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Journalist and writer, Writes on Northeast India, Bangladesh, Myanmar
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मंगलवार, 24 मई 2016

असम में राजनीति के साइड इफेक्ट्स

असम ने भारतीय जनता पार्टी को अभूतपूर्व जीत दिलाकर एक चक्कर पूरा कर लिया है। यह चक्कर जय आई असम से शुरू हुआ और अब भारत माता की जय तक आकर पूरा हुआ है। जय आई असम का मतलब होता है असम माता की जय। असमिया साहित्य में इस नारे या वाक्य की उपस्थिति काफी पहले से है। ज्योतिप्रसाद अगरवाला की कविता से लेकर भूपेन हजारिका के गीतों तक जय आई असम की उपस्थिति हम पाते हैं। लेकिन यह नारा सबसे अधिक लोकप्रिय हुआ 1979 में जब असम के लोगों ने असमिया भाषा और संस्कृति को बचाने के लिए एक जबरदस्त आंदोलन छेड़ा था। इस असमिया डर कि पड़ोसी बांग्लादेश के कारण असम की भाषा और संस्कृति बस कुछ ही दिनों की मेहमान है 1979 में लोगों पर इस कदर हावी हो गया कि उसकी परिणति एक जबरदस्त आंदोलन में हुई। उसी आंदोलन की उपज आज की असम गण परिषद और प्रफुल्ल कुमार महंत हैं।

एक बात गौर करने लायक है कि इस जबरदस्त जनजागरण के बाद 1985 में जो पहला चुनाव हुआ उसमें जनजागरण का नेतृत्व करने वाली शक्ति असम गण परिषद (पार्टी आंदोलन के बाद बनी थी) को इतनी अधिक सीटें नहीं मिली थीं जितनी इस बार भारतीय जनता पार्टी और उसकी सहयोगी असम गण परिषद और बोड़ो पीपुल्स फ्रंट को मिली हैं। हमारा मानना है कि 1985 में असम में रहने वाले गैर-असमिया हिंदुओं तथा जनजातीय समुदायों ने असम गण परिषद का साथ नहीं दिया था जिसके कारण उसे असमिया राष्ट्रवादी आंधी के बीच भी एक-एक सीट के लिए संघर्ष करना पड़ा था। लेकिन इस बार भारतीय जनता पार्टी को इन दोनों समुदायों का भी पूरा समर्थन मिला। इसी की परिणति यह रही है कि पहली बार के लिए असम में किसी चुनावपूर्व गठबंधन को इतनी अधिक सीटें मिल पाईं। मतदान के पैटर्न में आए इस बदलाव को ही हमने जय आई असम से भारत माता की जय तक की यात्रा कहा है।

1985 का चुनाव असमिया पहचान को बचाने के मुद्दे पर लड़ा गया था। पड़ोस में बांग्लादेश के होने और वहां से आने वाले लोगों की सतत धारा के कारण यह मुद्दा काफी पहले से असम में होने वाले किसी भी विमर्श के केंद्र में रहा है। स्वाधीनता के पहले के लेखन में भी हम देखते हैं कि इस मुद्दे का काफी असर था। लेकिन चुनाव में शायद पहली बार 1985 में ही इस मुद्दे की केंद्रीय उपस्थिति रही। इसके बाद मुख्यमंत्री बने प्रफुल्ल कुमार महंत की नाकामयाबियों के कारण लोगों में निराशा फैली। इस निराशा का परिणाम दो तरह से सामने आया। राजनीति से पहचान का मुद्दा गायब हो गया। लोगों को लगने लगा कि अब शायद असमिया भाषा और संस्कृति को बचाने के लिए कुछ नहीं हो सकता। दूसरी ओर, उग्र विचारधारा के एक वर्ग ने अल्फा के माध्यम से अपने विचारों को अभिव्यक्त किया। उनका मानना था कि भारत के हिस्से के रूप में रहकर बांग्लादेशियों के खतरे से हम अपने आपको सुरक्षित नहीं कर सकते। हमें पूर्वोत्तर के दूसरे राज्यों के साथ मिलकर अपना अलग देश बनाना चाहिए। किसी समय असम में इस विचारधारा के समर्थक लोगों की अच्छी खासी संख्या थी। यह वह दौर था जब असम भारत माता की जय के ठीक विपरीत छोर पर खड़ा था।

असम की छवि उस विद्रोही युवक की थी जिसे हर किसी से शिकायत थी। वह अपनी समस्या से सिर्फ अपने बूते पर निपट लेना चाहता था। यह मानसिकता 1979 के असम आंदोलन से शुरू हुई थी। गैर-असमियाभाषी समुदायों के समर्थन की उस आंदोलन में आकांक्षा तो थी, लेकिन उसके दिल में उसके लिए कोई मूल्य नहीं था। यह समर्थन उसे सिर्फ अपने ऊपर लगने वाले संकीर्णता के आरोपों से छुटकारा पाने के लिए चाहिए था। उस दौर के राजनीतिज्ञों ने जय आई असम और भारत माता की जय को दो विपरीत ध्रुवों पर खड़ा कर दिया था। जब जय आई असम के नारे लगते तो चाय बागान के मजदूरों को यह डर सताता कि यह कहीं हमें वापस झारखंड और उड़ीसा भेजने के लिए तो नहीं है। बोड़ो जैसी जनजातियों को डर लगता कि यह कहीं हमारी भाषा को खत्म करने के लिए तो नहीं है।

1979 से शुरू हुआ असमिया पहचान का आंदोलन हालांकि 1985 में समाप्त हो गया लेकिन उसके पीछे काम करने वाली विचारधारा आगे भी जारी रही। यह विचारधारा अपने उग्र से उग्रतम दौर को देख चुकी है और असम उसकी परिणतियों को झेल चुका है। ऐसा भी दौर आया जब उग्रवाद के विरुद्ध चले सैन्य अभियान को लेखकों और पत्रकारों ने असम पर भारत के हमले के रूप में दर्शाने की कोशिश की थी। इस तरह असमिया पहचान को बचाए रखने की जद्दोजहद 1990 के बाद या तो उग्रवादियों के हाथ में चली गई या उसकी आग मंद पड़ गई। आम राजनीति से यह गायब हो गई। लेकिन पिछले करीब एक दशक से हम देखते हैं कि असमिया पहचान को बचाने की यह अकुलाहट फिर से असमिया जनमानस में दिखाई देने लगी। इसका एक कारण बदरुद्दीन अजमल के नेतृत्व में एक ऐसी पार्टी का असम में उत्थान होना था जिसका नेता जमीयत उलेमा ए हिंद जैसे शुद्ध रूप से धर्म आधारित संगठन के भी बड़े पद पर था। लोग आपसी बातचीत में यह चर्चा करने लगे कि क्या बदरुद्दीन अजमल एक दिन असम के मुख्यमंत्री बन जाएंगे। यह किसी व्यक्ति विशेष के विरुद्ध विद्वेष की अभिव्यक्ति नहीं थी बल्कि असम का राजनीतिक नेतृत्व असमियाभाषी समुदाय के हाथ से हमेशा के लिए छिन जाने की उस आंशका के सही होने के कगार पर आने की पीड़ा थी जिसके प्रति स्वाधीनता से पहले के बुद्धिजीवियों ने भी आगाह किया था।

इस समय असम गण परिषद और इसके नेता प्रफुल्ल कुमार महंत की साख कैसी थी इसका अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि अखिस असम छात्र संघ ने प्रफुल्ल कुमार महंत का सार्वजनिक स्थानों पर बहिष्कार करने का आह्वान कर रखा था। महंत असमिया समुदाय के लिए असहनीय हो गए थे क्योंकि उन्होंने अपने मुख्यमंत्रित्व काल में दर्जनों अल्फा उग्रवादियों के नेताओं के परिवार वालों का सफाया करवा दिया था। लोग अल्फा का समर्थन नहीं करते थे लेकिन रात के अंधेरे में नकाबपोश हत्यारे आएं और निरीह परिवार वालों का कत्ल कर जाएं यह भी लोगों के लिए अस्वीकार्य था।

ऐसे ही समय में खाली स्थान को भरने के लिए भाजपा राजनीतिक दृश्यपटल पर आई। भाजपा का असम में काफी पहले से काम चल रहा था। असम के चाय बगीचों में जिन्हें हाल तक कांग्रेस का गढ़ कहा जाता था भाजपा ने चुपचाप काम किया और बगीचे के कई पीढ़ियों से असम में रहने वाले आदिवासी मूल के मजदूरों को कांग्रेस से विमुख कर दिया। जिन समुदायों को असम गण परिषद अपने उत्कर्ष के दिनों में भी अपने साथ नहीं कर पाई वे समुदाय बड़ी आसानी से भाजपा के साथ आ गए। इनमें बंगाली हिंदुओं का नाम लिया जा सकता है क्योंकि पूर्वी पाकिस्तान या बांग्लादेश से आने वाले लोगों हिंदुओं को भारत में शरणार्थी का दर्जा देने का ऐलान भाजपा ने ही किया है। इसकी अस्सी और नब्बे के दशक के उन दिनों से तुलना की जानी चाहिए जब असमिया राष्ट्रवाद का मतलब ही बंगाली हिंदुओं का विरोध करना था।

पिछले दो-तीन सालों से साफ लगने लगा था कि असम में अब मौका मिलते ही लोग भाजपा को सत्ता सौंप देंगे। इसका संकेत पालिका चुनावों और दो साल पहले हुए लोकसभा चुनावों में मिल चुका था। इसका कारण कांग्रेस का दूसरा विकल्प न होना तो था ही, असमिया समुदाय को यह भी लगने लगा कि उसकी पहचान की लड़ाई भारत माता की जय कहकर अधिक प्रभावी ढंग से लड़ी जा सकती है। किसी भी चुनाव के बाद समाज में कटुता फैलने के उदाहरण कई हैं लेकिन असम में हमें यह संभावना दिख रही है कि इन चुनावों के बाद समाज के विभिन्न हिस्सों में एकता बढ़ेगी। धार्मिक आधार पर चुनावों के पहले ध्रुवीकरण निःसंदेह हुआ है लेकिन असमिया समुदाय स्वाभाव से सांप्रदायिक नहीं है इसलिए एक उम्मीद भी है। दूसरी ओर, विगत वर्षों में असम को कई स्तरों पर ध्रुवीकरण के कटु अनुभव से गुजरना पड़ा है। उच्च वर्ण बनाम जनजातीय ध्रुवीकरण, असमिया बनाम गैर-असमिया ध्रुवीकरण जैसे ध्रुवीकरण समाज के लिए घातक तो रहे ही हैं, असमिया पहचान को सुरक्षित करने के एजेंडा को आगे ले जाने में भी सहायक नहीं हुए हैं। असम में भाजपा सरकार के आने के बाद यदि मूल असमिया समुदाय में यह भावना प्रबल होती है कि हमें अपनी समस्याओं का हल जनजातीय समुदायों, गैर-असमियाभाषी समुदायों, चाय बगीचा मजदूर समुदाय और केंद्र सरकार के सहयोग के साथ करना है, तो इसे राजनीति का अच्छा साइड इफेक्ट ही कहा जाएगा।

बुधवार, 14 अगस्त 2013

झंडा फहराएं

पुस्ताक्यल
1979 तक असम में स्वाधीनता दिवस और गणतंत्र दिवस पर कुछ न कुछ कार्यक्रम अवश्य होते थे। कम-से-कम लोग अपने घरों पर झंडा तो अवश्य फहराते थे। बाद में विदेशियों के विरुद्ध हुए आंदोलन का पहला शिकार राष्ट्रीय पर्व हुए। लोगों की झंडा फहराने की आदत एक बार छूटी तो फिर छूटी ही रह गई। 1982 में एक बार उत्तर प्रदेश के एक छोटे शहर में जाना हुआ। वहां 15 अगस्त को ही हमारा बाहर कुछ छोटे-छोटे कस्बों में घूमने का कार्यक्रम था। मुझे यह देखकर धक्का लगा कि देश के इस हृदय स्थल में भी स्कूल, पुलिस थाना और स्टेशन आदि सार्वजनिक इमारतों को छोड़कर निजी भवनों पर किसी ने झंडा फहराने की जहमत नहीं उठाई थी। राष्ट्रीय पर्व के उल्लास का क्षय वहां असम से पहले ही शुरू हो गया होगा।

इसलिए असम में अपने घर पर झंडा नहीं फहराने का कारण जब कोई उग्रवादियों का काल्पनिक डर बताता है तो मुझे उत्तर प्रदेश की वह घटना याद आ जाती है। वे उत्तर प्रदेशवासी क्या तर्क देते होंगे - टीवी पर धुआंधार बहस के जरिए किसी ने इसके लिए हमें उकसाया ही नहीं, झंडा फहराने से हमें क्या लाभ होने वाला है, झंडा नहीं फहराने से हमें कौन-सा जुर्माना लगने वाला है, या फिर यह कि झंडा फहराने का हमारे धर्म, भाषा, जाति से कोई संबंध तो है नहीं फिर हम क्यों झंडा फहराएं।

जब भाषा, जाति, समुदाय या क्षेत्र के नाम पर राष्ट्र को कमजोर करने वाली भावनाओं का इजहार इतना खुलेआम होता है तो हम अपने राष्ट्रप्रेम का प्रदर्शन करने के मौके को क्यों गवां देते हैं। इसके लिए हम न्यूनतम अपने घर की छत पर, अपनी गाड़ी पर आज के दिन राष्ट्रीय पताका तो लगा ही सकते हैं। यह न्यूनतमम है। जो पर्वत का बोझ नहीं उठा सकते वे सर के दो बोझे तो कम कर ही सकते हैं। सागर नहीं उलीच सकते तो आंखों के दो आंसू तो हर ही सकते हैं।

जो ज्यादा करना चाहते हैं वे बहुत कुछ कर सकते हैं। स्कलों-कालेजों में रात को रोशनी करनी चाहिए, डीनर पार्टी करनी चाहिएष राजनीतिक दलों को सेमीनार करने चाहिए, सामाजिक संस्थाओं को बच्चों के लिए क्वीज करनी चाहिए, शाम को नाटक आयोजित करने चाहिए, आतिशबाजी करनी चाहिएष सार्वजनिक मैदान या भवन में प्रदर्शनी करनी चाहिए, महत्वपूर्ण आयोजनों की शुरुआत जैसे पुस्तक मेला, नाट्य समारोह, स्कूल या कालेज सप्ताह की शुरुआत 15 अगस्त या 26 जनवरी से ही करनी चाहिए।

किसलिए हम इन दो दिनों को अलसाए-से, मरे-मरे, उदास-उदास, पड़े-पड़े, ताश खेलकर, टीवी से चिपककर बिताएं! आखिर ये दो दिन उस घटना की याद दिलाते हैं जब विश्व में एक नए तरह के राष्ट्र का उदय हुआ। विद्वानों ने कहा था कि भाषा या धर्म या इतिहास का सहारा नहीं होने के कारण यह राष्ट्र बन नहीं सकता। हमने बनाया। विद्वानों ने कहा कि यह टिक नहीं सकता। हमने टिकाया। 


हमारा राष्ट्र एक ऐसा पौधा है जिसके बारे में अनुभवी बागवानों का कहना है कि यह पौधा इस मिट्टी में पनप नहीं सकता। इसलिए हमारा और भी यह कर्तव्य हो जाता है कि हर 15 अगस्त और 26 जनवरी को इसे श्रद्धा से सींचें और बागवानों को गलत साबित कर दें। आखिर बहुत-सी फसलों को नए भूगोल में पहुंचाने के प्रयोग इस दुनिया में होते ही रहे हैं।

शनिवार, 25 अगस्त 2012

असम की चिट्ठी

 असम में ईद ठीकठाक ढंग से बीत जाने पर देश भर में लोगों ने राहत की सांस ली है। लेकिन असम से ज्यादा दक्षिण भारत और महाराष्ट्र को लेकर ज्यादा चिंता थी क्योंकि धमकी भरे असएमएस बेंगलुरू और पुणे में ही दिए गए थे। पूर्वोत्तर से वहां गए प्रवासी इसीलिए वहां से भाग आए थे। पहले ही इस बात का अहसास था कि यह एक हौवा है, ईद आएगी और चली जाएगी और कुछ होगी नहीं। क्योंकि भारत में हिंसा पहले से कहकर नहीं आती। वह जब आती है तो बिना किसी पूर्व सूचना के आती है। लेकिन पूर्वोत्तर के लोगों के भागने की घटना ने असम को देश के एजेंडा में सबसे ऊपर रख दिया है। दो साल बाद होने वाले लोकसभा चुनावों पर भी असम की घटनाओं का प्रभाव पड़े बिना नहीं रहेगा। इतिहास में पहली बार ऐसा हुआ है जब असम और पूर्वोत्तर पर देश का इतना ज्यादा ध्यान गया है। यदि यह ध्यान सुचिंतित समाधानों की ओर बढ़ता है तो इसे एक सकारात्मक घटना माना जाएगा। लेकिन देखा जा रहा है कि राजनीतिक दल चीजों को सिर्फ सतही ढंग से देखने में व्यस्त हैं, इसलिए आश्चर्य नहीं होना चाहिए यदि असम की समस्या पहले की अपेक्षा ज्यादा उलझ जाए। इससे पहले भी हमने लिखा था कि असम आंदोलन के दौरान आसू तथा असम गण संग्राम परिषद ने कुछ समूहों को भारत की विभिन्न दिशाओं में यह बताने के लिए भेजा था कि असम की वास्तविक समस्या क्या है। क्यों देश को असम की समस्या पर ध्यान देना चाहिए और किस तरह यह समस्या आने वाले कल को सारे देश को अपने आगोश में ले लेगी। 1980 में जो भविष्यवाणी की गई थी वह आज सच साबित हो रही है। विश्लेषण हमेशा गलत साबित नहीं होते, यह अलग बात है कि कई बार वे उससे ज्यादा वक्त ले लेते हैं जितने का अनुमान किया जाता है। अब एक बार फिर समय आ गया है कि असम की समस्या के बारे में ठीक-ठीक और बिना राजनीतिक रंग वाली जानकारी देने के लिए बुद्धिजीवी देश के दूसरे हिस्सों में जाएं और बताएं कि असम की समस्या का हल क्यों बाकी देश के भी हित में है। 

1980 में इंटरनेट नहीं था, आज इंटरनेट है। अखिल असम छात्र संघ और पूर्वोत्तर छात्र संगठन अपनी एक वेबसाइट खोलकर समस्या पर अपने नजरिए को इस पर डाल सकते हैं। 1980 में असम और पूर्वोत्तर के बारे में अंग्रेजी में भी नगण्य सामग्री उपलब्ध थी। किसी पत्रिका में कुछ निकलता था तो हम उसे चाट जाते थे। आज अंग्रेजी में काफी सामग्री और पुस्तकें उपलब्ध हैं। लेकिन हिंदी तथा अन्य भाषाओं में आज भी स्थिति दरिद्रता की है। आश्चर्य ही क्या कि हिंदी पट्टी के पत्रकारों-बुद्धिजीवियों का असम-विवेचन कई बार हास्तास्पदता की सामाएं छूता है।

कर्नाटक और महाराष्ट्र सरकार ने पूर्वोत्तर वासियों को वहां से भागने से रोकने के लिए जो प्रयास किए वे आंखें खोलने वाले हैं। खासकर पूर्वोत्तर के राजनीतिज्ञ तो इस जन्म में कभी वह सब नहीं कर सकते जो कर्नाटक सरकार ने किया है। पूर्वोत्तर में बाहरी राज्यों से काफी लोग आकर बसे हुए हैं, जबकि दो दशक पहले तक पूर्वोत्तर से कोई इक्का-दुक्का लोग ही बाहर जाते थे। स्थायी रूप से बसने के लिए तो कोई नहीं जाता था। अब दो दशकों से पढ़ाई के लिए जो लोग जाते हैं उनमें से बहुतेरे वहीं नौकरी करने लग जाते हैं। बाहरी राज्यों से पूर्वोत्तर में बसे लोगों को कभी अच्छी नजर से नहीं देखा गया। हो सकता है व्यक्तिगत स्तर पर किसी को कोई असुविधा नहीं हुई हो, लेकिन एक समूह के रूप में बाहरी राज्यों से आए लोगों के लिए समाचारपत्रों में खुले रूप में आज भी तिरस्कारपूर्ण शब्दों के इस्तेमाल को एक सामान्य बात माना जाता है। कई जगह इस तरह की पंक्तियां पढ़ने को मिल जाती हैं कि "असम एक चरागाह है जहां ये लोग चरने आ जाते हैं।'

आज जब हम देखते हैं कि एक राज्य का उप-मुख्यमंत्री असम सिर्फ इसलिए आता है कि उनके राज्य की राजधानी से भागकर आए लोगों को सुरक्षा का आश्वासन दिया जा सके। महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री रियायती दर पर हवाई जहाज उपलब्ध कराने की पेशकश करते हैं। घटनाएं घटती हैं और दिन गुजरने के साथ भुला दी जाती हैं या लोग सोचते हैं कि भुला दी जाती होंगी। लेकिन क्या सचमुच घटनाएं भुला दी जाती हैं। एक-एक घटना एक-एक समुदाय की विश्व दृष्टि यानी चीजों के प्रति नजरिए को बदलने वाली होती है। सिर्फ उन लोगों के लिए नहीं जिन्होंने उन घटनाओं को देखा और भोगा है। बल्कि उनकी आने वाली पीढ़ियां भी उन घटनाओं की छोटी से छोटी तफसील, उन घटनाओं से पैदा हुए "ज्ञान' को ग्रहण करते हुए बड़ी होती हैं। ऐसी घटनाओं के समय विभिन्न लोगों - पड़ोसियों, शहरवासियों, सरकारों - द्वारा दिखाए गए आचरण को वे भविष्य में एक कसौटी के रूप में इस्तेमाल करते हैं। तभी तो असमवासी 1962 के ीचन युद्ध के समय पंडित नेहरू के कहे शब्दों को आज भी याद करते हैं। नगा युवा अपने बुजुर्गों से खोनोमा गांव के कत्लेआम की कहानियां सुनकर बड़ा होता है।

कर्नाटक और महाराष्ट्र की सरकारों ने अपने शहरों में रहने वाले प्रवासियों के प्रति जो संवेदनशीलता दिखाई है वह भविष्य के लिए एक नजीर बन जाएगी। "हिंदुस्तान एक है यहां हर कहीं हर किसी को रहने का हक है।' बेंगलुरु स्टेशन पर खड़े एक पूर्वोत्तरवासी को टीवी कैमरा के सामने यह नारा लगाते सुनना सुखद लगा था। इस नारे की प्रतिध्वनि हो सकता है भविष्य में पूर्वोत्तर में भी सुनाई दे। हो सकता है कभी यह भाव भी जाग्रत हो कि जब समय की मांग हुई थी तब हमने इस वाक्य के मर्म को अपने राज्य में लागू नहीं किया था।

शनिवार, 4 अगस्त 2012

इस तरह हुआ जातीय सफाया

"दिन में करीब तीन बजे का समय होगा, वे लोग एक तरफ से आए, उनमें से कुछ के मुंह काले कपड़े से ढंके हुए थे, वे मिलिट्री जैसी पोशाक पहने हुए थे, हाथों में बंदूकें थीं, जिनसे वे गोलियां छोड़ते जा रहे थे। क्या कहा आपने, गोली किसी को लगी क्या...जी मेरे ही पैर के पास से गोली पार हो गई। वे लोग हमारे मवेशियों को मारते जा रहे थे।''

यह कहना है 55 वर्षीय नूर इस्लाम का। नूर इस्लाम धुबड़ी जिले के बिलासीपाड़ा कस्बे के रोकाखाटा हाई स्कूल में लगे राहत शिविर में अपने परिवार तथा अन्य करीब चार हजार लोगों के साथ रुका हुआ है। यह घटना मंगलवार (24 जुलाई) की है। तब तक सेना को नियुक्त नहीं किया गया था। यह बातचीत हम शुक्रवार को कर रहे हैं। चार दिन में ही शिविर में हाल बेहाल है। डिसेंट्री और बुखार की शिकायतें आम हैं। कुछ महिलाएं गर्भवती हैं, तो कुछ की गोद में एक महीने से भी छोटा बच्चा है। सरकार ने चावल, दाल और सरसों तेल भेज दियाहै। बाकी चीजें जैसे जलावन और बच्चों के लिए दूध कहां से आएगा। बिलासीपाड़ा के स्वयंसेवी संगठन, मारवाड़ी व्यवसायियों का संघ ये लोग राहत शिविर वासियों के लिए आगे आए हैं। इस संवाददाता के सामने ही एक आटो से आवश्यक वस्तुएं उतारी जा रही हैं।

""सरकार की ओर सिर्फ एक दिन एक मोबाइल डिस्पेंसरी आई थी। उनके पास सिर्फ नोरफ्लोक्सेसिन टैबलेटें (डिसेंट्री में काम आने वाली दवा) थीं। उनके साथ स्वास्थ्य विभाग के ज्वाइंट डाइरेक्टर थे। हमने कहा कि इस मरीज को सेलाइन चढ़ाने की जरूरत है, तो डाइरेक्टर महोदय ने हमें बुरी तरह डांट दिया और चलते बने। उसके बाद से शिविर की सुध लेने कोई सरकारी नुमाइंदा नहीं आया।''
 


चिरांग जिले के पुरान बिजनी के स्कूल में स्थापित शिविर के बाहर रास्ते पर ही मरीजों को सेलाइन चढ़ाने में मदद करने में व्यस्त जाकिर ये बातें क्षोभ के साथ बताता है। वहां एक पेड़ के नीचे करीब सात-आठ मरीजों का इलाज चल रहा है। एक को छोड़कर बाकी सभी महिलाएं हैं। स्थानीय लोग यहां भी मदद कर रहे हैं। एक निजी प्रैक्टिस करने वाले चिकित्सक अपनी सेवाएं दे रहे हैं। तब तक हमारे पीछे से एक करीब साठ वर्षीय पुरुष को सहारा देकर वहां लाया जाता है। क्या हुआ? ""यहां लगभग सभी को डायरिया हो रहा है। इसमें सेलाइन ही चढ़ानी पड़ती है। टेबलेट से काम नहीं होता। स्थानीय स्वयंसेवी संगठन ने कुछ सेलाइनें खरीद दी हैं,'' इलाज में व्यस्त डाक्टर पेड़ की टहनी से सेलाइन की बोतल लटकाने का प्रयत्न करते हुए धीरज के साथ बताते हैं। ""जल्दी ही बड़े रूप में मदद नहीं आई तो डायरिया कमजोर बच्चों की जान लेने लग जाएगा।''

चिरांग जिले में हिंसा देर से फैली है। ये लोग 25 तारीख से शिविर में हैं। आज 28 है। सरकार के यहां "जल्दी' जैसा कोई शब्द नहीं है। सब कुछ अपनी मस्त सरकारी चाल से होता है। मौतें होंगी और उन पर मीडिया में हो-हल्ला होगा, उसके बाद इलाके में चिकित्सा पहुंचेगी। यह हाल अंदरुनी गांव का नहीं, बिजनी सब-डिवीजन के एसडीओ के दफ्तर से महज तीन किलोमीटर दूरी का है। (4 अगस्त तक शिविरों में कम-से-कम तेरह बच्चों के मारे जाने के समाचार आते हैं। हमें हमारी आशंका सच साबित होने का दुख है।)

बिजनी में आल बीटीसी मुस्लिम छात्र संघ का कार्यकारी अध्यक्ष शाहनवाज प्रामानिक मिल जाता है। यह संगठन इस बार इस फसाद के केंद्र में है। कल तक शाहनवाज नामक यह युवक गैर-बोड़ो समुदायों के साथ भेदभाव का विरोध करने में आगे-आगे चलता था। आज वह खुद अपना घर-खेत छोड़कर एक शिविर में टिका हुआ है। क्या लोग अपने घरों को लौट जाएंगे? शाहनवाज निश्चित तौर पर कुछ नहीं कह पाता। यही सवाल जब कोकराझाड़ जिले से भाग कर आए एक शरणार्थी से बिलासीपाड़ा में किया गया तो वह सिहर उठा। बोला- नहीं, हमें जोर-जबर्दस्ती भेजने पर भी हम नहीं जाएंगे।

हमले में आग्नेयास्त्रों का इस्तेमाल

कोकराझाड़, धुबड़ी और चिरांग जिलों के कई शिविरों में ठहरे भुक्तभोगियों से बात करने के बाद यह कामन पैटर्न उभर कर सामने आता है-(क) हमला लगभग हर जगह दोपहर के बाद किया गया (ख) हमलावर कोई मुंह ढंके हुए था और कोई खुले मुंह (ग) हमलावर बंदूक आदि से लैस थे और बैटल फेटीग पहने थे, (घ) हमलावर लोगों पर सीधे गोलियां चलाने की बजाय दीवारों, मवेशियों पर ज्यादा गोलियां चला रहे थे, (ङ) हमलावरों ने गांववासियों को घेर कर नहीं मारा। हमला लगभग हर जगह एक तरफ से हुआ ताकि दूसरी ओर से गांव वालों के भागने का रास्ता खुला रहे, (च) हमला करने वाले सिर्फ मुसलमानों के घरों को छांट कर उनमें आग लगा रहे थे। किसी भी अन्य समुदाय के गांव या घर पर हमला नहीं हुआ, (छ) लगभग हर जगह यह आरोप सामने आया कि हमला करने वाले पूर्व उग्रवादी संगठन बीएलटी के सदस्य थे। यह उग्रवादी संगठन स्वायत्त बोड़ो क्षेत्र के आंदोलन के नेतृत्व में था और स्वायत्त क्षेत्र के 2003 में गठन के बाद इसका विघटन कर दिया गया। अब बीएलटी के कैडरों को एक्स-बीएलटी कहकर पुकारा जाता है। आरोप लगते रहे हैं कि इन पूर्व उग्रवादियों के पास अब भी हथियार हैं तथा वे इलाके में आतंक का पर्याय हैं।

एक्स-बीएलटी और अलग बोड़ोलैंड की मांग करने वाले उग्रवादी संगठन एनडीएफबी के दोनों गुटों का मुस्लिम समुदाय से नाराज होने का कारण भी समझ में आता है, क्योंकि इन पूर्व तथा वर्तमान उग्रवादियों के आतंक के विरुद्ध आवाज उठाने वालों में मुस्लिम समुदाय ही आगे-आगे रहा है। यह घटनाक्रम पिछले लगभग तीन-चार महीनों से चल रहा था, जो तेज नजर वाले पत्रकारों, राजनीतिज्ञों, अधिकारियों से छिपा हुआ भी नहीं था।

टीवी पर निठल्ला चिंतन और मुद्दे से भटकाव

हिंसाग्रस्त क्षेत्र का दौरा करके लौटने के बाद जब स्थानीय और राष्ट्रीय टीवी पर चलने वाली चर्चाओं को सुनते हैं तो एक तरह से उन पर दया आती है। टीवी पर होने वाला चिंतन किन बिंदुओं के इर्द-गिर्द घूमता है? एक, इस बाल की खाल निकालने में खासा समय जाया किया जाता हैकि सेना भेजने में देर किस कारण हुई। कुछ राजनीतिज्ञों को इसमें मुख्यमंत्री को परेशानी में डालने का अच्छा मौका नजर आ रहा है। दो, अचानक बांग्लादेश से होने वाली अवैध घुसपैठ एक मुद्दा बन गई है। अवैध घुसपैठ को हिंसा का कारण बताना प्रकारांतर से वर्तमान हिंसा को जायज ठहराना है। सवाल है कि क्या अब अवैध घुसपैठियों से निपटने का यही तरीका रह गया है, जो बीटीएडी के पूर्व और वर्तमान उग्रवादियों ने अपनाया है?

वर्तमान हिंसा का असली कारण है बीटीएडी इलाके में पूर्व और वर्तमान उग्रवादियों पर प्रशासन का कोई नियंत्रण नहीं होना। कानून और व्यवस्था लागू करने वाली मशीनरी वहां इस मामले में अपने आपको असहाय पाती है। सेना बीटीएडी इलाके में नियुक्त है, लेकिन सिर्फ उग्रवाद विरोधी अभियान के लिए। इसका व्यावहारिक अर्थ है सिर्फ एनडीएफबी के वार्ता विरोधी गुट के विरुद्ध अभियान के लिए।

पूर्व बीएलटी कैडर या एनडीएफबी का वार्तापंथी गुट यदि आपराधिक गतिविधि में लिप्त पाया जाता है, तो उससे निपटने का दायित्व सेना का नहीं, राज्य पुलिस का है। कई संगठनों को लेकर बना गैर-बोड़ो सुरक्षा मंच पिछले तीन-चार महीनों से इसी मुद्दे पर राज्यवासियों का ध्यान आकर्षित करने का प्रयास कर रहा था। लेकिन मुद्दा चूंकि भटककर अवैध घुसपैठ पर केंद्रित हो गया है, तो इसका लाभ भी उन्हीं लोगों को मिलेगा जो वर्तमान हिंसा के लिए जिम्मेवार रहे हैं।

बुधवार, 4 जुलाई 2012

एयरपोर्ट पर तीन मिनट और मीडिया से परहेज



प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और सोनिया गांधी के असम के बाढ़ पीड़ित इलाकों का हवाई सर्वेक्षण करने के बाद गुवाहाटी में मीडिया को ब्रीफ करने का कार्यक्रम था। मुख्यमंत्री सहित असम सरकार के नुमाइंदों के साथ एयरपोर्ट पर ही एक बैठक हुई और इसके बाद प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह, यूपीए अध्यक्ष सोनिया गांधी और मुख्यमंत्री तरुण गोगोई उनके इंतजार में बैठी मीडिया के पास आए। प्रधानमंत्री ने अपने अधिकारियों द्वारा तैयार किया गया एक बयान पढ़ा जिसमें खबर लायक एक ही बात थी कि केंद्र सरकार ने फौरी तौर पर बाढ़ सहायता के लिए पांच सौ करोड़ रुपए मंजूर किए हैं। इस तरह मुश्किल से तीन मिनट में अपना काम निपटा कर मनमोहन सिंह, सोनिया गांधी और तरुण गोगोई बिना पत्रकारों के किसी भी सवाल का जवाब दिए वहां से चले गए।

प्रधानमंत्री के इस व्यवहार ने एक बार फिर यह प्रश्न जेहन में ताजा कर दिया है कि आखिर वे मीडिया के साथ विचारों का आदान-प्रदान करने से इतना परहेज क्यों करते हैं? आखिर वे असम के दौरे पर क्यों आए? यही बताने के लिए न कि असम की विपत्ति के समय नई दिल्ली भी उनके साथ खड़ी है और उन्हें हर तरह की आर्थिक तथा अन्य तरह की मदद देकर उसकी परेशानियां दूर करने के लिए तैयार है! यदि यह सही है तो जनता कोे यह बताने के लिए मीडिया के अलावा उनके पास और कौन सा जरिया है।

कुछ महीनों पहले जब इस बात को लेकर उनकी ज्यादा ही आलोचना होने लगी थी कि वे जनता के साथ सीधे या मीडिया के माध्यम से विचारों का आदान-प्रदान नहीं करते, तब उनका नया प्रेस सलाहकार नियुक्त किया गया। इसके बाद शुरुआत के तौर पर चार चुनिंदा वरिष्ठ पत्रकारों को उन्होंने मुलाकात के लिए बुलाया और उनके साथ लंबा वार्तालाप किया। लेकिन लोगों की यह धारणा गलत निकली कि यह एक शुरुआत मात्र है। वह शुरुआत ही लगता है अंत थी। क्योंकि उसके बाद इस तरह मीडिया के साथ मिलने का कोई कार्यक्रम बाद में नहीं रखा गया।

कहीं बाहर दौरे पर जाने पर हवाई जहाज में अपने साथ गए पत्रकारों के साथ या जहां जाते हैं वहां के स्थानीय पत्रकारों के साथ वार्तालाप के माध्यम से जहां प्रधानमंत्री जनता को यह बता सकते हैं कि सरकार की सोच क्या है, वहीं पत्रकारों के प्रश्नों के माध्यम से जनता की नब्ज भी जान सकते हैं।

इस सरकार की सबसे बड़ी जो कमी अब दिन पर दिन ज्यादा से ज्यादा से खटकने लगी है वह है इसके मुखिया मनमोहन सिंह और सत्ता से दूर रहकर सत्ता संभालने वाली सोनिया गांधी की जनता के प्रश्नों का सामना करने से परहेज करने की प्रवृत्ति। शत्रु को देखते ही रेत में मुंह छिपा लेने वाले पक्षी वाली कहावत इन दोनों पर सटीक बैठती है। हालांकि उन्हें यह समझना चाहिए कि मीडिया शत्रु नहीं है। उल्टे यह उन्हें जनता के साथ संपर्क स्थापित करने का एक अवसर प्रदान करता है। लोकतंत्र में जनता के साथ लगातार सीधे संवाद बनाए रखने का भी अपना महत्त्व है। इसे आप नजरंदाज नहीं करते हुए यह नहीं कह सकते कि हम अपना काम बेहतर तरीके से कर रहे हैं लोग जो सोचते हैं सोचते रहें। आपको अपना नजरिया भी लोगों के सामने लगातार रखते रहना पड़ेगा। लोगों के साथ रिश्ता बनाए रखने के मामले में मुख्यमंत्री तरुण गोगोई माहिर हैं। शायद मुख्यमंत्री का दबाव नहीं होता तो प्रधानमंत्री और यूपीए अध्यक्ष असम का दौरा ही न करते। लेकिन वे कांग्रेस के बुरे समय में लगातार तीसरी बार जीत हासिल करने वाले मुख्यमंत्री को हर तरह से खुश रखना चाहते हैं। हो सकता है एक-दो ही दिन में मुख्यमंत्री प्रेस के प्रतिनिधियों को बुलाकर उस कमी की भरपाई करने की कोशिश करें जो प्रधानमंत्री और सोनिया गांधी के चुप्पे स्वभाव के कारण रह
गई है।

रविवार, 6 फ़रवरी 2011

लांक्षन सहना प्रवासी की नियति है



हाल ही में मैं राज्य के बाहर गया। वहां एक साहित्यिक मित्र ने मुझे उलाहना दिया कि आपलोग हिंदी अखबार क्यों निकालते हैं? इस तरह आपलोग मारवाड़ी समाज को असमिया समाज से दूर रखने का काम करते हैं। हिंदी अखबार न होते तो मारवाड़ी लोग असमिया अखबार पढ़ते और असमिया समाज-संस्कृति के ज्यादा निकट जाने का मौका मिलता। यदि हम काफी हाउस या पनवाड़ी की दुकान पर मिले होते तो मैं जोर-शोर से बहस करता, लेकिन किसी के घर अतिथि बनकर गर्मागर्म बहस करने का मौका नहीं था। फिर भी मैंने मिमियाते हुए कहा कि जब हिंदी अखबार नहीं थे, तब मारवाड़ी कौन-सा असमिया अखबार पढ़ते थे। उन दिनों वे सन्मार्ग और दैनिक विश्वमित्र पढ़ा करते थे जिनमें असम के बारे में कुछ नहीं होता था। हमारे मित्र को एतराज था कि मारवाड़ी फैंसी बाजार में अपनी डफली पर अपना राग गाते हैं, उन्होंने फैंसी बाजार को छोटा-सा टापू जैसा बना रखा है। इसीलिए तो स्थानीय लोगों में विद्रोह होता है।

चूंकि मैं वहां कुछ बोल नहीं पाया था, शायद इसीलिए इन प्रश्नों के बीज दिमाग में रह गए और अंकुरित होकर बड़े होते रहे। मैं सोचता रहा कि क्या इसीलिए असमिया समाज में विद्रोह पनपा है! मैं मारवाड़ी समाज के किसी भी स्थानीय समाज के नजदीक जाने, उसकी संस्कृति-भाषा को अपनाने का विरोधी नहीं बल्कि समर्थक हूं। लेकिन यह भी कहता हूं कि यह काम एक स्वाभाविक प्रक्रिया के तौर पर होगा, न कि किसी राजनीतिक कार्यक्रम की तर्ज पर।

फिर यह प्रश्न भी है कि असमिया भाषा-संस्कृति को काफी हद तक अपना लेने वाले समुदायों को क्या संदेह की दृष्टि से नहीं देखा जाता? उदाहरण के लिए नेपाली समुदाय। हमारे मित्र को जिन मुद्दों पर मारवाड़ी समुदाय से शिकायत थी उन मुद्दों पर नेपाली समुदाय उन्हें शिकायत का मौका नहीं देगा। मसलन, वे लोग शहरों में टापू बनाकर नहीं रहते। नेपाली समुदाय असम में खेती और गोपालन से जुड़ा हुआ है, इसलिए गांवों में रहता है। इस समुदाय के लोग असमिया भाषा को मातृभाषा की तरह प्रयोग में लाते हैं। नेपाली समुदाय का असमिया साहित्य में अच्छा योगदान है। हमारे मित्र को संतोष होगा, कि ये लोग अपनी भाषा में समाचार पत्र भी नहीं निकालते, और असमिया पत्र ही पढ़ते हैं। लेकिन इससे क्या नेपाली समुदाय दोषारोपण से बच जाता है?

असमिया समाज-भाषा-साहित्य के सामने संकट हो सकते हैं- इनमें से कई वास्तविक हैं और कुछ काल्पनिक। लेकिन इस संकट को पैदा करने में मारवाड़ी समुदाय की मुझे कोई भूमिका नजर नहीं आती। एक कहानी है- एक मक्खी एक बैल के सींग पर बैठी थी। उसने देखा कि बैल की आंखों से आंसू बह रहे हैं। द्रवित होकर मक्खी ने पूछा- बैल भाई, मेरा भार सहन नहीं हो रहा है तो मैं कहीं और बैठ जाऊँ। कुछ ऐसी ही स्थिति मारवाड़ी समाज की असम में है। मारवाड़ी समुदाय मुश्किल से यहां की जनसंख्या का एक फीसदी होगा। ये एक फीसदी लोग दिन-रात अपने व्यापार में मगन रहते हैं। ये लोग असमिया भाषा सीखे, असमिया संस्कृति के नजदीक जाए तो इनलोगों के लिए ही अच्छा है- लेकिन न जाए तो यह स्थानीय लोगों में असंतोष का कारण बन सकता है यह बात समझ से परे है। मारवाड़ी समाज सिर्फ असम ही नहीं देश के हर राज्य में फैला है। अपने प्रवास के करीब दो सौ सालों के दौरान किसी भी राज्य में इसके द्वारा स्थानीय भाषा-संस्कृति के विरुद्ध कोई काम करने का उदाहरण नहीं मिलता। यह समाज अपनी भाषा को ही संवैधानिक या किसी भी तरह की सरकारी मान्यता दिलाने के लिए कोई प्रयत्न नहीं करता, ऐसा समाज किसी भी अन्य भाषा-संस्कृति के लिए खतरा बनने का तो सवाल ही नहीं।

फिर भी मारवाड़ी लोग अपने स्वभाव के कारण हमेशा रक्षात्मक मुद्रा में खड़े रहते हैं। (व्यावहारिक तौर पर देखें तो यह अच्छा है, लेकिन बौद्धिकता के स्तर पर पीड़ा तो होती ही है)। कोई कहता है तुम बहुत बुरे हो, तब यह अपने गिरेबान में झांकने लग जाता है, कोई कहता है तुम अपने बच्चों को हिंदी क्यों पढ़ाते हो तब यह हिंदी स्कूलों को बुराई की जड़ बताने लग जाता है; कोई कहता है तुम शोषक हो तब यह जनकल्याण के काम गिनाने लग जाता है; कोई कहता है तुम जाहिल हो तब यह अपने समाज के बौद्धिकों के नाम गिनाने लग जाता है; कोई इसे देशद्रोही तक कह देता है तब यह स्वाधीनता संग्राम में मारवाड़ी समाज की भूमिका को गिनाने लग जाता है।

दरअसल हम एक जटिलताओं भरे समाज में रह रहे हैं। एक मारवाड़ी मध्यप्रदेश या उत्तर प्रदेश में रहता है, तब उस पर बहुत सारे प्रश्नों की बौछार नहीं की जाती, लेकिन वही मारवाड़ी जब उड़ीसा या असम में आ जाता है तो उससे इतने सारे सवाल पूछे जाते हैं कि वह अपराध बोध तले पिस जाता है। मध्य देश में मारवाड़ी ठीक है तो पूर्व देश में आकर वह बुरा कैसे हो गया?

कहीं ऐसा तो नहीं कि गालियां सुनना प्रवास की अनिवार्य शर्त होती है! बाहर से आए आदमी को आप सारी बुराइयों की जड़ बता दो, फिर भी वह रक्षात्मक मुद्रा में रहेगा, हाथ जोड़े खड़ा रहेगा, क्योंकि उसे भान है कि वह किस जमीन पर खड़ा है।

मारवाड़ी कैसा दिखता है यह इस बात पर जितना निर्भर करता है कि मारवाड़ी कैसा है, उससे ज्यादा इस बात पर निर्भर करता है कि देखने वाला कौन है? जहां तेज उद्योगीकरण हो रहा है, पूंजी और उद्यमियों का स्वागत किया जाता है वहां मारवाड़ी उद्यमी है और विकास का वाहक है (कर्नाटक)। जहां के लोग अपनी भाषा-संस्कृति-साहित्य की समृद्धि और भविष्य के प्रति आश्वस्त हैं वहां मारवाड़ी एक छोटा-सा अल्पसंख्यक समूह है जिसकी अपनी अलग भाषा-संस्कृति है। वे लोग अपनी भाषा में क्या करते हैं इससे किसी को कोई मतलब नहीं (पश्चिम बंगाल)। जहां के लोग अपनी भाषा-संस्कृति के भविष्य को लेकर आशंकित हैं वहां मारवाड़ियों को अलग दृष्टि से देखा जाता है (असम)।

असम के ज्यादातर मारवाड़ी द्विभाषी हैं। नई पीढ़ी में मारवाड़ी बोली खत्म हो रही है, उसका स्थान हिंदी ले रही है। इस तरह ज्यादातर मारवाड़ी हिंदी और असमिया का मातृभाषा के रूप में व्यवहार करते हैं। ज्यादातर मारवाड़ी शुद्ध असमिया बोलना जानते हैं। असमिया भाषा को इन लोगों ने दिल से अपना लिया है। लेकिन ज्यादातर मारवाड़ी हिंदी हो या असमिया - लिखने-पढ़ने से कोई ताल्लुक नहीं रखते। इसलिए उन्हें असमिया भाषा के प्रति अपने प्रेम को प्रदर्शित करने का अवसर नहीं मिलता। इधर असमिया समाज भाषा व साहित्य को लेकर अति संवेदनशील है। अपनी भाषा-साहित्य-संस्कृति के भविष्य को सुरक्षित करने की यह जद्दोजहद कम -से-कम डेढ़ सौ साल पुरानी है। असमिया संस्कृति के प्रति किसी का नजरिया क्या है, इसे असम में दोस्त और दुश्मन की पहचान के लिए एक संदर्भ बिंदु की तरह इस्तेमाल किया जाता है।

हाल ही में मारवाड़ी समाज से कई असमिया साहित्यकार उभरे हैं। कुछ लोग हिंदी के माध्यम से ही असमिया संस्कृति की सेवा में उतरे हैं। इसका असमिया समाज में अच्छा स्वागत हुआ है। व्यापक मारवाड़ी समाज के असमिया प्रेम को यही वर्ग आगे लेे जा सकता है और उसे संस्थागत रूप दे सकता है।

अपराध बोध से ग्रसित रहने वाले मारवाड़ी भाइयों से संक्षेप में यही कहना चाहूंगा-(1) आप असम की जनसंख्या का एक अति क्षुद्र अंश हैं। जनसंख्या संतुलन को बदलने या राजनीतिक फायदे बटोरने में आपकी कोई भूमिका नहीं है, (2) आप नौकरियों के बाजार पर कोई दबाव नहीं डालते, उल्टे नौकरियां पैदा करते हैं, (3) आप धर्म और कानून से डरने वाले दब्बू लोग हैं, गैर कानूनी काम आपके स्वभाव में नहीं है (अपवाद हर जगह होते हैं), (4) स्थानीय भाषा का अहित कर हिंदी या राजस्थानी को आगे बढ़ाने के लिए आपने आज तक कुछ नहीं किया, आगे भी उम्मीद नहीं है, (5) आप पिछड़े इलाकों में आधुनिक पूंजीवाद के वाहक रहे हैं, (6) आपकी नई पीढ़ियां काफी पढ़-लिख कर यह साबित कर रही है कि आपकी बौद्धिक योग्यता सिर्फ परंपरागत बनियागिरी तक सीमित नहीं है।

जब सच्चाई यह है तब आपको अपराधबोध या हीनता ग्रंथि से ग्रस्त होने की क्या जरूरत है? क्या आप इसलिए हतोत्साहित हो जातेे हैं कि दूसरे समुदाय के दस लोगों के बीच कोई भी आपकी खिल्ली उड़ा देता है और आपके समुदाय के नाम पर वे अपराध जड़ देता है जो आपके समुदाय ने कभी किए ही नहीं। इससे हतोत्साहित होने की जरूरत नहीं, यह हम भारतीयों का स्वभाव है, यहां हर भारतीय समुदाय दूसरे समुदाय का मजाक उड़ाता है और उनके चुटकुले बनाता है। हमें इसके साथ ही जीना सीखना होगा।

शनिवार, 30 अक्टूबर 2010

असम में किसे चाहिए आजादी

पिछले तीन दशकों में असम में काफी खून बहा है। मोटे तौर पर तीन कारणों से राज्य में हिंसा हुई। एक बोड़ो आंदोलन, दो असम आंदोलन और तीन अल्फा का स्वाधीनता को लेकर अलगाववादी आंदोलन। हिंसा का कोई तर्क नहीं होता। लेकिन इस हिंसा का संचालकों के पास इसके औचित्य को लेकर किसके पास क्या तर्क हैं इसे देखा जाना चाहिए। बोड़ो समुदाय के पास हो सकता है यह तर्क हो कि इंसानी खून के बदले में बोड़ो समुदाय ने अपनी पहचान हासिल कर ली। असम आंदोलन के नेताओं के पास भी तर्क हो सकते हैं कि तीन हजार से अधिक लोगों की जान के विनिमय में सारे देश का ध्यान असमिया समुदाय की समस्याओं पर गया। बांग्लादेशी घुसपैठ की समस्या हो सकता है असम आंदोलन के बिना भी किसी समय देश के राजनीतिक एजेंडे में सबसे ऊपर आ जाती, लेकिन असम आंदोलन ने इस समस्या को ठीक समय पर देश के सामने रख दिया।

लेकिन अल्फा के द्वारा किए गए खून-खराबे के पक्ष में इसके समर्थक लाख कोशिश करके भी कोई पचने वाला तर्क नहीं दे सकते। स्वाधीनता! असम में स्वाधीनता कौन चाहता है? 1947 में देश के आजाद होने के बाद से 1979 में अल्फा के द्वारा एक और आजादी की मांग उठाए जाने के बीच असम के राजनीतिक विमर्श में कभी भी प्रदेश की स्वाधीनता किसी की जबान पर नहीं रही। 1989-92 के दौरान अल्फा थोड़े दिनों के लिए हीरो बना जब इसके कैडर सिर्फ मारवाड़ी व्यवसायियों और असम में बाहर से आकर काम करने वाले बड़े अधिकारियों से पैसे वसूलते थे। उन दिनों अल्फा को "हमारे लड़के' कहकर संबोधित किया जाता था। जनता की नब्ज पकड़ने में राजनीतिक नेता माहिर होते हैं। अल्फा का जनता के बीच प्रभाव था इसीलिए प्रफुल्ल महंत उसके विरुद्ध कार्रवाई करने से कतराते रहे। महंत के बाद आए हितेश्वर सइकिया अल्फा और आसू दोनों के ही दुश्मन थे। लेकिन अपनी प्रेस वार्ताओं में वे भूल से भी (और लाख कोंचने के बावजूद) अल्फा के खिलाफ कोई शब्द उच्चारित नहीं करते थे। जो कुछ कहना होता था अपने पुलिस अधिकारियों को कहते थे। कथनी और करनी में उनके यहां जितना अंतर था उतना और कहीं नहीं मिलता।

1989-92 का दौर खत्म होने के बाद अल्फा की हथियारों की भूख बढ़ने लगी, साथ-साथ पैसे की भी। सेना के दो-दो अभियान झेल लेने के बाद इसका आत्म-विश्वास बढ़ गया था और इसके नख-दंत असमिया मूल के समुदायों को भी चुभने लगे थे। तब धीरे-धीरे मीडिया में अल्फा की आलोचना होने लगी। लेकिन तब तक मर्ज काफी बढ़ चुका था। विदेशों में हथियारों की मंडी तक उनकी पहुंच हो चुकी थी, म्यांमार में शस्त्र चालन के कोचिंग सेंटरों तक का रास्ता वे पहचान चुके थे। इसलिए जब तक असमिया समाज के एक बड़े वर्ग के बीच यह सहमति बनी कि इस मर्ज की रोकथाम होनी चाहिए, तब तक काफी देर हो चुकी थी - और इसीलिए समाज में असम की स्वाधीनता के एक फीसदी समर्थक भी मौजूद न होने के बावजूद अल्फा का खून-खराबा, हत्याओं का दौर इतने लंबे समय तक जारी रह पाया।

हम चर्चा कर रहे हैं इस बात की कि अल्फा के इस तथाकथित संघर्ष का क्या कोई औचित्य था। ब्रिटिश साम्राज्य में शामिल होने के बाद भारत के अंग के रूप में बने रहने पर राज्य में कभी कोई आपत्ति रही हो इसका उदाहरण ताजा इतिहास में हमें नजर नहीं आता। लेकिन जिस बात पर हम जोर देना चाहते हैं वह यह है कि आज से दो दशक पहले जो लोग स्वाधीनता या अलगाव के नाम पर उदासीनता दिखाते थे वे भी आज सक्रिय रूप से ऐसी किसी विचारधारा का विरोध करते हैं। इसका कारण यह है कि आज बीस साल पहले की अपेक्षा ज्यादा बड़ी संख्या में असम के छात्र दूसरे राज्यों के शिक्षा-संस्थानों में पढ़ते हैं, ज्यादा बड़ी संख्या में असम के युवा भारत के विभिन्न शहरों में नौकरियां करते हैं, ज्यादा बड़ी संख्या में असम के विभिन्न मूल समुदायों के लोग भारतीय सेना के तीनों अंगों में भर्ती हैं, ज्यादा बड़ी संख्या में लोग विशाल भारतीय बाजार के साथ जुड़े हुए हैं और इसका महत्व समझते हैं।

इसलिए असम में आज भावना यह है कि स्वाधीनता एक राजनीतिक बकवास है। लेकिन "लड़कों' ने इतने सालों तक "संघर्ष' किया है तो कुछ ले-देकर समझौता हो जाना चाहिए। यदि असम को अन्य राज्यों के मुकाबले कुछ अतिरिक्त सुविधाएं हासिल हो जाती हैं, तो अल्फा का "संघर्ष' धन्य हो जाएगा। लेकिन क्या यह कहा जा सकेगा कि इतने खून-खराबे और इंसानी जानों की कीमत अदा हो गई? हम ऐसा नहीं समझते। शायद आज के असम में कोई भी ऐसा नहीं समझता। क्योंकि भारतीय लोकतंत्र में स्पेस की इतनी कमी कभी नहीं हुई कि ज्यादा नौकरियां, ज्यादा धन, ज्यादा आरक्षण, संवैधानिक सुरक्षा जैसी चीजों के लिए इतना खून बहाना पड़े, जितना अल्फा ने बहाया है। जब किसी व्यवस्था में शांतिपूर्ण आंदोलन के लिए गुंजाइश न हो, तब वहां हिंसा के पक्ष में दलील की गुंजाइश बनती है। असम आंदोलन को नजदीक से देखने वालों और इसमें हिस्सा लेने वालों को जिस तरह आज अहसास हो रहा है कि केंद्रीय विश्वविद्यालय, आईआईटी जैसी चीजों के लिए तीन हजार से ज्यादा लोगों की जानों की बलि कुछ ज्यादा ही बड़ी कीमत है यदि अंततः विदेशियों को बाहर नहीं निकाला जाता। उसी तरह कल को असम को संविधान के अंतर्गत कुछ सविधाएं देने के एवज में अल्फा के साथ समझौता हो जाए तो यह अहसास होने में ज्यादा वक्त नहीं लगेगा कि इतना तो किसी शांतिपूर्ण आंदोलन से ही हासिल हो जाता।

बुधवार, 26 नवंबर 2008

दलित को इंतजार न्याय का


लक्ष्मी उरांव.
शायद यह नाम लोग भूल चुके होंगे, क्योंकि यह देश की किसी सेलेब्रिटी या राजनीतिक नेता का नाम नहीं है. लेकिन लोग अभी भी देश भर के टीवी चैनलों पर दिखाई गई उस तस्वीर को नहीं भूले होंगे जिसमें एक सांवले रंग की चाय मजदूर समुदाय की लड़की बिल्कुल निर्वस्त्र अपनी लाज बचाने के लिए सड़क पर दौड़ रही है.

यह आज से ठीक एक साल पहले यानी 24 नवंबर 2007 की घटना थी, जो गुवाहाटी के बेलतला में घटी.

इस तस्वीर को लेकर यह बहस खड़ी हुई थी कि क्या ऐसी तस्वीर छापना पत्रकारिता के सिद्धांतों के अनुकूल है. जो लोग अर्धनग्न अभिनेत्रियों की तस्वीरों के माध्यम से मनुष्य की आदिम वृत्तियों को सहलाने के बहाने अपना धंधा गर्म करने पर कभी आत्मचिंतन नहीं करते उन्हीं लोगों को जब समाज की गदंगी दिखाई गई तो वे सिहर उठे और चिल्लाने लगे कि "बंद करो यह अश्लीलता'.

बेलतला की कुख्यात घटना को एक साल पूरा होने के बाद आज यह साफ हो चुका है कि युवती की तस्वीर को पर्याप्त रूप से ढककर छापना कहीं से भी गलत नहीं था, गलत था उस घटना की भयावहता को ढकने का प्रयास करना.

यूं गुजर गया वक्त

आज एक साल बीत जाने के बाद यह सवाल अपनी जगह खड़ा है कि एक लड़की को सरेराह निर्वस्त्र कर देना, एक व्यक्ति को पीट-पीटकर मार डालना और दर्जनों को गंभीर रूप से जख्मी कर देना - इन सब अपराधों को किसी बंद कमरे में नहीं बल्कि बीच सड़क पर दिन के उजाले में अंजाम देने वालों के विरुद्ध कानूनी कार्रवाई करने के लिए सरकार को और कितने वक्त की जरूरत है.

बेलतला की शर्मनाक घटना के सिलसिले में सात मामले स्थानीय थाने में दर्ज कराए गए. इनमें से मात्र एक मामले को छोड़कर बाकी किसी में भी आरोप पत्र तक दाखिल नहीं हुआ है. जिस एक मामले में आरोप पत्र दाखिल हुआ और चार युवकों को गिरफ्तार किया गया उसमें भी अभियोग पक्ष की ओर से अदालत में कार्रवाई को आगे बढ़ाने के लिए कुछ नहीं किया गया. नतीजा क्या होगा हम जानते हैं, मामला धीरे-धीरे स्वयं ही अपनी मौत मर जाएगा.

घटना की जांच के लिए एक न्यायिक आयोग का गठन हुआ. आयोग ने समय पर अपनी जांच पूरी कर दी. जांच रपट को 1 अप्रैल को राज्य विधानसभा के पटल पर रखा गया. लेकिन सरकार ने मात्र यह कहकर पल्ला झाड़ लिया कि वह केंद्र सरकार से सीबीआई जांच के लिए अनुरोध कर चुकी है.

राष्ट्रीय महिला आयोग ने भी अपनी ओर से घटना की जांच की. इसने भी घटना की सीबीआई से जांच कराने की अनुशंसा की. लेकिन सरकार ने आज तक आयोग को यह बताने की जहमत नहीं उठाई कि उसकी अनुशंसाओं पर सरकार ने क्या कार्रवाई की है.


उधर घटना की शिकार लक्ष्मी उरांव एक राजनीतिक पार्टी के टिकट पर लोकसभा का चुनाव लड़ने की तैयारियां कर रही है. उसने अपने अनुभव से यह जाना है कि देश में न्याय उसी को मिलता है जो राजनीतिक रूप से ताकतवर हो. सड़क पर निर्वस्त्र की गई लक्ष्मी आज सड़कों पर चुनावी सभाएं करने में व्यस्त है. इसी में उसे आदिवासी समाज की मुक्ति दिखाई देती है.

लेकिन लक्ष्मी की यह राह भी आसान नहीं है.

उम्र पर राजनीति

जिस झारखंड दिशोम पार्टी ने लक्ष्मी के मुद्दे को देश भर में उठाया, वही दिशोम पार्टी अब लक्ष्मी के तेज़पुर लोकसभा क्षेत्र से चुनाव मैदान में उतरने से नाराज़ है और इसके लिए उसकी उम्र को मुद्दा बना रही है. पार्टी का दावा है कि लक्ष्मी की उम्र 25 से कम है और वह चुनाव नहीं लड़ सकती.

यहां तक कि जिस ऑल आदिवासी स्टूडेंट्स एसोसिएशन की रैली में विरोधी गुंडों द्वारा लक्ष्मी को प्रताड़ित किया गया था, वह एसोसिएशन भी लक्ष्मी को लोकसभा की टिकट देने के खिलाफ है.

लक्ष्मी को लोकसभा की टिकट देने का प्रस्ताव रखने वाली असम युनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट भी इन आरोपों से थोड़ी पशोपेश में है.

तेज़पुर में लगभग 25 फीसदी मतदाता चाय बगान में काम करने वाले आदिवासी मज़दूर हैं और असम युनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट को उम्मीद है कि लक्ष्मी इन मतदाताओं का वोट तो पाएंगी ही. विवादों में फंसे तेज़पुर से लोकसभा सदस्य और लॉटरी किंग मणीकुमार सुब्बा के खिलाफ लक्ष्मी मतदाताओं की पसंद हो सकती हैं लेकिन उम्र के विवाद से फ्रंट भी परेशान है.

तेजपुर से लक्ष्मी को पार्टी टिकट देने की घोषणा के बाद फ्रंट के अध्यक्ष बदरुद्दीन अजमल लक्ष्मी की उम्र के मुद्दे का निर्णय चुनाव आयोग पर छोड़े जाने के पक्ष में हैं. उनका कहना है कि इस मामले में चुनाव आयोग जो भी तय करेगा, उन्हें स्वीकार होगा.

हालांकि लक्ष्मी बड़ी साफगोई से कहती हैं कि वे राजनीति में किसी लोभ में नहीं आई हैं. भविष्य में किसी भी स्त्री के साथ इस तरह का दुर्व्यवहार नहीं हो, यही इच्छा उन्हें राजनीति में लाई है. लेकिन अपनी उम्र को लेकर हुए विवाद से वे दुखी हैं.

लक्ष्मी कहती हैं- “मेरा जन्म 10 अगस्त 1983 को हुआ है और मेरे पास स्कूल के प्रमाणपत्र हैं.आखिर मेरी उम्र पर सवाल खड़े करने वाले किस आधार पर यह बात कह रहे हैं, मैं खुद नहीं समझ पा रही हूं.”

राजनीतिक सवालों के कटघरे में कैद लक्ष्मी उरांव के सामने फिलहाल तो लोकसभा चुनाव का लक्ष्य है और 24 नवंबर 2007 की लड़ाई भी तो उन्हें लड़नी है. एक ऐसी लड़ाई, जो अब सुर्खियों में नहीं है और सवालों पर राजनीति की बिसात बिछाने वालों के लिए भी अब वो किसी बहस का मुद्दा नहीं है.

बुधवार, 12 नवंबर 2008

गुवाहाटी में आतंकवाद के खिलाफ आंदोलन शुरू

गुवाहाटी की सड़कों पर मंगलवार की दोपहर को जो जनता का समूह इकट्ठा हुआ वह असम को 29 साल पीछे ले गया। 29 साल पहले असम में अवैध घुसपैठियों के विरुद्ध एक ऐतिहासिक आंदोलन की शुरुआत कुछ इसी अंदाज में हुई थी। प्रफुल्ल कुमार महंत तथा उनके साथियों के नेतृत्व में निकाले गए जुलूस में जब अप्रत्याशित रूप से लोगों की उपस्थिति देखी गई और यह भी देखा गया कि इसमें समाज के सभी वर्ग के लोग शामिल हुए हैं तो इससे छात्र नेताओं को नई ऊर्जा मिली और विदेशी घुसपैठियों के खिलाफ ऐसा आंदोलन शुरू हुआ जिसकी मिसाल भारत में और कहीं देखने को नहीं मिलती।


होने को और भी बहुत सारे आंदोलन में देश में हुए हैं लेकिन असम आंदोलन के नाम से ख्यात इस घुसपैठिया विरोधी आंदोलन की खास बात थी इसका कुछ अपवादों को छोड़कर शांतिपूर्ण होना। आंदोलन का नेतृत्व छात्रों में से आया था लेकिन वह इतना परिपक्व था कि हिंसा का मतलब समझता था। आंदोलनों में हिंसा होने पर राज्य की शक्ति को उसे कुचलने में आसानी होती है। असम पर जबरदस्ती थोप दिए गए चुनावों के कारण बाद में हिंसा हुई भी और राज्य शक्ति ने उसे कुचला भी। इसके बाद का इतिहास भी लोगों के लिए अनजाना नहीं है। छात्रों का राजनेताओं में तब्दील होना और सत्ताधारी बनकर घुसपैठियों की समस्या को भूल जाना। फिर भी कुल मिलाकर असम आंदोलन आज भी अपनी जनभागीदारी और शांतिपूर्ण चरित्र के लिए याद किया जाता है।


यह अजीब संयोग है कि 1979 के आंदोलन की शुरुआत भी लोगों के राजनेताओं से मोहभंग के कारण हुई थी। और मंगलवार को जज फील्ड में जो समागम हुआ वह भी जनता की राजनेताओं और राजनीतिक पार्टियों के प्रति मोहभंग के कारण हुआ है। राजनेता भले कितने ही चालाक बनने की कोशिश करे, लोगों से यह छुपा पाने में वे बिल्कुल असफल रहते हैं कि उनके एक-एक शब्द के पीछे राजनीति छुपी रहती है। और वह राजनीति सिर्फ सत्तासुंदरी को प्राप्त करने के एकमात्र मकसद तक सीमित रहती है। इसलिए इसमें आश्चर्य नहीं होता जब कई-कई सालों तक सत्तासुख भोगने का तथाकथित जनादेश प्राप्त करने वाली राजनीतिक पार्टियों के आंदोलनात्मक कार्यक्रमों में भी चंद पार्टी कार्यकर्ताओं के ही दर्शन होते हैं। आम जनता को वैसे बंद, धरना या जुलूस वाले तथाकथित आंदोलनों से कोई लेना-देना नहीं होता।


असम में बम विस्फोटों के बाद जिस तरह का जनजागरण शुरू हुआ है वैसा बंगलोर, मुंबई, जयपुर, दिल्ली या अहमदाबाद में देखने को नहीं मिला। इसका कारण यह होगा कि असमवासियों की छठी इंद्रीय ने शायद जान लिया है कि 30 अक्टूबर के बम धमाके तो एक शुरुआत भर थे आगे इससे भी भीषण विभीषिकाएं उनका इंतजार कर रही हैं। 1979 के दौरान एक लोकप्रिय नारे का भावार्थ यह था कि आज जो कुछ असम में हो रहा है वही कल सारे भारत को भोगना होगा। आज जब हम दिल्ली, जयपुर, मुंबई आदि शहरों को बांग्लादेशी आबादी से जूझते देखते हैं तो पाते हैं कि 29 साल पहले कही गई बातें सौलहों आने सच थीं।