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Journalist and writer, Writes on Northeast India, Bangladesh, Myanmar

रविवार, 6 फ़रवरी 2011

लांक्षन सहना प्रवासी की नियति है



हाल ही में मैं राज्य के बाहर गया। वहां एक साहित्यिक मित्र ने मुझे उलाहना दिया कि आपलोग हिंदी अखबार क्यों निकालते हैं? इस तरह आपलोग मारवाड़ी समाज को असमिया समाज से दूर रखने का काम करते हैं। हिंदी अखबार न होते तो मारवाड़ी लोग असमिया अखबार पढ़ते और असमिया समाज-संस्कृति के ज्यादा निकट जाने का मौका मिलता। यदि हम काफी हाउस या पनवाड़ी की दुकान पर मिले होते तो मैं जोर-शोर से बहस करता, लेकिन किसी के घर अतिथि बनकर गर्मागर्म बहस करने का मौका नहीं था। फिर भी मैंने मिमियाते हुए कहा कि जब हिंदी अखबार नहीं थे, तब मारवाड़ी कौन-सा असमिया अखबार पढ़ते थे। उन दिनों वे सन्मार्ग और दैनिक विश्वमित्र पढ़ा करते थे जिनमें असम के बारे में कुछ नहीं होता था। हमारे मित्र को एतराज था कि मारवाड़ी फैंसी बाजार में अपनी डफली पर अपना राग गाते हैं, उन्होंने फैंसी बाजार को छोटा-सा टापू जैसा बना रखा है। इसीलिए तो स्थानीय लोगों में विद्रोह होता है।

चूंकि मैं वहां कुछ बोल नहीं पाया था, शायद इसीलिए इन प्रश्नों के बीज दिमाग में रह गए और अंकुरित होकर बड़े होते रहे। मैं सोचता रहा कि क्या इसीलिए असमिया समाज में विद्रोह पनपा है! मैं मारवाड़ी समाज के किसी भी स्थानीय समाज के नजदीक जाने, उसकी संस्कृति-भाषा को अपनाने का विरोधी नहीं बल्कि समर्थक हूं। लेकिन यह भी कहता हूं कि यह काम एक स्वाभाविक प्रक्रिया के तौर पर होगा, न कि किसी राजनीतिक कार्यक्रम की तर्ज पर।

फिर यह प्रश्न भी है कि असमिया भाषा-संस्कृति को काफी हद तक अपना लेने वाले समुदायों को क्या संदेह की दृष्टि से नहीं देखा जाता? उदाहरण के लिए नेपाली समुदाय। हमारे मित्र को जिन मुद्दों पर मारवाड़ी समुदाय से शिकायत थी उन मुद्दों पर नेपाली समुदाय उन्हें शिकायत का मौका नहीं देगा। मसलन, वे लोग शहरों में टापू बनाकर नहीं रहते। नेपाली समुदाय असम में खेती और गोपालन से जुड़ा हुआ है, इसलिए गांवों में रहता है। इस समुदाय के लोग असमिया भाषा को मातृभाषा की तरह प्रयोग में लाते हैं। नेपाली समुदाय का असमिया साहित्य में अच्छा योगदान है। हमारे मित्र को संतोष होगा, कि ये लोग अपनी भाषा में समाचार पत्र भी नहीं निकालते, और असमिया पत्र ही पढ़ते हैं। लेकिन इससे क्या नेपाली समुदाय दोषारोपण से बच जाता है?

असमिया समाज-भाषा-साहित्य के सामने संकट हो सकते हैं- इनमें से कई वास्तविक हैं और कुछ काल्पनिक। लेकिन इस संकट को पैदा करने में मारवाड़ी समुदाय की मुझे कोई भूमिका नजर नहीं आती। एक कहानी है- एक मक्खी एक बैल के सींग पर बैठी थी। उसने देखा कि बैल की आंखों से आंसू बह रहे हैं। द्रवित होकर मक्खी ने पूछा- बैल भाई, मेरा भार सहन नहीं हो रहा है तो मैं कहीं और बैठ जाऊँ। कुछ ऐसी ही स्थिति मारवाड़ी समाज की असम में है। मारवाड़ी समुदाय मुश्किल से यहां की जनसंख्या का एक फीसदी होगा। ये एक फीसदी लोग दिन-रात अपने व्यापार में मगन रहते हैं। ये लोग असमिया भाषा सीखे, असमिया संस्कृति के नजदीक जाए तो इनलोगों के लिए ही अच्छा है- लेकिन न जाए तो यह स्थानीय लोगों में असंतोष का कारण बन सकता है यह बात समझ से परे है। मारवाड़ी समाज सिर्फ असम ही नहीं देश के हर राज्य में फैला है। अपने प्रवास के करीब दो सौ सालों के दौरान किसी भी राज्य में इसके द्वारा स्थानीय भाषा-संस्कृति के विरुद्ध कोई काम करने का उदाहरण नहीं मिलता। यह समाज अपनी भाषा को ही संवैधानिक या किसी भी तरह की सरकारी मान्यता दिलाने के लिए कोई प्रयत्न नहीं करता, ऐसा समाज किसी भी अन्य भाषा-संस्कृति के लिए खतरा बनने का तो सवाल ही नहीं।

फिर भी मारवाड़ी लोग अपने स्वभाव के कारण हमेशा रक्षात्मक मुद्रा में खड़े रहते हैं। (व्यावहारिक तौर पर देखें तो यह अच्छा है, लेकिन बौद्धिकता के स्तर पर पीड़ा तो होती ही है)। कोई कहता है तुम बहुत बुरे हो, तब यह अपने गिरेबान में झांकने लग जाता है, कोई कहता है तुम अपने बच्चों को हिंदी क्यों पढ़ाते हो तब यह हिंदी स्कूलों को बुराई की जड़ बताने लग जाता है; कोई कहता है तुम शोषक हो तब यह जनकल्याण के काम गिनाने लग जाता है; कोई कहता है तुम जाहिल हो तब यह अपने समाज के बौद्धिकों के नाम गिनाने लग जाता है; कोई इसे देशद्रोही तक कह देता है तब यह स्वाधीनता संग्राम में मारवाड़ी समाज की भूमिका को गिनाने लग जाता है।

दरअसल हम एक जटिलताओं भरे समाज में रह रहे हैं। एक मारवाड़ी मध्यप्रदेश या उत्तर प्रदेश में रहता है, तब उस पर बहुत सारे प्रश्नों की बौछार नहीं की जाती, लेकिन वही मारवाड़ी जब उड़ीसा या असम में आ जाता है तो उससे इतने सारे सवाल पूछे जाते हैं कि वह अपराध बोध तले पिस जाता है। मध्य देश में मारवाड़ी ठीक है तो पूर्व देश में आकर वह बुरा कैसे हो गया?

कहीं ऐसा तो नहीं कि गालियां सुनना प्रवास की अनिवार्य शर्त होती है! बाहर से आए आदमी को आप सारी बुराइयों की जड़ बता दो, फिर भी वह रक्षात्मक मुद्रा में रहेगा, हाथ जोड़े खड़ा रहेगा, क्योंकि उसे भान है कि वह किस जमीन पर खड़ा है।

मारवाड़ी कैसा दिखता है यह इस बात पर जितना निर्भर करता है कि मारवाड़ी कैसा है, उससे ज्यादा इस बात पर निर्भर करता है कि देखने वाला कौन है? जहां तेज उद्योगीकरण हो रहा है, पूंजी और उद्यमियों का स्वागत किया जाता है वहां मारवाड़ी उद्यमी है और विकास का वाहक है (कर्नाटक)। जहां के लोग अपनी भाषा-संस्कृति-साहित्य की समृद्धि और भविष्य के प्रति आश्वस्त हैं वहां मारवाड़ी एक छोटा-सा अल्पसंख्यक समूह है जिसकी अपनी अलग भाषा-संस्कृति है। वे लोग अपनी भाषा में क्या करते हैं इससे किसी को कोई मतलब नहीं (पश्चिम बंगाल)। जहां के लोग अपनी भाषा-संस्कृति के भविष्य को लेकर आशंकित हैं वहां मारवाड़ियों को अलग दृष्टि से देखा जाता है (असम)।

असम के ज्यादातर मारवाड़ी द्विभाषी हैं। नई पीढ़ी में मारवाड़ी बोली खत्म हो रही है, उसका स्थान हिंदी ले रही है। इस तरह ज्यादातर मारवाड़ी हिंदी और असमिया का मातृभाषा के रूप में व्यवहार करते हैं। ज्यादातर मारवाड़ी शुद्ध असमिया बोलना जानते हैं। असमिया भाषा को इन लोगों ने दिल से अपना लिया है। लेकिन ज्यादातर मारवाड़ी हिंदी हो या असमिया - लिखने-पढ़ने से कोई ताल्लुक नहीं रखते। इसलिए उन्हें असमिया भाषा के प्रति अपने प्रेम को प्रदर्शित करने का अवसर नहीं मिलता। इधर असमिया समाज भाषा व साहित्य को लेकर अति संवेदनशील है। अपनी भाषा-साहित्य-संस्कृति के भविष्य को सुरक्षित करने की यह जद्दोजहद कम -से-कम डेढ़ सौ साल पुरानी है। असमिया संस्कृति के प्रति किसी का नजरिया क्या है, इसे असम में दोस्त और दुश्मन की पहचान के लिए एक संदर्भ बिंदु की तरह इस्तेमाल किया जाता है।

हाल ही में मारवाड़ी समाज से कई असमिया साहित्यकार उभरे हैं। कुछ लोग हिंदी के माध्यम से ही असमिया संस्कृति की सेवा में उतरे हैं। इसका असमिया समाज में अच्छा स्वागत हुआ है। व्यापक मारवाड़ी समाज के असमिया प्रेम को यही वर्ग आगे लेे जा सकता है और उसे संस्थागत रूप दे सकता है।

अपराध बोध से ग्रसित रहने वाले मारवाड़ी भाइयों से संक्षेप में यही कहना चाहूंगा-(1) आप असम की जनसंख्या का एक अति क्षुद्र अंश हैं। जनसंख्या संतुलन को बदलने या राजनीतिक फायदे बटोरने में आपकी कोई भूमिका नहीं है, (2) आप नौकरियों के बाजार पर कोई दबाव नहीं डालते, उल्टे नौकरियां पैदा करते हैं, (3) आप धर्म और कानून से डरने वाले दब्बू लोग हैं, गैर कानूनी काम आपके स्वभाव में नहीं है (अपवाद हर जगह होते हैं), (4) स्थानीय भाषा का अहित कर हिंदी या राजस्थानी को आगे बढ़ाने के लिए आपने आज तक कुछ नहीं किया, आगे भी उम्मीद नहीं है, (5) आप पिछड़े इलाकों में आधुनिक पूंजीवाद के वाहक रहे हैं, (6) आपकी नई पीढ़ियां काफी पढ़-लिख कर यह साबित कर रही है कि आपकी बौद्धिक योग्यता सिर्फ परंपरागत बनियागिरी तक सीमित नहीं है।

जब सच्चाई यह है तब आपको अपराधबोध या हीनता ग्रंथि से ग्रस्त होने की क्या जरूरत है? क्या आप इसलिए हतोत्साहित हो जातेे हैं कि दूसरे समुदाय के दस लोगों के बीच कोई भी आपकी खिल्ली उड़ा देता है और आपके समुदाय के नाम पर वे अपराध जड़ देता है जो आपके समुदाय ने कभी किए ही नहीं। इससे हतोत्साहित होने की जरूरत नहीं, यह हम भारतीयों का स्वभाव है, यहां हर भारतीय समुदाय दूसरे समुदाय का मजाक उड़ाता है और उनके चुटकुले बनाता है। हमें इसके साथ ही जीना सीखना होगा।

1 टिप्पणी:

  1. सच्चाई को काफी साफगोई से कलमबद्ध किया गया है, वैसे एक अकेली पंक्ति विषयवस्तु का निचोड़ प्रगट कर रही है - "जहां के लोग अपनी भाषा-संस्कृति के भविष्य को लेकर आशंकित हैं वहां मारवाड़ियों को अलग दृष्टि से देखा जाता है"

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