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Journalist and writer, Writes on Northeast India, Bangladesh, Myanmar

शुक्रवार, 14 सितंबर 2012

क्या बांग्लादेश वापस लेगा घुसपैठियों को?

क्या इतिहास अपने आपको दोहराएगा? इस बात का अंदेशा इस कारण हो रहा है कि १९७९ से १९८५ तक चले विदेशी भगाओ आंदोलन की तर्ज पर फिर से लोग सड़कों पर निकल पड़े हैं| १९८५ में इस बात पर सहमति हो गई थी कि २४ मार्च १९७१ के बाद आए बांग्लादेशियों को अवैध माना जाएगा और उन्हें वापस उनके देश भेजने की व्यवस्था सरकार करेगी| यदि बांग्लादेशी प्रव‘जन के विरुद्ध लोगों की भावनाएं फिर से एक बार आंदोलन का रूप लेती है (इसकी उम्मीद कम है), तो क्या इस बार लोग इस संबंध में पहले की अपेक्षा ज्यादा शिक्षित हैं कि क्यों इस दो दशकों से ज्यादा की अवधि में एक भी अवैध बांग्लादेशी को वापस उसके देश नहीं भेजा जा सका | (हम यहां ‘एक भी’ शब्दों का इस्तेमाल इसलिए कर रहे हैं क्योंकि हमारे पास इस बात की सूचना नहीं है कि इस अवधि में बांग्लादेश सरकार ने भारत द्वारा बांग्लादेशी करार दिए गए किसी व्यक्ति को अपना नागरिक मानकर स्वीकार किया है|)

यदि कोई व्यक्ति सचमुच यह जानना चाहता है कि किन कारणों से बांग्लादेशी घुसपैठियों को निकाला नहीं जा सका, तो वह तथ्यों को जानने की कोशिश करेगा और यदि वह जानने का परिश्रम नहीं करना चाहता तो वह कहेगा कि राजनीतिज्ञों की वोट लोलुपता के कारण ऐसा नहीं हो सका| यह सच है कि राजनीतिज्ञों ने कभी नहीं चाहा कि बांग्लादेशी घुसपैठियों के मामले को गंभीरता से लिया जाए| क्योंकि पुलिस और सरकारी एजेंसियां जिस तरह काम करती हैं, उसमें यह नितांत संभव है कि निर्दोष नागरिकों को परेशान किया जाए| कोई भी सरकार बैठे-बिठाए बंग्ला भाषा बोलने वाले हिंदुओं और मुसलमानों को अपना दुश्मन नहीं बनाना चाहेगी| और इस तरह किसी भी अधिकारी को अवैध बांग्लादेशी को खोज निकालने के लिए कुछ भी न करने का संकेत दे दिया जाता है| यह वैसे ही है, जैसे सत्ताधारी दल के गुंडे-बदमाशों पर पुलिस जल्दी से हाथ नहीं डालती| अभी हाईकोर्ट के आदेश पर जब पुलिस ने डी-वोटरों को खोज निकालना शुरू किया, तो खासकर हिंदू बंगालियों में हड़कंप मच गया| आज भी असम के बंग्ला अखबार हिंदू बंगालियों को होने वाली परेशानियों से भरे पड़े रहते हैं| डिटेंशन कैम्पों में कैद कई हिंदू बंगालियों की गाथा आए दिन बंग्ला अखबारों में छपती रहती है| कोर्ट के आदेशों के कारण मु‘यमंत्री डी-वोटर के मुद्दे पर कोई कार्रवाई तो क्या, आश्‍वासन तक देने की स्थिति में नहीं थे| लेकिन फिर भी उन्होंने चुनाव से पहले हिंदू बंगाली समुदाय को गोल-मोल भाषा में आश्‍वासन दे डाला और चुनाव में वोटों की अच्छी फसल काट ली|

अवैध बांग्लादेशियों की समस्या पर आने से पहले यह भी देख लें कि बीटीएडी में हुई हिंसा का लोकसभा चुनावों पर क्या असर पड़ेगा? असम से बाहर क्या होता है, यह अभी देखने वाली बात होगी, लेकिन असम का मुसलमान वोटर एक बार फिर से कांग‘ेस की ओर झुक जाए तो आश्‍चर्य नहीं होना चाहिए| जो मुसलमान वोटर बदरुद्दीन अजमल की पार्टी की ओर झुकने लगा था, वह इस बार तो अवश्य देख रहा होगा कि किस तरह मौलाना अजमल चुप्पी साध गए हैं| या किस तरह वे संकट के समय भी मुंबई-दुबई के चक्कर लगा रहे हैं|

किसी अन्य देश के नागरिक के बारे में तभी यह प्रमाणित किया जा सकता है कि वह अन्य देश का नागरिक है, जब या तो उसके पास ऐसे दस्तावेज पाए जाएं, जैसे पासपोर्ट या फोटो पहचान पत्र, जो उसे उस देश का नागरिक साबित कर सके, या फिर वह स्वयं स्वीकार करे कि वह अमुक देश में अमुक गांव का नागरिक है| जिन लोगों को अब तक न्यायालय के आदेश पर वापस खदेड़ने के लिए सीमा पर ले जाया गया है, उनके बारे में यह तो प्रमाण है कि वह भारत का नागरिक नहीं है, लेकिन क्या हमारी अदालतों ने यह भी प्रमाणित किया है कि वह बांग्लादेश का ही नागरिक है? ऐसा नहीं होने तक हम बांग्लादेश सरकार से इस मुद्दे पर अपनी बात नहीं मनवा पाएंगे और न ही अंतर्राष्ट्रीय मंच पर अपनी बात को तर्कपूर्ण ढंग से रख पाएंगे।

अवैध बांग्लादेशियों की समस्या के जिस पहलु पर सबसे कम ध्यान दिया गया, वह है अवैध बांग्लादेशी प्रमाणित हो चुके व्यक्ति को वापस उसके देश किस तरह भेजा जाएगा| बांग्लादेशियों के मुद्दे पर जो लोग भावनाओं में बहते हैं और सोचते हैं कि सरकार कड़ाई बरते तो उन्हें उनके देश वापस भेजा जा सकता है, उन्हें यदि यह बताया जाए कि ऐसा होना लगभग असंभव है तो उनके उत्साह पर पानी फिर सकता है| बांग्लादेशियों के मुद्दे पर अति उत्साही लोगों को यदि यह बताया जाए कि घुसपैठिया प्रमाणित होने के बाद भी ऐसे लोगों के भारत में ही रह जाने की संभावना है, भले उनके नागरिक अधिकार न रहें - तो उनमें से अधिकांश मानेंगे कि उनकी ऊर्जा एक निरर्थक काम में जाया हो गई| लेकिन ऐसा होने की संभावना ही अधिक है।

किसी अन्य देश के नागरिक के बारे में तभी यह प्रमाणित किया जा सकता है कि वह अन्य देश का नागरिक है, जब या तो उसके पास ऐसे दस्तावेज पाए जाएं, जैसे पासपोर्ट या फोटो पहचान पत्र, जो उसे उस देश का नागरिक साबित कर सके, या फिर वह स्वयं स्वीकार करे कि वह अमुक देश में अमुक गांव का नागरिक है| जिन लोगों को अब तक न्यायालय के आदेश पर वापस खदेड़ने के लिए सीमा पर ले जाया गया है, उनके बारे में यह तो प्रमाण है कि वह भारत का नागरिक नहीं है, लेकिन क्या हमारी अदालतों ने यह भी प्रमाणित किया है कि वह बांग्लादेश का ही नागरिक है? ऐसा नहीं होने तक हम बांग्लादेश सरकार से इस मुद्दे पर अपनी बात नहीं मनवा पाएंगे और न ही अंतर्राष्ट्रीय मंच पर अपनी बात को तर्कपूर्ण ढंग से रख पाएंगे| इसलिए यह तय है कि जिन लोगों को अवैध घुसपैठिया करार दिया जाएगा, वह अंततः भारत में ही राज्यविहीन व्यक्ति के रूप में रह जाएगा| बहुत कम लोगों को मालूम है कि रोहिंग्या मुसलमानों की तरह दो लाख से ऊपर हिंदुओं को बर्मा में राज्यविहीन व्यक्ति करार दे रखा गया है| बर्मा के ब्रिटिश शासन से स्वाधीन होने के बाद ये भारतीय मूल के लोग वहीं रह गए थे| आज उन हिंदुओं को भारत सरकार स्वीकार नहीं कर रही और बर्मा सरकार उन्हें किसी भी तरह का नागरिक अधिकार दे नहीं रही| कुल मिलाकर यही समझ में आता है कि अंतर्राष्ट्रीय सीमाओं की क्रूरता के बारे में आम आदमी को कितनी कम समझ है।

2 टिप्‍पणियां:

  1. एक बार फिर से इस आंदोलन की शुरुआत हो चुकी है यह कब तक रुकेगा कहना मुश्किल है। लेकिन यह बात सच है कि इसका फायदा असामाजिक त्तत्व जरुर उठा लेंगे,कर्म संस्कृति का ह्रास होगा। लोग आंदोलनमुखी होंगे.अन्य प्रदेशों के साथ लिक में कमी आएगी। आंदोलन में जो समय लगेगा उससे कोई विशेष फायदा मिलने वाला है या नहीं कहा नहीं जा सकता लेकिम पैसै व समय दोनो ही बरबाद होंगे। ब्यापारियों पर चंदे की गाज गिरेगी, ब्यापार पर भी असर पड़ेगा। यही समय व पैसा सीमा को बंद करने व बंगलादेशियों को शिनाख्त करने में लगाय जाए तो शायद कोई नतीजा निकल सकता है। बांगलादेशीयों को सिर्फ दो वक्त की रोटियो से मतलब है चाहे उनको वोट का अधिकार मिले या न मिले। ये फायदा तो राजनीतिज्ञ लोग करते हैं इनके बल पर अपनी दालरोटी सेकने का काम तो हर राजनीतिक दल करता आया है ,करता रहेगा भी। अतः बागलादेशी जो बस गए हैं उनहें दूसरे दर्जे के नागरिक के तौर पर रहने दिया जाए तथा नए प्रवेश पर कड़ाई से रोक लगा दी जाए तभी कोई बात बन सकती है। आंदोलन कोई समाधान कर सकता है या नहीं मैं नहीं जानता लेकिन कई समस्याँए खड़ी कर सकता है इसमें कोई शक नहीं ।
    किशोर कुमार जैन गुवाहाटी।

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  2. असम से बंगलादेशी नागरिकों को भगाने के संदर्भ मे पुनः जारी आंदोलन जोर पकड़ता जा रहा है और इसकी गूंज देश की राजधानी दिल्ली तक पहूंच चुकी है। लेकिन फिर भी भारत सरकार ने बंगलादेश से इस विषय पर बातचीत की अब तक कोई पहल नहीं की है। जब तक यह बातचीत की शुरआत नपीं होगी तब तक यह कयास लगाना कठिन है कि बंगलादेश इन नागरिकों को वापस लेगा या नहीं। श्री किशोर जैन के अनुसार घुसपैठियों को दूसरे दर्जे के नागरिक के रुप रहने की अनुमती देना तो बहुत खतरनाक होगा।

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