शादियों में फिजूलखर्ची, दिखावा और आडंबर एक ऐसा विषय है जो उस समय से ही मेरे अंतर्मन को कचोटता रहा है जब से मैंने सामाजिक जीवन में थोड़ी-बहुत रुचि लेनी शुरू की। उस जमाने में हम मारवाड़ी युवा मंच के बैनर तले सक्रिय हुआ करते थे। उन दिनों खुद इन पंक्तियों के लेखक ने, मुरलीधर तोसनीवाल, प्रमोद जैन आदि साथियों ने अपनी-अपनी शादियों में किसी न किसी हद तक कुछ परंपराओं को तोड़ा। तब ऐसा लगने लगा था कि ये उदाहरण एक आंदोलन की चिनगारी बनेंगे और आगे आने वाला आंदोलन समाज में शादी-ब्याह के मौकों को कर्ज लेकर घी पीने के मौके बनने से रोकेगा।
उन दिनों हमारे संकीर्ण मस्तिष्कों को यह लगता था कि सिर्फ मारवाड़ी समाज में ही शादियों के मौकों पर इतना आडंबर, तामझाम और भदेसपन की सीमाएं छूने वाली फिजूलखर्ची होती है। इसका कारण शायद यह होगा कि असमिया समाज में उन दिनों और आज भी तुलनात्मक रूप से शादियां सादगीपूर्ण होती हैं। हमें पता नहीं था कि असम के बाहर सारा भारत आज इस सामाजिक व्याधि के नीचे दबा हुआ कराह रहा है।
आप अध्ययन करके देखें तो पाएंगे कि भारत के हर समाज में अपनी क्षमता से अधिक पैसे शादी पर खर्च करने की प्रवृत्ति काम करती है। इसके कई कारण होते हैं। अपने दैनंदिन जीवन में सीमित संसाधनों से अपना काम चलाने वाले व्यक्ति के लिए शादी सिर्फ एक सामाजिक समारोह न होकर यह दिखाने का अवसर होता है कि उसने पिछले 25 सालों में क्या किया? आर्थिक सीढ़ियों पर कितनी पायदानें इस बीच वह चढ़ चुका है यह दिखाने के लिए शादी के अलावा यदि उसके पास कोई दूसरा मौका होता है तो वह होता है आलीशान घर बनवाने का।
समाज के क्रियाकलाप पर जब सोचते हैं तो कई अजीब चीजें देखने को मिलती हैं। एक मित्र ने ठीक ही प्रश्न किया कि मोबाइल तो बात करने के लिए होता है। फिर लोग इतने महंगे मोबाइल क्यों खरीदते हैं। इसी तरह प्रश्न किया जा सकता है कि शादी तो दो युवाओं के आपसी बंधन को सामाजिक मान्यता देने के लिए होती है, फिर इसमें बेतहाशा खर्च क्यों? यह प्रश्न किसी भी चीज के बारे में पूछा जा सकता है। साधारण शर्ट पहनने से काम चल सकता है तो इतनी कीमती शर्ट क्यों पहनते हैं। इन सवालों का जवाब यह है कि समाज में कोई चीज वही नहीं रह जाती जिससे उसकी शुरुआत हुई थी। विकसित समाज जटिल भी होता है। एक विकसित समाज में मोबाइल सिर्फ बात करने के लिए नहीं होता, यह आपकी हैसियत प्रदर्शित करने का एक माध्यम भी है। एक शर्ट सिर्फ तन ही नहीं ढकती, यह सामाजिक पायदान पर आपका स्थान भी निर्णय करती है। इसी तरह शादी सिर्फ शादी नहीं है, यह समाज में आपका स्थान निर्णय करती है, उसका पुनर्निर्धारण करती है।
हमारे स्कूल के दिनों में वार्षिक परीक्षा हो जाने के बाद नई कक्षा में हमारे बैठने के क्रम का फिर से निर्धारण होता था। उसी तरह शायद एक मध्यवर्गीय या उच्च-मध्यवर्गीय व्यक्ति चाहता है कि शादी में उसके द्वारा किए गए खर्च, उसके समारोह में आए अतिथियों के प्रोफाइल को देखकर समाज उस स्थान पर पुनर्विचार करे, जो शायद उसे 25 साल पहले दिया गया था। क्या समाज शादी में पकवानों की प्रदर्शनी लगाने और अतिथियों की भव्य भीड़ प्रस्तुत करने के माध्यम से उसके द्वारा की गई अपील पर विचार करता है?
इसका उत्तर शायद हां और शायद ना दोनों हैं। महंगे मोबाइल, महंगी कार, महंगे फ्लैट और महंगी शादी को देखकर समाज का एक हिस्सा जल्दी ही प्रभाव में आ जाता है। ऐसे लोग यह फैसला सुनाने की हड़बड़ी में रहते हैं कि श्रीमान क अब पहले वाले श्रीमान क नहीं रहे। उनकी सामाजिक रेटिंग में सुधार होना चाहिए। लेकिन गनीमत है कि समाज के ज्यादातर हिस्से में धन के इस तरह के भद्दे प्रदर्शन के खिलाफ गुस्सा उपजता है। जो लोग आडंबरपूर्ण शादियों में शरीक होते हैं, वे अपने व्यक्तिगत संबंधों के कारण शरीक होते हैं। कई बार जो मेजबान होता है वह उनके शरीक होने को आडंबर और अपव्यय के पक्ष में मतदान समझने की भूल कर बैठता है।
समाज का ज्यादातर हिस्सा चाहता है कि शादियों का खर्च उनकी हैसियत के अंदर रहे। वे शादियों के खर्च को प्रतियोगिता से अलग रखना चाहते हैं। इसका प्रमाण यह है कि हर उस समाज में जहां आज भी परंपराएं मजबूत हैं शादियों के खर्च को सीमाओं में बांधने की जद्दोजहद जारी है। हाल ही में हमने पढ़ा कि किसी उत्तरी भारत के राज्य में गुर्जरों की पंचायत ने शादियों के समारोह पर कुछ प्रतिबंध लगाए हैं। समस्या यह है कि हर समाज में पंचायतें मजबूत नहीं हैं। शहरी समाज में तो वे हैं ही नहीं। ऐसे में सामाजिक संगठनों की भूमिका महत्वपूर्ण हो जाती है। उदाहरण के लिए राजस्थान से निकल कर भारत के विभिन्न हिस्सों में बसे लोगों के कई मजबूत सामाजिक संगठन हैं। ये संगठन पंचायत नहीं हैं, लेकिन चाहें तो पंचायतों जैसा महत्व हासिल कर सकते हैं। ऐसे संगठन अपने समाज में शादी विवाह पर होने वाले खर्च की सीमाएं बांध सकते हैं। हालांकि यह कहना जितना आसान है करना उतना ही मुश्किल है।
यह लेख लिखने की प्रक्रिया के दौरान ही कुछ मित्रों से इस विषय पर बहस हुई। एक मित्र का कहना था कि आप उपभोक्तावाद का विरोध कर रहे हैं, और यह विरोध आज के युग में ज्यादा आगे तक चलने वाला नहीं है। आज लोग एक करोड़ की कार लेकर अपनी हैसियत में आए परिवर्तन के बारे में लोगों को सूचना देना चाहते हैं। उन्हें आप किस तरह रोकेंगे। इस पर हमारा कहना यह है कि जब हम शादियों में आडंबर और धन के भद्दे प्रदर्शन पर रोक लगाने की वकालत करते हैं तो हमारा उद्देश्य वहीं तक सीमित होता है। इसे बाकी उपभोक्तावाद के साथ गड्डमड्ड नहीं करना चाहते। क्योंकि शादी एक सामाजिक समारोह है, जो हर परिवार को एक न एक दिन आयोजित करना है। जब कोई धनाढ्य व्यक्ति शादी में होने वाले खर्च की सीमा को ऊंचा उठा देता है तो उसके वर्ग के समकक्ष व्यक्तियों पर एक तरह का दबाव पैदा हो जाता है कि उन्हें भी अपनी सामाजिक स्थिति को बचाए रखने के लिए इसी तरह का खर्च करना होगा। इस तरह शादियों में खर्च अपव्यय और भौंडे दिखावे की सीमाएं छूने लग जाता है। लेकिन जहां तक महंगी कार, या महलनुमा घर की बात है- इस तरह का उपभोक्तावाद भले ईर्ष्या और आतंक पैदा करे लेकिन इससे समाज का आम व्यक्ति यह दबाव महसूस नहीं करता कि उसे भी इस तरह का खर्च करना होगा। एक सामाजिक एक्टिविस्ट ने ठीक ही कहा िक "जनम-वरण और मरण' के अवसर पर होने वाले अनुष्ठान सामाजिक निगरानी के तहत होने चाहिए। ये अवसर व्यक्तिगत होते हुए भी नितांत व्यक्तिगत नहीं हैं। इन तीनों अवसरों के लिए बनाए गए विधान सामाजिक पंचायतें और संगठन लागू भी कर सकते हैं, क्योंकि कोई कितना ही धनी क्यों न हो वह इस बात को स्वीकार करता है कि इन अवसरों के बारे में समाज को बोलने का अधिकार है।
हाल ही में अहमदाबाद के बहुत ही सम्मानित तथा धनाढ्य व्यक्ति गिरीश दानी ने एक उदाहरण पेश किया। वे अपने बेटे और होने वाली बहू (अहमदाबाद के विख्यात डाक्टर की बेटी) को लेकर अपने गुरु आसाराम बापू के आश्रम में गए। वहां मंदिर में साधारण रूप से शादी संपन्न करने के बाद उन्होंने आसाराम बापू को एक करोड़ का चेक भेंट किया तथा कहा कि इस राशि से वे एक सौ जरूरतमंद जोड़ों की शादी करवा दें। मध्यवर्ग में शादियों में होने वाले अपव्यय को रोकने के लिए उच्च-मध्यवर्ग द्वारा पेश किए जाने वाले ऐसे उदाहरणों की एक बहुत बड़ी भूमिका हो सकती है।

हालांकि कम्युनिस्ट व्यवस्थाएं ध्वस्त हो चुकी हैं, लेकिन जब ये व्यवस्थाएं थीं तब वहां पैसे कमाने को गुनाह माना जाता था। चीन में कहने को कम्युनिस्ट शासन है, लेकिन वहां पूंजीवादी शैली की व्यवस्था की इजाजत दे दी गई। तंग (देंग) श्याओ पिंग की वह उक्ति काफी प्रसिद्ध हो चुकी हैकि बिल्ली चाहे भूरी हो या सफेद हमें मतलब इस बात से है कि वह चूहे पकड़ती है। यानी पूंजी का सृजन, धन पैदा करना किसी भी व्यवस्था का उद्देश्य होना चाहिए, चाहे वह धन कम्युनिस्ट प्रणाली से पैदा हुआ हो या पूंजीवादी प्रणाली से।
भारत में कम्युनिज्म और मार्क्सवाद का काफी प्रभाव रहा। यहां तक कि जो पार्टियां अपने-आपको कम्युनिस्ट या मार्क्सवादी नहीं कहती थीं उन पर भी इन विचारों का जाने-अनजाने में गहरा प्रभाव रहा। कांग्रेस या भारतीय जनता पार्टी- जैसी पार्टियां भी साफ शब्दों में आज भी यह कहने का साहस नहीं जुटा पातीं कि हम पूंजीवाद का समर्थन करती हैं। पिछड़ों और मुसलमानों को आधार बनाकर राजनीति करने वाले मुलायम सिंह यादव भी अपनी पार्टी को समाजवादी पार्टी ही कहलवाना पसंद करते हैं।
इस वैचारिक वातावरण का प्रभाव हमें रोजाना की दिनचर्या में देखने को मिलता है। जब किसी सार्वजनिक मंच पर किसी पैसे वाले का सम्मान करना होता है, तो उसे समाजसेवी कहकर संबोधित किया जाता है। उसे व्यवसायी, पूंजीपति, उद्यमी या उद्योगपति कहते समय जबान खुद-ब-खुद लड़खड़ा जाती है। ऐसा दूसरे पेशों को अपनाने वालों के साथ नहीं होता। पत्रकार को पत्रकार, शिक्षक को शिक्षक (इन्हें शिक्षाविद् कहने का चलन हो गया है), डाक्टर को डाक्टर और अफसर को प्रशासनिक अधिकारी कहते समय जबान नहीं लड़खड़ाती, लेकिन व्यवसायी को व्यवसायी कहते समय जबान रुक जाती है। वह कोई और शब्द खोजने लगती है।
ऐसा उस मानसिक प्रदूषण के कारण होता है, जो सदियों से हमारे दिमाग में भरता गया है। भारत में साहित्य में, नाटकों में, गीतों में कहीं भी पैसे कमाने को एक महत्त्वपूर्ण काम नहीं बताया गया है। बल्कि इसकी जगह गरीबी को या संतोष को महिमा मंडित करते हुए हम जरूर देखते हैं। यह एक दिलचस्प बात है कि जिन जातियों, पेशों को बाकी समाज तिरस्कार की नजर से देखता है, वे जातियां या वे पेशे वाले स्वयं भी अपनी जाति या पेशे को नीची नजरों से देखने लग जाते हैं। जो लोग दलित आंदोलन या ओबीसी आंदोलन से जुड़े हैं या उस राजनीति से जुड़े हैं उनकी बात छोड़ दें तो आप किसी भी धोबी, नाई या सफाई कर्मचारी को गर्व के साथ अपने पेशे की घोषणा करते हुए नहीं देखेंगे। हो सकता है एक धोबी एक साधारण किरानी से ज्यादा कमा लेता होगा; लेकिन किसी ट्रेन यात्रा में कोई धोबी अपना परिचय धोबी के रूप में नहीं देगा।
यही बात कमोबेश व्यवसायियों पर लागू होती है। जो टाटा समूह देश की शान है, जिस समूह के साथ भारत की पहचान जुड़ गई है- उस समूह के नाम को कल तक राजनीतिक पार्टियां शोषण के प्रतीक के रूप में इस्तेमाल करती थीं। हाल के वर्षों में भले थोड़ा परिवर्तन आया हो, लेकिन अस्सी के दशक तक "शोषक' और "टाटा बिड़ला' को पर्यायवाची के रूप में इस्तेमाल करना एक आम बात थी।
भारत में कुछ सरकारी विभाग ऐसे हैं, जहां कोई बिरला ही सौ प्रतिशत ईमानदार मिलता है। जैसे कर विभाग। लेकिन किसी कर आयुक्त को अपना परिचय कर आयुक्त के रूप में देते समय यह कैफियत नहीं देनी पड़ती कि मैंने भ्रष्ट तरीके से पैसे नहीं कमाए। यही बात अन्य पेशों पर लागू होती है। जब कोई कहता है कि अमुक जी पत्रकार हैं या लेखक हैं या गीतकार हैं- तब यह मानकर चला जाता है कि पत्रकार, लेखक या गीतकार महोदय की रचनाएं मौलिक ही होंगी। जब तक कोई आरोप न लगे तब तक उनकी मौलिकता पर कोई सवाल नहीं उठा सकता। यदि कोई उठाता है, तो उसे ईर्ष्यालु या बदतमीज माना जाएगा। लेकिन व्यवसायी के मामले में यह सवाल बिना किसी संकोच के उठा दिया जाता है। जब एक चर्चा के दौरान एक वक्ता ने पूछा कि "पैसा कमाना गुनाह तो नहीं' तो किसी ने कहा कि "गुनाह नहीं है यदि पैसे ईमानदारी तरीकों से कमाए गए हों।' क्या यह "यदि' किसी अन्य पेशे के साथ जोड़ा जाता किसी ने देखा है। इस सामाजिक बेहयाई की सिर्फ व्यापारी के मामले में इजाजत है।
असम की विशेष परिस्थितियों में जहां हरेक समुदाय के पास अपने पड़ोसी समुदाय के विरुद्ध शिकायतों की सूची होती है मारवाड़ी को यहां पूंजीपति या व्यवसायी के पर्याय के रूप में देखा गया। यह सही भी है कि आज असम में मारवाड़ी समुदाय के अधिकांश लोग व्यवसाय की गतिविधियों में लगे हुए हैं। असम के मारवाड़ी साधारणतया विनयी और झगड़े-झंझट से दूर रहने वाले लोग हैं। ये लोग स्थानीय राजनीति, साहित्य, संस्कृति से भी दूर रहते हैं। अपनी लगन, मेहनत, अध्यवसाय और व्यवसाय जगत में छाए पहले के शून्य स्थान के कारण इन लोगों ने पूंजी का सृजन किया है, अखिल भारतीय स्तर पर भले एक-दो ग्रुप ही उभर का आए हों, लेकिन प्रांत के स्तर पर व्यवसाय-उद्योग में मुख्यत: मारवाड़ियों का ही बोलबाला है।
पूंजी विरोधी मानसिक प्रदूषण ने क्षेत्रीयतावाद के साथ मिलकर जो विचारधारा रची है, उसमें मारवाड़ी सिर्फ एक विलेन के रूप में ही फिट होता है। विडंबना यह है कि इस वातावरण ने स्वयं मारवाड़ियों के दिमाग को भी दूषित कर दिया है। इसका प्रमाण यह है कि जब आरोप लगाने वाली अंगुलियां मारवाड़ियों की ओर उठती हैं तो उनके बुद्धिजीवी अपना बचाव करते समय आरोप लगाने वालों की विचारधारा का ही सराहा लेते हैं। मसलन, जब कहा जाता है कि "छि: आपलोग व्यवसायी हैं अर्थात शोषक हैं'' (स्रोत : मार्क्सवाद) तो उत्तर दिया जाता है कि "माफ कीजिए सभी लोग व्यवसायी नहीं हैं। हमारे बहुत से लोग अन्य पेशों में भी लगे हुए हैं (जिन्हें आपलोग भी सम्मानजनक मानते हैं), यहां तक कि बहुत से लोग तो कविता तक लिखते हैं (आपकी नजर में अत्यंत सम्मानजनक कर्म)''। जब यह आरोप लगाया जाता है कि ""आपलोग सिर्फ अपने आप से और पैसे से मतलब रखने वाले लोग हैं, स्थानीय भाषा, संस्कृति से आपका कोई लगाव नहीं है'' (स्रोत : अंध क्षेत्रीयतावाद) तब उत्तर में एक सूची पेश की जाती है कि हमारे ये-ये लोग असमिया भाषा में सृजन कार्य कर रहे हैं। यह सूची बहुत ही छोटी होती है और एक तरह से आरोप लगाने वालों की बात को ही सिद्ध करती है। इस सूची में घालमेल में भी इस अर्थ में होता है कि महान असमिया साहित्यकार ज्योति प्रसाद अगरवाला के परिवार को भी मारवाड़ी मानकर इसमें शामिल कर लिया जाता है। कई बार इस पर प्रतिक्रिया नहीं होती और कई बार इसी परिवार के सदस्य अपने आपको मारवाड़ी कहे जाने पर एतराज जताते हैं।

कुल मिलाकर प्रश्न, जैसा कि एक चर्चा के दौरान पूछा गया, यहीं सिमटकर आ जाता है कि मारवाड़ी को सम्मान क्यों नहीं मिलता। इसका एक ही उत्तर है कि सम्मान पाना न पाना असम में मारवाड़ी के कर्मों पर उतना निर्भर नहीं है जितना सामने वाले की दृष्टि पर। देखने वाला एक भ्रष्ट अधिकारी को सम्मान की दृष्टि से देखता है, लेकिन एक खुदरा दुकानदार को सम्मान नहीं देता तो यह पूरी तरह उसकी दृष्टि पर निर्भर है। वह कहता है कि हमें कविता पसंद है और आप सम्मान पाने के लिए कविता लिखने लग जाएं तो यह हास्यास्पद होगा। कोई धोबी को सम्मानजनक दृष्टि से नहीं देखता तो इलाज उसकी दृष्टि का होना चाहिए, न कि धोबी को अपना काम छोड़कर दूसरे काम में लग जाना चाहिए।
मारवाड़ियों के असम आने की जो भी ऐतिहासिक परिस्थितयां रही हों, लेकिन भारत के एक अग्रणी उद्यमी समुदाय के इस क्षेत्र में आने से एक शून्य की पूर्ति हुई है और इसे देखते हुए इनकी भूमिका का यहां स्वागत होना चाहिए था। लेकिन विडंबना यह है कि मारवाड़ियों को यहां सिर्फ सहन किया जाता है।

पिछले दिनों पूर्वोत्तर के सातों राज्यों के कुछ छात्र संगठनों के फेडरेशन नार्थ ईस्ट स्टूडेंट्स आर्गेनाइजेशन (नेसो) ने अपनी इस मांग को लेकर आंदोलन शुरू किया है कि पूर्वोत्तर क्षेत्र के सभी राज्यों को संविधान के अंतर्गत विशेष दर्जा दिया जाना चाहिए। नेसो के गुवाहाटी में हुए प्रदर्शन के समय कही गई बातों से यही समझ में आया कि यह संगठन विशेष दर्जे के माध्यम से पूर्वोत्तर के राज्यों में भूमि और प्राकृतिक संसाधनों पर यहां के स्थानीय निवासियों का अधिकार सुनिश्चित करना चाहता है।
विशेष राज्य का दर्जा संविधान में अनहोनी बात नहीं है। हमारे संविधान में इस समय जम्मू-कश्मीर को विशेष राज्य का दर्जा प्राप्त है। इस विशेष अधिकार के तहत अन्य विशेषाधिकारों के अलावा यह व्यवस्था भी है कि जम्मू-कश्मीर में भूमि का हस्तांतरण राज्य के बाहर के व्यक्ति को करना संभव नहीं है। इसी तरह नगलैंड को भी कई विशेष अधिकार प्राप्त हैं, जिनके तहत वहां के प्राकृतिक संसाधनों पर केंद्र सरकार का नहीं बल्कि राज्य सरकार का अधिकार है। साथ ही अन्य बहुत से प्रावधान हैं-जिनमें यह उल्लेखनीय है कि नगा समुदाय के पारंपरिक कानून-कायदों में केंद्र के किसी कानून के माध्यम से हस्तक्षेप करने की इजाजत नहीं है। पूर्वोत्तर राज्यों के लिए छठी अनुसूची की भी विशेष व्यवस्था है (इसे पूर्वोत्तर के बाहर सिर्फ दार्जिलिंग में लागू किया गया है), जिसके तहत किसी क्षेत्र विशेष का प्रशासन एक निर्वाचित परिषद को सौंप दिया जाता हैऔर यह निर्वाचित परिषद अपने अधिकार प्राप्त विषयों में स्वायत्त होती है। छठी अनुसूची के अंतर्गत इस समय असम में बोड़ो क्षेत्रीय स्वायत्त जिले, कार्बी आंग्लोंग स्वायत्त जिला और डिमा हासाउ जिले में इस तरह के स्वायत्त शासन की व्यवस्था है। मूलत: यह व्यवस्था किसी जनजातीय बहुल क्षेत्र को स्वायत्तशासन की सुविधा उपलब्ध कराने के लिए शुरू की गई है।
पूरे असम को विशेष दर्जा दिए जाने की मांग हाल ही में अल्फा के वार्तापंथी गुट ने भी केंद्र सरकार को सौंपे अपने मांगपत्र में उठाई है। इस मांगपत्र में असम को जम्मू-कश्मीर की तरह विशेष राज्य का दर्जा दिए जाने की मांग की गई है। लगता है असम में "विशेष दर्जा' शब्दों के प्रति विशेष आकर्षण है, जिसके कारण हम समय-समय पर इस तरह की मांग को उठते हुए देखते हैं। लेकिन हाल में इस आकर्षण में वृद्धि का प्रमुख कारण यह भी है कि असम में स्थानीय (गैर जनजातीय) लोगों के हाथ से जमीनें निकलकर बाहर के राज्यों से आए लोगों के हाथों में चली जा रही हैं-ऐसा एक डर व्यापक रूप से फैल गया है। विशेष दर्जे की मांग उठाने वाले जानते हैं कि यदि यह मांग मान ली गई तो असम में कोई भी स्थानीय व्यक्ति गैर-स्थानीय व्यक्ति को अपनी जमीन हस्तांतरित नहीं कर पाएगा। अभी सिर्फ जनजातीय लोगों के लिए यह प्रावधान है कि वे गैर जनजातीय लोगों को भूमि हस्तांतरित नहीं कर सकते।
अल्फा और नेसो द्वारा विशेष दर्जे की मांग उठाने से पहले ही अखिल असम छात्र संघ (आसू) ने अपने 1985 के समझौते में केंद्र सरकार से यह वादा प्राप्त कर लिया था कि "असमिया' समुदाय की अलग पहचान, संस्कृति (आदि) की सुरक्षा के लिए संविधान में विशेष प्रावधान किए जाएंगे। ये प्रावधान क्या होंगे इस पर 1985 का असम समझौता मौन है, यानी इस पर आगे बातचीत की गुंजाइश है। इन प्रावधानों में भूमि को स्थानीय लोगों के हाथ निकलने से बचाना, असमिया समुदाय के लिए निर्वाचित विधायिका में आरक्षण की व्यवस्था आदि भी शामिल हो सकते हैं। लेकिन इस मुद्दे पर सबसे बड़ी विडंबना यह है कि "असमिया' कौन है, आज तक यह निर्णय नहीं हो पाया। दरअसल जब असम समझौते पर हस्ताक्षर किए गए थे तब तक असम में जनजातीय स्वर इतना ऊंचा और मजबूत नहीं हो पाया था कि आसू नेतृत्व उसकी परवाह करता और "असमिया' शब्द की जगह कोई ऐसा शब्द व्यवहार करता जिसमें असम के सभी मूल समुदाय शामिल हो जाते। अब समस्या यह हो गई है कि असम के जनजातीय समुदायों को अलग रखकर अलग पहचान और संस्कृति की रक्षा के प्रावधान करना एक राजनीतिक मजाक ही हो सकता है। और जनजातीय समुदाय अपने आपको असमिया कहे जाने से सख्त परहेज करते हैं।
हाल ही में एक टीवी कार्यक्रम के दौरान नेसो के सचिव प्रधान गुंजुम हैदर से हुई बातचीत में उन्होंने पूर्वोत्तर के लोगों की व्यथा का जिक्र करते हुए बताया कि इतने भारी जनविरोध और दुरुपयोग के स्पष्ट प्रमाणों के बावजूद सशस्त्र बल विशेषाधिकार अधिनियम (अफस्पा) को नहीं हटाया जा रहा है, जबकि माओवादी हिंसा वाले राज्यों में यह कानून लागू नहीं है। इसके अलावा बाहरी राज्यों में पूर्वोत्तर के लोगों को अपमानजनक नामों से पुकारे जाने या उन्हें नेपाली या चीनी नागरिक समझने पर भी उन्होंने क्षोभ व्यक्त किया। उनके पास शिकायतों की लंबी फेहरिश्त थी और कहना था कि या तो आप इन समस्याओं का समाधान करें या फिर हमें अपना शासन खुद चलाने दें। "विशेष दर्जा' से उनका यही तात्पर्य था कि इसमें राज्य सरकार के पास इतने अधिकार आ जाएंगे कि वह अपनी समस्याओं का समाधान स्वयं खोज लेगी।
लगता है आने वाले दिनों में "विशेष राज्य का दर्जा' का मुद्दा जोर पकड़ेगा, क्योंकि इस मांग के पीछे असम के ताकतवर आसू जैसे छात्र संगठन का भी जोर है। यदि ऐसा होता है तो एक बार फिर "केंद्र का पक्षपात', "पूर्वोत्तर की अनदेखी' जैसे नारे हवा में उछलेंगे। इससे पूर्वोत्तर की युवा पीढ़ी में फिर से यह भावना मजबूत होगी कि भारत राष्ट्र में हमारा दर्जा समान नहीं है, हमारे साथ भेदभाव की नीति अपनाई जाती है। इसका दूरगामी और घातक प्रभाव युवा मस्तिष्क पर पड़ता है, जो राष्ट्र की एकता की दृष्टि से एक खतरनाक बात है।
हमेशा केंद्र को कोसने वाले पूर्वोत्तर के छात्र संगठनों से जब यह पूछा जाता है कि आप जितनी ऊर्जा के साथ केंद्र सरकार का विरोध करते हैं, उतनी ताकत राज्य सरकारों पर दबाव बनाने के लिए क्यों इस्तेमाल नहीं करते। जबकि देखा जाता है कि पूर्वोत्तर में बड़े ही लचर ढंग से सरकारी कामकाज चलता है। केंद्र से आने वाली राशि का बहुत बड़ा हिस्सा बिना इस्तेमाल के वापस लौट जाता है। केंद्र सरकार की ओर से सभी मंत्रालयों के योजनागत व्यय का दस फीसदी हिस्सा सिर्फ पूर्वोत्तर पर खर्च करने का प्रावधान है, लेकिन इसका भी बड़ा हिस्सा बिना खर्च हुए सिर्फ कोष में जमा हो रहा है। इस आरोप पर छात्र संगठनों के नेता दावा करते हैं कि उन्होंने अपनी-अपनी राज्य सरकारों को बख्श नहीं दिया है बल्कि उनके विरुद्ध भी आंदोलन चलता रहता है।
एक हद तक यह सही है कि पूर्वोत्तर के छात्र संगठन राज्य सरकारों के प्रशंसक नहीं हैं और उनकी आलोचना में मुखर देखे जाते हैं। लेकिन उनकी ओर से की जाने वाली राज्य सरकार और केंद्र सरकार की आलोचना में एक बुनियादी फर्क यह है कि जहां राज्य सरकार की खामियों को लचर राजकाज (गवर्नेंस) के रूप में देखा जाता है, वहीं केंद्र सरकार के प्रति शिकायतों को पूर्वोत्तर के प्रति भेदभाव, पक्षपात, एक क्षेत्र विशेष को वंचित रखने की साजिश के रूप में देखा जाता है। जब केंद्र सरकार की बात आती है तो यह देखने से परहेज किया जाता है कि पूर्वोत्तर को लेकर केंद्र के दायित्व पूरे नहीं हो रहे हैं तो उसका कारण प्रशासनिक अधिकारियों पर नियंत्रण न होना, सरकारी फैसलों को लागू करने में देरी और गंभीरता की कमी, भ्रष्टाचार, अधिकारियों द्वारा जिम्मेवारी को पूरा न किया जाना, लालफीताशाही जैसी वैसी ही समस्याएं हो सकती हैं जैसी राज्य स्तर पर हैं। स्थिति को गवर्नेंस की कमी के नजरिए से नहीं देखकर राजनीतिक साजिश के रूप में देखा जाता है। इस नजरिए के कारण एक पूरी पीढ़ी अपने आपको वंचित, शोषित की दृष्टि से देखने की मानसिकता के साथ बड़ी हुई है। जैसाकि ऊपर कह चुके हैं यह दूरगामी दृष्टि से खतरनाक है।