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Journalist and writer, Writes on Northeast India, Bangladesh, Myanmar
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शनिवार, 27 अगस्त 2016

इस्लाम की हिफाजत या महिलाओं को रोजगार

सात को ईद थी और दस को ढाका शहर अलसाया हुआ सा फिर से पटरी पर लौटने की कोशिश करता दिखा। अभी भी बड़ी संख्या में दुकानें खुली नहीं थीं। ढाका के ट्रैफिक जाम से और एक-दो दिनों के लिए राहत रहेगी। सुप्रीम कोर्ट में अभी कामकाज शुरू नहीं हुआ है लेकिन वकील लोग अपनी देशेर बाड़ी से शहर लोटने लगे हैं। 

सुप्रीम कोर्ट के वकील सुब्रत चौधरी का भी आज से व्यस्तता भरा दिन शुरू हो गया है। बांग्लादेश में अल्पसंख्यकों के हितों के लिए हिंदू, ईसाई और बौद्धों की संयुक्त संस्था के वे भी एक बड़े नेता हैं। सुब्रत को साफ दिखाई दे रहा है कि हालात दिन पर दिन बदतर होते जा रहे हैं। अपने बिंदास अंदाज में वे बताते हैं कि दाढ़ी रखने और सर पर टोपी पहनने का रिवाज बढ़ने लगा है। उनके चैंबर में उनके साथ और भी कई वकील बैठते हैं। ईद मनाकर लौटने पर सुब्रत ने उन्हें बधाई दी थी। इससे पता चला कि वे मुसलमान हैं। मैं कनखियों से देखता हूं उनकी सुब्रत की बातों पर क्या प्रतिक्रिया है। सभी अपने काम में व्यस्त दिखे। सुब्रत की असिस्टैंट लैपटाप पर टाइप करने में मुब्तिला थी। 

पिछले चालीस सालों में बांग्लादेश में आया अंतर सुब्रत को ज्यादा कचोट है। इस अंतर को हमने भी एक अलग तरीके से महसूस किया। बांग्लादेश के राष्ट्रीय म्यूजियम में वहां के प्रशासक ने विशेष अनुरोध कर हमें एक 22 मिनट की फिल्म दिखाई। उस फिल्म में 21 फरवरी 1952 को शुरू हुए भाषा आंदोलन से लेकर 1971 में बांग्लादेश के स्वतंत्र राष्ट्र बनने तक की गाथा को बड़े ही प्रामाणिक तरीके से दर्शाया गया है। फिल्म में सभी वास्तविक फुटेज हैं। 

हमने इस बात को खास तौर पर नोट किया कि छठे और सातवें दशक के फुटेज में शायद ही कोई ऐसा था जिसने अपने शरीर पर अपने धर्म को प्रचारित करने वाले प्रतीक धारण कर रखे थे। ढाका में आज भी अधिकतर मुस्लिम महिलाएं माथे पर बिंदी लगाती हैं और बुर्के का प्रचलन बहुत कम है। और उन फुटेज में तो आपको बिरला ही कोई टोपी या दाढ़ी वाला मिलेगा। 

उस फिल्म के दृश्यों को आधार बनाकर हम इस बात पर चिंतन कर सकते हैं कि आखिर वे कौन-सी शक्तियां हैं जिनके कारण दुनिया जाने-अनजाने में एक खास दिशा में बढ़ती जा रही है। पिछली आधी सदी में इस्लामिज्म या इस्लामवाद किस तरह फैला है इसका एक अंदाजा बांग्लादेश में इस्लाम के प्रतीक धारण करने वाले लोगों की संख्या में हुए इजाफे से लगाया जा सकता है। 

सुब्रत चौधरी सरकार की नीतियों से खफा हैं। उन्हें लगता है कि शेख हसीना भी अंततः इस्लामवादी ताकतों के सामने यदि घुटने नहीं टेक रही तो उन्हें संतुष्ट करने की कोशिश तो कर ही रही हैं। उदाहरण के रूप में वे हिफाजते इस्लाम के साथ सरकार के अच्छे रिश्तों को गिनाते हैं। बांग्लादेश में हिफाजते इस्लाम के त्वरित उत्थान और पतन की अपनी ही एक अनूठी कहानी है। 

बांग्लादेश में पुरानी और नई पीढ़ी के लोगों ने 1971 की यादों को भुलाया नहीं है। पाकिस्तान के साथ इस युद्ध में 30 लाख लोगों की जानें गई थीं। पाकिस्तान को तो बांग्लादेश के फेसबुक पोस्टर गंदी गालियों से संबोधित करते ही हैं, उनका अधिक गुस्सा अपने ही देश के उनलोगों के खिलाफ है जिन लोगों ने पाकिस्तानी सेना की मदद की थी। इसमें बांग्लादेश की जमाते इस्लामी नामक राजनीतिक पार्टी और अल बदर नामक संस्था अग्रणी थीं। 

कुल मिलाकर पाकिस्तान आज भी बांग्लादेश के बहुसंख्यक लोगों की घृणा का मुख्य केंद्र है। बांग्लादेश का समाज अपने नए राष्ट्र के उदय के समय से ही दो भागों में बंटा हुआ है। एक बहुसंख्यक समाज उनलोगों का है जिनलोगों ने पाकिस्तान की उर्दू थोपने की जिद के खिलाफ आवाज उठाई थी और इसकी परिणति स्वरूप पैदा हुए स्वाधीनता आंदोलन में हिस्सा लिया था या कम से कम उसकी सफलता चाही थी। 

दूसरा एक बहुत ही छोटा सा वर्ग उनलोगों का है जिसने उस समय पाकिस्तान का समर्थन किया था। इसमें जमाते इस्लामी के लोग तो हैं ही। उर्दूभाषी मुसलमानों को, जिन्हें वहां बिहारी मुसलमान कहा जाता है, इसीलिए ढाका में अच्छी नजर से नहीं देखा जाता। लोगों का मानना है कि इनलोगों ने 1971 में पाकिस्तानी फौज का साथ दिया था। 

स्वाधीनता समर्थक बहुसंख्यक लोग चाहते हैं कि 30 लाख लोगों की हत्या में पाकिस्तान की मदद करने वाले लोगों में से सभी को नहीं तो कम से कम उनके नेताओं को तो फांसी पर लटका ही दिया जाना चाहिए। शेख हसीना ने 2009 के चुनावों में यह वादा किया था कि फिर से उनकी सरकार आई तो वे ऐसे लोगों को फांसी पर लटकाएंगी। 

सत्ता में आने के बाद शेख हसीना ने ऐसे लोगों पर मुकदमा चलाने के लिए एक ट्राइब्यूनल का गठन किया। जिन लगभग एक दर्जन लोगों पर पाकिस्तानी सेना की मदद में नेतृत्व करने का आरोप था उन्हें गिरफ्तार कर उनके विरुद्ध मुकदमा शुरू कर दिया गया। 2013 आते-आते ऐसे पहले मुजरिम के खिलाफ फैसला भी आ गया। 

लेकिन इस फैसले से लोगों का गुस्सा एक बार फिर फट पड़ा। कारण यह कि मुजरिम अब्दुल कादेर मुल्ला को, जिसे लोग कसाई मुल्ला कहना ज्यादा पसंद करते हैं, ट्राइब्यूनल ने सिर्फ उम्रकैद की सजा सुनाई थी। ढाका में शहबाग नामक चौराहे पर फैसला सुनाने के दिन से ही लोगों का जमावड़ा शुरू हो गया। 

इस आंदोलन के दबाव में सरकार को फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में अपील करनी पड़ी और सुप्रीम कोर्ट ने ट्राइब्यूनल के फैसले को बदलकर सजाए मौत कर दिया। जमाते इस्लामी के बड़े नेताओं पर मुकदमे चल रहे थे और छोटे नेताओं और कार्यकर्ताओं को जेलों में भर दिया गया था, ऐसी स्थिति में इस्लामवादी खेमा पूरी तरह रक्षात्मक स्थिति में चला गया। लेकिन यह स्थिति ज्यादा दिन नहीं चलनी थी और नहीं चली। 

साल बीतते न बीतते हिफाजते इस्लाम नामक संस्था एक बड़ी शक्ति के रूप में उभरी। यह मूलतः कौमी मदरसे चलाने वाली संस्था है। इसके एजेंडा में दो मुख्य बातें थीं और हैं। एक, सरकार को कौमी मदरसों पर निगरानी करने और उनमें दखलंदाजी करने से रोकना, जिसके लिए शेख हसीना आमादा थीं। और दो, सार्वजनिक स्थानों पर पुरुषों और महिलाओं के मेलजोल की बढ़ती कथित रूप से गैर-इस्लामी आदतों को रोकना। 

इसके लिए हिफाजत ने महिलाओं के लिए शिक्षा और रोजगार आदि पर बंदिश लगाने वाले कई प्रस्ताव सरकार के सामने रखे थे। हिफाजत का सबसे बड़ा कार्यक्रम था 5 मई 2013 को ढाका पर कब्जा करने का। हिफाजत चूंकि मदरसों का संचालन करने वाली संस्था है इसलिए इसके पास मदरसों में पढ़ने वाले छात्रों का अच्छा-खासा आधार है। 

इस दिन देश भर से मदरसा छात्रों को ढाका लाया गया। और उन्हें लाने वाले नेताओं का कहना था कि जब तक उनकी मांगों को मान नहीं लिया जाता वे राजधानी से वापस नहीं जाएंगे। 5 मई की रात को पुलिस और सशस्त्र बलों ने बत्तियां गुल करके मोती झील नामक इलाके में आपरेशन चलाया और हिफाजत समर्थकों से ढाका को खाली करवा लिया। 

आज भी आतंकवाद समर्थकों के बयानों में इस घटना का जिक्र आता ही आता है। अल कायदा नेता जवाहिरी का जो बांग्लादेश केंद्रित बयान इंटरनेट के माध्यम से प्रचारित हुआ था उसमें भी इस घटना का जिक्र था। इस्लामवादी ताकतों का कहना है कि इस दिन पुलिस आपरेशन में हजारों छात्रों को मौत के घाट उतार दिया गया था। 

लेकिन जल्दी ही स्थिति फिर उलट गई। हिफाजते इस्लाम को सत्ताधारी दल का पिछलग्गू कैसे बनाया गया इस पर कोई यदि किताब लिखे तो वह राजनीति में साम दाम दंड भेद के सफल प्रयोग की गाइडबुक बन जाएगी। ढाका में पत्रकारों को यह कहने से कोई गुरेज नहीं कि हिफाजत के नेताओं पर एक और तो पुलिस केस की तलवार लटका दी गई और दूसरी और सरकार की बात मानने से उनकी तिजौरियों को मनचाही दौलत से भर दिया गया। आज हिफाजते इस्लाम और शेख हसीना की अवामी लीग के नेता एक मंच पर बैठे दिख जाएं तो कोई बड़ी बात नहीं। 

इसी बात से सुब्रत चौधरी नाराज थे।

गुरुवार, 18 नवंबर 2010

अंग्रेजी मैया की जय



उत्तर प्रदेश के लखीमपुर खीरी जिले के बनका गांव में इंग्लिश देवी का मंदिर बन रहा है। मंदिर दलित लोग बनवा रहे हैं। खबर चौंकाने वाली नहीं, सोचने को मजबूर करने वाली है। देश की यह गोबर पट्टी ही तो थी, जहां सबसे पहले अंग्रेजी हटाओ का नारा लगा था। इसी पट्टी के लोगों में से कुछ ने हिंदी न जानने वालों की देशभक्ति पर संदेह व्यक्त किया था। इसी पट्टी में ही तो हिंदी-हिंदू-हिंदुस्तानी का नारा उछला था। तो अब क्या हो गया? ठेेठ गंवई लहजे में पूछें तो क्या अकल ठिकाने आ गई?

अध्यात्म की गहराइयों की बात छोड़ दें और एक राह चलते आदमी से पूछें कि आप देवी दर्शन के लिए क्यों जाते हैं, तो वह अमूमन इन्हीं में से कोई जवाब देगा - बेटे की नौकरी के लिए, फैक्टरी की सफलता के लिए, स्वास्थ्य लाभ के लिए, गृहस्थी में शांति के लिए। आदमी चार दिन के लिए दुनिया में आता है लेकिन ये चार दिन भी रोटी, कपड़ा और मकान के बिना नहीं कट सकते। इसके बाद स्वास्थ्य चाहिए, समाज में सम्मान चाहिए, फिर....। यह सूची लंबी होती जाएगी। बात कुल मिलाकर यह है कि लोग हर देवी के पास कुछ प्राप्त करने के लिए जाते हैं। कहते हैं अलग-अलग देवियों के पास अलग-अलग शक्तियां होती हैं। इंग्लिश देवी का जहां तक सवाल है, यह बड़ी चमत्कारिक शक्तियों वाली देवी है। इसने देश को एक सूत्र में बांध दिया। कहते हैं हिंदी बोलने-समझने वालों की संख्या अंग्रेजी वालों से कई गुना है, फिर भी अंग्रेजी का प्रताप है। यही तो चमत्कार है। जिस तमिल भाषी को हिंदी में साम्राज्यवाद का खतरा नजर आता है, वह इंग्लिश देवी की शरण में चला जाता है।

इंग्लिश देवी सबके साथ समान व्यवहार करती है। वह किसी की मातृभाषा नहीं है। सभी लोग इसमें गलतियां करते हैं। जो कम गलत अंग्रेजी बोलता है, वह अंग्रेजी का विद्वान माना जाता है। हिंदी वालों के सामने बुद्धू बनने से तो अच्छा है टूटी-फूटी अंग्रेजी बोल लो, हम अपनी गलत अंग्रेजी बोलेंगे, तुम अपनी गलत अंग्रेजी बोलो। इंग्लिश देवी भोले शंकर की तरह है, छोटी-मोटी गलतियों का बुरा नहीं मानती, यहां अभिनव ओझा जैसे कर्मकांडी ब्राह्मण डंडा लेकर गलतियां पकड़ने के लिए नहीं खड़े रहते।

इंग्लिश देवी रोजगार देती है, सम्मान दिलाती है। कोई दलित भी दो-चार कदम धांसू अंग्रेजी में बोल लेता है तो हिंदी बोलने वाला ब्राह्मण धौंस में आ जाता है। इसके भक्त सारी दुनिया में फैले हैं। ज्यादातर ज्ञान अंग्रेजी में निकल रहा है। उसका एक फीसदी भी हिंदी में आने में दस साल लग जाते हैं। उसकी भी कोई गारंटी नहीं है कि हिंदी में वह आएगा ही। इसलिए हर ज्ञान पिपासु अंग्रेजी की शरण में जाने को बाध्य है।

यूरोप के देश अब तक इस देवी के सामने सर नहीं झुकाते थे। लेकिन अब वे भी अपनी-अपनी देवियों - जर्मन, फ्रेंच के साथ-साथ अंग्रेजी की भी आराधना करने में लगे हैं। कारण यह कि जो किताब आज अंग्रेजी में आई है वह जर्मन और फ्रेंच में आने में साल दो साल तो लग ही जाएंगे। और आज दुनिया जिस तेजी से आगे बढ़ रही है उस तेजी के सामने एक-दो साल बड़ा लंबा समय है। हमारे हिंदी वाले भाई दांतों तले अंगुली दबा लें कि हमारे यहां तो अंग्रेजी में उपलब्ध ज्ञान का पचास साल में भी अनुवाद नहीं हुआ और किसी ने चूं तक नहीं की। ये जर्मनी, फ्रांस वाले किताबी कीड़े होते होंगे या फिर अहमक होंगे जो ज्ञान जैसी चीज के लिए दूसरों की भाषा सीखते हैं (हमारे लिए तो मलेच्छ हैं)।

अब तो भाषा को लेकर अहंकारी चीन और जापान ने भी अंग्रेजी सीखना शुरू कर दिया । स्कूलों में अंग्रेजी एक विषय के तौर पर लेना अनिवार्य कर दिया है। आखिर आने वाली पीढ़ी को इंटरनेट पर दुनिया भर के लोगों से बातचीत करनी है, चिट्ठी-पत्री करनी है, चीनी-जापानी के भरोसे बैठे रहोगे तो कुएं में मेंढक बन जाओगे।

एक उदाहरण है। अक्सर देखा जाता है कि हिंदी पत्रकार बिरादरी में कुछ लोग असम और पूर्वोत्तर के अन्य राज्यों की समस्याओं के बारे में ऐसी बातें करते हैं जो किसी मूर्ख के मुंह पर ही शोभ सकती है। अपने ही देश के बारे में घोर अज्ञानता का कारण यह है कि हिंदी में अब तक असम के बारे में एक भी स्तरीय राजनीतिक पुस्तक उपलब्ध नहीं है। अब जिस आदमी ने अंग्रेजी देवी की कभी आराधना नहीं की, वह अपने ही देश के बारे में सही समझ कैसे विकसित कर सकता है। या तो आप अपनी भाषा में ज्ञान लाइए, या उस भाषा को सीखिए जिसमें वह ज्ञान उपलब्ध है - यह सब न करके मूर्तिभंजकों की तरह "अंग्रेजी हटाओ' का नारा देने का नतीजा यह हुआ है कि देश की हिंदी पट्टी में दो तरह के स्कूल खुल गए हैं। एक आम जनता के लिए, जिन्हें सरकारी स्कूल कहा जाता है। इन स्कूलों में पढ़ने वाला बच्चा अंग्रेजी तो दूर जोड़-घटाव भी ठीक तरह से नहीं सीख पाता। दूसरे हैं, निजी स्कूल, जिन्हें अंग्रेजी स्कूल कहा जाता है। गांवों-कस्बों में ये स्कूल छोटे-मोटे उद्यमी लगाते हैं, जहां सारी जरूरी सुविधाएं उपलब्ध नहीं होतीं। पत्रकार बंधु इनके आगे हमेशा "कुकुरमुत्तों की तरह उग आए' यह वाक्यांश जोड़ना नहीं भूलते। वे यह छिपाना नहीं चाहते कि उन्हें इन स्कूलों का "उगना' पसंद नहीं है। लेकिन गांव-कस्बे-शहर में जिस किसी के पास भी साधन है, वह अपने बच्चे को इन अंग्रेजी स्कूलों में ही भेजना पसंद करते हैं। ऐसे सर्वेक्षण हो चुके हैं, आगे और भी करवा लीजिए, आप पाएंगे कि अधिकांश हिंदी पत्रकारों-लेखकों-प्रोफेसरों के बच्चे अंग्रेजी स्कूलों में पढ़ते हैं। है न अंग्रेजी मैया का चमत्कार।

हिंदी पट्टी वालों ने काफी सालों तक सोचा कि हमारा विकास तो वैसे भी हो जाएगा। इसलिए वे राष्ट्र के, राष्ट्रभाषा के, राष्ट्रीयता के गीत गाते रहे। लेकिन ये गीत बस दक्षिण वालों, आसाम-बंगाल को सुनाने के लिए थे। उनके अपने घर में झांककर देखिए बड़ी दरिद्रता है। किसी राह चलते हिंदी वाले से कोई पूछ ले कि भैया जैसे बंग्ला में सुनील गंगोपाध्याय है, वैसे आपके यहां कौन हैं? इस बात की गारंटी दी जा सकती है कि कोई जवाब नहीं मिलेगा, या यह भी हो सकता है जवाब प्रेम वाजपेयी या रानू या ओमप्रकाश शर्मा मिले। अपनी ही भाषा के महान साहित्यकारों के बारे में अनभिज्ञ हिंदी पट्टी के लोग आज भाषा के मामले में सबसे ज्यादा गरीब हैं। उनमेें से ज्यादातर सिर्फ एक भाषा जानते हैं, जबकि देश के दूसरे राज्यों के ज्यादातर लोग अपनी प्रादेशिक भाषा के अलावा हिंदी और अंग्रेजी भी जानते हैं। उन्हें सीखना पड़ता है। हिंदी वाले भला प्रादेशिक भाषा क्यों सीखे। वे तो राष्ट्रीयता का झंडा लहराने वाले लोग हैं। क्षेत्रीयतावाद से उनका दूर-दूर तक रिश्ता नहीं। अंग्रेजी उन्होंने इसलिए नहीं सीखी क्योंकि इसके दो फायदे हैं। एक तो विदेशी भाषा सीखने की मेहनत से मुक्ति मिल गई, दूसरे देशभक्ति का एक काम हो गया। जैसे असम में किसी हिंदीभाषी को गाली देने से दो लाभ होते हैं- एक तो इलाके में धौंस जम जाती है, दूसरे असमी मां की सेवा हो जाती है। आखिर देश/प्रदेश के प्रति इतना कर्त्तव्य तो होना ही चाहिए।

रविवार, 16 नवंबर 2008

साले सेकुलर कहीं के

एक नई गाली चल निकली है "ये साले सेकुलर कहीं के'। किसी कुत्ते को गोली मारनी हो तो पहले उसे बदनाम कर दो। वक्त के द्वारा परखी हुई इसी तकनीक का इस्तेमाल इस समय सेकुलरिज्म के खिलाफ हो रहा है।



इसी तरह कम्युनिस्टों की शब्दावली में एक गाली दशकों से चली आ रही है "बुर्जुवा कहीं का'। जब किसी कम्युनिस्ट कार्यकर्ता को किसी उदारवादी के विचार समझ में नहीं आते या उसका उत्तर नहीं सूझता तो वह उस पर कोई न कोई लेबल चस्पां कर देता है। सबसे पंसदीदा लेबल यही होता है "बुर्जुवा'।



कल एक संघ समर्थक के साथ ट्रेन में सफर करना हुआ। बात करने समय उसका बार-बार उत्तेजित हो जाना कानों में चुभने वाला था। ऐसे में कोई संवाद स्थापित करना संभव ही नहीं होता। मसलन हमारे उन मित्र ने कहा कि बांग्लादेशी के मुद्दे पर तो तुमसे बात करके कोई फायदा नहीं है। इस बात पर ध्यान गया कि कोई भी कट्टरपंथी बात-बात पर उत्तेजित क्यों हो जाता है? ऐसा मुस्लिम कट्टरपंथी, कम्युनिस्ट कट्टरपंथी सबके साथ होता है। उनके साथ संवाद स्थापित नहीं हो पाता। शायद उन्हें संवाद की कोई वास्तविक जरूरत नहीं होती होगी। उनकी पवित्र किताबों में सारी समस्याओं के समाधान दिए हुए होंगे।



कट्टरपंथी आम तौर पर मुद्दों की चीरफाड़ करने के विरोधी होते हैं। जैसे, आप यदि कहें कि अमुक कंपनी अपने कर्मचारियों का काफी ध्यान रखती है। तो कोई कम्युनिस्ट कार्यकर्ता तुरंत आपके लिए यह धारणा बना लेगा कि आप उस कंपनी के पिट्ठू हैं। अपने विरोधी की कोई प्रशंसा सुनना उसे गवारा नहीं।



इसी तरह किसी हिंदुत्ववादी से कहें कि मुसलमानों में आपसी भाईचारे की भावना बड़ी तगड़ी है तो वह कहेगा कि "साले सेकुलरों में तो हिंदुओं के सिवा हर किसी में गुण नजर आते हैं। उन्हें बुराई केवल हिंदुओं में नजर आती है।'



यह तो हुई साधारण कार्यकर्ता की बात, लेकिन जो तपे-तपाए हिंदुत्ववादी, मुस्लिम कट्टरपंथी या कम्युनिस्ट हैं वे ऊपर से काफी सुलझे हुए लगेंगे। यानी वे आपकी बात शांति से सुनेंगे लेकिन जब वे आपके साथ बहस करने से कतराएंगे तो आपको तुरंत आभास हो जाएगा कि वे "विधर्मियों' के साथ बहस करने को समय को दुरुपयोग समझते हैं।



हर तरह के कट्टरवाद के कुछ गुणों में काफी समानता होती है। यह अध्ययन दिलचस्प है। जैसे यह कि, ऐसा लगता है कि कट्टरपंथी के मन में सदियों का गुस्सा पूंजीभूत है और वह झटके के साथ कोई परिवर्तन चाहता है और अपने विचारों का विरोध करने वालों को ही इसमें मुख्य बाधा मानता है। राजनीतिक या सांप्रदायिक हिंसा क्या इसीसे जन्मती है?