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Journalist and writer, Writes on Northeast India, Bangladesh, Myanmar

रविवार, 22 जुलाई 2012

मेरी मातृभाषा क्यों भिखारिन बनी घूम रही है


26 जनवरी, 2010 को अंडमान निकोबार में बोआ सीनियर की 85 वर्ष की उम्र में मृत्यु हो गई और उनकी मृत्यु के साथ ही इस पृथ्वी से मर गई एक और भाषा। एक भाषा की मृत्यु के साथ ही खत्म हो जाता है उनके साथ जुड़ा इतिहास, उसके साथ जुड़ी परंपरा, एक पूरी संस्कृति। हम क्यों किसी भाषा के मरने पर दुख मनाते हैं, वह इसलिए कि लाख विज्ञान ने प्रगति कर ली हो, लेकिन कुछ चीजें वह नहीं बना सकता। जैसे वह एक भाषा नहीं बना सकता। वह प्रकृति प्रदत्त जीव या वनस्पति को फिर से नहीं बना सकता। कल को बाघ इस पृथ्वी से विलुप्त हो जाएंगे तो वह फिर से बाघ नहीं बना पाएगा। गैंडा इस पृथ्वी से विदा हो जाएगा तो वह फिर से गैंडा नहीं बना पाएगा। यहीं आकर मनुष्य की सीमाएं दिखाई देने लगती हैं। जो चीज प्रकृति ने हमें दी है, हमारी नासमझी से यदि वे खत्म हो जाती हैं, तो हम उन्हें दोबारा नहीं बना सकते।

पृथ्वी पर सैकड़ों भाषाएं विलुप्ति के कगार पर हैं, उनमें से 53 भाषाएं भारत में हैं। अभी हमने दो दिन पहले छापा कि त्रिपुरा की साइमर भाषा बोलने वाले चार ही लोग बचे हैं। इसी तरह ग्रेट अंडमानिज भाषा बोलने वाले बस पांच ही लोग रह गए हैं। दक्षिण अंडमान की जारवा भाषा बोलने वाले 31 लोग रह गए हैं। पूर्वोत्तर में बोली जाने वाली रुगा, ताई नोरा, ताई रोंग और तांगाम भाषा बोलने वालों की संख्या प्रत्येक की सौ से ऊपर नहीं है।

भाषा कैसे मरती है? भाषा तब नहीं मरती जब उसके बोलने वाले सभी लोग मर जाते हैं। भाषा तब मरती है जब उसके बोलने वालों की नई पीढ़ियां अपनी भाषा का इस्तेमाल बंद कर देती हैं। मैं अपने सामने एक भाषा को मरते हुए देख रहा हूं। और अफसोस यह है कि यह भाषा मेरी अपनी मातृभाषा राजस्थानी है। राजस्थान या सारे भारत के बारे में नहीं कह सकता लेकिन असम, बिहार और प. बंगाल में हमने देखा है कि राजस्थानी परिवारों में नई पीढ़ी ने राजस्थानी बोलना छोड़ दिया है। राजस्थानी बोलना छोड़ने का नई पीढ़ी का यह निर्णय उसका अपना नहीं है। यह निर्णय उस पर थोपा गया है। उससे पहले की पीढ़ी यानी हमारी पीढ़ी ने नई पीढ़ी के साथ राजस्थानी भाषा में बात करना बंद कर हिंदी को अपना लिया। इस तरह नई पीढ़ी राजस्थानी से बिल्कुल अनजान रह गई।

दैनंदिन की दिनचर्या में इस बात की ओर ध्यान नहीं जाता कि राजस्थानी के बहुत सारे शब्द खुद हमारे जेहन से खत्म होते जा रहे हैं। जब मैं मां से बात करता हूं तब उनसे बात करते समय अचानक यह आभास होता है कि अरे इस शब्द का व्यवहार तो हमने बंद ही कर दिया है। जैसे मां कहती है- "बींटी कठै गई'। अरे बींटी की जगह तो हमने अंगुठी कहना शुरू कर दिया था, लेकिन ध्यान ही नहीं रहा कि बींटी भी एक शब्द है। इसी तरह राजस्थानी बोलते हुए भी हम "बारी' की जगह खिड़की, "धोळा' की जगह सफेद, "बाणच' की जगह फल बोलने लग गए। बो सीनियर की उस पीड़ा को मैं कभी-कभी महसूस करने की कोशिश करता हूं कि आप अपनी भाषा बोलने वाले अकेले व्यक्ति हैं, आप चाहकर भी अपनी भाषा में किसी से बात हीं कर सकते। क्या राजस्थानी जैसी जनभाषाओं का भी एक दिन यही हश्र होना है?

मैथिली और भोजपुरी से यदि तुलना करें तो मुझे लगता है कि सबसे कम काम राजस्थानी को आगे बढ़ने के लिए हुआ है। राजस्थानी को साहित्य अकादमी ने काफी पहले से मान्यता दे रखी है, लेकिन इसे संविधान की आठवीं अनुसूची में स्थान प्रप्त नहीं है। राजस्थानी भाषा को जो भी चाहने वाले हैं, वे बैठकों-सभाओं- व्यक्तिगत बातचीत में इस बात पर आक्षेप करते हैं कि भारत सरकार ने राजस्थानी को संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल न करके भारी अन्याय किया है। लेकिन मैं सोचता हूं कि संविधान के अंतर्गत मान्यता नहीं मिली ठीक है, लेकिन क्या हमने अपने दिल में अपनी भाषा को मान्यता दे रखी है? मैं कुछ बिंदुओं पर ध्यान दिलाना चाहूंगा।

(1) संविधान की मान्यता से राजस्थानी को अपने आप किसी भी प्रांत की मान्यता प्राप्त भाषा का दर्जा नहीं मिल जाएगा। राजस्थानी की बात कहने वाले जान-बूझकर इस तथ्य से आंखें मूंदे रहते हैं कि राजस्थान में राजस्थानी को लेकर आम सहमति नहीं है। राजस्थान में शेखावाटी अंचल की मातृभाषा राजस्थानी है। एक-दो और भी इलाके होंगे, जो राजस्थानी को मान्यता देने के पक्ष में हो सकते हैं। लेकिन उन्हें छोड़कर राजस्थान के बाकी इलाके में राजस्थानी को लेकर कोई उत्साह दिखाई नहीं देता। 
(2) जहां तक मेरी जानकारी है राजस्थान मेंं कहीं भी राजस्थानी भाषा शिक्षा का माध्यम नहीं है। क्या कभी इसकी मांग की गई? मेरी जानकारी में कभी ऐसी मांग गंभीरतापूर्वक नहीं उठाई गई। इसकी हम यहां असम या पूर्वोत्तर के अन्य राज्यों में दिखाई देने वाले भाषा प्रेम से तुलना करते हैं, तो हमें साफ दिखाई देने लगता है कि राजस्थानी को सबसे पहले उसके बेटों ने ही घर से निकाला है, तभी वह केंद्र सरकार की गलियों में भिखारिन बनी घूम रही हैऔर आठवीं अनुसूची में शामिल किए जाने के लिए याचना कर रही है। 
उदाहरण के लिए हम मेघालय के एक इलाके में बोले जाने वाली खासी भाषा की बात लें। आप शिलोंग जाएं तो आपको सार्वजनिक स्थानों पर लगे नामपट्टों पर खासी भाषा का वर्चस्व दिखाई देगा। खासी भाषा के कई-कई अखबार निकलते हैं, यह भाषा स्कूलों में पढ़ाई का माध्यम भी है, विधानसभा और सरकारी कामकाज में इसे मान्य प्राप्त है। यह संविधान की आठवीं अनुसूची में नहीं है, लेकिन इससे इसकी प्रगति में कहीं रुकावट नहीं आ रही है। दूसरी ओर राजस्थानी भाषा है, जो आठवीं अनुसूची के लिए तो लड़ रही है लेकिन राजस्थान की राजधानी में कहीं भी उसका अस्तित्व महसूस नहीं होता है। भाषा आपकी जबान पर ही नहीं रहेगी तो आठवीं अनुसूची में स्थान दिलाकर क्या होगा। यह वैसे ही होगा जैसे कोई अपनी मां को घर से निकाल दे और सरकार से उसे पदमश्री देने की मांग करे।

2 टिप्‍पणियां:

  1. एक भाषा को जीवित रखने के लिए जो विचार ब्यक्त किये गये हैं वे सराहनीय है। जहां तक घरों मारवाड़ी न बोले जाने का सवाल है वह सिर्फ प्रवास मे रहने वालो तक ही सीमित है। जयपुरिया इलाकों को छोड़ कर राजस्थानी घरो मारवाड़ी ही बोली जाती है। राजस्थानी भाषा को शिक्षा का माध्यम बनाना राजस्थान को शिक्षा के क्षेत्र मे पीछे ले जाना होगा। असम की कॉलेजो से अंग्रेजी माध्यम हटाने के बाद आज असम का बुद्धिजीवी समाज महसूस कर रहा है कि यह गलत हुआ। राजस्थानी माध्यम के सवाल पर विस्तृत चर्चा की आवश्यकता है। विस्तृत चर्चा मे निगेटिवीटी ही सामने आयेगी

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  2. राजास्थानी भाषा के बोलने वालें धीरे धीरे कम हो रहे है, शायद नयी पीढ़ी इसको नकार रहे है. यह विश्व की हर भाषा के साथ हो रहा है, अंग्रेजी, जर्मन और कुछ अन्य वैश्विक भाषा को छोड कर. हम बंगाली का उदाहरण ले ले, जन्मजात ही बच्चे के साथ बंगला भाषा बोली जाती है, यह बात राजास्थानी में नहीं है. राजस्थान के लोग हिंदी में भी अपने परिजनों के साथ बात करते है. शायद इसलिए, भाषा की यह दुर्गति है.

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