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Journalist and writer, Writes on Northeast India, Bangladesh, Myanmar

शनिवार, 30 जून 2012

शादियों में आडंबर : चिंतन चालू आहे


रिपोर्टिंग के दौरान अंतर्मुखी होने से काम नहीं चलता। खासकर कहीं बाहर जाने पर। इसलिए ईटानगर में उस आदी जनजाति के युवक से दोस्ती बढ़ाने की गरज से मैंने इधर-उधर की बातें शुरू की। पैसे देने के लिए उसने बटुआ निकाला तो देखा कि किसी महिला की फोटो है। मैंने पूछा- आपका वाइफ? उसने कहा, हां मेरा सबसे प्यारा वाइफ। सबसे प्यारा मतलब! उसने बताया कि उसकी चार पत्नियां हैं। तीन शादियां उसने पिता की इच्छा से की, और यह चौथी शादी अपनी मर्जी से की। उनकी जनजाति में किसी व्यक्ति का मान-सम्मान, रुतबा इस बात से मापा जाता है कि उसके कितनी पत्नियां हैं। कहने की जरूरत नहीं कि उनके यहां बहुविवाह की इजाजत है। लगभग हर समाज में किसी समय पत्नियों और गुलामों की संख्या से आदमी का रुतबा मापा जाता था। बाइबिल और हदीस में ऐसे प्रकरण भरे पड़े हैं, जिनमें एकाधिक पत्नियों और गुलामों की संख्या के साथ आदमी की सामाजिक हैसियत जुड़ी होने के प्रसंग आए हैं। आज लगभग हर समाज में बहुविवाह और गुलाम रखने की अनुमति नहीं है।

इस प्रकरण की याद आई उड़ीसा हाई कोर्ट के अधिवक्ता रमेश अग्रवाल द्वारा शादियों में फिजूलखर्ची पर मेरे लेख की प्रतिक्रिया में फेसबुक पर लगाए गए इस सवाल के कारण कि किसी के पास पैसा है तो अपनी मर्जी से खर्च करने का भी उसे अधिकार है। बाहर से किसी को बोलने का क्या अधिकार है? मुझे अरुणाचल प्रदेश के जनजातीय युवक का प्रसंग इसलिए याद आया कि हमारे अधिकांश क्रिया-कलाप पर सामाजिक नियंत्रण रहता है। लेकिन हम उसके इतने अभ्यस्त हो जाते हैं कि हमें उस सामाजिक श़ृंखला का अनुभव तक नहीं होता। उल्टे हम उस सामाजिक नियंत्रण के अंदर अपने आपको सुरक्षित महसूस करते हैं। आदी जनजाति में रुतबा दिखाने के लिए बहुविवाह की अनुमति है, इसलिए उस कबीले केधनी लोग इस अनुमति का फायदा उठाते हुए शान से एकाधिक विवाह करते हैं और अपने समाज में छाती फुलाकर चलते हैं। क्या हमारे समाज में किसी के पास पैसा हो तो वह बहुविवाह कर सकता है? आप कहेंगे कि यह गैरकानूनी है। लेकिन कानून तो हिंदू धर्म के वर्तमान रीति-रिवाज को देखते हुए बाद में बना है। कल्पना कीजिए कि कल को कानून न भी रहे तो क्या समाज सिर्फ इसलिए बहुविवाह की अनुमति दे देगा कि किसी के पास पैसा है? इन पंक्तियों से हम सिर्फ यह दिखाना चाहते हैं कि किस तरह हमारे क्रिया-कलापों पर सामाजिक प्रतिबंध है और उन्हें धनी और गरीब हर किसी को मानकर चलना पड़ता है। अब सवाल उठता है कि क्या शादियों के अवसर पर होने वाली फिजुलखर्ची और आडंबर समाज के लिए अहितकारी है? इस संबंध में कई तरह के सवाल पूछे जाते हैं।

प्रश्न 1 : आधुनिक अर्थव्यवस्था उपभोग पर निर्भर है। यदि लोगों ने शादियों में खर्च कम कर दिया तो क्या अर्थव्यवस्था धीमी पड़ जाने का खतरा नहीं है?

उत्तर : यह सही है कि आधुनिक अर्थव्यवस्था उपभोग पर निर्भर है। उपभोग मध्य वर्ग या उच्च वर्ग करता है। उच्च वर्ग संख्या में सीमित है, इसलिए अर्थव्यवस्था का सारा उद्यम मध्य वर्ग को तरह-तरह के उपभोगों की ओर आकर्षित करने पर केंद्रित रहता है। आज सिर्फ अर्थव्यवस्था को चलाने के लिए बाजार अनावश्यक और हानिकारक पेय पदार्थों, खाद्य पदार्थों, प्रसाधन सामग्रियों से पटा पड़ा है। बात लोगों के जीवन को ज्यादा आरामदायक बनाने की की जाती है, लेकिन मतलब होता है सिर्फ अपने प्रोडक्ट को मार्केट में ठेलने का। आज शाही शानौ-शौकत से शादियां करवाने वाली कंपनियां बाजार में उतर गई हैं।

इस अनावश्यक उपभोग के दो पहलू हैं। एक है विकसित देशों में होने वाला अनावश्यक उपभोग। वहां गरीब वर्ग नहीं है, या उसे राज्य द्वारा पर्याप्त मदद मिल जाती है, फिर भी अनावश्यक उपभोग प्रकृति द्वारा प्रदत्त संसाधनों पर दबाव पैदा करता है, यहां तक कि पृथ्वी के आने वाली पीढ़ियों के रहने लायक नहीं रहने का खतरा पैदा हो गया है। दूसरा पहलू है, भारत जैसे देश में अनावश्यक उपभोग का। हमारे देश में भले 30 करोड़ का मध्य वर्ग पैदा हो गया हो, फिर भी यहां संसाधनों की कमी है। इसलिए अर्थव्यवस्था को गति देने के नाम पर हम अनावश्यक और संसाधनों को बर्बाद करने वाले (टनों खाना नालियों में बहाया जाना) उपभोग को बढ़ावा नहीं दे सकते। हमारी अर्थव्यवस्था की मुख्य दिशा ज्यादा बचत और उस बचत के पैसे का बुनियादी ढांचे को विकसित करने और उद्योग में निवेश करने की ओर होनी चाहिए।

प्रश्न 2 : क्या आज के युग में सामाजिक नियंत्रण संभव है?

उत्तर : जिन जातियों में जाति पंचायतें आज भी सक्रिय हैं, वहां इस तरह के नियंत्रण आज भी संभव हैं। हमने पिछले सप्ताह गुर्जर पंचायत का जिक्र किया था, जिसने अपनी जाति के अंदर इस तरह के प्रतिबंध लागू किए हैं। इसके अलावा जहां आधुनिक शैली के संगठन सक्रिय हैं, यदि उन्हें पंचायतों जैसी मान्यता हासिल है, तो उनके माध्यम से भी इस तरह के नियंत्रण संभव हैं। याद रखना होगा कि शादियों में आडंबर के विरुद्ध लड़ाई आधुनिक अर्थव्यवस्था की इस समय जो दिशा है उस दिशा के विरुद्ध लड़ाई है। यह उपभोगवाद का आक्रामक प्रचार करने में नियोजित विज्ञापन कंपनियों, विशाल कारपोरेशनों के साथ लड़ाई है। इसके लिए मानसिक तैयारी को भी पर्याप्त महत्त्व देना होगा। उड़ीसा के रमेश अग्रवाल ने जैसा बुनियादी सवाल पूछा है, वैसे सवाल आते रहने चाहिए ताकि हम इस मुद्दे पर अपनी वैश्विक दृष्टि को साफ रख सकें।

5 टिप्‍पणियां:

  1. "उड़ीसा के अतिरिक्त महाधिवक्ता रमेश अग्रवाल द्वारा शादियों में फिजूलखर्ची पर मेरे लेख की प्रतिक्रिया में फेसबुक पर लगाए गए इस सवाल के कारण कि किसी के पास पैसा है तो अपनी मर्जी से खर्च करने का भी उसे अधिकार है। बाहर से किसी को बोलने का क्या अधिकार है?"
    प्रतिक्रियाः- अग्रवालजी, यदि किसी के पास पैसा, अकूट धन है तो इस संदर्भ मे एक बड़ी सच्चाई तो यह है कि आज के युग मे ईमानदारी के साथ और बिना भ्रष्टाचार का आश्रय लिए कोई भी अकूत धन का मालिक नहीं हो सकता। इस तरह से एकत्रित धन को खर्च करने मे मितब्ययिता के सिद्धांत की बिल्कुत अनदेखी की जाती है। यदि आपके जेहन मे ये विचार हैं भी तो सामाजिक दायित्वबोध समझने वाले हर चिंतनशील ब्यक्ति का यह अधिकार बनता है कि वह इसके खिलाफ अपने विचार समाज के सजग वर्गे के सामने रखे। यही श्री विनोद रिंगानियां ने किया है।
    अग्रवालजी, मेरा आपसे एक सवाल और भी है और वह यह कि किसी के पास अपार पैसा होने पर सामजिक दायित्व को भूल जाने का क्या कोई औचित्य है। पैसे वाले अपनी मर्जी से खर्च करे इसमे किसी को भी आपत्ति नही हो सकती। पर ऐसी मर्जी के आकलन का अधिकार हर सामाजिक चिंतनशील ब्यक्ति को है। पैसा खर्च करने की मर्जी यदि समाज के ब्यापक हित मे उपयोग होता है तो वह प्रशंसनीय है वर्ना निंदनीय है। यह निर्भर करता है

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  2. Two ppl were generally talking

    One had worn a titan watch and the other one rolex.

    Ek ne kaha "Yaar kya difference hai teri aur meri watch me,
    ...
    Tune 2 lakh ki watch pehni hai aur maine 2000 ki,

    Par dono watch ek hi waqt batati hai.

    Dusre ne kaha "Teri watch tera waqt batati hai aur meri watch mera waqt"

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  3. Making jocks of serious thoughts is nothing but insolvency of mindset.
    PHIR BHI AAP MAJAK ACHAA KAR LETE HAIN.
    Tish is also an art.
    But Why anonimous ?

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  4. असमीया समाज मे एक कहावत प्रचलित है डांगर मानुहर बिया साबोलै भाल होरु मानुहर बिया खाबोलै भाल ।
    आडंबरपूर्ण शादियों मे अतिथि तो होते हैं पर आतिथ्य नहीं रहता।

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  5. Santosh Agarwal 'Kalpataru'1 जुलाई 2012 को 6:14 pm

    परंपराएं बदले आपत्ति नहीं, टूटनी नहीं चाहिए
    कोई भी व्यक्ति चाहे वह गरीब हो या फिर अमीर, सबसे पहले वह एक सामाजिक प्राणी है, इसलिए वह समाज द्वारा बनाए गए नियमों पर चलने के लिए बाध्य है। यदि वह समाज के, चाहे वह लिखित हो या अलिखित, नियमों को तोड़कर आगे निकलने कोशिश करता है तो वह एक समाज विरोधी काम करता है। विनोद भैया के लेख पर यदि सीधी प्रतिक्रिया देनी हो तो यह सारी बातें फीट बैठती है। मगर बात यहां आकर खत्म नहीं, बल्कि शुरू होती है। हमारा समाज अर्थ प्रधान होने के कारण इसका नजरिया भी उसी प्रकार का हो गया है। यह जानते हुए भी कि सामने वाले ने समाज द्वारा तय नियमों को तोड़ा है, उसकी अमीरी-गरीबी को देखते हुए समाज अपनी प्रतिक्रियाएं देता है। मुझे अचरज तो तब होता है जब शादियों में फिजूल खर्ची के विरोध में लंबे-लंबे भाषण देने वाला व्यक्ति किसी अमीर व्यक्ति के बेटे-बेटी की शाही तरीके से आयोजित कि जाने वाली शादी का निमंत्रण पत्र पाकर फूला नहीं समाता और अपने मित्र-मंडलियों में गर्व के साथ इस बात का बखान करता है। शादी की फिजूल खर्ची को लेकर 1990-1991 में एक आंदोलन चला था, लड़के की शादी के मुद्दे में बनाए जाने वाले कीमती लड्‌डुओं को लेकर भी तब जमकर बहस हुई थी, मगर बाद में देखा गया कि शादी में फिजूल खर्ची का विरोध करने वालों ने ही अपने बेटे-बेटियों की शादियों में जमकर पानी की तरह पैसे बहाए। लेखक को याद होगा, 1980-81 का वह दौर जब शादी के समय बजने वाले बैंडबाजों को फिजूल खर्ची मानते हुए एक तरह से सामाजिक प्रतिबंध ही लगा दिया गया था। हमारे गांव में जब किसी शादी के मौके पर बैंडबाजे वालों को बुलाया जाता था, तब मैं वहां अपनी अनुपस्थिति दर्ज करा अपने अंदाज में उसका विरोध प्रकट किया करता था। मगर वह सिलसिला भी अधिक दिनों तक नहीं चला।
    उक्त बातों में एक अहम सवाल उभरकर सामने आता है कि वह क्या कारण है, जिनकी वजह से फिजुल खर्ची पर लगाम लगाने संबंधी आंदोलन-कार्यक्रम अधिक दिनों तक नहीं चल पाते। इस बारे में मेरी सोच है कि आप दबाव डालकर किसी को भी कोई नियम मानने पर अधिक दिनों तक मजबूर नहीं कर सकते। जैसे ही आपका दबाव कम होगा, सामने वाला फिर से अपनी मनमर्जी करने लगेगा। जहां तक सामाजिक नियमों-बंधनों का सवाल है तो वहां दबाव जैसी बात देखने को नहीं मिलती। एक तरह से यदि कहा जाए तो यही नियम हमारी परंपराओं में बदल चुके हैं। समाज द्वारा तय किसी भी परंपरा का निर्वाह करते समय ऐसा नहीं लगता कि वह किसी सामाजिक नियम का निर्वाह कर रहा है। जब भी किसी को ऐसा लगता है तो परंपराएं टूटती हैं, या यूं कह लें कि सामाजिक नियम टूटते हैं। ध्यान रहे किसी भी नियम में बदलाव लाना अथवा उस नियम को तोड़ना दो अलग-अगल बातें हैं। समय के साथ सामाजिक नियम, कायदे-कानूनों में बदलाव हो तो इसमें किसी को आपत्ति नहीं मगर, कोई समाज के नियम को ही तोड़ना चाहे तो ऐसे आग उगलते विचारों का पनपना स्वाभाविक है, जैसे विचार विनोद भैया के लेख में उभरकर सामने आए हैं।

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