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Journalist and writer, Writes on Northeast India, Bangladesh, Myanmar

शनिवार, 4 अगस्त 2012

इस तरह हुआ जातीय सफाया

"दिन में करीब तीन बजे का समय होगा, वे लोग एक तरफ से आए, उनमें से कुछ के मुंह काले कपड़े से ढंके हुए थे, वे मिलिट्री जैसी पोशाक पहने हुए थे, हाथों में बंदूकें थीं, जिनसे वे गोलियां छोड़ते जा रहे थे। क्या कहा आपने, गोली किसी को लगी क्या...जी मेरे ही पैर के पास से गोली पार हो गई। वे लोग हमारे मवेशियों को मारते जा रहे थे।''

यह कहना है 55 वर्षीय नूर इस्लाम का। नूर इस्लाम धुबड़ी जिले के बिलासीपाड़ा कस्बे के रोकाखाटा हाई स्कूल में लगे राहत शिविर में अपने परिवार तथा अन्य करीब चार हजार लोगों के साथ रुका हुआ है। यह घटना मंगलवार (24 जुलाई) की है। तब तक सेना को नियुक्त नहीं किया गया था। यह बातचीत हम शुक्रवार को कर रहे हैं। चार दिन में ही शिविर में हाल बेहाल है। डिसेंट्री और बुखार की शिकायतें आम हैं। कुछ महिलाएं गर्भवती हैं, तो कुछ की गोद में एक महीने से भी छोटा बच्चा है। सरकार ने चावल, दाल और सरसों तेल भेज दियाहै। बाकी चीजें जैसे जलावन और बच्चों के लिए दूध कहां से आएगा। बिलासीपाड़ा के स्वयंसेवी संगठन, मारवाड़ी व्यवसायियों का संघ ये लोग राहत शिविर वासियों के लिए आगे आए हैं। इस संवाददाता के सामने ही एक आटो से आवश्यक वस्तुएं उतारी जा रही हैं।

""सरकार की ओर सिर्फ एक दिन एक मोबाइल डिस्पेंसरी आई थी। उनके पास सिर्फ नोरफ्लोक्सेसिन टैबलेटें (डिसेंट्री में काम आने वाली दवा) थीं। उनके साथ स्वास्थ्य विभाग के ज्वाइंट डाइरेक्टर थे। हमने कहा कि इस मरीज को सेलाइन चढ़ाने की जरूरत है, तो डाइरेक्टर महोदय ने हमें बुरी तरह डांट दिया और चलते बने। उसके बाद से शिविर की सुध लेने कोई सरकारी नुमाइंदा नहीं आया।''
 


चिरांग जिले के पुरान बिजनी के स्कूल में स्थापित शिविर के बाहर रास्ते पर ही मरीजों को सेलाइन चढ़ाने में मदद करने में व्यस्त जाकिर ये बातें क्षोभ के साथ बताता है। वहां एक पेड़ के नीचे करीब सात-आठ मरीजों का इलाज चल रहा है। एक को छोड़कर बाकी सभी महिलाएं हैं। स्थानीय लोग यहां भी मदद कर रहे हैं। एक निजी प्रैक्टिस करने वाले चिकित्सक अपनी सेवाएं दे रहे हैं। तब तक हमारे पीछे से एक करीब साठ वर्षीय पुरुष को सहारा देकर वहां लाया जाता है। क्या हुआ? ""यहां लगभग सभी को डायरिया हो रहा है। इसमें सेलाइन ही चढ़ानी पड़ती है। टेबलेट से काम नहीं होता। स्थानीय स्वयंसेवी संगठन ने कुछ सेलाइनें खरीद दी हैं,'' इलाज में व्यस्त डाक्टर पेड़ की टहनी से सेलाइन की बोतल लटकाने का प्रयत्न करते हुए धीरज के साथ बताते हैं। ""जल्दी ही बड़े रूप में मदद नहीं आई तो डायरिया कमजोर बच्चों की जान लेने लग जाएगा।''

चिरांग जिले में हिंसा देर से फैली है। ये लोग 25 तारीख से शिविर में हैं। आज 28 है। सरकार के यहां "जल्दी' जैसा कोई शब्द नहीं है। सब कुछ अपनी मस्त सरकारी चाल से होता है। मौतें होंगी और उन पर मीडिया में हो-हल्ला होगा, उसके बाद इलाके में चिकित्सा पहुंचेगी। यह हाल अंदरुनी गांव का नहीं, बिजनी सब-डिवीजन के एसडीओ के दफ्तर से महज तीन किलोमीटर दूरी का है। (4 अगस्त तक शिविरों में कम-से-कम तेरह बच्चों के मारे जाने के समाचार आते हैं। हमें हमारी आशंका सच साबित होने का दुख है।)

बिजनी में आल बीटीसी मुस्लिम छात्र संघ का कार्यकारी अध्यक्ष शाहनवाज प्रामानिक मिल जाता है। यह संगठन इस बार इस फसाद के केंद्र में है। कल तक शाहनवाज नामक यह युवक गैर-बोड़ो समुदायों के साथ भेदभाव का विरोध करने में आगे-आगे चलता था। आज वह खुद अपना घर-खेत छोड़कर एक शिविर में टिका हुआ है। क्या लोग अपने घरों को लौट जाएंगे? शाहनवाज निश्चित तौर पर कुछ नहीं कह पाता। यही सवाल जब कोकराझाड़ जिले से भाग कर आए एक शरणार्थी से बिलासीपाड़ा में किया गया तो वह सिहर उठा। बोला- नहीं, हमें जोर-जबर्दस्ती भेजने पर भी हम नहीं जाएंगे।

हमले में आग्नेयास्त्रों का इस्तेमाल

कोकराझाड़, धुबड़ी और चिरांग जिलों के कई शिविरों में ठहरे भुक्तभोगियों से बात करने के बाद यह कामन पैटर्न उभर कर सामने आता है-(क) हमला लगभग हर जगह दोपहर के बाद किया गया (ख) हमलावर कोई मुंह ढंके हुए था और कोई खुले मुंह (ग) हमलावर बंदूक आदि से लैस थे और बैटल फेटीग पहने थे, (घ) हमलावर लोगों पर सीधे गोलियां चलाने की बजाय दीवारों, मवेशियों पर ज्यादा गोलियां चला रहे थे, (ङ) हमलावरों ने गांववासियों को घेर कर नहीं मारा। हमला लगभग हर जगह एक तरफ से हुआ ताकि दूसरी ओर से गांव वालों के भागने का रास्ता खुला रहे, (च) हमला करने वाले सिर्फ मुसलमानों के घरों को छांट कर उनमें आग लगा रहे थे। किसी भी अन्य समुदाय के गांव या घर पर हमला नहीं हुआ, (छ) लगभग हर जगह यह आरोप सामने आया कि हमला करने वाले पूर्व उग्रवादी संगठन बीएलटी के सदस्य थे। यह उग्रवादी संगठन स्वायत्त बोड़ो क्षेत्र के आंदोलन के नेतृत्व में था और स्वायत्त क्षेत्र के 2003 में गठन के बाद इसका विघटन कर दिया गया। अब बीएलटी के कैडरों को एक्स-बीएलटी कहकर पुकारा जाता है। आरोप लगते रहे हैं कि इन पूर्व उग्रवादियों के पास अब भी हथियार हैं तथा वे इलाके में आतंक का पर्याय हैं।

एक्स-बीएलटी और अलग बोड़ोलैंड की मांग करने वाले उग्रवादी संगठन एनडीएफबी के दोनों गुटों का मुस्लिम समुदाय से नाराज होने का कारण भी समझ में आता है, क्योंकि इन पूर्व तथा वर्तमान उग्रवादियों के आतंक के विरुद्ध आवाज उठाने वालों में मुस्लिम समुदाय ही आगे-आगे रहा है। यह घटनाक्रम पिछले लगभग तीन-चार महीनों से चल रहा था, जो तेज नजर वाले पत्रकारों, राजनीतिज्ञों, अधिकारियों से छिपा हुआ भी नहीं था।

टीवी पर निठल्ला चिंतन और मुद्दे से भटकाव

हिंसाग्रस्त क्षेत्र का दौरा करके लौटने के बाद जब स्थानीय और राष्ट्रीय टीवी पर चलने वाली चर्चाओं को सुनते हैं तो एक तरह से उन पर दया आती है। टीवी पर होने वाला चिंतन किन बिंदुओं के इर्द-गिर्द घूमता है? एक, इस बाल की खाल निकालने में खासा समय जाया किया जाता हैकि सेना भेजने में देर किस कारण हुई। कुछ राजनीतिज्ञों को इसमें मुख्यमंत्री को परेशानी में डालने का अच्छा मौका नजर आ रहा है। दो, अचानक बांग्लादेश से होने वाली अवैध घुसपैठ एक मुद्दा बन गई है। अवैध घुसपैठ को हिंसा का कारण बताना प्रकारांतर से वर्तमान हिंसा को जायज ठहराना है। सवाल है कि क्या अब अवैध घुसपैठियों से निपटने का यही तरीका रह गया है, जो बीटीएडी के पूर्व और वर्तमान उग्रवादियों ने अपनाया है?

वर्तमान हिंसा का असली कारण है बीटीएडी इलाके में पूर्व और वर्तमान उग्रवादियों पर प्रशासन का कोई नियंत्रण नहीं होना। कानून और व्यवस्था लागू करने वाली मशीनरी वहां इस मामले में अपने आपको असहाय पाती है। सेना बीटीएडी इलाके में नियुक्त है, लेकिन सिर्फ उग्रवाद विरोधी अभियान के लिए। इसका व्यावहारिक अर्थ है सिर्फ एनडीएफबी के वार्ता विरोधी गुट के विरुद्ध अभियान के लिए।

पूर्व बीएलटी कैडर या एनडीएफबी का वार्तापंथी गुट यदि आपराधिक गतिविधि में लिप्त पाया जाता है, तो उससे निपटने का दायित्व सेना का नहीं, राज्य पुलिस का है। कई संगठनों को लेकर बना गैर-बोड़ो सुरक्षा मंच पिछले तीन-चार महीनों से इसी मुद्दे पर राज्यवासियों का ध्यान आकर्षित करने का प्रयास कर रहा था। लेकिन मुद्दा चूंकि भटककर अवैध घुसपैठ पर केंद्रित हो गया है, तो इसका लाभ भी उन्हीं लोगों को मिलेगा जो वर्तमान हिंसा के लिए जिम्मेवार रहे हैं।

3 टिप्‍पणियां:

  1. राजेश (नवभारत टाइम्स पर लगे मेरे ब्लॉग पर)6 अगस्त 2012 को 10:11 am

    दक्षिण की तरह उतरपुर्व में भी स्थानिकों का उतरभारतीयों और हिंदीभाषियों से घृणा का कारण ये मारवाडी बाणिए हैं. ये जोक की तरह जनता को चूसते हैं. मेहनत करने वाला भूख तो मरेगा नहीं, पल्ले चवन्नी तक ये रहने नहीं देते |

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    1. भाई राजेश, आपकी समझ की बलिहारी। उल्लेखित आलेख मे 'मारवाड़ी बणिए' आपको किस कोण से दिखलाई दिए। इस आलेख पर कोई टिप्पणी लिखने के पूर्व इसकी विषय वस्तु को तो समझ लिया होता। कृपया सार्थक टिप्पणी देने का प्रयास करं और अपनी समझ को उन्नत करने की दिशा मे कोशिश करें। असम सहित पूरे पूर्वोत्तर मे मारवाड़ी समाज के योगदान का पहले अध्ययन करें फिर कोई कोमेन्ट करना आपके लेखक की सेहत के लिए अच्छा होगा।

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  2. विनोद, कल ही हरिद्वार आदि तीर्थों से लौटा हूं। मुझे अंदाज भी नहीं कि इतना बड़ा हादसा हो गया। किसी भी रास्ट्रीय स्तर के अखबार मे इतना विषद विवरण नहीं छपा। इस तरह हुआ जातीय सफाया मे सरकार को बता दिया गया कि बोडोलैंड की हिंसा कितनी भयानक थी। केन्द्र और राज्य सरकार इस मौरचे पर पूरी तरह नाकामयाब रही यह आलेख मे साफ कर दिया गया है। यह आलेख सजग और प्रवीण पत्रकारिता का प्रतीक है। साधुवाद।

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