रिपोर्टिंग के दौरान अंतर्मुखी होने से काम नहीं चलता। खासकर कहीं बाहर जाने पर। इसलिए ईटानगर में उस आदी जनजाति के युवक से दोस्ती बढ़ाने की गरज से मैंने इधर-उधर की बातें शुरू की। पैसे देने के लिए उसने बटुआ निकाला तो देखा कि किसी महिला की फोटो है। मैंने पूछा- आपका वाइफ? उसने कहा, हां मेरा सबसे प्यारा वाइफ। सबसे प्यारा मतलब! उसने बताया कि उसकी चार पत्नियां हैं। तीन शादियां उसने पिता की इच्छा से की, और यह चौथी शादी अपनी मर्जी से की। उनकी जनजाति में किसी व्यक्ति का मान-सम्मान, रुतबा इस बात से मापा जाता है कि उसके कितनी पत्नियां हैं। कहने की जरूरत नहीं कि उनके यहां बहुविवाह की इजाजत है। लगभग हर समाज में किसी समय पत्नियों और गुलामों की संख्या से आदमी का रुतबा मापा जाता था। बाइबिल और हदीस में ऐसे प्रकरण भरे पड़े हैं, जिनमें एकाधिक पत्नियों और गुलामों की संख्या के साथ आदमी की सामाजिक हैसियत जुड़ी होने के प्रसंग आए हैं। आज लगभग हर समाज में बहुविवाह और गुलाम रखने की अनुमति नहीं है।
इस प्रकरण की याद आई उड़ीसा हाई कोर्ट के अधिवक्ता रमेश अग्रवाल द्वारा शादियों में फिजूलखर्ची पर मेरे लेख की प्रतिक्रिया में फेसबुक पर लगाए गए इस सवाल के कारण कि किसी के पास पैसा है तो अपनी मर्जी से खर्च करने का भी उसे अधिकार है। बाहर से किसी को बोलने का क्या अधिकार है? मुझे अरुणाचल प्रदेश के जनजातीय युवक का प्रसंग इसलिए याद आया कि हमारे अधिकांश क्रिया-कलाप पर सामाजिक नियंत्रण रहता है। लेकिन हम उसके इतने अभ्यस्त हो जाते हैं कि हमें उस सामाजिक श़ृंखला का अनुभव तक नहीं होता। उल्टे हम उस सामाजिक नियंत्रण के अंदर अपने आपको सुरक्षित महसूस करते हैं। आदी जनजाति में रुतबा दिखाने के लिए बहुविवाह की अनुमति है, इसलिए उस कबीले केधनी लोग इस अनुमति का फायदा उठाते हुए शान से एकाधिक विवाह करते हैं और अपने समाज में छाती फुलाकर चलते हैं। क्या हमारे समाज में किसी के पास पैसा हो तो वह बहुविवाह कर सकता है? आप कहेंगे कि यह गैरकानूनी है। लेकिन कानून तो हिंदू धर्म के वर्तमान रीति-रिवाज को देखते हुए बाद में बना है। कल्पना कीजिए कि कल को कानून न भी रहे तो क्या समाज सिर्फ इसलिए बहुविवाह की अनुमति दे देगा कि किसी के पास पैसा है? इन पंक्तियों से हम सिर्फ यह दिखाना चाहते हैं कि किस तरह हमारे क्रिया-कलापों पर सामाजिक प्रतिबंध है और उन्हें धनी और गरीब हर किसी को मानकर चलना पड़ता है। अब सवाल उठता है कि क्या शादियों के अवसर पर होने वाली फिजुलखर्ची और आडंबर समाज के लिए अहितकारी है? इस संबंध में कई तरह के सवाल पूछे जाते हैं।
प्रश्न 1 : आधुनिक अर्थव्यवस्था उपभोग पर निर्भर है। यदि लोगों ने शादियों में खर्च कम कर दिया तो क्या अर्थव्यवस्था धीमी पड़ जाने का खतरा नहीं है?
उत्तर : यह सही है कि आधुनिक अर्थव्यवस्था उपभोग पर निर्भर है। उपभोग मध्य वर्ग या उच्च वर्ग करता है। उच्च वर्ग संख्या में सीमित है, इसलिए अर्थव्यवस्था का सारा उद्यम मध्य वर्ग को तरह-तरह के उपभोगों की ओर आकर्षित करने पर केंद्रित रहता है। आज सिर्फ अर्थव्यवस्था को चलाने के लिए बाजार अनावश्यक और हानिकारक पेय पदार्थों, खाद्य पदार्थों, प्रसाधन सामग्रियों से पटा पड़ा है। बात लोगों के जीवन को ज्यादा आरामदायक बनाने की की जाती है, लेकिन मतलब होता है सिर्फ अपने प्रोडक्ट को मार्केट में ठेलने का। आज शाही शानौ-शौकत से शादियां करवाने वाली कंपनियां बाजार में उतर गई हैं।
इस अनावश्यक उपभोग के दो पहलू हैं। एक है विकसित देशों में होने वाला अनावश्यक उपभोग। वहां गरीब वर्ग नहीं है, या उसे राज्य द्वारा पर्याप्त मदद मिल जाती है, फिर भी अनावश्यक उपभोग प्रकृति द्वारा प्रदत्त संसाधनों पर दबाव पैदा करता है, यहां तक कि पृथ्वी के आने वाली पीढ़ियों के रहने लायक नहीं रहने का खतरा पैदा हो गया है। दूसरा पहलू है, भारत जैसे देश में अनावश्यक उपभोग का। हमारे देश में भले 30 करोड़ का मध्य वर्ग पैदा हो गया हो, फिर भी यहां संसाधनों की कमी है। इसलिए अर्थव्यवस्था को गति देने के नाम पर हम अनावश्यक और संसाधनों को बर्बाद करने वाले (टनों खाना नालियों में बहाया जाना) उपभोग को बढ़ावा नहीं दे सकते। हमारी अर्थव्यवस्था की मुख्य दिशा ज्यादा बचत और उस बचत के पैसे का बुनियादी ढांचे को विकसित करने और उद्योग में निवेश करने की ओर होनी चाहिए।
प्रश्न 2 : क्या आज के युग में सामाजिक नियंत्रण संभव है?
उत्तर : जिन जातियों में जाति पंचायतें आज भी सक्रिय हैं, वहां इस तरह के नियंत्रण आज भी संभव हैं। हमने पिछले सप्ताह गुर्जर पंचायत का जिक्र किया था, जिसने अपनी जाति के अंदर इस तरह के प्रतिबंध लागू किए हैं। इसके अलावा जहां आधुनिक शैली के संगठन सक्रिय हैं, यदि उन्हें पंचायतों जैसी मान्यता हासिल है, तो उनके माध्यम से भी इस तरह के नियंत्रण संभव हैं। याद रखना होगा कि शादियों में आडंबर के विरुद्ध लड़ाई आधुनिक अर्थव्यवस्था की इस समय जो दिशा है उस दिशा के विरुद्ध लड़ाई है। यह उपभोगवाद का आक्रामक प्रचार करने में नियोजित विज्ञापन कंपनियों, विशाल कारपोरेशनों के साथ लड़ाई है। इसके लिए मानसिक तैयारी को भी पर्याप्त महत्त्व देना होगा। उड़ीसा के रमेश अग्रवाल ने जैसा बुनियादी सवाल पूछा है, वैसे सवाल आते रहने चाहिए ताकि हम इस मुद्दे पर अपनी वैश्विक दृष्टि को साफ रख सकें।
