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Journalist and writer, Writes on Northeast India, Bangladesh, Myanmar

सोमवार, 19 जनवरी 2015

ट्रेन टू बांग्लादेश


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 ढाका के ऑटोरिक्शे लोहे की जालियों से पूरी तरह सुरक्षित होते हैं।

हमें यह पता नहीं था कि त्रिपुरा की राजधानी अगरतला बिल्कुल अंतर्राष्ट्रीय सीमा पर ही बसी हुई है (हम कितने अज्ञानी हैं)। हमें यह तो पता था कि अंतर्राष्ट्रीय सीमा वहां से पास ही है लेकिन इस बात का आभास नहीं था कि हमारे देश के एक राज्य की राजधानी बिल्कुल सीमा पर ही है। सीमा के उस पार के कस्बे का नाम अखौड़ा है। औपचारिकताएं पूरी कर सीमा चौकी पार करने के बाद ऑटो से अखौड़ा स्टेशन तक जाने के दो सौ बांग्लादेशी टाका लगते हैं। यही 7-8 किलोमीटर की दूरी होगी। अखौड़ा में सड़कें संकरी थीं, काफी भीड़-भड़क्का। स्टेशन पर एक ट्रेन खड़ी थी। बांग्लादेश की सभी ट्रेनें चेयर कार वाली हैं। टिकट पर ही सीट नंबर लिखा रहता है। प्लेटफार्म पर तीन-चार सजे-धजे किन्नर तेज-तेज जा रहे थे, एक-दूसरे से होड़ करते हुए। जैसे हमारे यहां जाते हैं। जब हम बांग्लादेश में घुसे तो वहां विपक्षी पार्टियों का रास्ता जाम चल रहा था जिसे वहां अवरोध कहा जाता है। अवरोध के कारण पहले से ही भीड़ वाली ट्रेनों में और भी ज्यादा भीड़ थी। लेकिन अखौड़ा से ढाका जाने वाली ट्रेन भी नहीं थी। हमें आजमपुर जाने की सलाह दी गई। आजमपुर वहां से यही कोई 6-7 किलोमीटर था। हमने एक ऑटो ले लिया।

ढाका विश्वविद्यालय के छात्र संघ कार्यालय में एक छोटा सा म्यूजियम है जिसमें 1971 के स्वाधीनता संग्राम की यादें सुरक्षित हैं। लेखक के साथ परिलक्षित हैं प्रथम आलो नामक समाचार पत्र के संयुक्त संपादक सोहराब हसन।

ऑटो ड्राइवर हारून ने हमसे पूछा कि असमिया कैसे बोलते हैं। मैंने एक-दो वाक्य बोलकर सुनाया। लगा कि उसे अच्छा लगा। उसका मन हिंदी बोलने का था। कहा हिंदी बोलिए न। मैं हिंदी जानता हूं। हारून ने दुबई में हिंदी में सीखी थी। वहां वह रंगमिस्त्री का काम करता था। लेकिन ज्यादा कमाई नहीं कर पाया। वहां की एक हजार मुद्राएं यानी बांग्लादेशी टाका में बाईस हजार की कमाई होती थी। अब वह ऑटो चलाकर कम-से-कम तीस हजार कमा लेता है। अखौड़ा में ऑटो ड्राइवरों की अच्छी कमाई है। ऑटो चलाने वाले छह सौ टाका देकर किराए पर ऑटो ले सकते हैं। जबकि अगरतला में एक दिन का किराया तीन सौ रूपया (बांग्लादेशी 360 टाका) है। यानी उधर कमाई ज्यादा है। उधर कमाई ज्यादा होने के प्रमाण हमें आगे भी मिलते गए।

आजमपुर का दबा-सिकुड़ा-मरियल सा स्टेशन था। हमारे यहां ऐसे स्टेशन चालीस साल पहले भी नहीं थे। प्लेटफार्म पर ही मस्जिद बनी हुई थी। विदेशी जानकर प्लेटफार्म के बाहर एक युवक हमारी मदद करने के लिए आगे आया। कहा आपलोग बंग्ला नहीं जानते क्या। हमने पूछा तुम हिंदी कहां से सीखे। वह भी दुबई रिटर्न था। हमें अपने देश का मेहमान समझकर वह मदद करने को आगे आया था। तब तक ट्रेन आ चुकी थी। हमारी टिकट पर सीट नंबर नहीं थे। सीट वाली टिकटें खत्म हो चुकी थी। हमें बैठने का अधिकार नहीं था। पहले ही मिल चुकी सलाह के अनुसार हम बिल्कुल पीछे चले गए थे। वहां की ट्रेनों में पीछे के कोच में कैंटीन रहता है। कैंटीन वाले की ना-नुकर की परवाह नहीं करते हुए हम उसमें जबरदस्ती घुस गए। आखिर कैंटीन वाले को भी पैसे कमाने थे। जो पैसे देने वाले जैसे लगे उनलोगों को उसने कड़ाई से नहीं रोका।

अंदर चाय पीने और खाने के लिए टेबल-कुर्सियां लगी हुई थीं, जैसे कभी हमारे यहां की ट्रेनों में डाइनिंग कार में हुआ करती थीं। लेकिन यह पूरा कोच नहीं था। कोच का आधा या एक-तिहाई हिस्सा था। हर कुर्सी पर यात्री जमे हुए थे। ये लोग कुछ खाने-पीने के लिए नहीं आए थे। बल्कि कैंटीन वाले को कुछ टाका देकर वे लोग उन सीटों पर जम गए थे। कैंटीन वाले ने हमारे लिए भी एक बक्से पर जगह कर दी। उस स्थिति में हमारे लिए वह एसी से भी बढ़िया जगह थी। कैंटीन में सैंडविच, चाय, पानी, कोल्ड ड्रिंक और चावल मिल रहे थे। हमने भी समय पर सैंडविच खा ली। बांग्लादेश में ट्रेनों को किराया बहुत अधिक है। 120 किलोमीटर के 150 टाका ज्यादा ही हैं। हमारे यहां स्थानीय गाड़ियों में बीस-बाइस रुपए लगते हैं, मेल ट्रेन में यही 65-70 रुपए होंगे।

ढाका बिमान बंदर स्टेशन से हमारा होटल नजदीक पड़ता था इसलिए हम वहीं उतर गए। ढाका में कहीं टैक्सी दिखाई नहीं दी। स्टेशन से हमने ऑटो लिया। ढाका के ऑटो लोहे की जाली से पूरी तरह सुरक्षित रहते हैं। बताते हैं कि यहां छिनताई बहुत होती है। चलते ऑटो से औरतों के पर्स या मोबाइल छीन ले जाना आम बात है। उल्फा के अध्यक्ष अरविंद राजखोवा की पत्नी काबेरी कछारी राजखोवा अपने संस्मरण में बताती हैं कि तरह एक बार रिक्शे पर जाते समय एक लड़का उनका पर्स छीन ले गया। ढाका में ऑटो वालों की तेज गति दिल दहला देने वाली होती है। अब मैंने जाना कि ढाका अखबारों में दुर्घटनाओं की खबरें इतनी ज्यादा क्यों होती हैं। सीटी बस वाले चाहते हैं कि सिगनल को अनदेखा कर गाड़ी लाल बत्ती में भी बढ़ा ले जाएं। घर लौटने के बाद ढाका के अखबार में पढ़ा कि एक बस तीन लोगों के ऊपर से निकल गई। पहले लगता था ढाका में इतनी ज्यादा दुर्घटनाएं क्यों होती हैं। अब लगता है इतनी बेपरवाह ड्राइविंग के बाद भी इतनी कम दुर्घटनाएं। शायद ईश्वर के अस्तित्व का यही प्रमाण है। (बस एक मजाक है, ढाका के मित्र माफ करेंगे।)

हमारे हिंदी को लेकर अति उत्साही रहने वाले मित्रों को पता नहीं बांग्लादेश जाकर कैसा लगेगा। बांग्लादेश में सार्वजनिक स्थानों पर अंग्रेजी न के बराबर है। ट्रेनों में कहीं भी अंग्रेजी में कुछ भी लिखा नहीं रहता। टिकट पर होने को तो अंग्रेजी है लेकिन वह साफ नहीं है और आप यदि बंग्ला नहीं जानते तो आपको दूसरों के आसरे ही रहना पड़ेगा। यहां तक कि रोमन संख्याओं का उपयोग करने से भी उन्हें परहेज है। इस स्थिति में हमारे हिंदी-उत्साही मित्र शायद यह कहें कि देखो हमारा एक छोटा-सा पड़ोसी देश भी अपनी भाषा को कितना प्यार करता है और उसने अंग्रेजी को उखाड़ बाहर किया है। और हम हैं कि अंग्रेजी की गुलामी करते हैं। बांग्लादेशियों ने शायद यह मान लिया है कि विदेश से आने वाला कोई भी इंसान बंग्ला तो जानता ही होगा। या फिर उनलोगों को शायद विदेशी सैलानियों की जरूरत नहीं है या यह उम्मीद नहीं है कि उनके यहां काफी संख्या में विदेशी सैलानी आएंगे। बंग्ला पढ़ना नहीं जानने वाले को बांग्लादेश में निश्चित रूप से दिक्कतों का सामना करना पड़ेगा, लेकिन हमारे हिंदी-उत्साही मित्र शायद इन दिक्कतों को इसलिए सहर्ष झेल लें कि अंग्रेजी हटाओ का साक्षात पूर्ण क्रियान्वयन उनके बिल्कुल पड़ोस में हो रहा है।

(अगले रविवार को पढ़ें ट्रेन में इंडिया की बातें। लेखक से संपर्क 98640-72186)





शनिवार, 3 जनवरी 2015

पहले दिन का विषाद और असमिया भाषा से दूरियां



यह 1974 की बात होगी जब मैंने पहली बार राजस्थान की धरती पर पैर रखा था। मैंने अब तक दो ही बार मुख्य रूप से राजस्थान की यात्राएं की हैं। हमारे परिवार में बच्चे के बाल पहली बार राजस्थान जाकर अपने ईष्टदेवता के सामने कटवाने का नियम है। इसे हम लोग जड़ूला कहते हैं। तब तक मेरी उम्र 13 साल हो चुकी थी और मेरे बाल कटवाए नहीं गए थे। इससे दिक्कत तो हुई लेकिन फायदा यह हुआ कि जब मैं पहली बार राजस्थान गया तब तक चीजों को समझने और याद रखने लायक हो चुका था। अब भी वो अल्ल सुबह उठकर ऊंटगाड़ी में बिस्तर (सोड़िए) बिछाकर आसपास के गांवों की यात्रा करने का मनोरम दृश्य याद है। एक दृश्य - सामने से आ रही एक ऊंटगाड़ी भी बांई ओर से आ रही थी। हमारी ऊंटगाड़ी भी बांई ओर से जा रही थी। जब उसे रास्ता देने के लिए हमारी गाड़ी दाएं हुई तो वो भी दाएं हो गई। यह खेल दो-तीन दफे चला। गांव वाले बाएं और दाएं का नियम जानते ही नहीं थे। रेगिस्तान की निष्कलुष भोर में गांववासियों का यह भोलापन मिलकर उसे एक अनुपम ही रंग दे रहा था।

दूसरी बार राजस्थान की यात्रा करीब दस साल पहले हुई। मेरी ही तरह इस बार मेरे बच्चे के बाल कटवाने। मैं पिछली बार जैसी मनोरम यात्रा को लेकर अति उत्साहित था। इस बार हमने एक जीप कर ली। रास्ते भी ऐसे हो गए थे जिन पर जीप चल सके। जीप वाला फर्र-फर्र कर हमें हर जगह ले गया और करीब सात में से छह मंदिरों की यात्रा एक ही दिन में पूरी करवा दी। इस यात्रा में पिछली बार तीन-चार दिन लग गए थे। लेकिन पिछली बार जैसा मजा आया था उसका एक शतांश भी इस बार नहीं आया। पेट्रोल और डीजल से चलने वाले वाहन परिवेश में धुंआ फैला रहे थे। मुझे गुवाहाटी, सुजानगढ़, डीडवाना और कांकरोली में कोई फर्क नजर नहीं आया। गुवाहाटी में तो फिर भी पांव से चलने वाले रिक्शे अभी हैं लेकिन राजस्थान में तो सभी रिक्शे डीजल से चलने वाले हो गए हैं। वे बेहद शोर करते हैं। एक पीढ़ी ऐसी है जिसे कम भीड़ वाले रास्तों और रास्तों पर सहनीय शोर के बारे में कुछ मालूम ही नहीं है। जिस तरह बहुत से लोगों को असली जर्दा, असली दूध, असली मसालों के बारे में कुछ भी पता नहीं।

नववर्ष किसने किस तरह मनाया होगा। सारे भारतवर्ष में इसका भी एक पैटर्न बन गया है। लगभग हर जगह ही कुछ मोटरसाइकिल सवार अपने पिकनिक स्थल पर पहुंचने के लिए किसी ट्रक से होड़ करने के दौरान दुर्घटनाग्रस्त हुए होंगे। कुछ कार चालक नियम तोड़कर सामने से आते किसी वाहन से टकराते-टकराते बचे होंगे। और उनमें से कुछ सचमुच टकरा गए होंगे। लगभग हर शहर के बाहर किसी नदी-तालाब के किनारे पिकनिक मनाने गए कुछ लोगों में कुछ लोग तैरना नहीं जानते हुए नदी-तालाब में उतरे होंगे। और उनमें कुछ लोग डूबते-डूबते बचे होंगे। और उनमें से कुछ लोगों को उनके साथी बचा नहीं पाए होंगे।

क्या मैं बेवजह डर पैदा कर रहा हूं। ऐसी बात नहीं है। आप 2 जनवरी का अखबार उठाकर देखें। कम-से-कम सात लोगों ने छोटे से असम में इन्हीं तरह के कारणों से अपनी जान गंवाई और अपने साथियों के लिए 1 जनवरी को एक मनहूस दिन में तब्दील कर दिया। वाहनों का बढ़ना प्रगति की निशानी है। एक स्तर तक वाहन बढ़ते जाएंगे। फिर एक दौर आएगा जब बहुत अधिक पैसे वाले लोग पेट्रोल-डीजल से चलने वाले वाहनों की जगह साइकिल जैसे वाहन को पसंद करने लगेंगे। तब उनकी देखादेखी हो सकता है साइकिल चलाना एक क्रेज हो जाए। यह सब कब होगा कहना मुश्किल है। लेकिन जब तक साइकिलें वापस आएंगी तब तक के लिए क्या हम नियमों के अनुसार नहीं चल सकते। प्रगति हर निशानी के साथ कुछ नियम भी चले आते हैं। उनका यदि पालन नहीं करें तो प्रगति ही दुर्गति में बदल जाती है।

‘हमारी” युवा पीढ़ी

जो लोग असम के बाहर से आकर यहां रह रहे हैं और जिनकी दो-दो पीढ़ियों का जन्म यहीं हुआ है और जो बात-बात में यहीं के होने का दावा करते हैं उनका असमिया भाषा के साथ कोई गहरा रिश्ता नहीं बन पाया था, लेकिन क्या उनकी नई पीढ़ी का ही स्थानीय भाषा के साथ कोई रिश्ता बन पाया है। मुझे लगता है कि नई पीढ़ी तो और भी अधिक असमिया भाषा से दूर है। एक मित्र ने कहा कि भाषा क्या है, सिर्फ अभिव्यक्ति का माध्यम ही तो है। आप जैसे भी हो अपनी बात किसी को समझा पाते हैं तो और क्या चाहिए। लेकिन भाषा के साथ एक पूरा साझा इतिहास, एक संस्कृति जुड़ी होती है। जो युवा असमिया भाषा के साथ नहीं जुड़ा होगा, वह असमिया साहित्य के साथ भी जुड़ा नहीं होगा, वह असमिया नाटक और फिल्म से भी जुड़ा नहीं होगा, उसे असमिया संगीत से भी (हालांकि संगीत की कोई भाषा नहीं होती) कोई सरोकार नहीं होगा। और वह असमिया मानसिकता से भी दूर होगा। तो क्या जिन लोगों के पुरखे यहां सिर्फ रोजगार के लिए आए थे और इस तरह रहते थे जैसे कोई धर्मशाला में रहता है, तो नई पीढ़ी भी उस मानसिकता से उबर नहीं पाई है? जब हम हमारी पड़ताल को जरा गहरे में ले जाते हैं और देखते हैं कि असम जैसे प्रदेश में बाहर से कौन लोग आए? जिन जातियों के लोग आए उन्हें क्या अपने प्रदेश में भाषा, साहित्य, संगीत जैसी (बेकार की) चीजों से बहुत लगाव है। तो हम पाते हैं उन्हें अपने उस प्रदेश की भाषा से भी कोई वैसा लगाव नहीं है, वह चाहे हिंदी भाषा हो चाहे कोई और।


जब हम देखते हैं कि असम जैसे राज्य में पुस्तकों को लेकर कोई चर्चा हो, या टीवी पर कोई कार्यक्रम हो, सिनेमा को लेकर कोई विचारगोष्ठी हो, या नाटक पर कोई वर्कशाप हो, किसी नृत्य की कार्यशाला हो, या पत्रकारिता ही हो – हर जगह मुख्यतः मुख्यधारा के असमिया समुदाय का ही बोलबाला रहता है। फिर यह ख्याल आता है कि इन क्षेत्रों में जहां पैसे नहीं हैं या कम पैसे हैं दूसरे लोग आते कहां हैं। फिर यदि हम किसी की उपेक्षा करने का आरोप लगाएं तो यह गलत होगा। पिछले कुछ अरसे से बाहर से आए ऐसे एक समुदाय के लोगों में राजनीति में आने के लिए काफी जद्दोजहद देखने को मिली। जैसे व्यापार में आए वैसे ही ये लोग राजनीति में आना चाहते हैं। आखिर मलाई तो राजनीति में ही है। राजनीति भी तो एक व्यापार ही है। तो फिर क्यों नहीं आएं हम राजनीति में। लेकिन बिना समाज से जुड़े, बिना स्थानीय भाषा को प्यार किए, बिना स्थानीय संस्कृति का आदर किए – की जाने वाली यह राजनीति किस तरह सिर्फ पैसा कमाने और सिर्फ अपने समुदाय की मुखियागिरी करने वाली राजनीति होगी यह तो पहले से ही साफ है।

बुधवार, 22 अक्टूबर 2014

लक्ष्मी, स्वास्थ्य और ज्ञान




दीपावली का त्योहार आ गया जिस दिन लोग महालक्ष्मी की पूजा कर समृद्धि की कामना करते हैं। यह कम अर्थपूर्ण नहीं है कि जिस दिन को महालक्ष्मी की पूजा करने के लिए चुना गया है उससे दो दिन पहले धनवंतरि की पूजा की जाती है। धन्वंतरि स्वास्थ्य के देवता है। धन्वंतरि और लक्ष्मी दोनों ही समुद्र मंथन से निकले थे। सफल जीवन के लिए लक्ष्मी की जितनी आवश्यकता होती है स्वास्थ्य की उससे कम नहीं।



लेकिन पता नहीं क्यों हमारे देश में धीरे-धीरे स्वास्थ्य का महत्त्व कम होता गया। बल्कि यह मान लिया गया है कि जो लक्ष्मी की साधना करेगा उसे अच्छे स्वास्थ्य, ज्ञान, कला और विद्या हर चीज से नाता तोड़ लेना होगा। उसे एकांगी जीवन जीना होगा। इसी जीवन दर्शन को समेटते हुए कोई कोई कहता है कि लक्ष्मी और सरस्वती एक साथ नहीं रह सकतीं। भारत जैसे देश में जहां के धर्मों में जीवन के हर पहलू को समेटा गया है ऐसा चिंतन कब से हावी हो गया यह विचारणीय प्रश्न है।

पश्चिम में जो धनी लोग हैं उनके जीवन का अध्ययन करें तो आप पाएंगे कि उनमें से अधिकतर स्वास्थ्य की साधना को भी अपना अच्छा खासा समय देते हैं। वहां हर सफल व्यक्ति, भले वह व्यवसायी हो या राजनीतिज्ञ या कलाकार, जीवन में कम-से-कम एक पुस्तक तो अवश्य लिखता है। और पढ़ना तो चलता ही रहता है।

भारत में यह मान लिया गया है कि यदि कोई व्यक्ति धन की साधना में व्यस्त है तो उसके पास स्वास्थ्य का ध्यान रखने के लिए वक्त नहीं रहेगा। उसका वजन बढ़ता चलता जाएगा। उसके पास पुस्तक पढ़ने का वक्त नहीं रहेगा। इसे प्रोफेसरों को शगल समझा जाता है। इसके उलट जो लोग खेल या योग-व्यायाम जैसी गतिविधियों से जुड़े हुए हैं वे अधिक धनी नहीं होंगे यह मान लिया गया है।

जो लेखक हैं, विश्वविद्यालयों में प्राध्यापक हैं वे बस जैसे-तैसे अपनी गृहस्थी चलाते रहें यह हमारे यहां की एक मान्य छवि है। हिंदी के महान साहित्यकारों का नाम लें तो उनमें से अधिकतर की माली हालत ठीक नहीं थी, धनी तो उनमें से कोई नगण्य थे।

नई प्रौद्योगिकी के आने के बाद स्थिति बदली है। सूचना प्रौद्योगिकी से संबंधित कंपनियों में काम करने वाले इंजीनियरों का वेतन लाखों में है। पश्चिम के समृद्ध देशों के साथ भारत इंटरनेट के जरिए जुड़ गया है। ज्ञान के माध्यम से भी कोई समृद्ध हो सकता है यह अवधारणा अब लोगों की समझ में आ रही है।

ज्ञान आधारित उद्योग एक नई श्रेणी बनकर उभरा है। नित नए ऐप बन रहे हैं जिनका स्मार्टफोन और पर्सनल कंप्यूटरों पर उपयोग होता है। नई दवाओं का उद्योग सबसे अधिक मुनाफा देने वाला उद्योग है। पश्चिम के देशों ने किसी समय शारीरिक श्रम के माध्यम से समृद्धि हासिल की। अब उसने शारीरिक श्रम वाले उद्योगों को तीसरी दुनिया के देशों के हवाले कर दिया है। वे स्वयं अब सिर्फ नए उत्पादों की संकल्पना तैयार करते हैं। वास्तविक उत्पादन चीन, दक्षिण कोरिया, थाईलैंड, मलेशिया जैसे देशों में होता है।

भारत में दोनों ही प्रकार के उद्योगों में शीर्ष पर पहुंचने की संभावना है। सूचना प्रौद्योगिकी में बंगलोर दुनिया के नक्शे पर एक जाना-पहचाना नाम बनकर उभरा है। दुनिया के बहुत बड़े हिस्से में भारतीयों ने अपनी मेधा के बल पर शीर्ष पर पहुंचकर दिखाया है। दूसरी ओर, हमारे यहां करोड़ों भारतीय शारीरिक श्रम करके भी समृद्धि लाने के लिए तैयार हैं। आज के विश्व बाजार में भारत दुनिया भर के उत्पादकों के लिए कारखाने लगाने के लिए एक आदर्श देश साबित हो सकता है।

लक्ष्मी को कैद करके रखने और उसे फिर से मुक्त कराने के बहुत से मिथक हमारे ग्रंथों में उपलब्ध हैं। आज के दौर में भी हम कह सकते हैं कि हमारे यहां लक्ष्मी को गलत राजनीति ने कैद कर रखा है। राजनीतिक जकड़बंदी से इसे मुक्त करा लिया जाए तो हमारे यहां भी पश्चिम जैसी समृद्धि आ सकती है। भौतिक समृद्धि के पीछे-पीछे सुस्वास्थ्य और ज्ञान भी स्वयं ही चला आएगा बशर्ते कि हम इसके प्रति जागरूक हों।