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Journalist and writer, Writes on Northeast India, Bangladesh, Myanmar

गुरुवार, 6 फ़रवरी 2014

अमरीका में नदेला

अमरीका प्रणाली सचमुच प्रतिभा को मान्यता देती है इसलिए दुनिया भर से प्रतिभाएं इस देश की ओर आकर्षित होती हैं।

माइक्रोसाफ्ट जैसी विश्वव्यापी भीमकाय कंपनी का मुख्य कार्यकारी अधिकारी इस बार सत्या नदेला को बनाया गया है, जिनका जन्म भारत में ही हुआ था। इसे लेकर सारे देश में खुशी को माहौल है क्योंकि यह कहीं न कहीं इस बात को सिद्ध करता है कि भारतीयों में इतनी प्रतिभा है कि वे भी विश्व की शीर्ष कंपनियों में से एक के शीर्ष तक पहुंच सके। सत्या नदेला का मामला अकेला नहीं है। बहुत सारे भारतीय हैं जो अमरीका में सरकारी या निजी कंपनियों के शीर्ष पदों तक पहुंच रहे हैं। अमरीकी राष्ट्रपति बराक ओबामा ने हाल ही में अपने देश की स्वास्थ्य सेवाओं के प्रमुख के पद पर भी एक भारतीय डाक्टर को ही नियुक्ति दी है। लेकिन इस खुशी के माहौल में इस बात पर भी आत्मचिंतन किया जाना चाहिए कि हमारी प्रतिभाएं सिर्फ यूरोप और अमरीका में जाकर ही पूरी तरह क्यों खिलती हैं। विज्ञान के क्षेत्र में जिन तीन भारतीय वैज्ञानिकों को नोबेल पुरस्कार मिला, वे तीनों अमरीका जाकर वहां के नागरिक बन चुके थे।

इस परिघटना से एक तो यह बात समझ में आती है कि अमरीकी समाज ने अपने आपको इस तरह विकसित किया है कि वहां प्रतिभा का स्वतः विकास होता है। जो गुणी है, प्रतिभावान है वह वहां की प्रणाली में आगे बढ़ता चला जाता है। वहां का सिस्टम उसके मार्ग में अनावश्यक बाधाएं उत्पन्न नहीं करता, बल्कि सहूलियत पैदा करता है। प्रतिभाओं को आगे बढ़ाने का एक सहज तरीका होता है अच्छा प्रतिफल दिखाने वाले को ऊपर उठाया जाए, उसके काम को मानयता दी जाए और उसे बाकी लोगों के लिए आदर्श के रूप में प्रस्तुत किया जाए। विज्ञान, प्रौद्योगिकी, व्यवसाय हो या सरकार, यदि उसकी प्रणाली ही ऐसी हो कि गुणी, ज्ञानवान और प्रतिभा संपन्न लोग बिना जुगाड़ बिठाए आगे बढ़ते चले जाएं, तो फिर एक अवधि बीतने के बाद उस देश के सभी क्षेत्रों के शीर्ष पदों पर ऐसे लोग ही बैठे दिखाई देंगे जो स्वयं गुणी और ज्ञानवान हों। फिर ये लोग इस बात को सुनिश्चित करते हैं कि गुण को मान्यता देने की उनकी परंपरा आगे भी जारी रहे। समाज को आगे बढ़ाने के लिए अच्छे लोगों के लिए किसी न किसी तरह की प्रेरणा की जरूरत से कोई भी इनकार नहीं कर सकता। साहित्य और विज्ञान के क्षेत्र में दिए जाने वाले पुरस्कार इसी बात का संकेत करते हैं।

अमरीका के विपरीत भारत में अभी तक इस तरह का वातावरण है कि प्रतिभा और गुण का दम घुंट जाए। किसी व्यक्ति को आगे बढ़ने से रोकने का यहां कोई एक बहाना नहीं होता है – किसी प्रतिभा का औरत होना, किसी खास जाति से होना, या किसी खास राज्य से होना ही उसकी प्रतिभा को नजरंदाज करने के लिए काफी होता है। अभी तक यहां जो प्रणाली काम कर रही है उसमें जुगाड़ू, चापलूस और बेईमान लोगों का आगे बढ़ना ज्यादा आसान होता है। ऐसे लोग भले अपने लिए अकूत संपत्ति जमा कर लें, लेकिन राजकाज की नई प्रणालियां विकसित करने या विज्ञान व प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में कोई नई खोज करने में इनका कोई योगदान नहीं होता, न ही ऐसे लोग अपने व्यावसायिक प्रतिष्ठान को दुनिया का शीर्ष प्रतिष्ठान बना पाते हैं। ऐसे लोग अपने जैसों को ही ऊपर खींचते हैं और प्रतिभाओं के मार्ग में बाधाएं खड़ी करते हैं।

एक टिप्पणीकार ने ठीक ही कहा है कि नदेला यदि भारत में होते तो सिर्फ इसी कारण उन्हें बाधाओं का सामना करना पड़ता कि वे आईआईटी के स्नातक नहीं हैं बल्कि उन्होंने मणिपाल जैसे बंगोलर एक निजी संस्थान से स्नातक की डिग्री ली है। यह किसी समाज की बंद सोच का ही नमूना होता है कि वह प्रतिभाओं को चुने हुए संस्थानों तक सीमित मान लेता है। एक डिग्री और एक संस्थान के नाम से किसी व्यक्ति का संपूर्ण मूल्यांकन कभी हो ही नहीं सकता।

मंगलवार, 31 दिसंबर 2013

पैसा कमाने के कारण क्षमाप्रार्थी होने की आवश्यकता नहीं

प्राइम टाइम की चर्चाओं के शोर ने राष्ट्रीय मानसिकता ऐसी बना दी है कि उम्मीद की बात करना और वर्तमान सत्ता प्रतिष्ठान में भी कुछ अच्छा खोजना सत्ता प्रतिष्ठान के चमचे की गाली खाने के लिए पर्याप्त होता है। लेकिन फिर भी हम मानने को तैयार नहीं कि भारतीय राजनीति में अरविंद केजरीवाल नाम के धूमकेतु के उदय से पहले सब कुछ शून्य था और (असली) लोकतंत्र की यात्रा सिर्फ दिसंबर 2013 से शुरू हुई है।

2012 की तरह ही 2013 का भी असली हीरो संचार का नया माध्यम सोशल मीडिया था। इस मीडिया ने एक आम आदमी को भी अपनी ब्रांडिंग करने का अवसर प्रदान कर दिया है। आपके विचार कितने ही उम्दा हों, आप कितने ही ईमानदार हों, आप कितने ही कार्यकुशल हों- फिर भी आप राजनीति में सफल नहीं हो सकते यदि आपके बारे में लोग जानें ही नहीं। राजनीति आखिर ब्रांडिंग का ही खेल है, वरना बालीवुड का कोई सितारा कैसे चुनाव जीत लेता है जिसने पैसे कमाने के सिवा कभी कुछ सोचा ही नहीं। 2014 का हीरो भी सोशल मीडिया के ही रहने की उम्मीद है।

2013 में इस साधारण सी लगने वाली बात पर ध्यान गया कि आज के दौर में जितनी भी कुशलताएं (स्किल्स) हैं, उनमें गूगल का इस्तेमाल करना सबसे काम की कुशलता है। लेकिन इसे सिखाने के लिए कोई स्कूल नहीं है। पुस्तक पढ़ना, समझना, उसमें से कुछ लिखना- से सब कुशलताएं सिखाने के लिए स्कूलों में कितने पापड़ बेले जाते हैं, लेकिन गूगल पर मनचाही चीज कम समय में खोजना भी एक कला है इसे नई पीढ़ी तो जानती है, लेकिन पुराने ढर्रे के लोग अभी भी इसके विराट स्वरूप के दर्शन करने में असमर्थ हैं। अच्छे-खासे बुद्धिजीवियों को यह कहते सुना कि इंटरनेट पर तो नब्बे फीसदी पोर्न ही है। सत्तर के दशक की मांएं सिनेमा से डरती थीं कि यह बच्चों को बिगाड़ देगा। आज बच्चे दिन में तीन फिल्में देखकर भी पुरानी पीढ़ी से आगे ही जा रहे हैं। 2014 में कोई संकल्प लेने की सोच रहे हैं तो यही संकल्प लें कि इस वर्ष इंटरनेट-प्रवीण बनना है। वरना पीछे छूट जाएंगे इसमें कोई शक नहीं।

हमारे प्यारे आसाम के बारे में क्या कहें। इसमें सुधार के कोई लक्षण नजर नहीं आ रहे हैं। यह अब भी अपनी बीमारी का इलाज टोना और झाड़-फूंक से करना चाहता है। जिस दवा से थोड़ा फायदा होता है उसे ही जहर बताकर नाली में डालने के लिए उद्‌यत होता है। यूपी के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव की यह बात सटीक लगी कि लोगों को बहकाना आसान है, समझाना कठिन। जो बच्चे सूबे से बाहर जाकर पढ़कर आ रहे हैं या वहीं काम-धाम कर रहे हैं, उनकी सोच बदली है। इस तरह से देखें तो ज्यादा से ज्यादा बच्चों को बाहर भेजना अच्छा विचार हो सकता है।

यही हाल असम के हिंदीभाषी समाज का है। व्यक्तिगत स्तर पर या छोटे-छोटे गुटों के रूप में यह समाज अच्छा कर रहा है। जितनी चुनौतियों के बीच इसे काम करना पड़ता है, उससे साफ है कि यदि मार्ग थोड़ा भी प्रशस्त हो तो यह भारत के सर्वश्रेष्ठ समुदायों में शामिल हो सकता है। जैसे पारसी समुदाय। इस समुदाय की सबसे बड़ी समस्या है एक भिन्न संस्कृति के बीच समृद्ध समझे जाने के कारण उत्पन्न वल्नरेबिलिटी। हम कहां खड़े हैं और हमें कहां जाना है इसे समझने की कोई जद्दोजहद 2013 में भी इस समुदाय में दिखाई नहीं दी। इस समुदाय को दो बातें 2014 में कहने का प्रयास करना चाहिए- एक, अब तक के इतिहास में असम के हिंदीभाषी समाज ने ऐसा कोई काम नहीं किया, जिसके लिए उसे शर्मिंदा होना पड़े। दो, पैसा कमाने के कारण क्षमाप्रार्थी होने की आवश्यकता नहीं।

पुराना साल जाते-जाते दो पुस्तकें हमें पकड़ा गया। एक काबेरी कछारी राजखोवा ने लिखी है जो अल्फा नेताओं के भूटान और बांग्लादेश के अनुभवों का अच्छा खासा आभास देती है। दूसरी पुस्तक है वरिष्ठ पत्रकार राजीव भट्टाचार्य की जिसमें उन्होंने परेश बरुवा के साथ लंबी मुलाकातों के बारे में लिखा है। दोनों ही पुस्तकों में कहीं भी यह नहीं आया कि अलगाववाद क्यों जरूरी है। असम एक स्वाधीन देश था, लेकिन भारतवर्ष की रचना ऐसे भूतपूर्व स्वाधीन देशों के संघ के रूप में ही तो हुई है। इस संघ से बाहर निकलने की इच्छा के पीछे क्या है या यह क्यों होना चाहिए इस विषय में ठोस तर्कों की उम्मीद कोई भी अल्फा से कर सकता है, क्योंकि इस संघर्ष ने अब तक दसियों हजार लोगों की जान ले ली। ऐसा कुछ इन पुस्तकों में नहीं मिलता। श्रीमती राजखोवा की पुस्तक अल्फा अध्यक्ष अरविंद राजखोवा के परेश बरुवा के साथ मतभेदों पर अच्छा प्रकाश डालती है। लेकिन ये मतभेद सांगठनिक मुद्दों या काम करने के तरीकों को लेकर ज्यादा थे, और असम को भारतीय संघ से क्यों बाहर निकलना चाहिए, या क्या ऐसा करना आज की परिस्थिति में व्यावहारिक होगा या संभव होगा - इस पर बिल्कुल नहीं। इसी तरह परेश बरुवा के साथ राजीव भट्टाचार्य की मुलाकातों के बारे में पढ़ने पर यह बात सामने आती है कि बरुवा के मन में किशोर वय से ही तिनसुकिया के बंगाली और बिहारी व्यवसायियों के प्रति एक विद्वेष भाव था। उन्होने एक बंगाली व्यवसायी को किसी से मांग कर लाई बंदूक चलाकर जान से मार डाला था। आश्चर्य होता है कि किसी व्यक्ति के किसी समुदाय के प्रति बचपन में जम गए विद्वेष की कितनी भयानक परिणति हो सकती है।

दोनों पुस्तकें अलगाववादियों के मनोजगत में उतरने के लिए हमारे पास रक्षा जैकेट स्वरूप रहेंगी। दोनों पुस्तकें पढ़ते हुए एक बार फिर अखिलेश यादव की यह बात याद आती है- लोगों को बहकाना आसान है, समझाना कठिन।

सभी पाठकों को नए साल की शुभकामनाएं। अभी आगे साल भर बातचीत होती रहेगी।

शुक्रवार, 29 नवंबर 2013

सिंगापुर में है एक छोटा बांग्लादेश

सिंगापुर के बारे में भारत में लोग यह तो जानते हैं कि वहां की आबादी में अच्छा खासा हिस्सा भारतीयों का है। भारतीयों के अलावा वहां मलय और चीनी मूल के लोग रहते हैं। लेकिन ज्यादातर लोगों को यह नहीं पता कि वहां बांग्लादेशी लोग काफी संख्या में रहने लगे हैं। सिंगापुर का एक इलाका लिटिल इंडिया कहलाता है। यहां ज्यादातर दुकानें और होटलें भारतीय मूल के लोगों की हैं। कई दुकानें और होटलें काफी पुरानी हैं चौथे और पांचवे दशक की। जैसे कोमल विलास नामक रेस्तरां की कई शाखाएं सिंगापुर में हैं जहां शाकाहारी भोजन मिलता है। सिंगापुर में शाकाहारी भोजन का अच्छा खासा प्रचलन हैक्योंकि यहां भारतीय मूल के जो लोग रहते हैं वे अधिकतर शाकाहारी ही हैं। कोमल विलास की तरह ही आनंद भवन के रेस्तरां की शृंखला है जिसके अंदर शाकाहार का प्रचार करने वाली इबारतें भी लिखी रहती हैं।

कुल 54 लाख की आबादी वाले सिंगापुर में इस समय करीब सत्तर हजार बांग्लादेशी रहते हैं जो वर्क परमिट के आधार पर यहां आए हैं। ये लोग ज्यादातर निर्माण या साफ-सफाई के कामों में नियुक्त हैं। लिटिल इंडिया में जो मुख्य पथ है उसका नाम है सेरंगुन रोड। यहां आप कभी रविवार को जाएं तो आपको भीड़ के कारण रास्ते पर चलने में भी दिक्कत होगी। क्योंकि रविवार को सेरंगुन रोड पर समूचे सिंगापुर में रहने वाले बांग्लादेशी इकट्ठा होते हैं। यह उनके मिलने-जुलने की तय जगह है। एक जानकार बताते हैं कि रविवार को तकरीबन तीस हजार लोग यहां इकट्ठा होते हैं। सभी के हाथों में मोबाइल फोन होते हैं और सभी अपने किसी साथी-रिश्तेदार को फोन मिलाने में व्यस्त रहते हैं। उतनी भीड़ में वे चाहते हैं कि जिससे मिलने की इच्छा लेकर सेरंगुन रोड पर आए हैं वह यह जान ले कि ठीक किस जगह वह खड़े हैं। मिलने के स्थान अक्सर पार्क होते हैं। यहां ये लोग जमीन पर ही बैठ जाते हैं, या फिर पीछे की गली में किसी फुटपाथिया रेस्तरां के सामने जमीन पर।

साफ-सफाई के काम में नियुक्त एक बांग्लादेशी युवक को अमूमन 650 सिंगापुरी डालर की पगार मिलती है जो भारतीय रुपयों में लगभग 32,000 है। शनिवार को आधा दिन और रविवार को पूरी छुट्टी होती है। लेकिन सिंगापुर में जीवन निर्वाह का खर्च भी बहुत है। डालर मिलते हैं तो खर्च भी डालर ही होते हैं। इसमें से यदि कोई कामगार 200 डालर भी बचा ले तो वह उसके घर में करीब 14,000 मासिक बांग्लादेशी टाका के समान हो जाता है। बांग्लादेश में इस समय चल रहे औसत वेतन के लिहाज से यह अच्छी रकम है। ढाका के गारमेंट्‌स उद्योग में काम करने वाले एक औसत कामगार को तीन से चार हजार टाका के बीच वेतन मिलता है।

सिंगापुर में जहां भारतीय सैलानी खर्च करने के लिए जाते हैं वहीं बांग्लादेशी कमाने के लिए जाते हैं। इसीलिए मनी ट्रांसफर करने वाली एजेंसियां अपने पोस्टर और नामपट्ट तथा सूचना पत्र आदि बांग्ला में भी लिखवाने को काफी महत्व देती हैं। दुनिया भर से बांग्लादेशी अपने देश में धन भेजते हैं। इसलिए बांग्लादेश में कभी भी विदेशी मुद्रा की कमी नहीं होती। लिटिल इंडिया में कुछ इलाकों में बांग्लादेशियों का काफी आवागमन है। यह इलाका हालांकि पड़ता लिटिल इंडिया में ही है लेकिन इसे आप लिटिल बांग्लादेश भी कह सकते हैं। यहां की दुकानों में वह सामान आसानी से मिल जाता है जिसे बांग्लादेशी पसंद करते हैं। बांग्लादेशियों की पहली पसंद मोबाइल फोन होती है। मोबाइल की कीमत यहां बांग्लादेश से कम पड़ती है। इसके बाद टीवी का नंबर आता है। एक युवक अपने साथी के साथ काफी समय से एक टीवी को निहार रहा था। शायद वह सोच रहा होगा कि घर जाते समय यह टीवी खरीद कर ले जाऊंगा। बांग्लादेशी इलाके में आकर एक दो पान दुकानें दिखाई देती हैं, पान दुकानें हैं तो साथ में दीवारों पर चूने के दाग तो होने ही हैं। चमकती साफ-सफाई वाले सिंगापुरी बाजारों में वे धब्बे आंखों में चुभते हैं। एक रेस्तरां अपने ग्राहकों को बांग्ला भाषा में सूचना देता है कि यहां हंस का मांस मिलता है।

सिंगापुर की 54 लाख आबादी में से सिर्फ 34-35 लाख ही नागरिक हैं। नागरिकों के बाद स्थायी बासिंदों का नंबर आता है। इनके अधिकार नागरिकों से कम हैं। स्थायी बाशिंदों के बाद अस्थायी रूप से वर्क परमिट पर आने वाले लोगों का नंबर आता है। नागरिकता प्राप्त करने के लिए कुछ शर्तें पूरी करनी पड़ती हैं। हमारे सिंगापुरी मित्र बताते हैं कि हम समरसता या एसिमिलेशन पर जोर नहीं देते। एसिमिलेशन की बजाय हमारा जोर इंटीग्रेशन पर रहता है। यानी आप किसी भी जातीय समुदाय या धर्म से हों लेकिन कुछ साझा सिद्धांतों के प्रति आपकी प्रतिबद्धता होनी ही होगी। देश के प्रति आपके कुछ साझा कर्तव्य हैं जिनका आपको पालन करना ही होगा। एयरपोर्ट तथा अन्य स्थानों पर भारतीय समुदाय के लोग भी अपने अनुपात के अनुसार नौकरियों में दिखाई दे जाते हैं। सचमुच विभिन्न जातीय समुदायों के लोगों का शांतिपूर्ण ढंग से एक देश में रहना और उसे यूरोप के लोगों के लिए भी ईर्ष्या का विषय बना देना आश्चर्य जगाता है,खासकर भारत से गए लोगों के लिए।

सिंगापुर में काम करने वाले लोगों की कमी है। कम वेतन वाले काम करने के लिए लोग नहीं मिलते। जिस रेस्तरां में भारत में चार वेटर होते हैं वैसे ही रेस्तरां में वहां एक ही वेटर होता है। कई स्थानों पर ग्राहक को खुद ही प्लेट को सिंक में रखना पड़ता है। छोटी दुकानों में एक ही व्यक्ति होता है, मैनेजर और सेल्समैन सबकुछ वही। इसीलिए यहां बांग्लादेश से काम करने वाले युवकों को आमंत्रित किया जाता है। वर्क परमिट खत्म होने पर इनके नियोक्ता इनके परमिट की अवधि बढ़वा देते हैं। अवधि न बढ़ने पर इन्हें वापस अपने देश लौट जाना पड़ता है।

लोग बताते हैं कि सिंगापुर से जुड़े मलेशिया में भी बांग्लादेशी कामगार काफी बड़ी संख्या में हैं। करीब छह-सात लाख होंगे। इनमें से कई वहां अवैध रूप से भी पहुंच गए हैं। इन्हें नियमित करने के लिए मलेशिया सरकार काफी कोशिश कर रही है। इसके लिए बांग्लादेश सरकार से भी बातचीत की गई थी। एक बार मामूली-सी फीस लेकर इन्हें अपना नाम पंजीकरण कराने के लिए कहा गया था। इसके बाद बिना पंजीकरण वाले आप्रवासियों के खिलाफ अभियान चलाया गया।

बांग्लादेशियों की बात चली तो संतोसा टापू की एक घटना याद आ गई। वहां एक बांग्लादेशी मिल गए। दाढ़ी और टोपी वाले। उनकी पत्नी पूरी तरह बुर्के से ढकी थीं। मैंने पूछा ढाका में सबकुछ ठीकठाक है न। उन्होंने कहा - जी हां, हम काफी ठीकठाक हैं, मेरा छह माले का मकान है। जब मैंने पूछा कि शांति तो है न, तब वे मेरा आशय समझे। जो भी हो, आपके पास कितना मंजिला मकान है, या कितनी कारें हैं इससे भारत और दक्षिण एशिया में परिवार की समृद्धि मापी जाती है। यूरोपीय लोग इस पर आश्चर्य करते हैं।