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Journalist and writer, Writes on Northeast India, Bangladesh, Myanmar
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मंगलवार, 24 मई 2016

असम में राजनीति के साइड इफेक्ट्स

असम ने भारतीय जनता पार्टी को अभूतपूर्व जीत दिलाकर एक चक्कर पूरा कर लिया है। यह चक्कर जय आई असम से शुरू हुआ और अब भारत माता की जय तक आकर पूरा हुआ है। जय आई असम का मतलब होता है असम माता की जय। असमिया साहित्य में इस नारे या वाक्य की उपस्थिति काफी पहले से है। ज्योतिप्रसाद अगरवाला की कविता से लेकर भूपेन हजारिका के गीतों तक जय आई असम की उपस्थिति हम पाते हैं। लेकिन यह नारा सबसे अधिक लोकप्रिय हुआ 1979 में जब असम के लोगों ने असमिया भाषा और संस्कृति को बचाने के लिए एक जबरदस्त आंदोलन छेड़ा था। इस असमिया डर कि पड़ोसी बांग्लादेश के कारण असम की भाषा और संस्कृति बस कुछ ही दिनों की मेहमान है 1979 में लोगों पर इस कदर हावी हो गया कि उसकी परिणति एक जबरदस्त आंदोलन में हुई। उसी आंदोलन की उपज आज की असम गण परिषद और प्रफुल्ल कुमार महंत हैं।

एक बात गौर करने लायक है कि इस जबरदस्त जनजागरण के बाद 1985 में जो पहला चुनाव हुआ उसमें जनजागरण का नेतृत्व करने वाली शक्ति असम गण परिषद (पार्टी आंदोलन के बाद बनी थी) को इतनी अधिक सीटें नहीं मिली थीं जितनी इस बार भारतीय जनता पार्टी और उसकी सहयोगी असम गण परिषद और बोड़ो पीपुल्स फ्रंट को मिली हैं। हमारा मानना है कि 1985 में असम में रहने वाले गैर-असमिया हिंदुओं तथा जनजातीय समुदायों ने असम गण परिषद का साथ नहीं दिया था जिसके कारण उसे असमिया राष्ट्रवादी आंधी के बीच भी एक-एक सीट के लिए संघर्ष करना पड़ा था। लेकिन इस बार भारतीय जनता पार्टी को इन दोनों समुदायों का भी पूरा समर्थन मिला। इसी की परिणति यह रही है कि पहली बार के लिए असम में किसी चुनावपूर्व गठबंधन को इतनी अधिक सीटें मिल पाईं। मतदान के पैटर्न में आए इस बदलाव को ही हमने जय आई असम से भारत माता की जय तक की यात्रा कहा है।

1985 का चुनाव असमिया पहचान को बचाने के मुद्दे पर लड़ा गया था। पड़ोस में बांग्लादेश के होने और वहां से आने वाले लोगों की सतत धारा के कारण यह मुद्दा काफी पहले से असम में होने वाले किसी भी विमर्श के केंद्र में रहा है। स्वाधीनता के पहले के लेखन में भी हम देखते हैं कि इस मुद्दे का काफी असर था। लेकिन चुनाव में शायद पहली बार 1985 में ही इस मुद्दे की केंद्रीय उपस्थिति रही। इसके बाद मुख्यमंत्री बने प्रफुल्ल कुमार महंत की नाकामयाबियों के कारण लोगों में निराशा फैली। इस निराशा का परिणाम दो तरह से सामने आया। राजनीति से पहचान का मुद्दा गायब हो गया। लोगों को लगने लगा कि अब शायद असमिया भाषा और संस्कृति को बचाने के लिए कुछ नहीं हो सकता। दूसरी ओर, उग्र विचारधारा के एक वर्ग ने अल्फा के माध्यम से अपने विचारों को अभिव्यक्त किया। उनका मानना था कि भारत के हिस्से के रूप में रहकर बांग्लादेशियों के खतरे से हम अपने आपको सुरक्षित नहीं कर सकते। हमें पूर्वोत्तर के दूसरे राज्यों के साथ मिलकर अपना अलग देश बनाना चाहिए। किसी समय असम में इस विचारधारा के समर्थक लोगों की अच्छी खासी संख्या थी। यह वह दौर था जब असम भारत माता की जय के ठीक विपरीत छोर पर खड़ा था।

असम की छवि उस विद्रोही युवक की थी जिसे हर किसी से शिकायत थी। वह अपनी समस्या से सिर्फ अपने बूते पर निपट लेना चाहता था। यह मानसिकता 1979 के असम आंदोलन से शुरू हुई थी। गैर-असमियाभाषी समुदायों के समर्थन की उस आंदोलन में आकांक्षा तो थी, लेकिन उसके दिल में उसके लिए कोई मूल्य नहीं था। यह समर्थन उसे सिर्फ अपने ऊपर लगने वाले संकीर्णता के आरोपों से छुटकारा पाने के लिए चाहिए था। उस दौर के राजनीतिज्ञों ने जय आई असम और भारत माता की जय को दो विपरीत ध्रुवों पर खड़ा कर दिया था। जब जय आई असम के नारे लगते तो चाय बागान के मजदूरों को यह डर सताता कि यह कहीं हमें वापस झारखंड और उड़ीसा भेजने के लिए तो नहीं है। बोड़ो जैसी जनजातियों को डर लगता कि यह कहीं हमारी भाषा को खत्म करने के लिए तो नहीं है।

1979 से शुरू हुआ असमिया पहचान का आंदोलन हालांकि 1985 में समाप्त हो गया लेकिन उसके पीछे काम करने वाली विचारधारा आगे भी जारी रही। यह विचारधारा अपने उग्र से उग्रतम दौर को देख चुकी है और असम उसकी परिणतियों को झेल चुका है। ऐसा भी दौर आया जब उग्रवाद के विरुद्ध चले सैन्य अभियान को लेखकों और पत्रकारों ने असम पर भारत के हमले के रूप में दर्शाने की कोशिश की थी। इस तरह असमिया पहचान को बचाए रखने की जद्दोजहद 1990 के बाद या तो उग्रवादियों के हाथ में चली गई या उसकी आग मंद पड़ गई। आम राजनीति से यह गायब हो गई। लेकिन पिछले करीब एक दशक से हम देखते हैं कि असमिया पहचान को बचाने की यह अकुलाहट फिर से असमिया जनमानस में दिखाई देने लगी। इसका एक कारण बदरुद्दीन अजमल के नेतृत्व में एक ऐसी पार्टी का असम में उत्थान होना था जिसका नेता जमीयत उलेमा ए हिंद जैसे शुद्ध रूप से धर्म आधारित संगठन के भी बड़े पद पर था। लोग आपसी बातचीत में यह चर्चा करने लगे कि क्या बदरुद्दीन अजमल एक दिन असम के मुख्यमंत्री बन जाएंगे। यह किसी व्यक्ति विशेष के विरुद्ध विद्वेष की अभिव्यक्ति नहीं थी बल्कि असम का राजनीतिक नेतृत्व असमियाभाषी समुदाय के हाथ से हमेशा के लिए छिन जाने की उस आंशका के सही होने के कगार पर आने की पीड़ा थी जिसके प्रति स्वाधीनता से पहले के बुद्धिजीवियों ने भी आगाह किया था।

इस समय असम गण परिषद और इसके नेता प्रफुल्ल कुमार महंत की साख कैसी थी इसका अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि अखिस असम छात्र संघ ने प्रफुल्ल कुमार महंत का सार्वजनिक स्थानों पर बहिष्कार करने का आह्वान कर रखा था। महंत असमिया समुदाय के लिए असहनीय हो गए थे क्योंकि उन्होंने अपने मुख्यमंत्रित्व काल में दर्जनों अल्फा उग्रवादियों के नेताओं के परिवार वालों का सफाया करवा दिया था। लोग अल्फा का समर्थन नहीं करते थे लेकिन रात के अंधेरे में नकाबपोश हत्यारे आएं और निरीह परिवार वालों का कत्ल कर जाएं यह भी लोगों के लिए अस्वीकार्य था।

ऐसे ही समय में खाली स्थान को भरने के लिए भाजपा राजनीतिक दृश्यपटल पर आई। भाजपा का असम में काफी पहले से काम चल रहा था। असम के चाय बगीचों में जिन्हें हाल तक कांग्रेस का गढ़ कहा जाता था भाजपा ने चुपचाप काम किया और बगीचे के कई पीढ़ियों से असम में रहने वाले आदिवासी मूल के मजदूरों को कांग्रेस से विमुख कर दिया। जिन समुदायों को असम गण परिषद अपने उत्कर्ष के दिनों में भी अपने साथ नहीं कर पाई वे समुदाय बड़ी आसानी से भाजपा के साथ आ गए। इनमें बंगाली हिंदुओं का नाम लिया जा सकता है क्योंकि पूर्वी पाकिस्तान या बांग्लादेश से आने वाले लोगों हिंदुओं को भारत में शरणार्थी का दर्जा देने का ऐलान भाजपा ने ही किया है। इसकी अस्सी और नब्बे के दशक के उन दिनों से तुलना की जानी चाहिए जब असमिया राष्ट्रवाद का मतलब ही बंगाली हिंदुओं का विरोध करना था।

पिछले दो-तीन सालों से साफ लगने लगा था कि असम में अब मौका मिलते ही लोग भाजपा को सत्ता सौंप देंगे। इसका संकेत पालिका चुनावों और दो साल पहले हुए लोकसभा चुनावों में मिल चुका था। इसका कारण कांग्रेस का दूसरा विकल्प न होना तो था ही, असमिया समुदाय को यह भी लगने लगा कि उसकी पहचान की लड़ाई भारत माता की जय कहकर अधिक प्रभावी ढंग से लड़ी जा सकती है। किसी भी चुनाव के बाद समाज में कटुता फैलने के उदाहरण कई हैं लेकिन असम में हमें यह संभावना दिख रही है कि इन चुनावों के बाद समाज के विभिन्न हिस्सों में एकता बढ़ेगी। धार्मिक आधार पर चुनावों के पहले ध्रुवीकरण निःसंदेह हुआ है लेकिन असमिया समुदाय स्वाभाव से सांप्रदायिक नहीं है इसलिए एक उम्मीद भी है। दूसरी ओर, विगत वर्षों में असम को कई स्तरों पर ध्रुवीकरण के कटु अनुभव से गुजरना पड़ा है। उच्च वर्ण बनाम जनजातीय ध्रुवीकरण, असमिया बनाम गैर-असमिया ध्रुवीकरण जैसे ध्रुवीकरण समाज के लिए घातक तो रहे ही हैं, असमिया पहचान को सुरक्षित करने के एजेंडा को आगे ले जाने में भी सहायक नहीं हुए हैं। असम में भाजपा सरकार के आने के बाद यदि मूल असमिया समुदाय में यह भावना प्रबल होती है कि हमें अपनी समस्याओं का हल जनजातीय समुदायों, गैर-असमियाभाषी समुदायों, चाय बगीचा मजदूर समुदाय और केंद्र सरकार के सहयोग के साथ करना है, तो इसे राजनीति का अच्छा साइड इफेक्ट ही कहा जाएगा।

बुधवार, 8 अगस्त 2012

बांग्लादेशी घुसपैठियों की समस्या का समाधान संभव है

असम अब दिल्ली से दूर नहीं रहा। अब तक जो मानसिक दूरी थी वह लगता है खत्म होती जा रही है। यह बात पिछली दो घटनाओं से प्रमाणित हो गई। एक तो जीएस रोड कांड की अनुगूंज जिस तरह सारे देश में सुनाई दी उससे एक बार तो असम के लोग भौचक्के रह गए। आदत से मजबूर कुछ लोगों ने इसमें भी साजिश खोजने की कोशिश की। ऐसे लोगों ने अब तक सोशल नेटवर्किंग, यू ट्यूब और इलेक्ट्रानिक मीडिया के द्वारा लाए गए परिवर्तन को आत्मसात नहीं किया है। दिल्ली का पत्रकार जब असम के बारे में बोलता है तो ऐसे लोगों को अटपटा लगता है। अभी आदत नहीं हुई है। दूसरी घटना है - कोकराझाड़ की हिंसा। यह घटना तो अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर गूंजी है। कोई यह सोचता है कि मरने वालों की संख्या के कारण मीडिया का ध्यान आकृष्ट हुआ है तो वह गलत है। क्योंकि बोड़ो इलाके में समय-समय पर हिंसा भड़कती रहती है। सबसे ताजा हिंसा 2008 में भड़की थी, तब अभी की तुलना में कहीं ज्यादा लोग मारे गए थे। लेकिन राष्ट्रीय मीडिया ने इसका नोटिस ही नहीं लिया था। इन चार सालों में ऐसा क्या बदल गया है कि असम की घटनाओं पर मीडिया का पयाप्तर् ध्यान जाने लगा है। हमें लगता है कि यह इंटरनेट के प्रभाव के कारण है, हालांकि इस पर और अधिक चिंतन की गुंजाइश है।

जब बांग्लादेशी घुसपैठियों के खिलाफ आंदोलन चला था (1979 से 1985 तक, इसे असम आंदोलन कहा गया), तो आंदोलन के नेताओं को इस बात पर कोफ्त होती थी कि इतने बड़े-व्यापक आंदोलन के बारे में, असम के बाहर कोई जानता तक नहीं। पिछले साल अन्ना के आंदोलन को जो जनसमर्थन मिला था उससे कई गुना ज्यादा समर्थन उस आंदोलन को मिला था। तब आंदोलन के नेताओं ने छोटी-छोटी टीमें बनाईं जिनमें हिंदी और अंग्रेजी जानने वाले लोगों को रखा गया। इन टीमों का काम था राज्य के बाहर जाकर पत्रकारों से बातचीत कर उन्हें असम में होने वाली बांग्लादेशी घुसपैठ के बारे में बताना, तथा यह भी साफ करना कि असम आंदोलन अन्य राज्यों से आए भारतवासियों के खिलाफ नहीं है। एक तरह से असम से बाहर असम के बारे में फैले अज्ञान के कारण भी असम के लोगों में यह भावना भर गई कि हमें तो कोई पूछता ही नहीं। जो भी हो, हम इस तथ्य पर ध्यान आकर्षित करना चाहते हैं कि जिस बांग्लादेशी घुसपैठ पर असमवासियों ने बाकी देशवासियों का ध्यान आकर्षित करने के लिए इतनी ज्यादा मेहनत की थी, वह मुद्दा इस बार कोकराझाड़ की हिंसा के बाद एकाएक चर्चा का विषय बन गया।

राष्ट्रीय मीडिया पर बांग्लादेशी घुसपैठ के मुद्दे पर आज भी चर्चा हो रही है, लेकिन इस चर्चा में गहराई नहीं है। ज्यादातर यह चर्चा मुस्लिम विद्वेष से ग्रसित है। कहीं अति सरलीकरण की शिकार है। बोड़ो नेता काफी हद तक मीडिया से इस मायने में फायदा उठाने में कामयाब रहे कि उन्होंने ताजा हिंसा को बांग्लादेशी बनाम बोड़ो हिंसा का जामा पहना दिया और ज्यादातर लोग इसे इसी नजरिए से देखने लग गए। राज्य से बाहर के लोग सोचते हैं कि बांग्लादेश से लोग सीमा पार कर आ रहे हैं और बोड़ो इलाकों में बस रहे हैं, इसके कारण वहां लोगों में गुस्सा और असंतोष फैल रहा था, जो 21 जुलाई से शुरू हुई हिंसा का कारण बना। जबकि उन लोगों को पता नहीं है कि इससे पहले संथाल लोगों को भी इसी तरह बोड़ो इलाकों से भगाया गया था। उन पर तो बांग्लादेशी घुसपैठिया होने का ठप्पा नहीं लगा था। कोकराझाड़ की हिंसा को बोड़ो बनाम बांग्लादेशी का रूप देकर बोड़ो नेतृत्व एक तरह से हिंसा को वैधता प्रदान करने में कामयाब हो गया है। 


कोकराझाड़ हिंसा के कारण ही सही जब बांग्लादेशी घुसपैठ की समस्या राष्ट्रीय चर्चा के केंद्र में आ गई है तो हमें इस अवसर का लाभ उठाते हुए इस पर सुचिंतित तरीके से विचार-विमर्श करना चाहिए और देखना चाहिए कि इसके क्या-क्या संभावित समाधान हो सकते हैं।

1. विदेशी घुसपैठियों की पहचान की जाए, उन्हें वापस सीमा के पार भेजा जाए, इससे भी ज्यादा जरूरी यह है कि नए आने वाले घुसपैठियों को रोका जाए। इसके लिए कोई नया चिंतन, नई बातचीत करने की जरूरत नहीं है। सभी पक्षों के बीच सहमति है कि सीमा पर बाड़ का काम पूरा होना चाहिए। बाड़ लगाने का ज्यादातर काम पूरा हो चुका है और थोड़ा-सा ही काम बचा है। भारत में सरकारी काम किस तरह होता है, उसका एक नमूना है सीमा को सील करने का यह काम। कुछ मित्र बाड़ लगाने के काम के महत्व को यह कहकर कम करना चाहते हैं कि एक दस रुपए के कटर से आप बाड़ काटकर अंदर प्रवेश कर सकते हैं। लेकिन यह सही तर्क नहीं है। हर बाड़ को काटा जा सकता है, हर दीवार में सेंध लगाई जा सकती है, लेकिन फिर भी बाड़ और दीवार के बिना किसी इलाके की चौकीदारी करना और बाड़ या दीवार से घिरे इलाके की चौकीदारी करने में अंतर है।

नए घुसपैठियों को रोकने की दिशा में दूसरा महत्वपूर्ण काम है नागरिकों के राष्ट्रीय रजिस्टर (एनआरसी) को अद्यतन करना यानी नए जन्मे नागरिकों के नाम इसमें डालकर इसे एक जीवंत दस्तावेज बनाना। असम में वोटर पहचान पत्र नहीं दिए गए हैं, क्योंकि शक है कि मतदाता सूचियों में काफी विदेशियों के नाम भरे हुए हैं। इसलिए अभी तक कोई ऐसा दस्तावेज नहीं है जिसकी प्रामाणिकता प्रश्नातीत हो। एनआरसी को अद्यतन करने पर भी सभी पक्षों के बीच सहमति है। राज्य के दो राजस्व सर्किल में प्रयोग के तौर पर यह काम शुरू भी किया गया था। लेकिन अल्पसंख्यक समुदाय को इसकी प्रक्रिया पर कुछ आपत्तियां थीं, उन आपत्तियों को दूर नहीं किया गया, उसके विरुद्ध प्रदर्शन हुआ, गोलियां चलीं, कई लोग मारे गए और काम रोक दिया गया। उसके बाद फिर से सभी पक्षों के बीच बैठकों के दौर चले और अब सहमति बन चुकी है कि एनआरसी बनाने का काम फिर से शुरू करना चाहिए। एनआरसी को अद्यतन करना इसलिए जरूरी है कि यह एक आधार बन जाएगा किसी की नागरिकता को प्रमाणित करने के लिए। एनआरसी बनने के बाद किसी भी नए आए विदेशी को पहचानना आसान हो जाएगा। एनआरसी नए आने वाले घुसपैठियों को रोकने का कारगर हथियार बन जाएगा। 

2. असम में इस समय दो तरह के लोग हैं। एक वे हैं जो सोचते हैं कि विदेशियों की पहचान हो जाने के बाद एक न एक दिन उन्हें वापस उनके मूल देश में भेजना संभव हो पाएगा। दूसरा वर्ग ऐसे लोगों का है जो अब तक के घटनाक्रम से निराश हो चुका है और उसे उम्मीद नहीं है कि विदेशियों को कभी वापस भेजना संभव हो पाएगा। दोनों ही नजरिए सही नहीं हैं क्योंकि दोनों ही इस बात को ज्यादा महत्व देते हैं कि जो घुसपैठिए आ गए वे कब वापस बांग्लादेश भेजे जाएंगे।

इक्का-दुक्का लोगों को पकड़ लेना और अदालत की लंबी प्रक्रिया से गुजार कर उन्हें बांग्लादेश के बार्डर गार्ड्‌स की नजरों से बचाकर रात के अंधरे में पुश बैक करना अलग बात है, लेकिन बड़े स्तर पर घुसपैठियों को वापस भेजना दिवास्वप्न के अलावा कुछ नहीं है। इसमें दो बाधाएं हैं - एक तोे लंबी चलने वाली भारतीय न्याय प्रक्रिया और दो, बांग्लादेश सरकार द्वारा भारत से भेजे जाने वाले लोगों को अपने नागरिक के रूप में स्वीकार न किए जाने की संभावना। रोहिंगा मुसलमानों को म्यांमार से अपने देश में घुसने न देने के लिए बांग्लादेश ने जिस कड़ाई का प्रदर्शन किया उससे हमारी इस धारणा को बल मिलता है।

यदि एनआरसी का काम ठीकठाक चलता है और काफी संख्या में बांग्लादेशी घुसपैठियों की पहचान कर ली जाती है तो ज्यादा संभावना है कि वे राज्यविहीन नागरिकों के रूप में हमारे ही देश में रह जाएंगे। ये लोग भारत के नागरिक नहीं होंगे इसलिए नागरिक अधिकारों से वंचित होंगे और चुनाव प्रक्रिया को किसी भी तरह प्रभावित नहीं कर पाएंगे। लेकिन यह भी संभव हो पाएगा क्या इस पर एक बहुत बड़ा प्रश्न चिह्न है। क्योंकि जब दो-तीन लाख लोग एक साथ खड़े हो जाते हैं तो वे अपने-आप में एक बहुत बड़ी राजनीतिक ताकत बन जाते हैं। तब उनकी बात न्यायपूर्ण है या नहीं इससे ज्यादा महत्त्व उनकी संख्या और बाहर से उनको मिलने वाले समर्थन का हो जाता है।

3. असम में पूर्व बंगीय मूल के लोगों से सबसे ज्यादा राजनीतिक रूप से खतरा महसूस किया जा रहा है। स्वाधीनता के बाद से असम में असमिया भाषी समुदाय का राजनीतिक वर्चस्व रहा है। अब इन पूर्व बंगीय मूल के लोगों (जिन्हें लोग बांग्लादेशी कह देते हैं, लेकिन सभी बांग्लादेशी नहीं हैं) के कारण यह वर्चस्व अब टूटा, तब टूटा की स्थिति है। लेकिन इस वर्चस्व को बचाने का बहुत ही आसान-सा उपाय है। 15 अगस्त 1985 को हुए समझौते में केंद्र सरकार ने असम आंदोलन के नेतृत्व को यह आश्वासन दिया था कि असमिया समुदाय की अलग पहचान की रक्षा के लिए संविधान में विशेष व्यवस्था की जाएगी। इस विशेष व्यवस्था का सीधा मतलब है अन्य चीजों के अलावा विधानसभा में असमिया समुदाय के लिए आरक्षण की व्यवस्था। जब यह समझौता हुआ था तब की परिस्थिति में "असमिया' शब्द पर कोई विवाद नहीं था। लेकिन बाद के वर्षों में असम के बोड़ो, कार्बी आदि बहुत से जनजातीय समुदायों ने अपने आपको असमिया मानने से इनकार कर दिया। इसलिए अब मामला यहां अटक गया है कि "असमिया' किसे मानें। केंद्र सरकार ने यह निर्णय करने का दायित्व असम सरकार को सौंप दिया है। यहां फिर उसी भारतीय कार्यपद्धति का रोड़ा सामने आ जाता है। कमेटी पर कमेटी बैठ रही है, असम समझौते पर दस्तखत करने वाले प्रफुल्ल महंत बूढ़े हो गए हैं, भृगु फूकन इस दुनिया में नहीं रहे लेकिन असमिया समुदाय के लिए एक अति महत्वपूर्ण विषय का निपटारा आज तक नहीं हो पाया है। असमिया की परिभाषा में कौन-कौन लोग शामिल होंगे यह आज तक तय नहीं हो पाया है।

बुधवार, 4 जुलाई 2012

एयरपोर्ट पर तीन मिनट और मीडिया से परहेज



प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और सोनिया गांधी के असम के बाढ़ पीड़ित इलाकों का हवाई सर्वेक्षण करने के बाद गुवाहाटी में मीडिया को ब्रीफ करने का कार्यक्रम था। मुख्यमंत्री सहित असम सरकार के नुमाइंदों के साथ एयरपोर्ट पर ही एक बैठक हुई और इसके बाद प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह, यूपीए अध्यक्ष सोनिया गांधी और मुख्यमंत्री तरुण गोगोई उनके इंतजार में बैठी मीडिया के पास आए। प्रधानमंत्री ने अपने अधिकारियों द्वारा तैयार किया गया एक बयान पढ़ा जिसमें खबर लायक एक ही बात थी कि केंद्र सरकार ने फौरी तौर पर बाढ़ सहायता के लिए पांच सौ करोड़ रुपए मंजूर किए हैं। इस तरह मुश्किल से तीन मिनट में अपना काम निपटा कर मनमोहन सिंह, सोनिया गांधी और तरुण गोगोई बिना पत्रकारों के किसी भी सवाल का जवाब दिए वहां से चले गए।

प्रधानमंत्री के इस व्यवहार ने एक बार फिर यह प्रश्न जेहन में ताजा कर दिया है कि आखिर वे मीडिया के साथ विचारों का आदान-प्रदान करने से इतना परहेज क्यों करते हैं? आखिर वे असम के दौरे पर क्यों आए? यही बताने के लिए न कि असम की विपत्ति के समय नई दिल्ली भी उनके साथ खड़ी है और उन्हें हर तरह की आर्थिक तथा अन्य तरह की मदद देकर उसकी परेशानियां दूर करने के लिए तैयार है! यदि यह सही है तो जनता कोे यह बताने के लिए मीडिया के अलावा उनके पास और कौन सा जरिया है।

कुछ महीनों पहले जब इस बात को लेकर उनकी ज्यादा ही आलोचना होने लगी थी कि वे जनता के साथ सीधे या मीडिया के माध्यम से विचारों का आदान-प्रदान नहीं करते, तब उनका नया प्रेस सलाहकार नियुक्त किया गया। इसके बाद शुरुआत के तौर पर चार चुनिंदा वरिष्ठ पत्रकारों को उन्होंने मुलाकात के लिए बुलाया और उनके साथ लंबा वार्तालाप किया। लेकिन लोगों की यह धारणा गलत निकली कि यह एक शुरुआत मात्र है। वह शुरुआत ही लगता है अंत थी। क्योंकि उसके बाद इस तरह मीडिया के साथ मिलने का कोई कार्यक्रम बाद में नहीं रखा गया।

कहीं बाहर दौरे पर जाने पर हवाई जहाज में अपने साथ गए पत्रकारों के साथ या जहां जाते हैं वहां के स्थानीय पत्रकारों के साथ वार्तालाप के माध्यम से जहां प्रधानमंत्री जनता को यह बता सकते हैं कि सरकार की सोच क्या है, वहीं पत्रकारों के प्रश्नों के माध्यम से जनता की नब्ज भी जान सकते हैं।

इस सरकार की सबसे बड़ी जो कमी अब दिन पर दिन ज्यादा से ज्यादा से खटकने लगी है वह है इसके मुखिया मनमोहन सिंह और सत्ता से दूर रहकर सत्ता संभालने वाली सोनिया गांधी की जनता के प्रश्नों का सामना करने से परहेज करने की प्रवृत्ति। शत्रु को देखते ही रेत में मुंह छिपा लेने वाले पक्षी वाली कहावत इन दोनों पर सटीक बैठती है। हालांकि उन्हें यह समझना चाहिए कि मीडिया शत्रु नहीं है। उल्टे यह उन्हें जनता के साथ संपर्क स्थापित करने का एक अवसर प्रदान करता है। लोकतंत्र में जनता के साथ लगातार सीधे संवाद बनाए रखने का भी अपना महत्त्व है। इसे आप नजरंदाज नहीं करते हुए यह नहीं कह सकते कि हम अपना काम बेहतर तरीके से कर रहे हैं लोग जो सोचते हैं सोचते रहें। आपको अपना नजरिया भी लोगों के सामने लगातार रखते रहना पड़ेगा। लोगों के साथ रिश्ता बनाए रखने के मामले में मुख्यमंत्री तरुण गोगोई माहिर हैं। शायद मुख्यमंत्री का दबाव नहीं होता तो प्रधानमंत्री और यूपीए अध्यक्ष असम का दौरा ही न करते। लेकिन वे कांग्रेस के बुरे समय में लगातार तीसरी बार जीत हासिल करने वाले मुख्यमंत्री को हर तरह से खुश रखना चाहते हैं। हो सकता है एक-दो ही दिन में मुख्यमंत्री प्रेस के प्रतिनिधियों को बुलाकर उस कमी की भरपाई करने की कोशिश करें जो प्रधानमंत्री और सोनिया गांधी के चुप्पे स्वभाव के कारण रह
गई है।