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Journalist and writer, Writes on Northeast India, Bangladesh, Myanmar
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बुधवार, 3 दिसंबर 2008

सभी भौंचक कि गुस्सा मुसलमान नहीं राजनेताओं के विरुद्ध कैसे

मुंबई की घटना के बाद देश भर में राजनेताओं के विरुद्ध लोगों का गुस्सा भड़क उठा है। घटना के तुरंत बाद राजनेताओं को जैसे सांप सूंघ गया था। एक दो हेवीवैट को छोड़कर बाकी सब कुछ भी बोलने का साहस नहीं कर पा रहे थे। बाद में लोगों का गुस्सा देखकर एक दो नेताओं ने जिस तरह प्रतिक्रियाएं व्यक्त कीं उससे मामला और भी बिगड़ गया।

यह देखना सुखद है कि यह गुस्सा किसी पार्टी विशेष के खिलाफ नहीं है। आम जनता हो या अखबारों के स्तंभ लेखक, सभी कांग्रेस, भाजपा और माकपा - सभी के विरुद्ध खुलकर सामने आ रहे हैं। मुहावरे की भाषा में जिसे दीवार का लेखन कहा जाता है वही आज एसएमएस का लेखन बन गया है। एसएमएस की भाषा पर यदि राजनेताओं ने अब भी ध्यान नहीं दिया तो इससे उनका ही नुकसान होगा।

लेकिन चिंता यही है कि राजनेताओं के खिलाफ यह गुस्सा कहीं एक सप्ताह बाद ही कपूर की तरह उड़ न जाए। अभी तक इस गुस्से का कोई सांगठनिक या वैचारिक आधार नहीं है। जिस तरह किसी सड़क दुर्घटना के बाद हिंसक जनता पुलिस और प्रशासन पर पथराव करती है, इस समय की आलोचनाओं की वैसे पथराव के साथ ही तुलना की जा सकती है।

दो दिन बाद उस सड़क पर वाहनों की वही आपाधापी बदस्तूर चलती देखी जा सकती है। इसी तरह देश में कुछ दिन बाद हम देखेंगे कि राजनेता फिर से पुलिस-सुरक्षा बलों के कामकाज में टांग अड़ाते दिखाई देने लगेंगे। शुद्ध रूप से सुरक्षा संबंधी, जांच संबंधी मामलों को राजनीति के कीचड़ में घसीटते दिखाई देंगे। पुलिस बलों की सुरक्षा को खतरे में डालते हुए घटिया माल की आपूर्ति के लिए अधिकारियों को मजबूर करते दिखाई देंगे।

लोगों की ठीक ही समझ में आ रहा है कि इस देश में लोकतंत्र का सबसे ज्यादा अपव्यय राजनीतिक बिरादरी ने किया है। संविधान में कहीं न कहीं कोई ऐसी खोट रह गई है कि राजनीतिक बिरादरी पर अंकुश लगाना संभव नहीं रह गया हैऔर वह सारी सरकारी मशीनरी को अपने घरेलू नौकर की तरह इस्तेमाल कर पा रही है।

इसीलिए जब भी पेशेवर राजनेताओं को दरकिनार कर कहीं भी कोई आंदोलन छिड़ता है तभी आम जनता की उसमें भागीदारी देखने लायक होती है। गुजरात का नवनिर्माण आंदोलन हो या बिहार का जेपी आंदोलन या असम का छात्र आंदोलन - इन सबमें जो चीज साझा थी वह थी सभी स्थापित पार्टियों के प्रति लोगों के गुस्से का इजहार। हाल ही में गुवाहाटी में एक छात्र संगठन के बैनर तले हजारों लोगों के जुलूस ने एक बार फिर यह साबित कर दिया है कि लोग विद्रोह और आतंकवाद के विरुद्ध सामने आने को तैयार हैं, बशर्ते उन्हें यह भरोसा हो कि उनका राजनीतिक स्वार्थ के लिए इस्तेमाल नहीं होगा।

इन्हीं कालमों में हम लिख चुके हैं कि सरकारें दबाव में काम करती हैं और इसलिए सरकारों पर दबाव बनाए रखने के लिए ऐसी सशक्त नागरिक समितियां बनाने की दिशा में काम किया जाना चाहिए जो सरकार से सुरक्षा व्यवस्था के बारे नियमित अवधि पर हिसाब लेती रहें। यदि इस उद्देश्य को लेकर आंदोलन चलाया जाए तो इस राजनेता विरोधी गुस्से को सही दिशा में परिचालित किया जा सकता है।

यदि हर राज्य में प्रभावशाली नागरिक, अवकाशप्राप्त ईमानदार नौकरशाह, सेना के अधिकारी, छात्र नेता ऐसी समितियों में शामिल हों तो ये समितियां किसी भी राज्य की सरकार को झुकने पर मजबूर कर सकती हैं। तब सरकारों के मुखिया इन समितियों के साथ नियमित बैठकें कर उनके सुझाव सुनने को मजबूर होंगे और सुरक्षा के मामले में क्या प्रगति हुई है यह बताने को मजबूर होंगे। ये समितियां यह जायजा ले पाएंगी कि नए पुलिस कानून के क्रियान्वयन में क्या प्रगति हुई है, पुलिस के आधुनिकीकरण के लिए अधिकारियों द्वारा दिए गए प्रस्ताव किस स्थिति में हैं, उनके लिए संसाधनों की क्या व्यवस्था की गई है।

अब तक जनता सड़क, बिजली, पानी आदि के लिए आंदोलन करती रही है, अब चुस्त-दुरुस्त पुलिस तंत्र के लिए भी उसे आंदोलन करना पड़ेगा।