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Journalist and writer, Writes on Northeast India, Bangladesh, Myanmar

बुधवार, 8 अगस्त 2012

बांग्लादेशी घुसपैठियों की समस्या का समाधान संभव है

असम अब दिल्ली से दूर नहीं रहा। अब तक जो मानसिक दूरी थी वह लगता है खत्म होती जा रही है। यह बात पिछली दो घटनाओं से प्रमाणित हो गई। एक तो जीएस रोड कांड की अनुगूंज जिस तरह सारे देश में सुनाई दी उससे एक बार तो असम के लोग भौचक्के रह गए। आदत से मजबूर कुछ लोगों ने इसमें भी साजिश खोजने की कोशिश की। ऐसे लोगों ने अब तक सोशल नेटवर्किंग, यू ट्यूब और इलेक्ट्रानिक मीडिया के द्वारा लाए गए परिवर्तन को आत्मसात नहीं किया है। दिल्ली का पत्रकार जब असम के बारे में बोलता है तो ऐसे लोगों को अटपटा लगता है। अभी आदत नहीं हुई है। दूसरी घटना है - कोकराझाड़ की हिंसा। यह घटना तो अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर गूंजी है। कोई यह सोचता है कि मरने वालों की संख्या के कारण मीडिया का ध्यान आकृष्ट हुआ है तो वह गलत है। क्योंकि बोड़ो इलाके में समय-समय पर हिंसा भड़कती रहती है। सबसे ताजा हिंसा 2008 में भड़की थी, तब अभी की तुलना में कहीं ज्यादा लोग मारे गए थे। लेकिन राष्ट्रीय मीडिया ने इसका नोटिस ही नहीं लिया था। इन चार सालों में ऐसा क्या बदल गया है कि असम की घटनाओं पर मीडिया का पयाप्तर् ध्यान जाने लगा है। हमें लगता है कि यह इंटरनेट के प्रभाव के कारण है, हालांकि इस पर और अधिक चिंतन की गुंजाइश है।

जब बांग्लादेशी घुसपैठियों के खिलाफ आंदोलन चला था (1979 से 1985 तक, इसे असम आंदोलन कहा गया), तो आंदोलन के नेताओं को इस बात पर कोफ्त होती थी कि इतने बड़े-व्यापक आंदोलन के बारे में, असम के बाहर कोई जानता तक नहीं। पिछले साल अन्ना के आंदोलन को जो जनसमर्थन मिला था उससे कई गुना ज्यादा समर्थन उस आंदोलन को मिला था। तब आंदोलन के नेताओं ने छोटी-छोटी टीमें बनाईं जिनमें हिंदी और अंग्रेजी जानने वाले लोगों को रखा गया। इन टीमों का काम था राज्य के बाहर जाकर पत्रकारों से बातचीत कर उन्हें असम में होने वाली बांग्लादेशी घुसपैठ के बारे में बताना, तथा यह भी साफ करना कि असम आंदोलन अन्य राज्यों से आए भारतवासियों के खिलाफ नहीं है। एक तरह से असम से बाहर असम के बारे में फैले अज्ञान के कारण भी असम के लोगों में यह भावना भर गई कि हमें तो कोई पूछता ही नहीं। जो भी हो, हम इस तथ्य पर ध्यान आकर्षित करना चाहते हैं कि जिस बांग्लादेशी घुसपैठ पर असमवासियों ने बाकी देशवासियों का ध्यान आकर्षित करने के लिए इतनी ज्यादा मेहनत की थी, वह मुद्दा इस बार कोकराझाड़ की हिंसा के बाद एकाएक चर्चा का विषय बन गया।

राष्ट्रीय मीडिया पर बांग्लादेशी घुसपैठ के मुद्दे पर आज भी चर्चा हो रही है, लेकिन इस चर्चा में गहराई नहीं है। ज्यादातर यह चर्चा मुस्लिम विद्वेष से ग्रसित है। कहीं अति सरलीकरण की शिकार है। बोड़ो नेता काफी हद तक मीडिया से इस मायने में फायदा उठाने में कामयाब रहे कि उन्होंने ताजा हिंसा को बांग्लादेशी बनाम बोड़ो हिंसा का जामा पहना दिया और ज्यादातर लोग इसे इसी नजरिए से देखने लग गए। राज्य से बाहर के लोग सोचते हैं कि बांग्लादेश से लोग सीमा पार कर आ रहे हैं और बोड़ो इलाकों में बस रहे हैं, इसके कारण वहां लोगों में गुस्सा और असंतोष फैल रहा था, जो 21 जुलाई से शुरू हुई हिंसा का कारण बना। जबकि उन लोगों को पता नहीं है कि इससे पहले संथाल लोगों को भी इसी तरह बोड़ो इलाकों से भगाया गया था। उन पर तो बांग्लादेशी घुसपैठिया होने का ठप्पा नहीं लगा था। कोकराझाड़ की हिंसा को बोड़ो बनाम बांग्लादेशी का रूप देकर बोड़ो नेतृत्व एक तरह से हिंसा को वैधता प्रदान करने में कामयाब हो गया है। 


कोकराझाड़ हिंसा के कारण ही सही जब बांग्लादेशी घुसपैठ की समस्या राष्ट्रीय चर्चा के केंद्र में आ गई है तो हमें इस अवसर का लाभ उठाते हुए इस पर सुचिंतित तरीके से विचार-विमर्श करना चाहिए और देखना चाहिए कि इसके क्या-क्या संभावित समाधान हो सकते हैं।

1. विदेशी घुसपैठियों की पहचान की जाए, उन्हें वापस सीमा के पार भेजा जाए, इससे भी ज्यादा जरूरी यह है कि नए आने वाले घुसपैठियों को रोका जाए। इसके लिए कोई नया चिंतन, नई बातचीत करने की जरूरत नहीं है। सभी पक्षों के बीच सहमति है कि सीमा पर बाड़ का काम पूरा होना चाहिए। बाड़ लगाने का ज्यादातर काम पूरा हो चुका है और थोड़ा-सा ही काम बचा है। भारत में सरकारी काम किस तरह होता है, उसका एक नमूना है सीमा को सील करने का यह काम। कुछ मित्र बाड़ लगाने के काम के महत्व को यह कहकर कम करना चाहते हैं कि एक दस रुपए के कटर से आप बाड़ काटकर अंदर प्रवेश कर सकते हैं। लेकिन यह सही तर्क नहीं है। हर बाड़ को काटा जा सकता है, हर दीवार में सेंध लगाई जा सकती है, लेकिन फिर भी बाड़ और दीवार के बिना किसी इलाके की चौकीदारी करना और बाड़ या दीवार से घिरे इलाके की चौकीदारी करने में अंतर है।

नए घुसपैठियों को रोकने की दिशा में दूसरा महत्वपूर्ण काम है नागरिकों के राष्ट्रीय रजिस्टर (एनआरसी) को अद्यतन करना यानी नए जन्मे नागरिकों के नाम इसमें डालकर इसे एक जीवंत दस्तावेज बनाना। असम में वोटर पहचान पत्र नहीं दिए गए हैं, क्योंकि शक है कि मतदाता सूचियों में काफी विदेशियों के नाम भरे हुए हैं। इसलिए अभी तक कोई ऐसा दस्तावेज नहीं है जिसकी प्रामाणिकता प्रश्नातीत हो। एनआरसी को अद्यतन करने पर भी सभी पक्षों के बीच सहमति है। राज्य के दो राजस्व सर्किल में प्रयोग के तौर पर यह काम शुरू भी किया गया था। लेकिन अल्पसंख्यक समुदाय को इसकी प्रक्रिया पर कुछ आपत्तियां थीं, उन आपत्तियों को दूर नहीं किया गया, उसके विरुद्ध प्रदर्शन हुआ, गोलियां चलीं, कई लोग मारे गए और काम रोक दिया गया। उसके बाद फिर से सभी पक्षों के बीच बैठकों के दौर चले और अब सहमति बन चुकी है कि एनआरसी बनाने का काम फिर से शुरू करना चाहिए। एनआरसी को अद्यतन करना इसलिए जरूरी है कि यह एक आधार बन जाएगा किसी की नागरिकता को प्रमाणित करने के लिए। एनआरसी बनने के बाद किसी भी नए आए विदेशी को पहचानना आसान हो जाएगा। एनआरसी नए आने वाले घुसपैठियों को रोकने का कारगर हथियार बन जाएगा। 

2. असम में इस समय दो तरह के लोग हैं। एक वे हैं जो सोचते हैं कि विदेशियों की पहचान हो जाने के बाद एक न एक दिन उन्हें वापस उनके मूल देश में भेजना संभव हो पाएगा। दूसरा वर्ग ऐसे लोगों का है जो अब तक के घटनाक्रम से निराश हो चुका है और उसे उम्मीद नहीं है कि विदेशियों को कभी वापस भेजना संभव हो पाएगा। दोनों ही नजरिए सही नहीं हैं क्योंकि दोनों ही इस बात को ज्यादा महत्व देते हैं कि जो घुसपैठिए आ गए वे कब वापस बांग्लादेश भेजे जाएंगे।

इक्का-दुक्का लोगों को पकड़ लेना और अदालत की लंबी प्रक्रिया से गुजार कर उन्हें बांग्लादेश के बार्डर गार्ड्‌स की नजरों से बचाकर रात के अंधरे में पुश बैक करना अलग बात है, लेकिन बड़े स्तर पर घुसपैठियों को वापस भेजना दिवास्वप्न के अलावा कुछ नहीं है। इसमें दो बाधाएं हैं - एक तोे लंबी चलने वाली भारतीय न्याय प्रक्रिया और दो, बांग्लादेश सरकार द्वारा भारत से भेजे जाने वाले लोगों को अपने नागरिक के रूप में स्वीकार न किए जाने की संभावना। रोहिंगा मुसलमानों को म्यांमार से अपने देश में घुसने न देने के लिए बांग्लादेश ने जिस कड़ाई का प्रदर्शन किया उससे हमारी इस धारणा को बल मिलता है।

यदि एनआरसी का काम ठीकठाक चलता है और काफी संख्या में बांग्लादेशी घुसपैठियों की पहचान कर ली जाती है तो ज्यादा संभावना है कि वे राज्यविहीन नागरिकों के रूप में हमारे ही देश में रह जाएंगे। ये लोग भारत के नागरिक नहीं होंगे इसलिए नागरिक अधिकारों से वंचित होंगे और चुनाव प्रक्रिया को किसी भी तरह प्रभावित नहीं कर पाएंगे। लेकिन यह भी संभव हो पाएगा क्या इस पर एक बहुत बड़ा प्रश्न चिह्न है। क्योंकि जब दो-तीन लाख लोग एक साथ खड़े हो जाते हैं तो वे अपने-आप में एक बहुत बड़ी राजनीतिक ताकत बन जाते हैं। तब उनकी बात न्यायपूर्ण है या नहीं इससे ज्यादा महत्त्व उनकी संख्या और बाहर से उनको मिलने वाले समर्थन का हो जाता है।

3. असम में पूर्व बंगीय मूल के लोगों से सबसे ज्यादा राजनीतिक रूप से खतरा महसूस किया जा रहा है। स्वाधीनता के बाद से असम में असमिया भाषी समुदाय का राजनीतिक वर्चस्व रहा है। अब इन पूर्व बंगीय मूल के लोगों (जिन्हें लोग बांग्लादेशी कह देते हैं, लेकिन सभी बांग्लादेशी नहीं हैं) के कारण यह वर्चस्व अब टूटा, तब टूटा की स्थिति है। लेकिन इस वर्चस्व को बचाने का बहुत ही आसान-सा उपाय है। 15 अगस्त 1985 को हुए समझौते में केंद्र सरकार ने असम आंदोलन के नेतृत्व को यह आश्वासन दिया था कि असमिया समुदाय की अलग पहचान की रक्षा के लिए संविधान में विशेष व्यवस्था की जाएगी। इस विशेष व्यवस्था का सीधा मतलब है अन्य चीजों के अलावा विधानसभा में असमिया समुदाय के लिए आरक्षण की व्यवस्था। जब यह समझौता हुआ था तब की परिस्थिति में "असमिया' शब्द पर कोई विवाद नहीं था। लेकिन बाद के वर्षों में असम के बोड़ो, कार्बी आदि बहुत से जनजातीय समुदायों ने अपने आपको असमिया मानने से इनकार कर दिया। इसलिए अब मामला यहां अटक गया है कि "असमिया' किसे मानें। केंद्र सरकार ने यह निर्णय करने का दायित्व असम सरकार को सौंप दिया है। यहां फिर उसी भारतीय कार्यपद्धति का रोड़ा सामने आ जाता है। कमेटी पर कमेटी बैठ रही है, असम समझौते पर दस्तखत करने वाले प्रफुल्ल महंत बूढ़े हो गए हैं, भृगु फूकन इस दुनिया में नहीं रहे लेकिन असमिया समुदाय के लिए एक अति महत्वपूर्ण विषय का निपटारा आज तक नहीं हो पाया है। असमिया की परिभाषा में कौन-कौन लोग शामिल होंगे यह आज तक तय नहीं हो पाया है।

1 टिप्पणी:

  1. सतीश जायसवाल, रायपुर10 अगस्त 2012 को 5:30 pm

    प्रिय बिनोद जी,
    १. बंगलादेशी घुसपैठियों की समस्या के समाधान पर विचार करने से पहले इस समस्या को मंजूर करना जरूरी ठहरता है. इस सम्बन्ध में, यदि संसद में होने वाली बहस पर ध्यान दें तो यह साफ़ तौर पर दिखता है कि राजनीतिक दल इस समस्या को उसके यथार्थ से अलगा कर, एक-दूसरे के लिये राजनीतिक जटिलता निर्मित करने में उलझे हुए मिलेंगे.

    २. यदि जे० एस० रोड की घटना या कोकड़ाझार हिंसा जैसी किसी वज़ह से , कोई जगह नॅशनल मीडिया के ध्यानाकर्षण में आती है तो इस से उस राज्य और वहाँ के समाज की अच्छी छवि प्रस्तुत नहीं होती. चाहे, इस घटना से असम की छवि या चाहे बस्तर में नक्सली घटनाओं की वज़ह से छत्तीसगढ़ का अंतर्राष्ट्रीय परिदृश्य में दिखना.

    ३. लेकिन कोकड़ाझार आन्दोलन के सन्दर्भ ने सरकारों द्वारा दिल्ली के पत्रकारों और स्थानीय पत्रकारों की विश्वसनीयता में किया जाने वाला भेद-भाव भी सामने आया है.
    इस पर, मेरी समझ में, विचार करने की जरूरत है. यह ज़रुरत सरकारों की तरफ भी है और हमारे अपने तरफ भी है.
    इस तथ्य को सामने रख कर बात करनी होगी कि किन्हीं भी घटनाओं की प्रारम्भिक और ज़मीनी सचाई वहाँ के स्थानीय पत्रकार के पास सब से पहले और उतनी ही प्रामाणिक होती है.
    उस, किसी घटना को उसका अपेक्षित महत्त्व समझते हुए ऐसा प्रस्तुतीकरण देने का कौशल(आरटीक्युलेशन) दिल्ली के पत्रकारों में हो सकता है, जिसके प्रभाव में राजधानियों के विभिन्न राजनीतिक दबाव-समूह (प्रेशर ग्रुप) क्रियाशील हो जाते हैं.
    लेकिन इसके बावजूद, यह तथ्य अपनी जगह बना रहता है कि वहाँ की घटना का प्रथम-दर्शी और ज़मीनी तौर पर प्रामाणिक स्रोत वहाँ का स्थानीय पत्रकार ही होता है.
    असम की घटनाओं के लिये भी यही बात सच है. लेकिन, दिल्ली ने बहुत देर तक इस बात की अनदेखी की जिसके चलते असम में बंगलादेशी घुसपैठियों के मामलों को करीब-करीब ''अंधों के हाथी'' की तरह देखा गया.
    इसीलिये, असम से दूर बैठे, हम जैसे लोगों के लिये असम की घटनाओं के सन्दर्भ में, सदन की बहस के दौरान बार बार बंगलादेशी घुसपैठ का प्रश्न उठ जाना, समझ से बाहर रह जाता है.

    ४. इस समस्या पर, सदन में होने वाली बहसें हमेँ आरोपों-प्रत्यारोपों से परिचित कराती हैं. लेकिन इस देश का नागरिक इस समस्या का निदान भी समझना चाहता है.
    वह आपने सुझाया है. यदि उस पर ध्यान दिया जाता है तो यह उम्मीद बनेगी कि आरोपों-प्रत्यारोपों से परे हट कर अब हमारे राजनीतिक दल समस्या के निदान पक्ष पर एकराय कायम की जाने वाली किसी मेज़ की तरफ बढ़ने का मन बना सकेंगे.

    ५. निदान की दिशा में आपने तीन विचारणीय बिंदु अंकित किये हैं -- (अ). बँगलादेशी घुस-पैठ की आज की स्थिति का ठीक-ठीक विवरणीकरण.(डाक्युमेंटेशन), (ब). नये घुस-पैठ की त्वरित रोक-थाम.
    एक जटिल हो चुकी, या जटिल बना दी गयी बड़ी समस्या के लिये इस से सरल और व्यावहारिक निदान और क्या सुझाया जा सकता है ?
    तथा (स). ''असमिया'' को उसकी भावनात्मकता में ग्रहण करते हुए परिभाषित करना और यथानुसार राजनीतिक निर्णय के स्तर पर प्रयुक्त करना.
    इस संवेदनशील प्रश्न पर तो, खुल कर बात करने के बदले बात से बचने की ही कोशिशें अभी तक दिखी हैं. अब, शायद कोई पहल हो सकेगी.

    ६. एक पत्रकार की हैसियत में जब मैं असम के कुल घटना-क्रम में सरकारों के नज़रिए और इसमें अब तक की, मीडिया की भूमिका को देखता हूँ तो अपने लिये या मेरी तरह के, असम से दूर रह कर देख रहे स्थानीय किस्म के पत्रकारों की तरफ से एक प्रश्न उठता है. क्या यह अकेले असम का मामला है ? और इसलिए, यह अकेले वहाँ के लोगों की ज़िम्मेदारी हुयी, जैसे छत्तीसगढ़ का नक्सली प्रश्न असम के लिये कोई प्रश्न नहीं होना चाहिए ?
    मैं समझता हूँ कि यह प्रश्न आप की तरफ भी बनता होगा.
    क्या हम अपने आपस में, किन्हीं ऐसे छोटे-छोटे लेकिन दृष्टियुक्त पत्रकारों के समूह-गठन की बात सोच सकते हैं जिनका ''अध्ययन दल'' असम की वर्तमान समस्या के स्थल-अवलोकन के लिये भेजा जाए और उक्त दल की रिपोर्ट सरकार के लिये भी एक आधार बने ?
    इस समय असम की यह समस्या अपनी सर्वोच्च प्राथमिकता पर है . इस प्राथमिकता को बनाये रखने के लिये , दलीय राजनीतिक दबाव-समूह से इतर पक्षीय तथ्यात्मक-वैचारिक पहल सहायक होगी.
    इसके लिये सरकारों से बात की जा सकती है. चाहे असम सरकार इस पर सहमत दिखे या केंद्र सरकार की सहमति दिखे.
    यदि, असम से प्रारंभ ऐसी कोई पहल अपनी प्रभाविता प्रमाणित कर सकी तो हमारे सामने ऐसी कई बड़ी और उलझी हुयी समस्याएँ हैं जिन्हें एक प्रभावशाली ''तीसरे पक्ष'' के रचनात्मक हस्तक्षेप (इंटरवेंशन) से सहमतियों की मेज़ तक पहुँचाने का रास्ता खुलेगा.

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