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Journalist and writer, Writes on Northeast India, Bangladesh, Myanmar

शनिवार, 24 जनवरी 2015

ट्रेन टू बांग्लादेश (2)



इस बात से भी हमारे हिंदी उत्साही मित्र खुश होंगे कि बांग्लादेशियों ने चुन चुनकर अपनी भाषा में से अंग्रजी के शब्दों को निकाल बाहर किया है। जैसे कोलकाता में आपको कोई नो प्रॉब्लम जैसे शब्दों का व्यवहार करता मिल सकता है। बल्कि वैसा ही मिलेगा। लेकिन बांग्लादेश में लोग कहेंगे ‘समस्या नेई’, या ‘असुबिधा नेई’। लेकिन दूसरी ओर बांग्लादेश की बंगला पर अरबी प्रभाव भी साफ है। जैसे कोलकाता में ब्रेकफास्ट को नाश्ता कोई नहीं कहता, लेकिन बांग्लादेश की बंग्ला में नाश्ता शब्द आम चलन में है। कोलकाता में पानी को जल कहते हैं। बांग्लादेश में पानी कहते हैं। इसी तरह कोलकाता की बौदी, बांग्लादेश में भाबी हो जाती है। मोटे तौर पर हिंदू भाभी को बौदी और मुस्लिम भाभी को भाबी कहते हैं। जिस तरह मुस्लिम अंकल को चाचा और हिंदू अंकल को काका कहते हैं। कितने गहराई तक बंटे हुए हैं हम।

बांग्लादेश के बुद्धिजीवियों में इस समय आमीर खान की पीके को लेकर काफी चर्चा है। चर्चा इस संदर्भ में होती है कि ‘हिंदी विस्तारवाद’ किस तरह अपनी जड़ें फैला रहा है। हमारे जैसे असम के किसी भी व्यक्ति को यह सुनकर आश्चर्य होगा और उसकी दिलचस्पी बढ़ेगी क्योंकि असम में भी हिंदी विस्तारवाद की बातें होती हैं। बांग्लादेश में भी पीके काफी लोकप्रिय रही और इसे लेकर चर्चा होती रही। चर्चा कुछ इस तरह की होती है कि हिंदी सिनेमा जैसे बरगद के नीचे बांग्ला सिनेमा कभी नहीं पनप सकता। एक व्यक्ति अपनी बातचीत के सिलसिले में कहता है ‘पोर्न या हिंदी सिनेमा’, तो दूसरा उसका विरोध करता है कि तुम्हें पोर्न और हिंदी सिनेमा को एक ही सांस में बोलने का अधिकार कहां से मिला। कोई पीके के बजट की बात कहता है तो कोई कहता है कि सत्यजीत राय, ऋत्विक घटक जैसों ने बहुत कम बजट में ही अच्छी फिल्में बनाई थीं। फिर बांग्लादेश के किसी भी विमर्श में जैसा कि अनिवार्य रूप से होता है बात राजनीति पर आ जाती है। कोई कहता है हमारे इस सूचना मंत्री के रहते बांग्ला सिनेमा कभी पनप नहीं सकता।

हिंदी विस्तारवाद की बातें सुनकर बेचारे अल्फा वालों पर तरस आया कि वे बेकार में ही स्वाधीनता के लिए अपनी जान दे रहे हैं। वे इस आस में हैं कि दिल्ली के ‘साम्राज्यवाद’ से ‘मुक्त’ होने पर हिंदी विस्तारवाद से भी अपने आप मुक्त हो जाएंगे। लेकिन यहां हमारे पड़ोस में एक राष्ट्र है जिसका जन्म ही भाषा और संस्कृति के मुद्दे पर हुआ। और वह हिंदी के तथाकथित विस्तारवाद के सामने अपने आपको असहाय पाता है। यानी परेश बरुवा महोदय को राजनीतिक स्वाधीनता से आगे सोचना होगा।

कभी-कभी लगता है कि असम के उन लोगों को पड़ोसी देशों में खूब घूमना चाहिए जो बात-बात में दिल्ली को गालियां देते हैं, और इस गाली का कुछ हिस्सा बेचारी हिंदी के पल्ले भी आ जाता है। क्योंकि तब कई मुद्दों पर उनकी दृष्टि साफ हो जाएगी। जैसे म्यांमार में जाने पर अवैध घुसपैठ को लेकर उनकी सोच को एक नई दृष्टि मिलेगी। वे यह सोचने के लिए मजबूर होंगे कि घुसपैठियों को लेकर सबकुछ हो गया, उनकी शिनाख्त हो गई लेकिन आप जिनको घुसपैठिया बता रहे हैं पड़ोसी देश उन्हें वापस लेने से इनकार कर दे तो आप क्या करेंगे। बांग्लादेश जाएंगे तो भाषा-संस्कृति की रक्षा का मुद्दा सोचने के लिए नए-नए विचार देगा। असम स्वाधीन हो भी गया तो भी आज के दौर में किस तरह हवाओं से होकर हिंदी असम के लोगों के घरों में घुसी रहेगी इसका क्या कोई इलाज स्वाधीनतावादियों ने सोचा है? बांग्लादेश में एक महिला अफसोस करती है कि हमलोग तो टीवी खोलते ही इंडिया के चैनल देखते हैं लेकिन इंडिया (पढ़ें पश्चिम बंगाल) के लोगों को बांग्लादेश के चैनलों के बारे में कुछ पता ही नहीं। दरअसल इंडिया बांग्लादेश के दिलोदिमाग पर हर समय छाया रहता है। भले इसकी प्रशंसा करते वक्त या आलोचना करने के समय।

ट्रेन का एक वाकया। एक ग्रामीण युवा को ट्रेन में सीट नहीं मिली। जबकि टिकट के अनुसार वह सीट पाने का अधिकारी था। पहले तो वह हमारे पड़ोसी यात्री के पास आया और कहा कि जरा बता दें कि मेरी कौन से कमरे (कोच को वहां कमरा कहते हैं, कहा न कि अंग्रेजी शब्दों को बाहर का रास्ता दिखा दिया गया है) में सीट है। उसे बता दिया। वह थोड़ी देर बाद फिर लौट कर आया और बोला कि टीटी बाबू कहां हैं। क्योंकि वहां तो मेरी सीट नहीं मिल रही है। इस पर हमारे पास बैठे यात्री ने कहा कि यह जो नंबर लिखा है, इस नंबर वाली सीट तुम्हारी है। उसने कहा उस पर तो कोई बैठा है। बैठा है तो क्या हुआ उसे उठने बोलो, यह भी कोई बात हुई कि जिसकी मर्जी हुई वही बैठ गया। यह कहते-कहते वह यात्री उत्तेजित हो गया। यह कोई देश है जो कुर्सी पर बैठ गया वह उठेगा नहीं। कोई कानून-कायदा है या नहीं। पूरे कोच का वातावरण उत्तेजित हो गया। कई यात्री एक साथ बोलने लगे। हमारे पास बैठे यात्री ने एक युवा लड़के को ग्रामीण लड़के के साथ भेज दिया कि जाओ इसे सीट दिलाकर आओ।

बात तुरंत राजनीति पर आ गई। इशारा प्रधानमंत्री की कुर्सी की ओर था। देश ऐसे ही चल रहा है। एक यात्री बोला इंडिया में देखिए एक साधारण अभिनेत्री, क्या नाम है सृति ईरानी न क्या (बंग्ला में संयुक्त अक्षर में म जुड़ा होने पर म का उच्चारण नहीं करते, जैसे आत्म को लिखते आत्म ही हैं लेकिन उच्चारण आत्त करते हैं) वह आज शिक्षा मंत्री बन गई है। एक अन्य यात्री बोला – एक चाय वाला वहां प्रधानमंत्री बन सकता है। संसद में जाने से पहले वहां प्रधानमंत्री सीढ़ियों पर सर नवाकर सलाम करते हैं, प्रणाम करते हैं। इतना सम्मान है डेमोक्रेसी का। प्रणव मुखर्जी कांग्रेस के हैं लेकिन बीजेपी के प्रधानमंत्री उनका चरण स्पर्श करके सलाम करते हैं, प्रणाम करते हैं। डेमोक्रेसी के बारे में जानना है तो इंडिया से जानो, इसके लिए ब्रिटेन अमेरिका से जानने की जरूरत नहीं है।

राजनीति की चर्चा छिड़ने पर वहां सभी जोश में आ जाते हैं। एक यात्री कहता है जयललिता, सिर्फ एक अभिनेत्री थी और आज मुख्यमंत्री बन गई। इनके ही राज्य से तो हैं, उसने हमारी ओर इशारा करते हुए कहा। आप तमिलनाडु के ही हैं न, मैं आपलोगों की बातचीत सुनकर ही समझ गया था। हमने हां में सिर हिलाकर उसके बुद्धिमान होने की पुष्टि की। दरअसल देश दो बेगमों की आपसी लड़ाई के कारण पूरी तरह बरबाद हो रहा है। पिछले साल 5 जनवरी को चुनाव हुए जिसमें शेख हसीना की सत्ताधारी पार्टी अवामी लीग बिना किसी प्रतिद्वंद्विता के ही जीत गई क्योंकि विपक्षी खालिदा जिया की बीएनपी ने चुनाव का बायकाट कर दिया था। अब इस 5 जनवरी से बीएनपी ने समूचे देश को अस्थिर करने की ठान ली है। हम 6 जनवरी को बांग्लादेश में घुसे और 5 जनवरी से रास्तों पर गाड़ियों का चलना बंद हुआ था। बीएनपी का समर्थन करने वाली जमाते इस्लामी के जंगी कार्यकर्ता चुपके से मोटरसाइकिल पर आते हैं और किसी चलती गाड़ी पर पेट्रोल बम फेंक जाते हैं। रोज लोग मर रहे हैं। जनता हताश है। ट्रेनों में लोग जो अचानक उत्तेजित हो जाते हैं तो उत्तेजित न होकर वे और करें क्या।

5 टिप्‍पणियां:

  1. आप तो आसाम से हैं लेकिन दाद देनी पड़ेगी बांग्लादेशी बुद्धिमानों की , कि आपको तमिलनाडु का बना दिया ! कोई नहीं , आखिर उन्हें इतना तो पता ही है कि तमिलनाडु भी इंडिया में ही है ! मजा आ रहा है आपकी इस श्रंखला में ! कुछ बातें अलग सी लगती हैं ! जैसे हिन्दुओं में भी चाचा ज्यादातर बोलते हैं और भाभी भी ! शायद असम में अलग होगा

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  2. भाई रिगानियाजी, आपकी बँगला देश की सृखला वास्तव में पढ़ने में बहुत अच्छी लग रही है। हम घर बैठे बांग्ला देशी भाइयों की बातचीतों का मजा ले रहे हैं। अंग्रेजी को हटाने की एक पहल तो कर रहे है वे । अभिमान है उनको अपनी बँगला देशी भाषा पर।
    मैंने अपने पहले पत्र में जोर दिया था काश हमने भी अपनी हिंदी को राष्ट्र भाषा बनाने के लिए तहे दिल से पिछले ६५ सालो में सच्चा प्रयास किया होता ! ! ! ! ! !

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  3. बेहद अच्छा व रोचक लगा दूसरा अंक भी। आम आदमी से बातचीत से बातचीत के कारण वो पहलु भी सामने आ रहे हैं जो हम जानने के उत्सुक रहते हैं।
    किशोर कुमार जैन

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  4. श्री रिंगानिया जी ,
    भाषा की गणित को सरल शब्दों में आपसे बेहतर कौन प्रस्तुत कर सकता है ! थोड़े से समय में ही आपने बांग्लादेश की भाषा और बांग्ला भाषा के अंतर को बड़ी नफासत से कैच कर लिया। आपकी यात्रा-वृत्त में रोचकता भी है और सामयिक जानकारी भी। इस श्रृंखला की आगामी कड़ी का इंतज़ार रहेगा। आपकी यात्रा रोचक , प्रेरक और सुरक्षित हो यही कामना है।

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