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Journalist and writer, Writes on Northeast India, Bangladesh, Myanmar

मंगलवार, 31 दिसंबर 2013

पैसा कमाने के कारण क्षमाप्रार्थी होने की आवश्यकता नहीं

प्राइम टाइम की चर्चाओं के शोर ने राष्ट्रीय मानसिकता ऐसी बना दी है कि उम्मीद की बात करना और वर्तमान सत्ता प्रतिष्ठान में भी कुछ अच्छा खोजना सत्ता प्रतिष्ठान के चमचे की गाली खाने के लिए पर्याप्त होता है। लेकिन फिर भी हम मानने को तैयार नहीं कि भारतीय राजनीति में अरविंद केजरीवाल नाम के धूमकेतु के उदय से पहले सब कुछ शून्य था और (असली) लोकतंत्र की यात्रा सिर्फ दिसंबर 2013 से शुरू हुई है।

2012 की तरह ही 2013 का भी असली हीरो संचार का नया माध्यम सोशल मीडिया था। इस मीडिया ने एक आम आदमी को भी अपनी ब्रांडिंग करने का अवसर प्रदान कर दिया है। आपके विचार कितने ही उम्दा हों, आप कितने ही ईमानदार हों, आप कितने ही कार्यकुशल हों- फिर भी आप राजनीति में सफल नहीं हो सकते यदि आपके बारे में लोग जानें ही नहीं। राजनीति आखिर ब्रांडिंग का ही खेल है, वरना बालीवुड का कोई सितारा कैसे चुनाव जीत लेता है जिसने पैसे कमाने के सिवा कभी कुछ सोचा ही नहीं। 2014 का हीरो भी सोशल मीडिया के ही रहने की उम्मीद है।

2013 में इस साधारण सी लगने वाली बात पर ध्यान गया कि आज के दौर में जितनी भी कुशलताएं (स्किल्स) हैं, उनमें गूगल का इस्तेमाल करना सबसे काम की कुशलता है। लेकिन इसे सिखाने के लिए कोई स्कूल नहीं है। पुस्तक पढ़ना, समझना, उसमें से कुछ लिखना- से सब कुशलताएं सिखाने के लिए स्कूलों में कितने पापड़ बेले जाते हैं, लेकिन गूगल पर मनचाही चीज कम समय में खोजना भी एक कला है इसे नई पीढ़ी तो जानती है, लेकिन पुराने ढर्रे के लोग अभी भी इसके विराट स्वरूप के दर्शन करने में असमर्थ हैं। अच्छे-खासे बुद्धिजीवियों को यह कहते सुना कि इंटरनेट पर तो नब्बे फीसदी पोर्न ही है। सत्तर के दशक की मांएं सिनेमा से डरती थीं कि यह बच्चों को बिगाड़ देगा। आज बच्चे दिन में तीन फिल्में देखकर भी पुरानी पीढ़ी से आगे ही जा रहे हैं। 2014 में कोई संकल्प लेने की सोच रहे हैं तो यही संकल्प लें कि इस वर्ष इंटरनेट-प्रवीण बनना है। वरना पीछे छूट जाएंगे इसमें कोई शक नहीं।

हमारे प्यारे आसाम के बारे में क्या कहें। इसमें सुधार के कोई लक्षण नजर नहीं आ रहे हैं। यह अब भी अपनी बीमारी का इलाज टोना और झाड़-फूंक से करना चाहता है। जिस दवा से थोड़ा फायदा होता है उसे ही जहर बताकर नाली में डालने के लिए उद्‌यत होता है। यूपी के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव की यह बात सटीक लगी कि लोगों को बहकाना आसान है, समझाना कठिन। जो बच्चे सूबे से बाहर जाकर पढ़कर आ रहे हैं या वहीं काम-धाम कर रहे हैं, उनकी सोच बदली है। इस तरह से देखें तो ज्यादा से ज्यादा बच्चों को बाहर भेजना अच्छा विचार हो सकता है।

यही हाल असम के हिंदीभाषी समाज का है। व्यक्तिगत स्तर पर या छोटे-छोटे गुटों के रूप में यह समाज अच्छा कर रहा है। जितनी चुनौतियों के बीच इसे काम करना पड़ता है, उससे साफ है कि यदि मार्ग थोड़ा भी प्रशस्त हो तो यह भारत के सर्वश्रेष्ठ समुदायों में शामिल हो सकता है। जैसे पारसी समुदाय। इस समुदाय की सबसे बड़ी समस्या है एक भिन्न संस्कृति के बीच समृद्ध समझे जाने के कारण उत्पन्न वल्नरेबिलिटी। हम कहां खड़े हैं और हमें कहां जाना है इसे समझने की कोई जद्दोजहद 2013 में भी इस समुदाय में दिखाई नहीं दी। इस समुदाय को दो बातें 2014 में कहने का प्रयास करना चाहिए- एक, अब तक के इतिहास में असम के हिंदीभाषी समाज ने ऐसा कोई काम नहीं किया, जिसके लिए उसे शर्मिंदा होना पड़े। दो, पैसा कमाने के कारण क्षमाप्रार्थी होने की आवश्यकता नहीं।

पुराना साल जाते-जाते दो पुस्तकें हमें पकड़ा गया। एक काबेरी कछारी राजखोवा ने लिखी है जो अल्फा नेताओं के भूटान और बांग्लादेश के अनुभवों का अच्छा खासा आभास देती है। दूसरी पुस्तक है वरिष्ठ पत्रकार राजीव भट्टाचार्य की जिसमें उन्होंने परेश बरुवा के साथ लंबी मुलाकातों के बारे में लिखा है। दोनों ही पुस्तकों में कहीं भी यह नहीं आया कि अलगाववाद क्यों जरूरी है। असम एक स्वाधीन देश था, लेकिन भारतवर्ष की रचना ऐसे भूतपूर्व स्वाधीन देशों के संघ के रूप में ही तो हुई है। इस संघ से बाहर निकलने की इच्छा के पीछे क्या है या यह क्यों होना चाहिए इस विषय में ठोस तर्कों की उम्मीद कोई भी अल्फा से कर सकता है, क्योंकि इस संघर्ष ने अब तक दसियों हजार लोगों की जान ले ली। ऐसा कुछ इन पुस्तकों में नहीं मिलता। श्रीमती राजखोवा की पुस्तक अल्फा अध्यक्ष अरविंद राजखोवा के परेश बरुवा के साथ मतभेदों पर अच्छा प्रकाश डालती है। लेकिन ये मतभेद सांगठनिक मुद्दों या काम करने के तरीकों को लेकर ज्यादा थे, और असम को भारतीय संघ से क्यों बाहर निकलना चाहिए, या क्या ऐसा करना आज की परिस्थिति में व्यावहारिक होगा या संभव होगा - इस पर बिल्कुल नहीं। इसी तरह परेश बरुवा के साथ राजीव भट्टाचार्य की मुलाकातों के बारे में पढ़ने पर यह बात सामने आती है कि बरुवा के मन में किशोर वय से ही तिनसुकिया के बंगाली और बिहारी व्यवसायियों के प्रति एक विद्वेष भाव था। उन्होने एक बंगाली व्यवसायी को किसी से मांग कर लाई बंदूक चलाकर जान से मार डाला था। आश्चर्य होता है कि किसी व्यक्ति के किसी समुदाय के प्रति बचपन में जम गए विद्वेष की कितनी भयानक परिणति हो सकती है।

दोनों पुस्तकें अलगाववादियों के मनोजगत में उतरने के लिए हमारे पास रक्षा जैकेट स्वरूप रहेंगी। दोनों पुस्तकें पढ़ते हुए एक बार फिर अखिलेश यादव की यह बात याद आती है- लोगों को बहकाना आसान है, समझाना कठिन।

सभी पाठकों को नए साल की शुभकामनाएं। अभी आगे साल भर बातचीत होती रहेगी।

1 टिप्पणी:

  1. बहुत खूबसूरती से और सरल एवं बेबाक लफ़्ज़ों में लिखे गए इस आलेख के लिए बहुत बहुत साधुवाद। बहुत चुस्त और मंजे हुए शब्दों में आपने जो कुछ लिखा है उसकी गहराई अथाह है। मेरी नज़र में आपका यह लेख बहुत विलम्ब से आया. "जागरण जंक्शन " में छपे एक लेख ने इंटरनेट पर आपको खोजने के लिए मुझे बाध्य कर दिया। आपकी लेखनी को कोई विशेषण दे सकू इतनी योग्यता तो मुझ में नहीं है फिर भी मन नें एक शब्द उभरता है "आफरीन !" "आफरीन! "

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