मेरे बारे में

मेरी फ़ोटो
Journalist and writer, Writes on Northeast India, Bangladesh, Myanmar

रविवार, 16 जून 2013

पै अंग्रेजी ज्ञान बिन रहत हीन के हीन



हालांकि हम पर कभी लोहिया के अंग्रेजी हटाओ आंदोलन का प्रत्यक्ष प्रभाव नहीं पड़ा, लेकिन आज मैं एक स्कूली बच्चे की मानसिकता की सहज ही कल्पना कर सकता हूं जो अपने पाठ्‌यक्रम में से कोई एक विषय कम होने पर कितना उत्फुल्लित होता होगा। आज भी जब कोई हिंदीवादी या असमियावादी, या बोड़ोवादी अपनी भाषा के पक्ष में दलील देते हुए अपने से बड़ी भाषा-अंग्रेजी, हिंदी या असमिया- को कोसता है तो एक स्कूली बच्चा उनका सबसे बड़ा समर्थक होता होगा। उसे मातृभाषा के आंदोलन में अपना स्कूली बोझ कम होता दिखाई देता है। जब लोहिया ने "अंग्रेजी हटाओ' का नारा दिया तो भले उनका आशय अंग्रेजी को प्रशासन से, न्यायालय से और शिक्षा के माध्यम से हटाने का रहा होगा, लेकिन स्कूली विद्यार्थियों ने इससे एक ही बात समझी होगी कि अब हमें अंग्रेजी भाषा का भारी-भरकम ज्ञान निगलना नहीं होगा।

आज स्थिति काफी बदल चुकी है। आज अंग्रेजी हटाओ के लिए कोई जगह नहीं है। इसके उलट अंग्रेजी पल्प लिटरेचर का एक हस्ताक्षर आज के युवाओं के लिए सेलेब्रिटी है। पता नहीं राजनीतिक पार्टियों को यह बात समझ में आई है या नहीं कि हमारे देश के बहुभाषी होने की कीमत हम अंग्रेजी के रूप में चुका रहे हैं। जो भी हो, एक राजनीतिक कार्यक्रम के रूप में "अंग्रेजी हटाओ' या "हिंदी लाओ' जैसे नारों की उपयोगिता बिल्कुल समाप्त हो चुकी है।

अपनी भाषा को विकसित करने की इच्छा होना एक सहज स्वाभाविक इच्छा है। जिस तरह अपने देश को विकसित करने की इच्छा। लेकिन यह काम जिद भरे राजनीतिक आंदोलनों से नहीं हो सकता। इसके लिए कितने अध्यवसाय की जरूरत होती है, कैसी प्रतिबद्धता चाहिए, किस तरह एक-एक शब्द विकसित करना पड़ता है इस विषय में न जाकर हम इस विरोधाभास जैसी लगने वाली बात को रेखांकित करना चाहेंगे कि अपनी भाषा को विकसित करने की पहली शर्त होती है अपने से बड़ी भाषा का अच्छा ज्ञान होना। हिंदी के लिए यह बड़ी भाषा अंग्रेजी हो सकती है, असमिया के लिए हिंदी हो सकती है, इसी तरह बोड़ो के लिए असमिया हो सकती है। भाषणों में भाषाओं को बहनें कहा जाता है, जबकि व्यवहार में भाषाओं के बीच आपस में सौतनों जैसी ईर्ष्या होती है। अक्सर एक भाषा दूसरी भाषा से कुछ भी सीखने से साफ इनकार कर देती है। क्योंकि दूसरी भाषा से सीखना उसे अपने आत्मसम्मान के विरुद्ध लगता है। और किसी भाषा को अपने से बड़ी समझना? आप क्या बात करते हैं? भाषा के नाम पर हमारे देश में दंगे हुए हैं और आप कहते हैं किसी दूसरी भाषा को अपने से बड़ी भाषा मान लें!

जो भी हो, यदि आप हिंदी की स्थिति देखें तो पाएंगे कि यह भाषा पत्रकारिता, साहित्य, मनोरंजन, विज्ञापन और बोलचाल की भाषा बनकर रह गई है। आज जो ज्ञान का विस्फोट हो रहा है उससे हिंदी का दूर-दूर तक कोई रिश्ता नहीं है। इस बात को जांचने का एक आसान सा तरीका है गूगल का सर्च इंजन। मान लीजिए आप किसी साधारण से प्रश्न का जवाब खोजना चाहते हैं, उदाहरण के लिए आप यह जानना चाहते हैं कि शिमला में ठहरने के लिए कौन-सी अच्छी जगह है। यह जानकारी यदि आप हिंदी में खोजना चाहें तो आपको हो सकता है निराश होना पड़े। लेकिन अंग्रेजी में यदि खोजें तो तुरंत आपके सामने सूचनाओं की थाली सज जाएगी। ऐसी स्थिति में जो लोग अंग्रेजी नहीं जानते वे इंटरनेट का समुचित लाभ नहीं उठा पाते। उनके लिए सूचना क्रांति का आना और नहीं आना बराबर है। उसी तरह जिस तरह अंग्रेजी नहीं जानने वालों के लिए अमरीका में किसी नई धांसू किताब का निकलना और नहीं निकलना बराबर है।

एक राजनेता हाल ही में एक हिंदी संस्था के कार्यक्रम में गए। उनके भाषण का सार यह था कि हिंदी जरूर सीखनी चाहिए क्योंकि जितनी ज्यादा भाषाएं सीखी जा सकें उतना अच्छा है। यह वक्तव्य साफ दिखाता है कि उन्हें भाषाओं के आंतरिक विज्ञान के बारे में ज्यादा जानकारी नहीं है। क्योंकि अधिक से अधिक भाषाएं सीखना एक बात है, और एक ऐसी भाषा सीखना जिसमें विश्व का ज्यादा से ज्यादा ज्ञान एकत्र है बिल्कुल दूसरी बात है। कोई सीख सके तो अच्छी बात है, लेकिन आज जरूरत ज्यादा से ज्यादा भाषाओं के सीखने की नहीं बल्कि ज्यादा से ज्यादा ऐसी भाषा को सीखने की है जो समर्थ है, जिसमें विश्व का ज्ञान समाहित है। जो अपनी भाषा को अत्यधिक प्यार करता है उसके लिए भी अंग्रेजी का अच्छा ज्ञान अनिवार्य है। क्योंकि ऐसा नहीं होने पर वह स्वयं बहुत सारे ज्ञान से अछूता रह जाएगा, और दूसरे वह इस ज्ञान को अपनी भाषा में नहीं ला पाएगा।



बीटीएडी बनने के ठीक बाद एक बोड़ो सभा में जाना हुआ। श्रोताओं में से अधिकतर लोग बोड़ो और असमिया दोनों भाषाएं जानते थे क्योंकि वहां की आबादी मिश्रित आबादी थी। लेकिन बीटीएडी की कमान संभालने वाले नए-नए लोकतांत्रिक राजनीति में आए पूर्व उग्रवादी हाग्रामा मोहिलारी ने कहा कि बचपन से उन्होंने सिर्फ बोड़ो भाषा के माध्यम से पढ़ाई की है, इसलिए वे दूसरी भाषा नहीं जानते। उन्होंने अपना भाषण बोड़ो भाषा में ही दिया। यहां सवाल यह नहीं है कि हम उस भाषण को कितना समझ पाए। सवाल यह है कि उग्र मातृभाषा प्रेम ने हाग्रामा मोहिलारी जैसों की एक पूरी पीढ़ी को अपने आसपास की दुनिया से काट दिया। बोड़ो भाषा अपने विकास के शैशव काल में है। उसमें अभी दुनिया भर का ज्ञान और विद्याएं इकट्ठा नहीं हुए हैं। लेकिन यदि बोड़ो जानने वाले अच्छी असमिया, हिंदी या अंग्रेजी नहीं जानेंगे तो यह ज्ञान बोड़ो भाषा में कौन लाएगा? यह बात हर भारतीय भाषा पर लागू होती है। आज के दिन किसी भी भारतीय भाषा का प्रेमी यदि यह कहता है कि हमें अंग्रेजी की कोई जरूरत नहीं, तो वह अपनी भाषा का प्रेमी नहीं दुश्मन है।

देखें आलेख - अंग्रेजी मैया की जय (नीचे क्लिक करें)
http://binodringania.blogspot.in/2010/11/blog-post.html

मंगलवार, 23 अप्रैल 2013

मीडिया की औकात




असम के मीडिया के बारे में कहा जाने लगा है कि यहां जरूरत से अधिक मीडिया हो गया। जरूरत से अधिक अखबार छप रहे हैं, कई ऐसे हैं जो जीवन रक्षक दवाओं के सहारे चल रहे हैं लेकिन फिर भी चल रहे हैं। यही हाल चैनलों का है। कई ने ठीक से चलना भी नहीं सीखा कि उनके सामने अपने जनम-मरण का सवाल आ गया। कुछ लोगों को इनकी अधिक संख्या को लेकर आपत्ति है। कहते हैं इतने ज्यादा अखबारों और चैनलों की क्या जरूरत है। लेकिन हमारा मानना है कि बीस अखबार होना कोई बुरी बात नहीं है। क्योंकि भारत की तरह असम में भी विभिन्न समुदायों के लोग रहते हैं। उनके विभिन्न दृष्टिकोण हैं। जिस तरह राजनीति में विभिन्न राजनीतिक पार्टियां अपना अस्तित्व बनाए हुए हैं उसी तरह मीडिया में विभिन्न अखबार भी बने रहें तो क्या आपत्ति है। लेकिन सवाल है कि ये बीस अखबार क्या बीस दृष्टिकोण लेकर चल रहे हैं? क्या किसी एक सवाल पर इन अखबारों में बीस अलग-अलग पहलू निकलकर आते हैं? 

अफसोस की बात यही है कि ये बीस अखबार मिलकर एक अखबार का ही काम कर रहे हैं। असम में ऐसे लोग कम ही हैं जो किसी एक विषय पर अपनी सुचिंतित राय रखते हों। इसलिए अधिकांश अखबारों के संपादकीय पृष्ठों तक जाने की जरूरत ही नहीं होती। ये बीस अखबार मिलकर किसी एक भीड़ की तरह काम करते हैं। बातचीत के दौरान एक मित्र ने आरोप लगाया कि हाल ही में उभर कर आया एक "मसीहा' मीडिया की ही उपज है। हमने मित्र को समझाया कि हमारे यहां मीडिया कोई ऐसी चीज नहीं है जो अपने विवेक से निर्णय लेता हो। या जिसके कामों के पीछे कोई पूर्व परिकल्पना हो। यह एक भीड़ की तरह काम करता है। मान लीजिए किसी चौराहे पर कोई एक व्यक्ति कोई हंगामा कर रहा है या कोई हैरतअंगेज हरकत कर रहा है। वहां हमारे जैसे आते-जाने लोग उत्सुकतावश खड़े हो जाएंगे। यदि हंगामा दिलचस्प हुआ तो वहां काफी देर तक रहेंगे। और न हुआ तो आगे अपने काम के लिए निकल जाएंगे। अब हो सकता है कोई आरोप लगाए कि रास्ते पर आने-जाने वाले इन लोगों ने इस हंगामा खड़ा करने वाले की औकात इतनी बढ़ा दी है। लेकिन रास्ते पर गुजरने वाले लोगों ने सिर्फ अपने स्वभाव के अनुकूूल काम किया है। उसके काम के पीछे कोई योजना नहीं है।

यही बात हमारे आज के मीडिया पर लागू होती है। कहीं भी कोई हंगामा खड़ा हो जाए तो वहां मीडिया पहुंचकर उस घटना के महत्व को बढ़ाने में अनजाने में लग जाता है। इसके पीछे कोई योजना नहीं होती। वह एक भीड़ की मानसिकता से काम करता है। भीड़ किसी भी घटना की तह में जाने की कोशिश नहीं करती। यदि मारो-मारो कहकर किसी व्यक्ति को दो-चार लोग पीटने लग जाएं तो बाकी भीड़ भी उसे पीटने पर उतारू हो जाती है। वह उन शुरू में पीटने वाले लोगों की बात पर विश्वास कर लेती है कि पिटने वाला व्यक्ति चोर है।

मीडिया की इस मानसिकता का लाभ कई शातिर दिमाग वालों ने उठाया है। अपने प्रतिद्वंद्वी को फंसाने के लिए उसके विरुद्ध किसी तरह का आपराधिक मामला दायर कीजिए और इसके बाद मीडिया के अपने मित्रों को बुला लीजिए। अपने प्रतिद्वंद्वी को आप बदनाम तो कर ही देंगे साथ ही भविष्य में उसे तंग न करने की एवज में मोटी राशि भी ऐंठ सकते हैं। अधिकांश संवाददाता आज भी यह सोचते हैं कि थाने में रपट का होना ही किसी के विरुद्ध कुछ भी लिखने की पूरी आजादी दे देता है। इसका एक दूसरा रूप भी है। मान लीजिए किसी अस्पताल में किसी की अस्वाभाविक मौत हो गई। आप उस अस्पताल पर इलाज में लापरवाही बरतने का आरोप लगाते हुए वहां जाकर हंगामा कीजिए, साथ ही मीडिया के अपने मित्रों को बुला लीजिए, कैमरों के सामने कुछ तोड़-फोड़ कीजिए। मीडिया वालों के जाने के बाद आप अस्पताल के मालिकों के साथ मोटी रकम का लेन-देन कर सकते हैं। हमारे राज्य में यह एक अचूक नुस्खा है और मीडिया के सहयोग से भयादोहन एक कुटीर उद्योग का रूप लेता जा रहा है।

रोज एक "मसीहा' बनाने का आरोप लगाने वाले मित्र के सामने हमने अरविंद केजड़ीवाल का उदाहरण रखा। कल तक उसे मीडिया की उपज कहा जा रहा था। लेकिन अब जब वे दो सप्ताह तक अनशन पर बैठे रहे तो वही मीडिया कहां गायब हो गया। क्या मीडिया ने आपस में कोई मंत्रणा कर ली कि अब इस "मसीहा' को आगे नहीं दिखाना है। दरअसल इसका कारण है मीडिया की भीड़ मनोवृत्ति। कल तक केजड़ीवाल के तमाशे में रस मिल रहा था। इसे मीडिया वाले न्यूज वैल्यू कहते हैं। आज वह रस खत्म हो गया तो मीडिया भी मोदी बनाम राहुल के बेमतलब विमर्श में व्यस्त हो गया। दो सप्ताह तक अन्न-जल छोड़ने वाले केजड़ीवाल की ओर उसने झांका तक नहीं।

असम में इतने अखबार निकलते हैं लेकिन किसी भी राजनीतिक या सामाजिक प्रश्न पर किन्हीं दो अखबारों की राय में रत्ती भर भी फर्क नहीं मिलता। मीडिया राह चलतों की भीड़ की तरह उसकी ही ओर आकर्षित हो जाता है जिसके फेफड़े ज्यादा मजबूत होते हैं। जो अधिक ऊंची आवाज में चिल्ला सकते हैं। चीख-पुकार बंद होते ही वह भीड़ के लोगों की तरह अपने दूसरे काम पर निकल पड़ता है।

जहां तक असम के मीडिया की बात है, उसने तो सौ प्रतिशत अपने आपको राजनीतिक रूप से सही-सही कहने की सुरक्षित सीमाओं के बीच कैद कर रखा है। अखबारों पर कोई प्रत्यक्ष दबाव नहीं है लेकिन मीडिया का कुल वातावरण इतनी बौद्धिक धार वाला नहीं है कि वह किसी भी मुद्दे की विभिन्न कोणों से चीरफाड़ कर सके। उसकी इतनी औकात कहां कि वह मसीहा बना सके। वह खुद ही लोगों की नजरों से तेजी से गिर रहा है।
7JDJ5PTVPJYM

रविवार, 10 मार्च 2013

क्या है पूर्वोत्तर के 'शोषण' की असली कहानी




 पूर्वोत्तर राज्यों के बारे में यह एक आम धारणा है कि ये राज्य पिछड़े हुए हैं और यदि केंद्र सरकार अधिक आर्थिक सहायता दे तो ये भी अन्य भारतीय राज्यों के समकक्ष पहुंच सकते हैं। पूर्वोत्तर राज्यों के आर्थिक विकास के लक्ष्य को ध्यान में रखकर पिछली केंद्रीय सरकार के समय बनाए गए विजन डाक्यूमेंट 2020 में कहा गया है कि स्वाधीनता के समय ये राज्य काफी समृद्ध थे और बाद में धीरे-धीरे विकास की दौड़ में पिछड़ते गए। 

पूर्वोत्तर के राज्यों की आज जो स्थिति है उसे देखते हुए इन्हें पिछड़ा कहना उचित है और नहीं भी। ये दोनों ही बातें इसलिए सही हैं कि पूर्वोत्तर राज्यों की औसत प्रति व्यक्ति आय 5070 रुपए राष्ट्रीय औसत प्रति व्यक्ति आय 4485 रुपए से अधिक है कम नहीं। इन राज्यों में गरीबी रेखा से नीचे की आबादी का प्रतिशत (33 फीसदी) राष्ट्रीय प्रतिशत 39 से कम ही है। इसके अलावा विकास को मापने के कई पैमानों पर जैसे साक्षरता या प्रति व्यक्ति बिजली की उपलब्धता जैसे पैमानों पर भी पूर्वोत्तर के राज्य बिहार, झारखंड जैसे राज्यों से आगे हैं पीछे नहीं। 
लेकिन साथ ही इसमें यह भी जोड़ना जरूरी है कि सड़कों की स्थिति, औद्योगिक विकास के लिए जरूरी बुनियादी ढांचे आदि को देखा जाए तो पूर्वोत्तर के राज्य अन्य भारतीय राज्यों की अपेक्षा काफी पीछे हैं। इसके लिए इस इलाके का भूगोल भी जिम्मेवार है। असम और त्रिपुरा का ज्यादातर हिस्सा समतल है, जबकि बाकी पांचों राज्यों (मणिपुर की इंफाल घाटी को छोड़कर) में सिर्फ पहाड़ी इलाका है जहां परंपरागत रूप से आवागमन के कोई साधन नहीं थे। बुनियादी ढांचे के अभाव के कारण यहां निजी पूंजी आकर्षित नहीं हुई और यह इलाका मूलतः कृषि आधारित अर्थव्यवस्था वाला इलाका बनकर रह गया। जाहिर है कृषि में रोजगार उपलब्ध कराने की क्षमता की एक सीमा है। 
पूर्वोत्तर राज्यों के राजनीतिक विमर्श में केंद्र सरकार को गाली देने और भेदभाव का आरोप लगाने का फैशन कभी पुराना नहीं पड़ा। पूर्वोत्तर के राजनेता अपनी जनता के लिए भले कुछ खास नहीं कर पाए हों लेकिन केंद्र पर यह आरोप लगाने में वे कभी पीछे नहीं रहे कि वह इन राज्यों को विकास के लिए समुचित राशि उपलब्ध नहीं कराता। ये आरोप अक्सर वस्तुस्थिति के विपरीत हैं। पांच दशकों से पूर्वोत्तर राज्यों को मिलने वाली प्रति व्यक्ति केंद्रीय सहायता राशि बिहार जैसे गरीब और पिछड़े राज्यों की अपेक्षा काफी अधिक रही है। राष्ट्रीय विकास परिषद ने अपने कुल योजना व्यय की 30 फीसदी राशि इन राज्यों के योजना व्यय में केंद्रीय सहायता के रूप में देने का फैसला कर रखा है। यह राशि अन्य राज्यों को 30 प्रतिशत सहायता और 70 प्रतिशत ऋण के रूप में दी जाती है। जबकि ‘विशेष राज्य’ का दर्जा होने के कारण पूर्वोत्तर राज्यों को 90 प्रतिशत सहायता और 10 प्रतिशत ऋण के रूप में दी जाती है। नब्बे के दशक के आंकड़ों पर नजर डालें तो इस दौरान 60,000 करोड़ रुपए पूर्वोत्तर में ग्रोस फंड ट्रांसफर के रूप में आए जोकि इन राज्यों का आकार और आबादी देखते हुए एक बड़ी राशि है। सवाल है कि इतनी बड़ी राशि आखिर जाती कहां है? पूर्वोत्तर राज्यों के मुख्यमंत्री राज्य की योजना की राशि बढ़वाने के लिए नई दिल्ली का चक्कर लगाने में जरा भी आलस्य नहीं करते, लेकिन दूसरी ओर वे यह सुनिश्चित नहीं करते कि इस राशि का उपयोग अपने-अपने राज्य में सड़क यातायात, बिजली संयंत्र आदि बुनियादी सुविधाओं के निर्माण में हो। नगालैंड और मणिपुर में तो इस राशि का एक बड़ा हिस्सा उग्रवादियों के खजाने में भी चला जाता है। असम के पहाड़ी जिले कार्बी आंग्लोंग और डिमा हासाउ का भी यही हाल है, जहां स्वायत्तशासन की व्यवस्था है। लेकिन यह अलग किस्सा है और कोशिश करने पर इसमें स्थिति सुधर सकती है।

जो बात ज्यादा चिंताजनक है और जहां सुधार के आसार बिल्कुल नजर नहीं आते वह है सभी पहाड़ी राज्यों में सरकारी तंत्र पर अनाप-शनाप खर्च होना। असम को छोड़कर पूर्वोत्तर के अन्य सभी राज्यों की आबादी 8 लाख से तकरीबन 25-30 लाख के बीच है। लेकिन इतनी कम आबादी पर शासन (या कल्याण योजनाएं?) चलाने के लिए इतने अधिक सरकारी कर्मचारी रखे गए हैं कि अन्य राज्य कल्पना भी नहीं कर सकते। यदि एक औसत परिवार पांच लोगों का माना जाए तो हम कह सकते हैं कि नगालैंड में हर तीन परिवारों पर एक सरकारी कर्मचारी नियुक्त है। असम को छोड़कर सभी पूर्वोत्तर राज्यों का यही हाल है। नगालैंड में 17 लोगों पर 1 सरकारी कर्मचारी है, मिजोरम में 20 पर, त्रिपुरा में 29 पर, मणिपुर में 31 पर और अरुणाचल प्रदेश में 37 पर एक सरकारी कर्मचारी है। जबकि करीब तीन करोड़ की आबादी वाले असम में 105 लोगों में से कोई एक ही इतना भाग्यवान है जिसे सरकारी नौकरी मिल पाई है।

असम के दो पहाड़ी जिलों का भी यही हाल है जहां स्वायत्तशासन की व्यवस्था है। यही कारण है कि इन पहाड़ी राज्यों में कोई उद्योग धंधा, व्यवसाय-वाणिज्य नहीं होने के बावजूद जबर्दस्त समृद्धि आई है। क्षेत्र के सबसे बड़े शहर गुवाहाटी के महंगे माल, होटलों, अस्पतालों और स्कूलों में इस धनाढ्य सरकारी अमले की अनुपात से अधिक उपस्थिति सहज ही नजर आ सकती है। यह भारी-भरकम सरकारी अमला संख्या में जितना आगे है, कार्यकुशलता में उतना ही पीछे है। अनावश्यक रूप से सरकार का आकार बढ़ाते जाने का नतीजा यह हुआ है कि नौकरशाही बिल्कुल निकम्मी हो गई है और विकास योजनाओं का पैसा काम में नहीं लग पा रहा है। 

पूर्वोत्तर के पहाड़ी राज्यों के राजनेताओं ने इसे एक सिद्धांत के तौर पर अपना लिया है कि सारी आबादी को रोजगार देने का दायित्व सरकार का है और इसका एकमात्र तरीका सरकारी नौकरियां देना है। बुनियादी ढांचे का विकास कर निजी पूंजी के निवेश का वातावरण बनाना ताकि यहां की अर्थव्यवस्था आगे बढ़े और नए उत्पादक रोजगार उत्पन्न हों – इसे एक फिजूल का विचार मानकर अस्वीकार कर दिया जाता है। आंकड़े दिखाते हैं कि राष्ट्रीय औसत से अधिक केंद्रीय राशि पाने वाले पूर्वोत्तर के राज्यों की वृद्धि दर औसत से कितनी पीछे है। पिछले पांच दशकों में असम का प्रति व्यक्ति शुद्ध राज्य घरेलू उत्पाद (एनएसडीपी) 6288 रुपए था, जबकि राष्ट्रीय औसत 9725 रुपए था। मणिपुर, मेघालय और त्रिपुरा का भी यही हाल था। सिर्फ नगालैंड, अरुणाचल प्रदेश और मिजोरम के आंकड़े राष्ट्रीय औसत को छूते हुए कुछ आगे निकले हुए हैं। 

पूर्वोत्तर के पहाड़ी राज्यों की अर्थव्य़वस्था सरकारी बजट के इर्द-गिर्द घूमती है। किसी परियोजना के समय पर क्रियान्वयन के द्वारा क्षेत्र के स्थायी विकास को सुनिश्चित करने की बजाय यहां ऐसी परियोजना को एक दुधारू गाय समझा जाता है और उसके चार थनों को ठेकेदार, नौकरशाही, राजनेता और उग्रवादी आपस में बांट लेते हैं।

‘विजन 2020’ में कहा गया है कि पूर्वोत्तर राज्यों में विकास के लाभ को निम्नतम स्तर तक पहुंचाने के लिए ‘कोई एक हरित क्रांति’ की जरूरत होगी। हजारों गहरे नलकूप बैठाकर धान की खेती का नवीकरण, छोटे चाय के खेत, रबर की खेती जैसे अभिनव कदमों से उपजाऊ जमीन वाले असम प्रदेश में जहां इस तरह की हरित क्रांति के लाने के कुछ प्रयत्न हुए हैं, वहीं पूर्वोत्तर के पहाड़ी प्रदेश अब तक इस तरह के कृषि आधारित विकास से कोसों दूर हैं।