा करना चाहिए, क्योंकि 20 रुपए में हम जितनी सामग्री खरीद पाते हैं उतनी सामग्री की कीमत वहां लगभग 1 यूरो है। इसे परचेजिंग पॉवर पैरिटी कहते हैं। यह किसी शहर में महंगाई के स्तर को जानने के लिए आसान तरीका है। इस तरह शहर में ट्राम-बस-मेट्रो का संयुक्त मासिक टिकट करीब 1600 रूपयों का हुआ।

 हालांकि पति और पत्नी एक ही पास का इस्तेमाल कर सकते हैं लेकिन फिर भी यह हमारे यहां के लिए बहुत ज्यादा है। क्या इसीलिए हमारे यहां शहरी यातायात व्यवस्था इतने खस्ताहाल में है? क्योंकि व्यवस्था पर जितना खर्च होता है उतना सेवा लेने वालों से वापस नहीं मिलता। अंततः घाटे की भरपाई के लिए सरकार पर निर्भर होना पड़ता है। लेकिन सेवा देने वाली एजेंसी के पक्ष में एक चीज जाती है कि हमारे यहां मेट्रो, बस या ट्रेन किसी भी समय खाली नहीं जाती।

 इसलिए एजेंसी को लागत की पूरी कीमत वापस मिल जाती है। और खड़े होकर, लटक कर यात्रा करने वाले यात्रियों से मिलने वाले पैसे को अतिरिक्त आय समझ लीजिए। वहां कभी भी किसी ट्राम, बस या मेट्रो में मैंने आधी से ज्यादा सीटें भरी हुई नहीं देखी। ट्रेन का टिकट कटवाते समय आपसे पूछा जाएगा कि क्या आप रिजर्वेशन चाहते हैं। यानी ज्यादातर लोगों को रिजर्वेशन की जरूरत नहीं होती।

मुझे लगा कि आप बर्लिन में आंख मूंदकर भी सड़क पर चल सकते हैं। बस सामने ट्रैफिक की हरी और लाल बत्तियों को देखकर चलते रहिए। किसी भारतीय को शुरू शुरू में अजीब लग सकता है कि दूर-दूर तक कोई गाड़ी नहीं होने के बावजूद पैदल लोग बत्ती के हरी होने का इंतजार करते हैं। बत्ती लाल से हरी होने के बाद ही सड़क पार करते हैं।

 एक छोटा बच्चा भी ट्रैफिक की बत्तियों को देखते हुए आसानी से एक जगह से दूसरी जगह जा सकता है। विएना में ट्रैफिक की बत्तियों के ऊपर कैमरे लगे थे। लेकिन हर शहर में औह हर जगह कैमरे नहीं लगे हैं। लोग सिर्फ कैमरों के डर से नियमों का पालन नहीं करते बल्कि वह उनकी आदत में शुमार हो गया है।

म्यूजियमों से भरे बर्लिन में एक म्यूजियम ट्रैफिक की बत्तियों का भी है। ट्रैफिक के सिपाही को वहां एम्पलमैन कहा जाता है। इसलिए इस म्यूजियम का नाम एम्पलमैन्स म्यूजियम है। यहां ट्रैफिक की पुरानी डिजाइन की बत्तियों के अलावा यादगार के लिए संग्रहणीय विभिन्न तरह की सामग्रियों – जैसे कलम, ग्रीटिंग कार्ड, बटुआ, तस्वीरें, टोपियां – को ट्रैफिक की बत्तियों की थीम पर बनाया गया है। सैलानियों के संग्रह के लिए अच्छी चीज है।

एक म्यूजियम का नाम है स्पाई म्यूजियम है। हिटलर और बाद में पूर्वी जर्मनी के कम्यूनिस्ट शासन में चले अत्याचार में खुफिया पुलिस की खास भूमिका रही थी। दरअसल तानाशाही और खुफिया पुलिस का चोली-दामन का साथ है। जहां भी तानाशाही है, राज्यसत्ता का अत्याचार है वहां खुफिया पुलिस की महत्वपूर्ण भूमिका है।

 दरअसल बर्लिन में घूमते हुए आप तीन चीजों को नहीं भूल सकते। हिटलर के समय यहूदियों पर हुआ अत्याचार, 1989 तक जारी रहा जर्मनी और बर्लिन का विभाजन तथा जर्मनी की संसद। जर्मनी की संसद बर्लिन के ठीक बाहर बनी है। जर्मनी में जब पहले पहले लोकतंत्र आया और संसद (रिख्सटाड) बनी तो बर्लिन के राजा ने कहा कि संसद बनाना ही है तो उसे बर्लिन राज्य के बाहर ही बनवाओ। वैसे ही जैसे घर के कूड़े को कोई घर के बाहर पड़ोस में फेंक देता है। बर्लिन का राजा लोकतंत्र को तो रोक नहीं पाया लेकिन संसद को अपने राज्य से बाहर जरूर कर दिया।

हेकेशर मार्केट में पहले के पूर्वी जर्मनी की साफ छाप दिखाई देती है। यहूदियों पर हुए अत्याचार की याद दिलाने वाला एक म्यूजियम है ओटो वाइट्ज का अंधों का कारखाना वाला म्यूजियम। ओटो वाइट्ज नामक जर्मन ने जूतों के ब्रश बनाने का एक कारखाना खोलकर उसमें अंधे यहूदियों को रोजगार दिया था ताकि उनकी जान बच जाए। हालांकि बाद में सभी यहूदी पकड़ लिए गए और उन्हें मार डाला गया।

 इस स्थान को एक म्यूजियम में तब्दील कर दिया गया है ताकि उस कहानी की यादगार सुरक्षित रहे। ओटो वाइट्ज स्पीलबर्ग की मशहूर फिल्म शिंडलर्स लिस्ट के शिंडलर का ही लघु संस्करण था। शिंडलर ने कोई दो-ढाई सौ यहूदियों की जान बचाई थी, जबकि ओटो वाइट्ज के कारखाने में करीब दो दर्जन कारीगर ही थे।

 म्यूजियम में ओटो के साथ सभी कामगारों की तस्वीर भी है। कारखाने के एक कोने में एक कमरा है जिसमें कोई खिड़की या रोशनदान नहीं है। इसमें जाने का दरवाजा एक कपड़ों की आलमारी के पीछे खुलता था। इसमें एक यहूदी परिवार को छुपाकर रखा गया था। हालांकि वह भी अंत में पकड़ा गया था। इस तरह की मन को द्रवित कर देने वाली कहानियां बर्लिन में बिखरी पड़ी हैं या कहें कि जर्मनों ने उन्हें संजोकर रखा है।


कोई अपने इतिहास के कलंकित पन्नों को भी किस तरह संजोकर (लेकिन उन्हें महिमामंडित करके नहीं) रख सकता है इसे जर्मनी से सीखा जा सकता है। बर्लिन की दीवार की याद को ताजा रखने के लिए कहीं-कहीं इस दीवार का एक हिस्सा बिना तोड़े सुरक्षित रख दिया गया है। कहीं-कहीं बीच रास्ते पर कंकड़ों से चिह्न बने हुए दिखाई दे जाएंगे जो यह बताते हैं कि यहां पहले दीवार थी।

 पेवमेंट पर चलते-चलते मेरा मित्र माइक मुझे अचानक नीचे एक छोटी-सी प्लेट दिखाता है। उस पर जर्मन भाषा में उस यहूदी परिवार का नाम लिखा है जो उस स्थान पर पहले रहा करता था। अब उस परिवार के सदस्यों ने इस्राइल से आकर उस स्थान को खोजा और वहां नीचे पटरी पर ही पुलिस के बिल्ले जितनी बड़ी वह प्लेट फिट कर दी। पता नहीं लोगों की ठोकरें खाकर वह प्लेट कब तक बची रहेगी।

11 टिप्‍पणियां:

  1. I have been a virtual tourist since my boyhood (wanderlust). I've enjoyed reading your post on Germany. Your description (with audio accompaniment) is wonderful and presents Germany in graphic details. Your insightful observations of cross-cultural elements is commendable.

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