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Journalist and writer, Writes on Northeast India, Bangladesh, Myanmar
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शनिवार, 30 जून 2012

शादियों में आडंबर : चिंतन चालू आहे


रिपोर्टिंग के दौरान अंतर्मुखी होने से काम नहीं चलता। खासकर कहीं बाहर जाने पर। इसलिए ईटानगर में उस आदी जनजाति के युवक से दोस्ती बढ़ाने की गरज से मैंने इधर-उधर की बातें शुरू की। पैसे देने के लिए उसने बटुआ निकाला तो देखा कि किसी महिला की फोटो है। मैंने पूछा- आपका वाइफ? उसने कहा, हां मेरा सबसे प्यारा वाइफ। सबसे प्यारा मतलब! उसने बताया कि उसकी चार पत्नियां हैं। तीन शादियां उसने पिता की इच्छा से की, और यह चौथी शादी अपनी मर्जी से की। उनकी जनजाति में किसी व्यक्ति का मान-सम्मान, रुतबा इस बात से मापा जाता है कि उसके कितनी पत्नियां हैं। कहने की जरूरत नहीं कि उनके यहां बहुविवाह की इजाजत है। लगभग हर समाज में किसी समय पत्नियों और गुलामों की संख्या से आदमी का रुतबा मापा जाता था। बाइबिल और हदीस में ऐसे प्रकरण भरे पड़े हैं, जिनमें एकाधिक पत्नियों और गुलामों की संख्या के साथ आदमी की सामाजिक हैसियत जुड़ी होने के प्रसंग आए हैं। आज लगभग हर समाज में बहुविवाह और गुलाम रखने की अनुमति नहीं है।

इस प्रकरण की याद आई उड़ीसा हाई कोर्ट के अधिवक्ता रमेश अग्रवाल द्वारा शादियों में फिजूलखर्ची पर मेरे लेख की प्रतिक्रिया में फेसबुक पर लगाए गए इस सवाल के कारण कि किसी के पास पैसा है तो अपनी मर्जी से खर्च करने का भी उसे अधिकार है। बाहर से किसी को बोलने का क्या अधिकार है? मुझे अरुणाचल प्रदेश के जनजातीय युवक का प्रसंग इसलिए याद आया कि हमारे अधिकांश क्रिया-कलाप पर सामाजिक नियंत्रण रहता है। लेकिन हम उसके इतने अभ्यस्त हो जाते हैं कि हमें उस सामाजिक श़ृंखला का अनुभव तक नहीं होता। उल्टे हम उस सामाजिक नियंत्रण के अंदर अपने आपको सुरक्षित महसूस करते हैं। आदी जनजाति में रुतबा दिखाने के लिए बहुविवाह की अनुमति है, इसलिए उस कबीले केधनी लोग इस अनुमति का फायदा उठाते हुए शान से एकाधिक विवाह करते हैं और अपने समाज में छाती फुलाकर चलते हैं। क्या हमारे समाज में किसी के पास पैसा हो तो वह बहुविवाह कर सकता है? आप कहेंगे कि यह गैरकानूनी है। लेकिन कानून तो हिंदू धर्म के वर्तमान रीति-रिवाज को देखते हुए बाद में बना है। कल्पना कीजिए कि कल को कानून न भी रहे तो क्या समाज सिर्फ इसलिए बहुविवाह की अनुमति दे देगा कि किसी के पास पैसा है? इन पंक्तियों से हम सिर्फ यह दिखाना चाहते हैं कि किस तरह हमारे क्रिया-कलापों पर सामाजिक प्रतिबंध है और उन्हें धनी और गरीब हर किसी को मानकर चलना पड़ता है। अब सवाल उठता है कि क्या शादियों के अवसर पर होने वाली फिजुलखर्ची और आडंबर समाज के लिए अहितकारी है? इस संबंध में कई तरह के सवाल पूछे जाते हैं।

प्रश्न 1 : आधुनिक अर्थव्यवस्था उपभोग पर निर्भर है। यदि लोगों ने शादियों में खर्च कम कर दिया तो क्या अर्थव्यवस्था धीमी पड़ जाने का खतरा नहीं है?

उत्तर : यह सही है कि आधुनिक अर्थव्यवस्था उपभोग पर निर्भर है। उपभोग मध्य वर्ग या उच्च वर्ग करता है। उच्च वर्ग संख्या में सीमित है, इसलिए अर्थव्यवस्था का सारा उद्यम मध्य वर्ग को तरह-तरह के उपभोगों की ओर आकर्षित करने पर केंद्रित रहता है। आज सिर्फ अर्थव्यवस्था को चलाने के लिए बाजार अनावश्यक और हानिकारक पेय पदार्थों, खाद्य पदार्थों, प्रसाधन सामग्रियों से पटा पड़ा है। बात लोगों के जीवन को ज्यादा आरामदायक बनाने की की जाती है, लेकिन मतलब होता है सिर्फ अपने प्रोडक्ट को मार्केट में ठेलने का। आज शाही शानौ-शौकत से शादियां करवाने वाली कंपनियां बाजार में उतर गई हैं।

इस अनावश्यक उपभोग के दो पहलू हैं। एक है विकसित देशों में होने वाला अनावश्यक उपभोग। वहां गरीब वर्ग नहीं है, या उसे राज्य द्वारा पर्याप्त मदद मिल जाती है, फिर भी अनावश्यक उपभोग प्रकृति द्वारा प्रदत्त संसाधनों पर दबाव पैदा करता है, यहां तक कि पृथ्वी के आने वाली पीढ़ियों के रहने लायक नहीं रहने का खतरा पैदा हो गया है। दूसरा पहलू है, भारत जैसे देश में अनावश्यक उपभोग का। हमारे देश में भले 30 करोड़ का मध्य वर्ग पैदा हो गया हो, फिर भी यहां संसाधनों की कमी है। इसलिए अर्थव्यवस्था को गति देने के नाम पर हम अनावश्यक और संसाधनों को बर्बाद करने वाले (टनों खाना नालियों में बहाया जाना) उपभोग को बढ़ावा नहीं दे सकते। हमारी अर्थव्यवस्था की मुख्य दिशा ज्यादा बचत और उस बचत के पैसे का बुनियादी ढांचे को विकसित करने और उद्योग में निवेश करने की ओर होनी चाहिए।

प्रश्न 2 : क्या आज के युग में सामाजिक नियंत्रण संभव है?

उत्तर : जिन जातियों में जाति पंचायतें आज भी सक्रिय हैं, वहां इस तरह के नियंत्रण आज भी संभव हैं। हमने पिछले सप्ताह गुर्जर पंचायत का जिक्र किया था, जिसने अपनी जाति के अंदर इस तरह के प्रतिबंध लागू किए हैं। इसके अलावा जहां आधुनिक शैली के संगठन सक्रिय हैं, यदि उन्हें पंचायतों जैसी मान्यता हासिल है, तो उनके माध्यम से भी इस तरह के नियंत्रण संभव हैं। याद रखना होगा कि शादियों में आडंबर के विरुद्ध लड़ाई आधुनिक अर्थव्यवस्था की इस समय जो दिशा है उस दिशा के विरुद्ध लड़ाई है। यह उपभोगवाद का आक्रामक प्रचार करने में नियोजित विज्ञापन कंपनियों, विशाल कारपोरेशनों के साथ लड़ाई है। इसके लिए मानसिक तैयारी को भी पर्याप्त महत्त्व देना होगा। उड़ीसा के रमेश अग्रवाल ने जैसा बुनियादी सवाल पूछा है, वैसे सवाल आते रहने चाहिए ताकि हम इस मुद्दे पर अपनी वैश्विक दृष्टि को साफ रख सकें।

बुधवार, 27 जून 2012

प्रमोद शाह की लंबी टिप्पणी : मारवाड़ी संतुलन रखने में चूक गया



विनोद रिंगानिया का लेख "मारवाड़ी को सिर्फ सहन किया जाता है'- विचार हेतु कई बिंदु छोड़ जाता है। वास्तव में इस महत्वपूर्ण विषय पर चर्चा करने से पूर्व कुछ बुनियादी बातों पर चर्चा जरूरी है। यहां यह स्पष्ट कर देना भी उचित समझता हूं कि हर व्यक्ति या समाज की अपनी-अपनी खूबियां और कमियां हुआ करती हैं। उन पर एक संतुलित विवेचना होनी चाहिए, बिना किसी पूर्वाग्रह के।

पहले हम हमारे देश के आर्थिक मनोविज्ञान को समझने की कोशिश करते हैं, तब मारवाड़ी समाज पर आते हैं। हमारा देश मूलत: एक आध्यात्मिक देश है। यहां भोग को नहीं त्याग को महत्व दिया गया है, जो ॠषि-समाज, आत्मा की गहराइयों तक जा चुका था, उसके लिए भौतिकता को प्रधानता देना कोई बड़ी बात नहीं थी। उन्होंने धन पर बहुत चिंतन किया और सदियों तक विचार-विमर्श के पश्चात उसकी सीमा तय कर दी। उन्होंने कहीं भी भोग को नकारा नहीं है। उसके मानदंड तय कर दिए। उन्होंने भोग को अध्यात्म यानी धर्म को आधार दे दिया और सूत्र दिया-धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष। यानी धर्म को सर्वोपरि रखते हुए उसको प्रथम स्थान दिया। उसे आधार मानकर अर्थ अर्जित करे और उससे कामनाएं पूरी करते हुए मोक्ष को प्राप्त करे।

हर सभ्यता और संस्कृति को उत्थान-पतन का दौर देखना पड़ता है। इसने भी देखा। प्राकृतिक प्रकोप, महायुद्ध, विवेकहीन आस्था, ज्ञान, एकाधिकार, विशिष्टता और अहंकार इत्यादि अनेक कारणों से देश गुलाम रहा। अंधेरा छा गया, अकर्मण्यता बढ़ी, गरीबी और अशिक्षा ने जकड़ लिया। अनेक भ्रांतियों ने जन्म लिया। एक भ्रांति यह भी फैल गई कि धन व्यर्थ की चीज है। वह यह भूल गया कि किस स्तर आ रहा धन व्यर्थ हो जाता है। वह धन को कोसता रहा, साथ ही लक्ष्मी-पूजा करता रहा। लेकिन पैसे की आलोचना से उसकी जरूरत खत्म नहीं हो जाती। दुनिया का शायद ही कोई व्यक्ति हो जो गरीब रहना चाहता है। जो सही मायने में अध्यात्म में गहरे उतर गए हैं, साधना में लीन हैं, मैं उनकी बात नहीं कर रहा हूं। मगर सवालों का सवाल यह है कि धन की प्राप्ति कैसे करें? उसमें बड़ा आकर्षण है, अत: आदमी गुनाह करने से भी परहेज नहीं करता है। ऐसे लोग हैं जिनकी चाह की कोई सीमा नहीं, तो ऐसे व्यक्ति भी हैं जो केवल अपनी जरूरत पूरी हो जाए, बस उतना चाहते हैं। ऐसे भी व्यक्ति हैं जो धन पाने के लिए कुछ भी करने को तैयार हैं और ऐसे भी हैं जो अपने सिद्धांतों पर कायम रहकर कमाना चाहते हैं। ऐसे लोग भी हैं जो इस भावना से धन इकट्‌ठा किए जा रहे हैं-सब कुछ लिख दे मेरे नाम, भूखों मर जाए देश तमाम या अब वतन आजाद है-लूट सके सो लूट-तो दूसरी ओर ऐसे व्यक्ति भी हैं जो सादा जीवन उच्च विचार में विश्वास रखते हुए कबीर के इस दोहे को चरितार्थ करते हुए जीते हैं-

"साईं इतना दीजिए, जामे कुटुम्ब समाय।

मैं भी भूखा ना रहूं, साधु न भूखा जाय।।

वास्तव में जीवन में संतुलन की आवश्यकता है, इसके लिए धन, साहित्य, संगीत, कला, धर्म, अध्यात्म सभी चाहिए वरना जीवन एकांगी हो जाएगा।

अब उन बिंदुओं पर चर्चा करते हैं, जिन्हें विनोदजी ने अपने उपरोक्त वर्णित लेख में उठाया है।

कम्युनिस्ट व्यवस्था की बात की गई है। न जाने कितने साम्यवादी विचारधारावालाओं को धन के इर्द-गिर्द मंडराते देखा है। उन सारे भोग-विलासों के प्रति उनका रुझान रहा है, जिनके लिए वे पूंजीपतियों को जी-भर कर कोसते रहे हैं। साम्यवाद, समाजवाद, प्रगतिशीलता मात्र नारे साबित हुए।

कालांतर में ऐसा घट गया कि एक हीनभावना हमारे अंदर घर कर गई। हमने धन को आदर देना बंद कर दिया। अत: व्यापारी भी अपने आपको व्यापारी कहने में संकोच करने लगा। एक उद्योगपति या व्यापारी मंच पर बैठा है तो उसके श्रम, व्यापारिक कौशल, लगन, दक्षता, प्रबंधन, कला का सम्मान होना चाहिए, लेकिन जो उसका पावना है, हम उसे सही रूप में दे नहीं पाते। हो सकता है कि लोग यह मान बैठे हैं कि उद्योगपति यदि श्रम करता है या किसी को नौकरी देता है तो अपना लाभ प्राप्त करने के लिए। लोगों के दिमाग में यह भी बैठ गया है कि पैसा केवल गलत तरीके से ही कमाया जाता है। आम आदमी यह भी सोचता है कि पैसे वाला अपनी मेहनत का फल तो भोग ही रहा है, सारे सुख प्राप्त कर रहा है, अब वह त्यागियों वाला आदर क्यों चाहता है? विवाहों-त्यौहारों इत्यादि अवसरों पर किए जाने वाले आडंबर आग में घी का काम करते हैं।

यूं आम आदमी आदर उसे ही देता है जो निःस्वार्थ भाव से सर्वजन हिताय के कार्य करता है। जो धनपति विनम्र हैं, दान देते हैं, रहमदिल हैं - उनका आदर आज भी किया जाता है, क्योंकि वह पैसे का सदुपयोग कर रहा है, त्याग कर रहा है। भारत के इतिहास में किसी धनपति का नाम नहीं आता है, भामाशाह को छोड़कर। वह इसलिए कि उन्होंने धन का त्याग किया था। धन की ओर भागने वाले व्यापारी, नेता, पत्रकार, प्रशासक, वकील, शिक्षक साधू के बारे में आम आदमी अच्छी राय नहीं रखता है।

धन और धनपति को आदर न मिलने की व्याख्या करते हुए विनोद रिंगानिया ने लिखा है "ऐसा उस मानसिक प्रदूषण के कारण होता है, जो सदियों से हमारे दिमाग में भरता गया है। भारत में साहित्य में, नाटक में, गीतों में कहीं भी पैसे कमाने को एक महत्वपूर्ण काम नहीं बताया गया है।' मैं उनसे सहमत नहीं हूं। जरा विस्तार में कहना चाहूंगा कि यह हमारे मानसिक प्रदूषण का नहीं, सदियों के आध्यात्मिक चिंतन का परिणाम है। यह सही है कि पिछले हजार वर्ष के अंधकार ने हमारे मन में धन के प्रति एक अन्यथा भाव पैदा कर दिया, लेकिन यह भारत की मूल भावना नहीं है। जब उसने देखा कि धन कमाने वाले अध्यात्म के विरुद्ध काम कर रहे हैं, ऐय्याशियां कर रहे हैं, तो धन के प्रति आदर और कम हुआ। हमें सामंती और नवाबी युग नहीं भूलना चाहिए। उसकी गहराई में आज भी कहीं अध्यात्म बैठा है, वही उसकी प्राण नाड़ी है।

जरा गहराई में उतरें तो पाएंगे कि हमारे देश ने उस पेशे को व्यावसायिक नहीं होने दिया, जिसमें व्यक्ति खुद उत्पादन बन जाए। व्यक्ति के शारीरिक, बौद्धिक, मानसिक और आध्यात्मिक विकास करने वाले का दृष्टिकोण व्यावसायिक नहीं होना चाहिए। यही वजह है कि वैद्य (शारीरिक विकास), शिक्षक (बौद्धिक विकास), कलाकार (मानसिक विकास) और योग गुरु या धर्मगुरु (आध्यात्मिक विकास) अपनी विद्या बेचते नहीं थे, जरूरत भर लेते थे। उनके गुरु उनसे कहते थे कि तुम यदि इनको बेचोगे तो मेरे द्वारा दी गई विद्या भूल जाओगे। और आज ये चारों क्षेत्र बड़े से बड़ा उद्योग बन गए हैं। उच्च इलाज, शिक्षा, संगीत और योग तेजी से आम आदमी की पहुंच के बाहर हो रहे हैं। आज व्यक्ति प्रोडक्ट हो गया है। हर आदमी एक-दूसरे को बेच रहा है, खरीद रहा है। हमारे चिंतकों ने धन की सीमा को भी समझ लिया था, उस सीमा तक उसे आदर भी दिया है। एक व्यक्ति धन के बूते पर हो सकता है कि ओलंपिक में चुन लिया जाए या एक्टर बन जाए या डाक्टर बन जाए, मगर अच्छा खेलना, अच्छी एक्टिंग करना या इलाज करना तभी संभव होगा, जब वह उसके काबिल हो, यानी उसने सीख लिया हो। गीतकार भारतभूषण कहते हैं-

"बिकता है सिंदूर हाट में,

नहीं सुहाग बिका करता।

वीणा चाहे जहां खरीदो,

किंतु न राग बिका करता।

यदि सूनापन मिट जाता तो

नभ दे देता चांद-सितारे।

कलियां हो नीलाम न उनका

गंध-पराग बिका करता है।'

साहित्य में धन के पक्ष में भी लिखा गया है। "मृच्छकटिक (शूद्रक) में लिखा है- निर्धनता सर्वापदामास्पदम्‌' (निर्धनता सब विपत्तियों का घर है)। "नीतिदिष्टिका' (सुंदर पांड्य) में लिखा है- "द्रव्येण सर्वे वशा:' (धन के सभी वशीभूत होते हैं) धन को साधन माना है, साध्य नहीं। लक्ष्मी, विष्णु के पांव दबाती हैं, उनके सर पर नहीं बैठतीं। ॠषि-चिंतन ने धनपति होने को कहा है, धन का गुलाम होने को नहीं। क्या यह उचित होगा कि धन कमाने वालों पर कसीदे लिखे जाएंं। लिखे हैं कवियों और शायरों ने कसीदे- पर पछताए ही। अमीर खुसरो, मिर्जा गालिब और अन्य सामंती युग के कवियों और शायरों को पढ़ें। इस देश में धन के गीत गाए हैं, मगर उन्होंने धन चांदी के सिक्कों को नहीं राम को माना है। मीरा ने नाचते हुए गाया- "पायो जी मैंने राम रतन धन पायो।' मीरा को क्या करना चाहिए था? क्या वह महलों में रहकर यह गाती कि "पायो जी मैंने लाख टका धन पायो' या "पायो जी मैंने गहना को सुख पायो।' अब "राम' क्या है इसकी व्याख्या की आवश्यकता मैं नहीं समझता, बाबा तुलसी ने बात खत्म कर दी है। जैनियों के सारे तीर्थंकर राजा थे- निकल गए लंगोटी पहनकर, यह काम सिद्धार्थ ने किया, त्याग दिया कपिलवस्तु का राज्य। आज भी ऐसे लोग हैं, जो धन-वैभव छोड़कर सही मायने में संन्यास ले चुके हैं। साहित्य, नाटक या गीत किसके गुण गाए? उनको जिन्होंने सारा राज-पाट निस्सार समझकर छोड़ दिया या उनके जिन्होंने छीना-झपटी करके धन की सत्ता हासिल की है? ॠषि-प्रज्ञा ने सदैव त्याग को महत्व दिया है। छीना-झपटी को नहीं। यही वजह है कि यहां का हर व्यक्ति अपना गोत्र ॠषियों में खोजता है और पश्चिम के लोग अपना उद्‌गम राज्य में खोजते हंैं।

वैसे बता दूं कि भारतीय साहित्य, नाटक या गीत धन की महत्ता से भरे पड़े हैं मगर उसका स्वरूप कुछ और है। गृहस्थाश्रम का महत्व पढ़ें। पहले यह निर्देश दिया गया है कि एक गृहस्थ को धन किस तरह अर्जित करना चाहिए, फिर यह बताया गया है कि उसका उपयोग करके गृहस्थ धर्म कैसे निभाएं और ऐसा करने वालों को संन्यासियों से भी ऊंचा बताया गया है।

संस्कृत साहित्य में व्यापारियों को श्रेष्ठी कहकर संबोधित किया गया है, क्योंकि वह पूरे समाज को देखता है। वही श्रेष्ठी कालांतर में सेठ कहलाया। यह बात भी सोचने की है कि श्रेष्ठी का वह सम्मान गुम क्यों हो गया? सेठ शब्द विकृत क्यों हो गया? व्यापारियों और उद्योगपतियों ने देश के विकास में बहुत बड़ा योगदान दिया है। उनकी महत भूमिका रही है, इस हेतु वह पूरे सम्मान के हकदार हैं। मगर यहां के सदियों के साहित्य, नाटकों और गीतों पर मानसिक प्रदूषण का आरोप नहीं लगाया जा सकता।

उपरोक्त वर्णित लेख में विनोदजी ने गरीबी और संतोष का जिक्र भी एक ही सांस में किया है। इस देश ने कभी भी गरीबी को महिमामंडित नहीं किया। गरीब रहते हुए स्वाभिमान, सहनशक्ति, संघर्ष और आत्मबल कायम रखना मुश्किल हो जाता है, जिन्होंने इनका दामन नहीं छोड़ा, उनकी महिमा गाई गई है। और जहां संतोष का प्रश्न है, यह तो भगवान का वरदान है, जो नसीब वालों को प्राप्त होता है। अमीर और फकीर में यही फर्क है। फकीर हर हाल में संतुष्ट है, अमीर हर स्थिति में असंतुष्ट है। उसका दामन नहीं भरता कभी। कवि शैलेंद्र ने कहा है-

"बहुत दिया देने वाले ने तुझको, आंचल ही न समाए तो क्या कीजै'।
तस्वीर का दूसरा पहलू भी है। कुछ लोगों ने राजनीतिक लाभ उठाने के लिए आम आदमी की कुंठाओं और भ्रांतियों का सहारा लेकर उनके दिमाग को प्रदूषित किया। उन्हें समझाया गया कि देखो इसने हवेली बना ली, यह पूंजीपति है, इसने तुम्हारा शोषण किया है। अब कोई उनसे यह पूछे कि इनके पास क्या था जो उसका शोषण किया। केवल एक लेबर था, जिसको वो पूंजी में नहीं बदल सके। पूंजीपति ने बदल दिया तो शोषण किया। हां, लेबर को पूरा पैसा नहीं मिलता है तो शोषण है, उसके लिए बात होनी चाहिए, न्याय मिलना चाहिए। पं. जवाहर लाल नेहरू जैसे व्यक्तित्व ने एक जगह कहा था कि मुझे प्रोफिट शब्द से नफरत है। उसका बड़ा करारा जवाब स्व. जेआरडी टाटा ने दिया था। जहां तक भ्रष्ट तरीके से पैसा कमाने का सवाल है, उसमें व्यवसायी ही नहीं, बल्कि पत्रकार हो या कलाकार, प्रशासन हो या राजनीतिज्ञ, डाक्टर हो या अन्य कोई, वह आम आदमी की आलोचना का विषय बनता है। बेईमानी या चोरी का पैसा कमाने वाले कभी भी आदर्श नहीं हो सकते।

मारवाड़ी के संबंध में हमें एक बात याद रखनी होगी कि वे अपने-अपने स्थानों से धन कमाने आए थे, साहित्य रचने या पत्रकारिता करने नहीं। बरसों तक घरवालों को पता नहीं होता था कि उसके परिवार का सदस्य जिंदा है या मर गया। वह अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहा था। वैसे ही जैसे आज से करीब तीस वर्ष पहले जो भारतीय अमरीका गए थे वे अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहे थे। उन्होंने अब दूसरे क्षेत्रों में रुचि लेनी आरंभ की है। वैसे ही मारवाड़ी कई दशकों तक खुद को स्थापित करने में मितव्ययता से काम लेता रहा। हालांकि मक्खीचूस और कंजूस जैसे विशेषण उस पर लगते रहे। फिर भी उसने अपनी कमाई का एक हिस्सा जनसेवा के कार्य में बराबर खर्च किया। उसकी स्थिति यह नहीं थी कि वह रचनात्मक क्षेत्रों में जाने की सोचे। वह जहां भी गया स्थानीय लोगों के लाभार्थ काम करता रहा, कभी बाधक नहीं बना। उसने इस अंदाज में काम किया-

"आने से हमारे न परेशान हो गुंचों

हम बाग लगाते हैं, उजाड़ा नहीं करते'

व्यापार या उद्योग, वितरण या उत्पादन से ताल्लुक रखता है, जबकि साहित्य, कला, संगीत सृजनात्मकता से संबंध रखते हैं। दोनों का महत्व है। उत्पादन की आयु छोटी होती है, सृजन की लंबी- जरूरी दोनों है। इस समाज ने उत्पादन पर तो बहुत ध्यान दिया, लेकिन सृजन को आदर देने में उदासीन रहा। दोनों में एक संतुलन नहीं बना पाया।

मारवाड़ी समाज के पास प्रचुर मेधा व प्रतिभाएं हैं। लेकिन उन्हें वांछित वातावरण नहीं मिल पा रहा है। यह काम गुजराती समाज ने सफलता के साथ किया है। मारवाड़ी समाज ने अर्थ-केंद्रित इतने रीति-रिवाज कर दिए कि इस समाज के व्यक्ति का पूरा जीवन अर्थ अर्जित करने में ही लग जाता है। यहां महान प्रतिभाओं को विकसित होने का अवसर ही नहीं मिल पाता है। और यदि कोई प्रतिभा इसके बावजूद प्रकाश में आ पाती है तो समाज उसे महत्व नहीं देता। फलस्वरूप अन्य समाज इस समाज को प्रतिभाहीन समझने लगता है। इसकी छवि एक ऐसे समाज की बन गई, मानो जिसे रचनात्मकता से कोई मतलब ही न हो, जो कि सही नहीं है।

इस समाज को सम्मान मिले उसके लिए प्रतिभाओं को प्रकाश में लाना होगा। उन्हें प्रोत्साहित करना होगा। हमारी समृद्ध विरासत को अन्य समाजों के समक्ष प्रस्तुत करना होगा। अब तक इसका एकांगी रूप ही सामने आया है। लिखते हुए अफसोस होता है कि इस समाज के अखिल भारतीय स्तर के संगठन भी समाज की विरासत उजागर करने में कोई रुचि नहीं रखते हैं। उन्हें आत्ममंथन की जरूरत है।

डा. कृष्ण बिहारी मिश्र ने "हिंदी पत्रकारिता-राजस्थानी आयोजन की कृति भूमिका में इस समाज के योगदान को स्वर्णाक्षरों में रेखांकित किया है। इससे मारवाड़ी समाज के पत्रकारिता से संबंधित अनेक महत्वपूर्ण पहलू उजागर हुए।

मिश्रजी की नजर में मारवाड़ी समाज का अपनी प्रतिभाओं के प्रति क्या दृष्टिकोण है, उसके बारे में क्या लिखते है देखें। उन्होंने अपने दिवंगत विद्वान मित्र के संबंध में जो कि मारवाड़ी था, लिखा है - "विद्या ही मेरे मित्र (नाम नहीं दिया जा रहा है) का स्वधर्म था वणिक-कुल में जन्मे मेरे मित्र में वणिक-बुद्धि थी ही नहीं। उनकी नियति की यही विडंबना थी कि वणिक-लोक विद्या को नहीं, वित्त को उपलब्धि मानता है। बनिया बिरादरी में अकुशल व्यापारी का कोई मोल नहीं होता। मेरे मित्र, वाणिज्य विषयक अपने प्रयोग और प्रचेष्टा में कभी कृतकार्य नहीं हुए। यह उनकी विधर्म-साधना थी। और वणिक- समाज अपने धर्म के मुताबिक विद्या उपलब्धि को बहु मान देने को तैयार नहीं था। मगर विशिष्ट जगत से उन्होंने खास इज्जत कमाई थी, वह बड़ी धन-संपदा से नहीं खरीदी जा सकती। आंख हो तो उनकी श्रद्धांजलि सभा ने बड़े-बड़े धनपतियों की आंखें खोल दी होंगी कि परलोक संवारने की सटीक राह कौन-सी होती है। वे वणिक समाज के चरित्र को बारीकी से समझते थे... जहां जन्मे-पले थे, जिनके मुगालते की कांपती जमीन से भली प्रकार परिचित थे, वहां सांस पर निरंतर अवरोध रचने वाले समाज में सांस लेने को अभिशप्त थे (संवेदना के विविध आयाम प्र.सं. 255)

यदि ऐसा नहीं है तो राजस्थानी भाषा में महान गीतकार गजानन वर्मा चुपचाप क्यों चले जाते हैं(पिछले महीने दिवंगत हुए)? जी हां, वे ही गजानन वर्मा, जिनके गीत "पौ फाटी जद बोलण लागी, पांख पंखेरू पीपळ डाल'

"बाजरै की रोटी पोई फोफलिया रो सागजी' "मैं तो बाबल रे बागां री चीड़कली' या "पगड़ी सम्भाळ भई पगड़ी सम्भाळ' जैसे गीत सुन-सुन कर, गा-गा कर एक पीढ़ी बूढ़ी हो चुकी है। मारवाड़ी समाज के संगठन भी बेखबर हैं। खैर। उनसे यही उम्मीद थी।

अंत में एक बात और याद दिला दूं। यहूदी समाज भी 18वीं शताब्दी में व्यापारिक समाज ही था। हमारी जैसी ही स्थिति थी। मगर 19वीं शताब्दी में जागरण हुआ। सामाजिक व धार्मिक मान्यताओं में विवेकपूर्ण परिवर्तन किए तो एक ही सदी में मार्क्स (1818-1883), फ्रायड (1856-1939) और आइंस्टाइन (1879-1955) जैसे चिंतक और वैज्ञानिक पैदा हुए। तस्वीर ही बदल गई उस समाज की। आज दुनिया उसका लोहा मानती है।

अब यह आम मारवाड़ी का कर्तव्य हो जाता है कि वह आगे बढ़कर समाज में परिवर्तन लाए। एक संतुलन पैदा करे। इस समाज की संस्थाएं तो ऐसा करने में नाकामयाब रही हैं, उनसे कोई उम्मीद भी नहीं है। अतः अब आम आदमी को ही आगे आना होगा। फिर किसी विनोद रिंगानिया को यह लिखने की आवश्यकता नहीं होगी कि "मारवाड़ी को सिर्फ सहन किया जाता है' - उनका दर्द समझिए।

शनिवार, 23 जून 2012

शादियों में आडंबर पर सामाजिक नियंत्रण जरूरी









शादियों में फिजूलखर्ची, दिखावा और आडंबर एक ऐसा विषय है जो उस समय से ही मेरे अंतर्मन को कचोटता रहा है जब से मैंने सामाजिक जीवन में थोड़ी-बहुत रुचि लेनी शुरू की। उस जमाने में हम मारवाड़ी युवा मंच के बैनर तले सक्रिय हुआ करते थे। उन दिनों खुद इन पंक्तियों के लेखक ने, मुरलीधर तोसनीवाल, प्रमोद जैन आदि साथियों ने अपनी-अपनी शादियों में किसी न किसी हद तक कुछ परंपराओं को तोड़ा। तब ऐसा लगने लगा था कि ये उदाहरण एक आंदोलन की चिनगारी बनेंगे और आगे आने वाला आंदोलन समाज में शादी-ब्याह के मौकों को कर्ज लेकर घी पीने के मौके बनने से रोकेगा।

उन दिनों हमारे संकीर्ण मस्तिष्कों को यह लगता था कि सिर्फ मारवाड़ी समाज में ही शादियों के मौकों पर इतना आडंबर, तामझाम और भदेसपन की सीमाएं छूने वाली फिजूलखर्ची होती है। इसका कारण शायद यह होगा कि असमिया समाज में उन दिनों और आज भी तुलनात्मक रूप से शादियां सादगीपूर्ण होती हैं। हमें पता नहीं था कि असम के बाहर सारा भारत आज इस सामाजिक व्याधि के नीचे दबा हुआ कराह रहा है।

आप अध्ययन करके देखें तो पाएंगे कि भारत के हर समाज में अपनी क्षमता से अधिक पैसे शादी पर खर्च करने की प्रवृत्ति काम करती है। इसके कई कारण होते हैं। अपने दैनंदिन जीवन में सीमित संसाधनों से अपना काम चलाने वाले व्यक्ति के लिए शादी सिर्फ एक सामाजिक समारोह न होकर यह दिखाने का अवसर होता है कि उसने पिछले 25 सालों में क्या किया? आर्थिक सीढ़ियों पर कितनी पायदानें इस बीच वह चढ़ चुका है यह दिखाने के लिए शादी के अलावा यदि उसके पास कोई दूसरा मौका होता है तो वह होता है आलीशान घर बनवाने का।

समाज के क्रियाकलाप पर जब सोचते हैं तो कई अजीब चीजें देखने को मिलती हैं। एक मित्र ने ठीक ही प्रश्न किया कि मोबाइल तो बात करने के लिए होता है। फिर लोग इतने महंगे मोबाइल क्यों खरीदते हैं। इसी तरह प्रश्न किया जा सकता है कि शादी तो दो युवाओं के आपसी बंधन को सामाजिक मान्यता देने के लिए होती है, फिर इसमें बेतहाशा खर्च क्यों? यह प्रश्न किसी भी चीज के बारे में पूछा जा सकता है। साधारण शर्ट पहनने से काम चल सकता है तो इतनी कीमती शर्ट क्यों पहनते हैं। इन सवालों का जवाब यह है कि समाज में कोई चीज वही नहीं रह जाती जिससे उसकी शुरुआत हुई थी। विकसित समाज जटिल भी होता है। एक विकसित समाज में मोबाइल सिर्फ बात करने के लिए नहीं होता, यह आपकी हैसियत प्रदर्शित करने का एक माध्यम भी है। एक शर्ट सिर्फ तन ही नहीं ढकती, यह सामाजिक पायदान पर आपका स्थान भी निर्णय करती है। इसी तरह शादी सिर्फ शादी नहीं है, यह समाज में आपका स्थान निर्णय करती है, उसका पुनर्निर्धारण करती है।

हमारे स्कूल के दिनों में वार्षिक परीक्षा हो जाने के बाद नई कक्षा में हमारे बैठने के क्रम का फिर से निर्धारण होता था। उसी तरह शायद एक मध्यवर्गीय या उच्च-मध्यवर्गीय व्यक्ति चाहता है कि शादी में उसके द्वारा किए गए खर्च, उसके समारोह में आए अतिथियों के प्रोफाइल को देखकर समाज उस स्थान पर पुनर्विचार करे, जो शायद उसे 25 साल पहले दिया गया था। क्या समाज शादी में पकवानों की प्रदर्शनी लगाने और अतिथियों की भव्य भीड़ प्रस्तुत करने के माध्यम से उसके द्वारा की गई अपील पर विचार करता है?

इसका उत्तर शायद हां और शायद ना दोनों हैं। महंगे मोबाइल, महंगी कार, महंगे फ्लैट और महंगी शादी को देखकर समाज का एक हिस्सा जल्दी ही प्रभाव में आ जाता है। ऐसे लोग यह फैसला सुनाने की हड़बड़ी में रहते हैं कि श्रीमान क अब पहले वाले श्रीमान क नहीं रहे। उनकी सामाजिक रेटिंग में सुधार होना चाहिए। लेकिन गनीमत है कि समाज के ज्यादातर हिस्से में धन के इस तरह के भद्दे प्रदर्शन के खिलाफ गुस्सा उपजता है। जो लोग आडंबरपूर्ण शादियों में शरीक होते हैं, वे अपने व्यक्तिगत संबंधों के कारण शरीक होते हैं। कई बार जो मेजबान होता है वह उनके शरीक होने को आडंबर और अपव्यय के पक्ष में मतदान समझने की भूल कर बैठता है।

समाज का ज्यादातर हिस्सा चाहता है कि शादियों का खर्च उनकी हैसियत के अंदर रहे। वे शादियों के खर्च को प्रतियोगिता से अलग रखना चाहते हैं। इसका प्रमाण यह है कि हर उस समाज में जहां आज भी परंपराएं मजबूत हैं शादियों के खर्च को सीमाओं में बांधने की जद्‌दोजहद जारी है। हाल ही में हमने पढ़ा कि किसी उत्तरी भारत के राज्य में गुर्जरों की पंचायत ने शादियों के समारोह पर कुछ प्रतिबंध लगाए हैं। समस्या यह है कि हर समाज में पंचायतें मजबूत नहीं हैं। शहरी समाज में तो वे हैं ही नहीं। ऐसे में सामाजिक संगठनों की भूमिका महत्वपूर्ण हो जाती है। उदाहरण के लिए राजस्थान से निकल कर भारत के विभिन्न हिस्सों में बसे लोगों के कई मजबूत सामाजिक संगठन हैं। ये संगठन पंचायत नहीं हैं, लेकिन चाहें तो पंचायतों जैसा महत्व हासिल कर सकते हैं। ऐसे संगठन अपने समाज में शादी विवाह पर होने वाले खर्च की सीमाएं बांध सकते हैं। हालांकि यह कहना जितना आसान है करना उतना ही मुश्किल है।

यह लेख लिखने की प्रक्रिया के दौरान ही कुछ मित्रों से इस विषय पर बहस हुई। एक मित्र का कहना था कि आप उपभोक्तावाद का विरोध कर रहे हैं, और यह विरोध आज के युग में ज्यादा आगे तक चलने वाला नहीं है। आज लोग एक करोड़ की कार लेकर अपनी हैसियत में आए परिवर्तन के बारे में लोगों को सूचना देना चाहते हैं। उन्हें आप किस तरह रोकेंगे। इस पर हमारा कहना यह है कि जब हम शादियों में आडंबर और धन के भद्दे प्रदर्शन पर रोक लगाने की वकालत करते हैं तो हमारा उद्देश्य वहीं तक सीमित होता है। इसे बाकी उपभोक्तावाद के साथ गड्डमड्ड नहीं करना चाहते। क्योंकि शादी एक सामाजिक समारोह है, जो हर परिवार को एक न एक दिन आयोजित करना है। जब कोई धनाढ्‌य व्यक्ति शादी में होने वाले खर्च की सीमा को ऊंचा उठा देता है तो उसके वर्ग के समकक्ष व्यक्तियों पर एक तरह का दबाव पैदा हो जाता है कि उन्हें भी अपनी सामाजिक स्थिति को बचाए रखने के लिए इसी तरह का खर्च करना होगा। इस तरह शादियों में खर्च अपव्यय और भौंडे दिखावे की सीमाएं छूने लग जाता है। लेकिन जहां तक महंगी कार, या महलनुमा घर की बात है- इस तरह का उपभोक्तावाद भले ईर्ष्या और आतंक पैदा करे लेकिन इससे समाज का आम व्यक्ति यह दबाव महसूस नहीं करता कि उसे भी इस तरह का खर्च करना होगा। एक सामाजिक एक्टिविस्ट ने ठीक ही कहा िक "जनम-वरण और मरण' के अवसर पर होने वाले अनुष्ठान सामाजिक निगरानी के तहत होने चाहिए। ये अवसर व्यक्तिगत होते हुए भी नितांत व्यक्तिगत नहीं हैं। इन तीनों अवसरों के लिए बनाए गए विधान सामाजिक पंचायतें और संगठन लागू भी कर सकते हैं, क्योंकि कोई कितना ही धनी क्यों न हो वह इस बात को स्वीकार करता है कि इन अवसरों के बारे में समाज को बोलने का अधिकार है। 
 
 
हाल ही में अहमदाबाद के बहुत ही सम्मानित तथा धनाढ्‌य व्यक्ति गिरीश दानी ने एक उदाहरण पेश किया। वे अपने बेटे और होने वाली बहू (अहमदाबाद के विख्यात डाक्टर की बेटी) को लेकर अपने गुरु आसाराम बापू के आश्रम में गए। वहां मंदिर में साधारण रूप से शादी संपन्न करने के बाद उन्होंने आसाराम बापू को एक करोड़ का चेक भेंट किया तथा कहा कि इस राशि से वे एक सौ जरूरतमंद जोड़ों की शादी करवा दें। मध्यवर्ग में शादियों में होने वाले अपव्यय को रोकने के लिए उच्च-मध्यवर्ग द्वारा पेश किए जाने वाले ऐसे उदाहरणों की एक बहुत बड़ी भूमिका हो सकती है।

रविवार, 6 फ़रवरी 2011

लांक्षन सहना प्रवासी की नियति है



हाल ही में मैं राज्य के बाहर गया। वहां एक साहित्यिक मित्र ने मुझे उलाहना दिया कि आपलोग हिंदी अखबार क्यों निकालते हैं? इस तरह आपलोग मारवाड़ी समाज को असमिया समाज से दूर रखने का काम करते हैं। हिंदी अखबार न होते तो मारवाड़ी लोग असमिया अखबार पढ़ते और असमिया समाज-संस्कृति के ज्यादा निकट जाने का मौका मिलता। यदि हम काफी हाउस या पनवाड़ी की दुकान पर मिले होते तो मैं जोर-शोर से बहस करता, लेकिन किसी के घर अतिथि बनकर गर्मागर्म बहस करने का मौका नहीं था। फिर भी मैंने मिमियाते हुए कहा कि जब हिंदी अखबार नहीं थे, तब मारवाड़ी कौन-सा असमिया अखबार पढ़ते थे। उन दिनों वे सन्मार्ग और दैनिक विश्वमित्र पढ़ा करते थे जिनमें असम के बारे में कुछ नहीं होता था। हमारे मित्र को एतराज था कि मारवाड़ी फैंसी बाजार में अपनी डफली पर अपना राग गाते हैं, उन्होंने फैंसी बाजार को छोटा-सा टापू जैसा बना रखा है। इसीलिए तो स्थानीय लोगों में विद्रोह होता है।

चूंकि मैं वहां कुछ बोल नहीं पाया था, शायद इसीलिए इन प्रश्नों के बीज दिमाग में रह गए और अंकुरित होकर बड़े होते रहे। मैं सोचता रहा कि क्या इसीलिए असमिया समाज में विद्रोह पनपा है! मैं मारवाड़ी समाज के किसी भी स्थानीय समाज के नजदीक जाने, उसकी संस्कृति-भाषा को अपनाने का विरोधी नहीं बल्कि समर्थक हूं। लेकिन यह भी कहता हूं कि यह काम एक स्वाभाविक प्रक्रिया के तौर पर होगा, न कि किसी राजनीतिक कार्यक्रम की तर्ज पर।

फिर यह प्रश्न भी है कि असमिया भाषा-संस्कृति को काफी हद तक अपना लेने वाले समुदायों को क्या संदेह की दृष्टि से नहीं देखा जाता? उदाहरण के लिए नेपाली समुदाय। हमारे मित्र को जिन मुद्दों पर मारवाड़ी समुदाय से शिकायत थी उन मुद्दों पर नेपाली समुदाय उन्हें शिकायत का मौका नहीं देगा। मसलन, वे लोग शहरों में टापू बनाकर नहीं रहते। नेपाली समुदाय असम में खेती और गोपालन से जुड़ा हुआ है, इसलिए गांवों में रहता है। इस समुदाय के लोग असमिया भाषा को मातृभाषा की तरह प्रयोग में लाते हैं। नेपाली समुदाय का असमिया साहित्य में अच्छा योगदान है। हमारे मित्र को संतोष होगा, कि ये लोग अपनी भाषा में समाचार पत्र भी नहीं निकालते, और असमिया पत्र ही पढ़ते हैं। लेकिन इससे क्या नेपाली समुदाय दोषारोपण से बच जाता है?

असमिया समाज-भाषा-साहित्य के सामने संकट हो सकते हैं- इनमें से कई वास्तविक हैं और कुछ काल्पनिक। लेकिन इस संकट को पैदा करने में मारवाड़ी समुदाय की मुझे कोई भूमिका नजर नहीं आती। एक कहानी है- एक मक्खी एक बैल के सींग पर बैठी थी। उसने देखा कि बैल की आंखों से आंसू बह रहे हैं। द्रवित होकर मक्खी ने पूछा- बैल भाई, मेरा भार सहन नहीं हो रहा है तो मैं कहीं और बैठ जाऊँ। कुछ ऐसी ही स्थिति मारवाड़ी समाज की असम में है। मारवाड़ी समुदाय मुश्किल से यहां की जनसंख्या का एक फीसदी होगा। ये एक फीसदी लोग दिन-रात अपने व्यापार में मगन रहते हैं। ये लोग असमिया भाषा सीखे, असमिया संस्कृति के नजदीक जाए तो इनलोगों के लिए ही अच्छा है- लेकिन न जाए तो यह स्थानीय लोगों में असंतोष का कारण बन सकता है यह बात समझ से परे है। मारवाड़ी समाज सिर्फ असम ही नहीं देश के हर राज्य में फैला है। अपने प्रवास के करीब दो सौ सालों के दौरान किसी भी राज्य में इसके द्वारा स्थानीय भाषा-संस्कृति के विरुद्ध कोई काम करने का उदाहरण नहीं मिलता। यह समाज अपनी भाषा को ही संवैधानिक या किसी भी तरह की सरकारी मान्यता दिलाने के लिए कोई प्रयत्न नहीं करता, ऐसा समाज किसी भी अन्य भाषा-संस्कृति के लिए खतरा बनने का तो सवाल ही नहीं।

फिर भी मारवाड़ी लोग अपने स्वभाव के कारण हमेशा रक्षात्मक मुद्रा में खड़े रहते हैं। (व्यावहारिक तौर पर देखें तो यह अच्छा है, लेकिन बौद्धिकता के स्तर पर पीड़ा तो होती ही है)। कोई कहता है तुम बहुत बुरे हो, तब यह अपने गिरेबान में झांकने लग जाता है, कोई कहता है तुम अपने बच्चों को हिंदी क्यों पढ़ाते हो तब यह हिंदी स्कूलों को बुराई की जड़ बताने लग जाता है; कोई कहता है तुम शोषक हो तब यह जनकल्याण के काम गिनाने लग जाता है; कोई कहता है तुम जाहिल हो तब यह अपने समाज के बौद्धिकों के नाम गिनाने लग जाता है; कोई इसे देशद्रोही तक कह देता है तब यह स्वाधीनता संग्राम में मारवाड़ी समाज की भूमिका को गिनाने लग जाता है।

दरअसल हम एक जटिलताओं भरे समाज में रह रहे हैं। एक मारवाड़ी मध्यप्रदेश या उत्तर प्रदेश में रहता है, तब उस पर बहुत सारे प्रश्नों की बौछार नहीं की जाती, लेकिन वही मारवाड़ी जब उड़ीसा या असम में आ जाता है तो उससे इतने सारे सवाल पूछे जाते हैं कि वह अपराध बोध तले पिस जाता है। मध्य देश में मारवाड़ी ठीक है तो पूर्व देश में आकर वह बुरा कैसे हो गया?

कहीं ऐसा तो नहीं कि गालियां सुनना प्रवास की अनिवार्य शर्त होती है! बाहर से आए आदमी को आप सारी बुराइयों की जड़ बता दो, फिर भी वह रक्षात्मक मुद्रा में रहेगा, हाथ जोड़े खड़ा रहेगा, क्योंकि उसे भान है कि वह किस जमीन पर खड़ा है।

मारवाड़ी कैसा दिखता है यह इस बात पर जितना निर्भर करता है कि मारवाड़ी कैसा है, उससे ज्यादा इस बात पर निर्भर करता है कि देखने वाला कौन है? जहां तेज उद्योगीकरण हो रहा है, पूंजी और उद्यमियों का स्वागत किया जाता है वहां मारवाड़ी उद्यमी है और विकास का वाहक है (कर्नाटक)। जहां के लोग अपनी भाषा-संस्कृति-साहित्य की समृद्धि और भविष्य के प्रति आश्वस्त हैं वहां मारवाड़ी एक छोटा-सा अल्पसंख्यक समूह है जिसकी अपनी अलग भाषा-संस्कृति है। वे लोग अपनी भाषा में क्या करते हैं इससे किसी को कोई मतलब नहीं (पश्चिम बंगाल)। जहां के लोग अपनी भाषा-संस्कृति के भविष्य को लेकर आशंकित हैं वहां मारवाड़ियों को अलग दृष्टि से देखा जाता है (असम)।

असम के ज्यादातर मारवाड़ी द्विभाषी हैं। नई पीढ़ी में मारवाड़ी बोली खत्म हो रही है, उसका स्थान हिंदी ले रही है। इस तरह ज्यादातर मारवाड़ी हिंदी और असमिया का मातृभाषा के रूप में व्यवहार करते हैं। ज्यादातर मारवाड़ी शुद्ध असमिया बोलना जानते हैं। असमिया भाषा को इन लोगों ने दिल से अपना लिया है। लेकिन ज्यादातर मारवाड़ी हिंदी हो या असमिया - लिखने-पढ़ने से कोई ताल्लुक नहीं रखते। इसलिए उन्हें असमिया भाषा के प्रति अपने प्रेम को प्रदर्शित करने का अवसर नहीं मिलता। इधर असमिया समाज भाषा व साहित्य को लेकर अति संवेदनशील है। अपनी भाषा-साहित्य-संस्कृति के भविष्य को सुरक्षित करने की यह जद्दोजहद कम -से-कम डेढ़ सौ साल पुरानी है। असमिया संस्कृति के प्रति किसी का नजरिया क्या है, इसे असम में दोस्त और दुश्मन की पहचान के लिए एक संदर्भ बिंदु की तरह इस्तेमाल किया जाता है।

हाल ही में मारवाड़ी समाज से कई असमिया साहित्यकार उभरे हैं। कुछ लोग हिंदी के माध्यम से ही असमिया संस्कृति की सेवा में उतरे हैं। इसका असमिया समाज में अच्छा स्वागत हुआ है। व्यापक मारवाड़ी समाज के असमिया प्रेम को यही वर्ग आगे लेे जा सकता है और उसे संस्थागत रूप दे सकता है।

अपराध बोध से ग्रसित रहने वाले मारवाड़ी भाइयों से संक्षेप में यही कहना चाहूंगा-(1) आप असम की जनसंख्या का एक अति क्षुद्र अंश हैं। जनसंख्या संतुलन को बदलने या राजनीतिक फायदे बटोरने में आपकी कोई भूमिका नहीं है, (2) आप नौकरियों के बाजार पर कोई दबाव नहीं डालते, उल्टे नौकरियां पैदा करते हैं, (3) आप धर्म और कानून से डरने वाले दब्बू लोग हैं, गैर कानूनी काम आपके स्वभाव में नहीं है (अपवाद हर जगह होते हैं), (4) स्थानीय भाषा का अहित कर हिंदी या राजस्थानी को आगे बढ़ाने के लिए आपने आज तक कुछ नहीं किया, आगे भी उम्मीद नहीं है, (5) आप पिछड़े इलाकों में आधुनिक पूंजीवाद के वाहक रहे हैं, (6) आपकी नई पीढ़ियां काफी पढ़-लिख कर यह साबित कर रही है कि आपकी बौद्धिक योग्यता सिर्फ परंपरागत बनियागिरी तक सीमित नहीं है।

जब सच्चाई यह है तब आपको अपराधबोध या हीनता ग्रंथि से ग्रस्त होने की क्या जरूरत है? क्या आप इसलिए हतोत्साहित हो जातेे हैं कि दूसरे समुदाय के दस लोगों के बीच कोई भी आपकी खिल्ली उड़ा देता है और आपके समुदाय के नाम पर वे अपराध जड़ देता है जो आपके समुदाय ने कभी किए ही नहीं। इससे हतोत्साहित होने की जरूरत नहीं, यह हम भारतीयों का स्वभाव है, यहां हर भारतीय समुदाय दूसरे समुदाय का मजाक उड़ाता है और उनके चुटकुले बनाता है। हमें इसके साथ ही जीना सीखना होगा।

शनिवार, 30 अक्टूबर 2010

असम में किसे चाहिए आजादी

पिछले तीन दशकों में असम में काफी खून बहा है। मोटे तौर पर तीन कारणों से राज्य में हिंसा हुई। एक बोड़ो आंदोलन, दो असम आंदोलन और तीन अल्फा का स्वाधीनता को लेकर अलगाववादी आंदोलन। हिंसा का कोई तर्क नहीं होता। लेकिन इस हिंसा का संचालकों के पास इसके औचित्य को लेकर किसके पास क्या तर्क हैं इसे देखा जाना चाहिए। बोड़ो समुदाय के पास हो सकता है यह तर्क हो कि इंसानी खून के बदले में बोड़ो समुदाय ने अपनी पहचान हासिल कर ली। असम आंदोलन के नेताओं के पास भी तर्क हो सकते हैं कि तीन हजार से अधिक लोगों की जान के विनिमय में सारे देश का ध्यान असमिया समुदाय की समस्याओं पर गया। बांग्लादेशी घुसपैठ की समस्या हो सकता है असम आंदोलन के बिना भी किसी समय देश के राजनीतिक एजेंडे में सबसे ऊपर आ जाती, लेकिन असम आंदोलन ने इस समस्या को ठीक समय पर देश के सामने रख दिया।

लेकिन अल्फा के द्वारा किए गए खून-खराबे के पक्ष में इसके समर्थक लाख कोशिश करके भी कोई पचने वाला तर्क नहीं दे सकते। स्वाधीनता! असम में स्वाधीनता कौन चाहता है? 1947 में देश के आजाद होने के बाद से 1979 में अल्फा के द्वारा एक और आजादी की मांग उठाए जाने के बीच असम के राजनीतिक विमर्श में कभी भी प्रदेश की स्वाधीनता किसी की जबान पर नहीं रही। 1989-92 के दौरान अल्फा थोड़े दिनों के लिए हीरो बना जब इसके कैडर सिर्फ मारवाड़ी व्यवसायियों और असम में बाहर से आकर काम करने वाले बड़े अधिकारियों से पैसे वसूलते थे। उन दिनों अल्फा को "हमारे लड़के' कहकर संबोधित किया जाता था। जनता की नब्ज पकड़ने में राजनीतिक नेता माहिर होते हैं। अल्फा का जनता के बीच प्रभाव था इसीलिए प्रफुल्ल महंत उसके विरुद्ध कार्रवाई करने से कतराते रहे। महंत के बाद आए हितेश्वर सइकिया अल्फा और आसू दोनों के ही दुश्मन थे। लेकिन अपनी प्रेस वार्ताओं में वे भूल से भी (और लाख कोंचने के बावजूद) अल्फा के खिलाफ कोई शब्द उच्चारित नहीं करते थे। जो कुछ कहना होता था अपने पुलिस अधिकारियों को कहते थे। कथनी और करनी में उनके यहां जितना अंतर था उतना और कहीं नहीं मिलता।

1989-92 का दौर खत्म होने के बाद अल्फा की हथियारों की भूख बढ़ने लगी, साथ-साथ पैसे की भी। सेना के दो-दो अभियान झेल लेने के बाद इसका आत्म-विश्वास बढ़ गया था और इसके नख-दंत असमिया मूल के समुदायों को भी चुभने लगे थे। तब धीरे-धीरे मीडिया में अल्फा की आलोचना होने लगी। लेकिन तब तक मर्ज काफी बढ़ चुका था। विदेशों में हथियारों की मंडी तक उनकी पहुंच हो चुकी थी, म्यांमार में शस्त्र चालन के कोचिंग सेंटरों तक का रास्ता वे पहचान चुके थे। इसलिए जब तक असमिया समाज के एक बड़े वर्ग के बीच यह सहमति बनी कि इस मर्ज की रोकथाम होनी चाहिए, तब तक काफी देर हो चुकी थी - और इसीलिए समाज में असम की स्वाधीनता के एक फीसदी समर्थक भी मौजूद न होने के बावजूद अल्फा का खून-खराबा, हत्याओं का दौर इतने लंबे समय तक जारी रह पाया।

हम चर्चा कर रहे हैं इस बात की कि अल्फा के इस तथाकथित संघर्ष का क्या कोई औचित्य था। ब्रिटिश साम्राज्य में शामिल होने के बाद भारत के अंग के रूप में बने रहने पर राज्य में कभी कोई आपत्ति रही हो इसका उदाहरण ताजा इतिहास में हमें नजर नहीं आता। लेकिन जिस बात पर हम जोर देना चाहते हैं वह यह है कि आज से दो दशक पहले जो लोग स्वाधीनता या अलगाव के नाम पर उदासीनता दिखाते थे वे भी आज सक्रिय रूप से ऐसी किसी विचारधारा का विरोध करते हैं। इसका कारण यह है कि आज बीस साल पहले की अपेक्षा ज्यादा बड़ी संख्या में असम के छात्र दूसरे राज्यों के शिक्षा-संस्थानों में पढ़ते हैं, ज्यादा बड़ी संख्या में असम के युवा भारत के विभिन्न शहरों में नौकरियां करते हैं, ज्यादा बड़ी संख्या में असम के विभिन्न मूल समुदायों के लोग भारतीय सेना के तीनों अंगों में भर्ती हैं, ज्यादा बड़ी संख्या में लोग विशाल भारतीय बाजार के साथ जुड़े हुए हैं और इसका महत्व समझते हैं।

इसलिए असम में आज भावना यह है कि स्वाधीनता एक राजनीतिक बकवास है। लेकिन "लड़कों' ने इतने सालों तक "संघर्ष' किया है तो कुछ ले-देकर समझौता हो जाना चाहिए। यदि असम को अन्य राज्यों के मुकाबले कुछ अतिरिक्त सुविधाएं हासिल हो जाती हैं, तो अल्फा का "संघर्ष' धन्य हो जाएगा। लेकिन क्या यह कहा जा सकेगा कि इतने खून-खराबे और इंसानी जानों की कीमत अदा हो गई? हम ऐसा नहीं समझते। शायद आज के असम में कोई भी ऐसा नहीं समझता। क्योंकि भारतीय लोकतंत्र में स्पेस की इतनी कमी कभी नहीं हुई कि ज्यादा नौकरियां, ज्यादा धन, ज्यादा आरक्षण, संवैधानिक सुरक्षा जैसी चीजों के लिए इतना खून बहाना पड़े, जितना अल्फा ने बहाया है। जब किसी व्यवस्था में शांतिपूर्ण आंदोलन के लिए गुंजाइश न हो, तब वहां हिंसा के पक्ष में दलील की गुंजाइश बनती है। असम आंदोलन को नजदीक से देखने वालों और इसमें हिस्सा लेने वालों को जिस तरह आज अहसास हो रहा है कि केंद्रीय विश्वविद्यालय, आईआईटी जैसी चीजों के लिए तीन हजार से ज्यादा लोगों की जानों की बलि कुछ ज्यादा ही बड़ी कीमत है यदि अंततः विदेशियों को बाहर नहीं निकाला जाता। उसी तरह कल को असम को संविधान के अंतर्गत कुछ सविधाएं देने के एवज में अल्फा के साथ समझौता हो जाए तो यह अहसास होने में ज्यादा वक्त नहीं लगेगा कि इतना तो किसी शांतिपूर्ण आंदोलन से ही हासिल हो जाता।