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Journalist and writer, Writes on Northeast India, Bangladesh, Myanmar
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शनिवार, 25 अगस्त 2012

असम की चिट्ठी

 असम में ईद ठीकठाक ढंग से बीत जाने पर देश भर में लोगों ने राहत की सांस ली है। लेकिन असम से ज्यादा दक्षिण भारत और महाराष्ट्र को लेकर ज्यादा चिंता थी क्योंकि धमकी भरे असएमएस बेंगलुरू और पुणे में ही दिए गए थे। पूर्वोत्तर से वहां गए प्रवासी इसीलिए वहां से भाग आए थे। पहले ही इस बात का अहसास था कि यह एक हौवा है, ईद आएगी और चली जाएगी और कुछ होगी नहीं। क्योंकि भारत में हिंसा पहले से कहकर नहीं आती। वह जब आती है तो बिना किसी पूर्व सूचना के आती है। लेकिन पूर्वोत्तर के लोगों के भागने की घटना ने असम को देश के एजेंडा में सबसे ऊपर रख दिया है। दो साल बाद होने वाले लोकसभा चुनावों पर भी असम की घटनाओं का प्रभाव पड़े बिना नहीं रहेगा। इतिहास में पहली बार ऐसा हुआ है जब असम और पूर्वोत्तर पर देश का इतना ज्यादा ध्यान गया है। यदि यह ध्यान सुचिंतित समाधानों की ओर बढ़ता है तो इसे एक सकारात्मक घटना माना जाएगा। लेकिन देखा जा रहा है कि राजनीतिक दल चीजों को सिर्फ सतही ढंग से देखने में व्यस्त हैं, इसलिए आश्चर्य नहीं होना चाहिए यदि असम की समस्या पहले की अपेक्षा ज्यादा उलझ जाए। इससे पहले भी हमने लिखा था कि असम आंदोलन के दौरान आसू तथा असम गण संग्राम परिषद ने कुछ समूहों को भारत की विभिन्न दिशाओं में यह बताने के लिए भेजा था कि असम की वास्तविक समस्या क्या है। क्यों देश को असम की समस्या पर ध्यान देना चाहिए और किस तरह यह समस्या आने वाले कल को सारे देश को अपने आगोश में ले लेगी। 1980 में जो भविष्यवाणी की गई थी वह आज सच साबित हो रही है। विश्लेषण हमेशा गलत साबित नहीं होते, यह अलग बात है कि कई बार वे उससे ज्यादा वक्त ले लेते हैं जितने का अनुमान किया जाता है। अब एक बार फिर समय आ गया है कि असम की समस्या के बारे में ठीक-ठीक और बिना राजनीतिक रंग वाली जानकारी देने के लिए बुद्धिजीवी देश के दूसरे हिस्सों में जाएं और बताएं कि असम की समस्या का हल क्यों बाकी देश के भी हित में है। 

1980 में इंटरनेट नहीं था, आज इंटरनेट है। अखिल असम छात्र संघ और पूर्वोत्तर छात्र संगठन अपनी एक वेबसाइट खोलकर समस्या पर अपने नजरिए को इस पर डाल सकते हैं। 1980 में असम और पूर्वोत्तर के बारे में अंग्रेजी में भी नगण्य सामग्री उपलब्ध थी। किसी पत्रिका में कुछ निकलता था तो हम उसे चाट जाते थे। आज अंग्रेजी में काफी सामग्री और पुस्तकें उपलब्ध हैं। लेकिन हिंदी तथा अन्य भाषाओं में आज भी स्थिति दरिद्रता की है। आश्चर्य ही क्या कि हिंदी पट्टी के पत्रकारों-बुद्धिजीवियों का असम-विवेचन कई बार हास्तास्पदता की सामाएं छूता है।

कर्नाटक और महाराष्ट्र सरकार ने पूर्वोत्तर वासियों को वहां से भागने से रोकने के लिए जो प्रयास किए वे आंखें खोलने वाले हैं। खासकर पूर्वोत्तर के राजनीतिज्ञ तो इस जन्म में कभी वह सब नहीं कर सकते जो कर्नाटक सरकार ने किया है। पूर्वोत्तर में बाहरी राज्यों से काफी लोग आकर बसे हुए हैं, जबकि दो दशक पहले तक पूर्वोत्तर से कोई इक्का-दुक्का लोग ही बाहर जाते थे। स्थायी रूप से बसने के लिए तो कोई नहीं जाता था। अब दो दशकों से पढ़ाई के लिए जो लोग जाते हैं उनमें से बहुतेरे वहीं नौकरी करने लग जाते हैं। बाहरी राज्यों से पूर्वोत्तर में बसे लोगों को कभी अच्छी नजर से नहीं देखा गया। हो सकता है व्यक्तिगत स्तर पर किसी को कोई असुविधा नहीं हुई हो, लेकिन एक समूह के रूप में बाहरी राज्यों से आए लोगों के लिए समाचारपत्रों में खुले रूप में आज भी तिरस्कारपूर्ण शब्दों के इस्तेमाल को एक सामान्य बात माना जाता है। कई जगह इस तरह की पंक्तियां पढ़ने को मिल जाती हैं कि "असम एक चरागाह है जहां ये लोग चरने आ जाते हैं।'

आज जब हम देखते हैं कि एक राज्य का उप-मुख्यमंत्री असम सिर्फ इसलिए आता है कि उनके राज्य की राजधानी से भागकर आए लोगों को सुरक्षा का आश्वासन दिया जा सके। महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री रियायती दर पर हवाई जहाज उपलब्ध कराने की पेशकश करते हैं। घटनाएं घटती हैं और दिन गुजरने के साथ भुला दी जाती हैं या लोग सोचते हैं कि भुला दी जाती होंगी। लेकिन क्या सचमुच घटनाएं भुला दी जाती हैं। एक-एक घटना एक-एक समुदाय की विश्व दृष्टि यानी चीजों के प्रति नजरिए को बदलने वाली होती है। सिर्फ उन लोगों के लिए नहीं जिन्होंने उन घटनाओं को देखा और भोगा है। बल्कि उनकी आने वाली पीढ़ियां भी उन घटनाओं की छोटी से छोटी तफसील, उन घटनाओं से पैदा हुए "ज्ञान' को ग्रहण करते हुए बड़ी होती हैं। ऐसी घटनाओं के समय विभिन्न लोगों - पड़ोसियों, शहरवासियों, सरकारों - द्वारा दिखाए गए आचरण को वे भविष्य में एक कसौटी के रूप में इस्तेमाल करते हैं। तभी तो असमवासी 1962 के ीचन युद्ध के समय पंडित नेहरू के कहे शब्दों को आज भी याद करते हैं। नगा युवा अपने बुजुर्गों से खोनोमा गांव के कत्लेआम की कहानियां सुनकर बड़ा होता है।

कर्नाटक और महाराष्ट्र की सरकारों ने अपने शहरों में रहने वाले प्रवासियों के प्रति जो संवेदनशीलता दिखाई है वह भविष्य के लिए एक नजीर बन जाएगी। "हिंदुस्तान एक है यहां हर कहीं हर किसी को रहने का हक है।' बेंगलुरु स्टेशन पर खड़े एक पूर्वोत्तरवासी को टीवी कैमरा के सामने यह नारा लगाते सुनना सुखद लगा था। इस नारे की प्रतिध्वनि हो सकता है भविष्य में पूर्वोत्तर में भी सुनाई दे। हो सकता है कभी यह भाव भी जाग्रत हो कि जब समय की मांग हुई थी तब हमने इस वाक्य के मर्म को अपने राज्य में लागू नहीं किया था।

शनिवार, 4 अगस्त 2012

इस तरह हुआ जातीय सफाया

"दिन में करीब तीन बजे का समय होगा, वे लोग एक तरफ से आए, उनमें से कुछ के मुंह काले कपड़े से ढंके हुए थे, वे मिलिट्री जैसी पोशाक पहने हुए थे, हाथों में बंदूकें थीं, जिनसे वे गोलियां छोड़ते जा रहे थे। क्या कहा आपने, गोली किसी को लगी क्या...जी मेरे ही पैर के पास से गोली पार हो गई। वे लोग हमारे मवेशियों को मारते जा रहे थे।''

यह कहना है 55 वर्षीय नूर इस्लाम का। नूर इस्लाम धुबड़ी जिले के बिलासीपाड़ा कस्बे के रोकाखाटा हाई स्कूल में लगे राहत शिविर में अपने परिवार तथा अन्य करीब चार हजार लोगों के साथ रुका हुआ है। यह घटना मंगलवार (24 जुलाई) की है। तब तक सेना को नियुक्त नहीं किया गया था। यह बातचीत हम शुक्रवार को कर रहे हैं। चार दिन में ही शिविर में हाल बेहाल है। डिसेंट्री और बुखार की शिकायतें आम हैं। कुछ महिलाएं गर्भवती हैं, तो कुछ की गोद में एक महीने से भी छोटा बच्चा है। सरकार ने चावल, दाल और सरसों तेल भेज दियाहै। बाकी चीजें जैसे जलावन और बच्चों के लिए दूध कहां से आएगा। बिलासीपाड़ा के स्वयंसेवी संगठन, मारवाड़ी व्यवसायियों का संघ ये लोग राहत शिविर वासियों के लिए आगे आए हैं। इस संवाददाता के सामने ही एक आटो से आवश्यक वस्तुएं उतारी जा रही हैं।

""सरकार की ओर सिर्फ एक दिन एक मोबाइल डिस्पेंसरी आई थी। उनके पास सिर्फ नोरफ्लोक्सेसिन टैबलेटें (डिसेंट्री में काम आने वाली दवा) थीं। उनके साथ स्वास्थ्य विभाग के ज्वाइंट डाइरेक्टर थे। हमने कहा कि इस मरीज को सेलाइन चढ़ाने की जरूरत है, तो डाइरेक्टर महोदय ने हमें बुरी तरह डांट दिया और चलते बने। उसके बाद से शिविर की सुध लेने कोई सरकारी नुमाइंदा नहीं आया।''
 


चिरांग जिले के पुरान बिजनी के स्कूल में स्थापित शिविर के बाहर रास्ते पर ही मरीजों को सेलाइन चढ़ाने में मदद करने में व्यस्त जाकिर ये बातें क्षोभ के साथ बताता है। वहां एक पेड़ के नीचे करीब सात-आठ मरीजों का इलाज चल रहा है। एक को छोड़कर बाकी सभी महिलाएं हैं। स्थानीय लोग यहां भी मदद कर रहे हैं। एक निजी प्रैक्टिस करने वाले चिकित्सक अपनी सेवाएं दे रहे हैं। तब तक हमारे पीछे से एक करीब साठ वर्षीय पुरुष को सहारा देकर वहां लाया जाता है। क्या हुआ? ""यहां लगभग सभी को डायरिया हो रहा है। इसमें सेलाइन ही चढ़ानी पड़ती है। टेबलेट से काम नहीं होता। स्थानीय स्वयंसेवी संगठन ने कुछ सेलाइनें खरीद दी हैं,'' इलाज में व्यस्त डाक्टर पेड़ की टहनी से सेलाइन की बोतल लटकाने का प्रयत्न करते हुए धीरज के साथ बताते हैं। ""जल्दी ही बड़े रूप में मदद नहीं आई तो डायरिया कमजोर बच्चों की जान लेने लग जाएगा।''

चिरांग जिले में हिंसा देर से फैली है। ये लोग 25 तारीख से शिविर में हैं। आज 28 है। सरकार के यहां "जल्दी' जैसा कोई शब्द नहीं है। सब कुछ अपनी मस्त सरकारी चाल से होता है। मौतें होंगी और उन पर मीडिया में हो-हल्ला होगा, उसके बाद इलाके में चिकित्सा पहुंचेगी। यह हाल अंदरुनी गांव का नहीं, बिजनी सब-डिवीजन के एसडीओ के दफ्तर से महज तीन किलोमीटर दूरी का है। (4 अगस्त तक शिविरों में कम-से-कम तेरह बच्चों के मारे जाने के समाचार आते हैं। हमें हमारी आशंका सच साबित होने का दुख है।)

बिजनी में आल बीटीसी मुस्लिम छात्र संघ का कार्यकारी अध्यक्ष शाहनवाज प्रामानिक मिल जाता है। यह संगठन इस बार इस फसाद के केंद्र में है। कल तक शाहनवाज नामक यह युवक गैर-बोड़ो समुदायों के साथ भेदभाव का विरोध करने में आगे-आगे चलता था। आज वह खुद अपना घर-खेत छोड़कर एक शिविर में टिका हुआ है। क्या लोग अपने घरों को लौट जाएंगे? शाहनवाज निश्चित तौर पर कुछ नहीं कह पाता। यही सवाल जब कोकराझाड़ जिले से भाग कर आए एक शरणार्थी से बिलासीपाड़ा में किया गया तो वह सिहर उठा। बोला- नहीं, हमें जोर-जबर्दस्ती भेजने पर भी हम नहीं जाएंगे।

हमले में आग्नेयास्त्रों का इस्तेमाल

कोकराझाड़, धुबड़ी और चिरांग जिलों के कई शिविरों में ठहरे भुक्तभोगियों से बात करने के बाद यह कामन पैटर्न उभर कर सामने आता है-(क) हमला लगभग हर जगह दोपहर के बाद किया गया (ख) हमलावर कोई मुंह ढंके हुए था और कोई खुले मुंह (ग) हमलावर बंदूक आदि से लैस थे और बैटल फेटीग पहने थे, (घ) हमलावर लोगों पर सीधे गोलियां चलाने की बजाय दीवारों, मवेशियों पर ज्यादा गोलियां चला रहे थे, (ङ) हमलावरों ने गांववासियों को घेर कर नहीं मारा। हमला लगभग हर जगह एक तरफ से हुआ ताकि दूसरी ओर से गांव वालों के भागने का रास्ता खुला रहे, (च) हमला करने वाले सिर्फ मुसलमानों के घरों को छांट कर उनमें आग लगा रहे थे। किसी भी अन्य समुदाय के गांव या घर पर हमला नहीं हुआ, (छ) लगभग हर जगह यह आरोप सामने आया कि हमला करने वाले पूर्व उग्रवादी संगठन बीएलटी के सदस्य थे। यह उग्रवादी संगठन स्वायत्त बोड़ो क्षेत्र के आंदोलन के नेतृत्व में था और स्वायत्त क्षेत्र के 2003 में गठन के बाद इसका विघटन कर दिया गया। अब बीएलटी के कैडरों को एक्स-बीएलटी कहकर पुकारा जाता है। आरोप लगते रहे हैं कि इन पूर्व उग्रवादियों के पास अब भी हथियार हैं तथा वे इलाके में आतंक का पर्याय हैं।

एक्स-बीएलटी और अलग बोड़ोलैंड की मांग करने वाले उग्रवादी संगठन एनडीएफबी के दोनों गुटों का मुस्लिम समुदाय से नाराज होने का कारण भी समझ में आता है, क्योंकि इन पूर्व तथा वर्तमान उग्रवादियों के आतंक के विरुद्ध आवाज उठाने वालों में मुस्लिम समुदाय ही आगे-आगे रहा है। यह घटनाक्रम पिछले लगभग तीन-चार महीनों से चल रहा था, जो तेज नजर वाले पत्रकारों, राजनीतिज्ञों, अधिकारियों से छिपा हुआ भी नहीं था।

टीवी पर निठल्ला चिंतन और मुद्दे से भटकाव

हिंसाग्रस्त क्षेत्र का दौरा करके लौटने के बाद जब स्थानीय और राष्ट्रीय टीवी पर चलने वाली चर्चाओं को सुनते हैं तो एक तरह से उन पर दया आती है। टीवी पर होने वाला चिंतन किन बिंदुओं के इर्द-गिर्द घूमता है? एक, इस बाल की खाल निकालने में खासा समय जाया किया जाता हैकि सेना भेजने में देर किस कारण हुई। कुछ राजनीतिज्ञों को इसमें मुख्यमंत्री को परेशानी में डालने का अच्छा मौका नजर आ रहा है। दो, अचानक बांग्लादेश से होने वाली अवैध घुसपैठ एक मुद्दा बन गई है। अवैध घुसपैठ को हिंसा का कारण बताना प्रकारांतर से वर्तमान हिंसा को जायज ठहराना है। सवाल है कि क्या अब अवैध घुसपैठियों से निपटने का यही तरीका रह गया है, जो बीटीएडी के पूर्व और वर्तमान उग्रवादियों ने अपनाया है?

वर्तमान हिंसा का असली कारण है बीटीएडी इलाके में पूर्व और वर्तमान उग्रवादियों पर प्रशासन का कोई नियंत्रण नहीं होना। कानून और व्यवस्था लागू करने वाली मशीनरी वहां इस मामले में अपने आपको असहाय पाती है। सेना बीटीएडी इलाके में नियुक्त है, लेकिन सिर्फ उग्रवाद विरोधी अभियान के लिए। इसका व्यावहारिक अर्थ है सिर्फ एनडीएफबी के वार्ता विरोधी गुट के विरुद्ध अभियान के लिए।

पूर्व बीएलटी कैडर या एनडीएफबी का वार्तापंथी गुट यदि आपराधिक गतिविधि में लिप्त पाया जाता है, तो उससे निपटने का दायित्व सेना का नहीं, राज्य पुलिस का है। कई संगठनों को लेकर बना गैर-बोड़ो सुरक्षा मंच पिछले तीन-चार महीनों से इसी मुद्दे पर राज्यवासियों का ध्यान आकर्षित करने का प्रयास कर रहा था। लेकिन मुद्दा चूंकि भटककर अवैध घुसपैठ पर केंद्रित हो गया है, तो इसका लाभ भी उन्हीं लोगों को मिलेगा जो वर्तमान हिंसा के लिए जिम्मेवार रहे हैं।

शनिवार, 30 अक्टूबर 2010

असम में किसे चाहिए आजादी

पिछले तीन दशकों में असम में काफी खून बहा है। मोटे तौर पर तीन कारणों से राज्य में हिंसा हुई। एक बोड़ो आंदोलन, दो असम आंदोलन और तीन अल्फा का स्वाधीनता को लेकर अलगाववादी आंदोलन। हिंसा का कोई तर्क नहीं होता। लेकिन इस हिंसा का संचालकों के पास इसके औचित्य को लेकर किसके पास क्या तर्क हैं इसे देखा जाना चाहिए। बोड़ो समुदाय के पास हो सकता है यह तर्क हो कि इंसानी खून के बदले में बोड़ो समुदाय ने अपनी पहचान हासिल कर ली। असम आंदोलन के नेताओं के पास भी तर्क हो सकते हैं कि तीन हजार से अधिक लोगों की जान के विनिमय में सारे देश का ध्यान असमिया समुदाय की समस्याओं पर गया। बांग्लादेशी घुसपैठ की समस्या हो सकता है असम आंदोलन के बिना भी किसी समय देश के राजनीतिक एजेंडे में सबसे ऊपर आ जाती, लेकिन असम आंदोलन ने इस समस्या को ठीक समय पर देश के सामने रख दिया।

लेकिन अल्फा के द्वारा किए गए खून-खराबे के पक्ष में इसके समर्थक लाख कोशिश करके भी कोई पचने वाला तर्क नहीं दे सकते। स्वाधीनता! असम में स्वाधीनता कौन चाहता है? 1947 में देश के आजाद होने के बाद से 1979 में अल्फा के द्वारा एक और आजादी की मांग उठाए जाने के बीच असम के राजनीतिक विमर्श में कभी भी प्रदेश की स्वाधीनता किसी की जबान पर नहीं रही। 1989-92 के दौरान अल्फा थोड़े दिनों के लिए हीरो बना जब इसके कैडर सिर्फ मारवाड़ी व्यवसायियों और असम में बाहर से आकर काम करने वाले बड़े अधिकारियों से पैसे वसूलते थे। उन दिनों अल्फा को "हमारे लड़के' कहकर संबोधित किया जाता था। जनता की नब्ज पकड़ने में राजनीतिक नेता माहिर होते हैं। अल्फा का जनता के बीच प्रभाव था इसीलिए प्रफुल्ल महंत उसके विरुद्ध कार्रवाई करने से कतराते रहे। महंत के बाद आए हितेश्वर सइकिया अल्फा और आसू दोनों के ही दुश्मन थे। लेकिन अपनी प्रेस वार्ताओं में वे भूल से भी (और लाख कोंचने के बावजूद) अल्फा के खिलाफ कोई शब्द उच्चारित नहीं करते थे। जो कुछ कहना होता था अपने पुलिस अधिकारियों को कहते थे। कथनी और करनी में उनके यहां जितना अंतर था उतना और कहीं नहीं मिलता।

1989-92 का दौर खत्म होने के बाद अल्फा की हथियारों की भूख बढ़ने लगी, साथ-साथ पैसे की भी। सेना के दो-दो अभियान झेल लेने के बाद इसका आत्म-विश्वास बढ़ गया था और इसके नख-दंत असमिया मूल के समुदायों को भी चुभने लगे थे। तब धीरे-धीरे मीडिया में अल्फा की आलोचना होने लगी। लेकिन तब तक मर्ज काफी बढ़ चुका था। विदेशों में हथियारों की मंडी तक उनकी पहुंच हो चुकी थी, म्यांमार में शस्त्र चालन के कोचिंग सेंटरों तक का रास्ता वे पहचान चुके थे। इसलिए जब तक असमिया समाज के एक बड़े वर्ग के बीच यह सहमति बनी कि इस मर्ज की रोकथाम होनी चाहिए, तब तक काफी देर हो चुकी थी - और इसीलिए समाज में असम की स्वाधीनता के एक फीसदी समर्थक भी मौजूद न होने के बावजूद अल्फा का खून-खराबा, हत्याओं का दौर इतने लंबे समय तक जारी रह पाया।

हम चर्चा कर रहे हैं इस बात की कि अल्फा के इस तथाकथित संघर्ष का क्या कोई औचित्य था। ब्रिटिश साम्राज्य में शामिल होने के बाद भारत के अंग के रूप में बने रहने पर राज्य में कभी कोई आपत्ति रही हो इसका उदाहरण ताजा इतिहास में हमें नजर नहीं आता। लेकिन जिस बात पर हम जोर देना चाहते हैं वह यह है कि आज से दो दशक पहले जो लोग स्वाधीनता या अलगाव के नाम पर उदासीनता दिखाते थे वे भी आज सक्रिय रूप से ऐसी किसी विचारधारा का विरोध करते हैं। इसका कारण यह है कि आज बीस साल पहले की अपेक्षा ज्यादा बड़ी संख्या में असम के छात्र दूसरे राज्यों के शिक्षा-संस्थानों में पढ़ते हैं, ज्यादा बड़ी संख्या में असम के युवा भारत के विभिन्न शहरों में नौकरियां करते हैं, ज्यादा बड़ी संख्या में असम के विभिन्न मूल समुदायों के लोग भारतीय सेना के तीनों अंगों में भर्ती हैं, ज्यादा बड़ी संख्या में लोग विशाल भारतीय बाजार के साथ जुड़े हुए हैं और इसका महत्व समझते हैं।

इसलिए असम में आज भावना यह है कि स्वाधीनता एक राजनीतिक बकवास है। लेकिन "लड़कों' ने इतने सालों तक "संघर्ष' किया है तो कुछ ले-देकर समझौता हो जाना चाहिए। यदि असम को अन्य राज्यों के मुकाबले कुछ अतिरिक्त सुविधाएं हासिल हो जाती हैं, तो अल्फा का "संघर्ष' धन्य हो जाएगा। लेकिन क्या यह कहा जा सकेगा कि इतने खून-खराबे और इंसानी जानों की कीमत अदा हो गई? हम ऐसा नहीं समझते। शायद आज के असम में कोई भी ऐसा नहीं समझता। क्योंकि भारतीय लोकतंत्र में स्पेस की इतनी कमी कभी नहीं हुई कि ज्यादा नौकरियां, ज्यादा धन, ज्यादा आरक्षण, संवैधानिक सुरक्षा जैसी चीजों के लिए इतना खून बहाना पड़े, जितना अल्फा ने बहाया है। जब किसी व्यवस्था में शांतिपूर्ण आंदोलन के लिए गुंजाइश न हो, तब वहां हिंसा के पक्ष में दलील की गुंजाइश बनती है। असम आंदोलन को नजदीक से देखने वालों और इसमें हिस्सा लेने वालों को जिस तरह आज अहसास हो रहा है कि केंद्रीय विश्वविद्यालय, आईआईटी जैसी चीजों के लिए तीन हजार से ज्यादा लोगों की जानों की बलि कुछ ज्यादा ही बड़ी कीमत है यदि अंततः विदेशियों को बाहर नहीं निकाला जाता। उसी तरह कल को असम को संविधान के अंतर्गत कुछ सविधाएं देने के एवज में अल्फा के साथ समझौता हो जाए तो यह अहसास होने में ज्यादा वक्त नहीं लगेगा कि इतना तो किसी शांतिपूर्ण आंदोलन से ही हासिल हो जाता।

शुक्रवार, 28 नवंबर 2008

जिहादी आतंकवाद का मुकाबला कांग्रेस और भाजपा को मिलकर करना होगा

इसमें कोई शक नहीं कि मुंबई पर हुआ हमला भारत का 9/11 है। सवाल है कि क्या हम उस तरह के कदम उठाने के लिए तैयार हो पाए हैं जिस तरह के कदम अमरीका ने पिछले सात सालों में फिर से किसी 9/11 की पुनरावृत्ति रोकने के लिए उठाए हैं।

इस बात की कोई गारंटी नहीं है कि कल को फिर से सशस्त्र बदमाशों का दल भारत के किसी अन्य शहर के किसी होटल, स्टेशन या हवाईअड्डे पर हमला नहीं कर देगा। ऐसा हो ही सकता है। लेकिन सवाल है कि क्या हम आज भी यह स्वीकार करने के लिए तैयार हैं कि आतंक के विरुद्ध ईमानदार, पार्टीगत राजनीति से इतर जीरो टालरेन्स की नीति अपनाने में काफी देर हो गई है?


आतंक का मुकाबला करने के रास्ते में बाधा यह नहीं है कि कांग्रेस और भारतीय जनता पार्टी के बीच कोई मौलिक वैचारिक मतभेद हैं, न ही हमारे गृह मंत्री कोई बाधा हैं जो जीवंत कैमरे के सामने बिना यह सोचे कि आतंकवादी और उनके आका भी टीवी देख रहे होंगे, सूचना देते हैं कि 200 कमांडों दिल्ली से इतनी बजे रवाना हो चुके हैं।

आतंकवाद का मुकाबला करने में बाधा है हमारी अति यर्थाथवादी राजनीति जो विचारधारा के आधार पर नहीं गणित के आधार पर चलती है। इसलिए जब हमारा राजनीतिक वर्ग आतंकवाद के बारे में सोचता है तो वह इसके संप्रदायीकरण के बारे में भी सोचता है। इसमें यूपीए और एनडीए दोनों ही समान रूप से दोषी हैं। जहां भाजपा केवल जिहादी आतंकवाद के बारे में सोचती है, वहीं कांग्रेस आतंकवाद के मूल कारणों की खोज में समय जाया करती है।

केपीएस गिल ने अपने आलेख में ठीक ही लिखा है कि आतंकवाद से मुकाबला करने के लिए कानून का सहारा लिया जाए या विकास का सहारा लिया जाए या राजनीति का सहारा लिया जाए या बातचीत का सहारा लिया जाए या पुलिस का सहारा लिया जाए या मिलिटरी का सहारा लिया जाए - इस िनरर्थक बहस में उलझने का कोई मतलब नहीं है। आतंकवाद से मुकाबला करने का एक और एकमात्र तरीका है आतंकवाद विरोध या काउंटर टेररिज्म, इसमें ही सारी बातें समाहित हो जाती हैं।


जब मालेगांव बम विस्फोट में हिंदुओं का हाथ मिला तो कांग्रेस पक्ष के कुछ लोगों के चेहरों पर मुस्कान छुपाए नहीं छुप रही थी। तो दूसरी ओर भाजपा मामले की जांच कर रहे एटीएस और उसके प्रमुख की विश्वसनीयता पर ही प्रश्नचिन्ह लगाते हुए इसके प्रमुख हेमंत करकरे को हटाने की मांग करने लगी।

हेमंत करकरे अब अंततः मरने के बाद वह चीज हासिल कर लेंगे जो वे जीवित रहते कभी नहीं कर पाते। वह चीज है कांग्रेस और भाजपा दोनों के ही नेताओं की आंखों से एक साथ निकली आंसू की चंद बूंदें। यही वह चीज है जो आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई में आज सबसे महत्वपूर्ण है। एक साथ।

आतंकवाद को छोड़ दें तो देश में सबकुछ ठीकठाक ही चल रहा था। दुनिया भर की मंदी के बीच हम सात फीसदी वृद्धि दर की उम्मीद कर रहे थे। चांद को भी हमने छू लिया। देश के कई शहरों में बम विस्फोट करने वाले गिरोह को भी हमने पकड़ने में कामयाबी हासिल कर ली। कश्मीर में साठ फीसदी मतदान हो गया। तो हम आधा या एक दर्जन दहशतगर्दों को इस देश की तकदीर लिखने की इजाजत कैसे दे सकते हैं।

होने को इन दहशतगर्दों के हाथ बहुत लंबे होंगे लेकिन भारत की संकल्प शक्ति भी अभी चुकी नहीं है। जरूरत है इसके राजनीतिक वर्ग को एक साथ आने की। आज देश की दो सौ बीस करोड़ आंखें मनमोहन सिंह, लालकृष्ण आडवाणी, लालूप्रसाद, मुलायम सिंह, मायावती और प्रकाश करात को एक मंच से यह घोषणा करते हुए देखना चाहती हैं कि आतंकवाद से मुकाबला करने के मामले में सारा देश एक है। इस मुद्दे पर किसी तरह की राजनीति न तो की जाएगी और न ही बर्दाश्त की जाएगी।

बुधवार, 26 नवंबर 2008

दलित को इंतजार न्याय का


लक्ष्मी उरांव.
शायद यह नाम लोग भूल चुके होंगे, क्योंकि यह देश की किसी सेलेब्रिटी या राजनीतिक नेता का नाम नहीं है. लेकिन लोग अभी भी देश भर के टीवी चैनलों पर दिखाई गई उस तस्वीर को नहीं भूले होंगे जिसमें एक सांवले रंग की चाय मजदूर समुदाय की लड़की बिल्कुल निर्वस्त्र अपनी लाज बचाने के लिए सड़क पर दौड़ रही है.

यह आज से ठीक एक साल पहले यानी 24 नवंबर 2007 की घटना थी, जो गुवाहाटी के बेलतला में घटी.

इस तस्वीर को लेकर यह बहस खड़ी हुई थी कि क्या ऐसी तस्वीर छापना पत्रकारिता के सिद्धांतों के अनुकूल है. जो लोग अर्धनग्न अभिनेत्रियों की तस्वीरों के माध्यम से मनुष्य की आदिम वृत्तियों को सहलाने के बहाने अपना धंधा गर्म करने पर कभी आत्मचिंतन नहीं करते उन्हीं लोगों को जब समाज की गदंगी दिखाई गई तो वे सिहर उठे और चिल्लाने लगे कि "बंद करो यह अश्लीलता'.

बेलतला की कुख्यात घटना को एक साल पूरा होने के बाद आज यह साफ हो चुका है कि युवती की तस्वीर को पर्याप्त रूप से ढककर छापना कहीं से भी गलत नहीं था, गलत था उस घटना की भयावहता को ढकने का प्रयास करना.

यूं गुजर गया वक्त

आज एक साल बीत जाने के बाद यह सवाल अपनी जगह खड़ा है कि एक लड़की को सरेराह निर्वस्त्र कर देना, एक व्यक्ति को पीट-पीटकर मार डालना और दर्जनों को गंभीर रूप से जख्मी कर देना - इन सब अपराधों को किसी बंद कमरे में नहीं बल्कि बीच सड़क पर दिन के उजाले में अंजाम देने वालों के विरुद्ध कानूनी कार्रवाई करने के लिए सरकार को और कितने वक्त की जरूरत है.

बेलतला की शर्मनाक घटना के सिलसिले में सात मामले स्थानीय थाने में दर्ज कराए गए. इनमें से मात्र एक मामले को छोड़कर बाकी किसी में भी आरोप पत्र तक दाखिल नहीं हुआ है. जिस एक मामले में आरोप पत्र दाखिल हुआ और चार युवकों को गिरफ्तार किया गया उसमें भी अभियोग पक्ष की ओर से अदालत में कार्रवाई को आगे बढ़ाने के लिए कुछ नहीं किया गया. नतीजा क्या होगा हम जानते हैं, मामला धीरे-धीरे स्वयं ही अपनी मौत मर जाएगा.

घटना की जांच के लिए एक न्यायिक आयोग का गठन हुआ. आयोग ने समय पर अपनी जांच पूरी कर दी. जांच रपट को 1 अप्रैल को राज्य विधानसभा के पटल पर रखा गया. लेकिन सरकार ने मात्र यह कहकर पल्ला झाड़ लिया कि वह केंद्र सरकार से सीबीआई जांच के लिए अनुरोध कर चुकी है.

राष्ट्रीय महिला आयोग ने भी अपनी ओर से घटना की जांच की. इसने भी घटना की सीबीआई से जांच कराने की अनुशंसा की. लेकिन सरकार ने आज तक आयोग को यह बताने की जहमत नहीं उठाई कि उसकी अनुशंसाओं पर सरकार ने क्या कार्रवाई की है.


उधर घटना की शिकार लक्ष्मी उरांव एक राजनीतिक पार्टी के टिकट पर लोकसभा का चुनाव लड़ने की तैयारियां कर रही है. उसने अपने अनुभव से यह जाना है कि देश में न्याय उसी को मिलता है जो राजनीतिक रूप से ताकतवर हो. सड़क पर निर्वस्त्र की गई लक्ष्मी आज सड़कों पर चुनावी सभाएं करने में व्यस्त है. इसी में उसे आदिवासी समाज की मुक्ति दिखाई देती है.

लेकिन लक्ष्मी की यह राह भी आसान नहीं है.

उम्र पर राजनीति

जिस झारखंड दिशोम पार्टी ने लक्ष्मी के मुद्दे को देश भर में उठाया, वही दिशोम पार्टी अब लक्ष्मी के तेज़पुर लोकसभा क्षेत्र से चुनाव मैदान में उतरने से नाराज़ है और इसके लिए उसकी उम्र को मुद्दा बना रही है. पार्टी का दावा है कि लक्ष्मी की उम्र 25 से कम है और वह चुनाव नहीं लड़ सकती.

यहां तक कि जिस ऑल आदिवासी स्टूडेंट्स एसोसिएशन की रैली में विरोधी गुंडों द्वारा लक्ष्मी को प्रताड़ित किया गया था, वह एसोसिएशन भी लक्ष्मी को लोकसभा की टिकट देने के खिलाफ है.

लक्ष्मी को लोकसभा की टिकट देने का प्रस्ताव रखने वाली असम युनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट भी इन आरोपों से थोड़ी पशोपेश में है.

तेज़पुर में लगभग 25 फीसदी मतदाता चाय बगान में काम करने वाले आदिवासी मज़दूर हैं और असम युनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट को उम्मीद है कि लक्ष्मी इन मतदाताओं का वोट तो पाएंगी ही. विवादों में फंसे तेज़पुर से लोकसभा सदस्य और लॉटरी किंग मणीकुमार सुब्बा के खिलाफ लक्ष्मी मतदाताओं की पसंद हो सकती हैं लेकिन उम्र के विवाद से फ्रंट भी परेशान है.

तेजपुर से लक्ष्मी को पार्टी टिकट देने की घोषणा के बाद फ्रंट के अध्यक्ष बदरुद्दीन अजमल लक्ष्मी की उम्र के मुद्दे का निर्णय चुनाव आयोग पर छोड़े जाने के पक्ष में हैं. उनका कहना है कि इस मामले में चुनाव आयोग जो भी तय करेगा, उन्हें स्वीकार होगा.

हालांकि लक्ष्मी बड़ी साफगोई से कहती हैं कि वे राजनीति में किसी लोभ में नहीं आई हैं. भविष्य में किसी भी स्त्री के साथ इस तरह का दुर्व्यवहार नहीं हो, यही इच्छा उन्हें राजनीति में लाई है. लेकिन अपनी उम्र को लेकर हुए विवाद से वे दुखी हैं.

लक्ष्मी कहती हैं- “मेरा जन्म 10 अगस्त 1983 को हुआ है और मेरे पास स्कूल के प्रमाणपत्र हैं.आखिर मेरी उम्र पर सवाल खड़े करने वाले किस आधार पर यह बात कह रहे हैं, मैं खुद नहीं समझ पा रही हूं.”

राजनीतिक सवालों के कटघरे में कैद लक्ष्मी उरांव के सामने फिलहाल तो लोकसभा चुनाव का लक्ष्य है और 24 नवंबर 2007 की लड़ाई भी तो उन्हें लड़नी है. एक ऐसी लड़ाई, जो अब सुर्खियों में नहीं है और सवालों पर राजनीति की बिसात बिछाने वालों के लिए भी अब वो किसी बहस का मुद्दा नहीं है.

रविवार, 16 नवंबर 2008

साले सेकुलर कहीं के

एक नई गाली चल निकली है "ये साले सेकुलर कहीं के'। किसी कुत्ते को गोली मारनी हो तो पहले उसे बदनाम कर दो। वक्त के द्वारा परखी हुई इसी तकनीक का इस्तेमाल इस समय सेकुलरिज्म के खिलाफ हो रहा है।



इसी तरह कम्युनिस्टों की शब्दावली में एक गाली दशकों से चली आ रही है "बुर्जुवा कहीं का'। जब किसी कम्युनिस्ट कार्यकर्ता को किसी उदारवादी के विचार समझ में नहीं आते या उसका उत्तर नहीं सूझता तो वह उस पर कोई न कोई लेबल चस्पां कर देता है। सबसे पंसदीदा लेबल यही होता है "बुर्जुवा'।



कल एक संघ समर्थक के साथ ट्रेन में सफर करना हुआ। बात करने समय उसका बार-बार उत्तेजित हो जाना कानों में चुभने वाला था। ऐसे में कोई संवाद स्थापित करना संभव ही नहीं होता। मसलन हमारे उन मित्र ने कहा कि बांग्लादेशी के मुद्दे पर तो तुमसे बात करके कोई फायदा नहीं है। इस बात पर ध्यान गया कि कोई भी कट्टरपंथी बात-बात पर उत्तेजित क्यों हो जाता है? ऐसा मुस्लिम कट्टरपंथी, कम्युनिस्ट कट्टरपंथी सबके साथ होता है। उनके साथ संवाद स्थापित नहीं हो पाता। शायद उन्हें संवाद की कोई वास्तविक जरूरत नहीं होती होगी। उनकी पवित्र किताबों में सारी समस्याओं के समाधान दिए हुए होंगे।



कट्टरपंथी आम तौर पर मुद्दों की चीरफाड़ करने के विरोधी होते हैं। जैसे, आप यदि कहें कि अमुक कंपनी अपने कर्मचारियों का काफी ध्यान रखती है। तो कोई कम्युनिस्ट कार्यकर्ता तुरंत आपके लिए यह धारणा बना लेगा कि आप उस कंपनी के पिट्ठू हैं। अपने विरोधी की कोई प्रशंसा सुनना उसे गवारा नहीं।



इसी तरह किसी हिंदुत्ववादी से कहें कि मुसलमानों में आपसी भाईचारे की भावना बड़ी तगड़ी है तो वह कहेगा कि "साले सेकुलरों में तो हिंदुओं के सिवा हर किसी में गुण नजर आते हैं। उन्हें बुराई केवल हिंदुओं में नजर आती है।'



यह तो हुई साधारण कार्यकर्ता की बात, लेकिन जो तपे-तपाए हिंदुत्ववादी, मुस्लिम कट्टरपंथी या कम्युनिस्ट हैं वे ऊपर से काफी सुलझे हुए लगेंगे। यानी वे आपकी बात शांति से सुनेंगे लेकिन जब वे आपके साथ बहस करने से कतराएंगे तो आपको तुरंत आभास हो जाएगा कि वे "विधर्मियों' के साथ बहस करने को समय को दुरुपयोग समझते हैं।



हर तरह के कट्टरवाद के कुछ गुणों में काफी समानता होती है। यह अध्ययन दिलचस्प है। जैसे यह कि, ऐसा लगता है कि कट्टरपंथी के मन में सदियों का गुस्सा पूंजीभूत है और वह झटके के साथ कोई परिवर्तन चाहता है और अपने विचारों का विरोध करने वालों को ही इसमें मुख्य बाधा मानता है। राजनीतिक या सांप्रदायिक हिंसा क्या इसीसे जन्मती है?