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Journalist and writer, Writes on Northeast India, Bangladesh, Myanmar
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बुधवार, 18 जुलाई 2012

नारी को उपदेश

गुवाहाटी कांड में प्याज के छिलकों की तरह एक के एक बाद परतें उतर रही हैं। इस घटना का एक पहलू है पुरुष प्रधान समाज में आम लोगों की मानसिकता का उजागर होना। जब से यह घटना हुई है कुछ लोगों की जबान पर एक सवाल बार-बार सुनने को मिल रहा है कि वह लड़की या औरत कौन थी? उसका नाम क्या था? राष्ट्रीय मीडिया पर पीड़ित लड़की का नाम उजागर होने के बाद जांच के लिए असम आई अलका लांबा नामक सामाजिक कार्यकर्ता की काफी किरकिरी हुई है। लेकिन राष्ट्रीय स्तर पर लोगों को पता नहीं कि असम में पीड़ित लड़की का नाम न केवल एकाधिक मीडिया हाउसों में आया है बल्कि प्रिंट मीडिया के कई तथाकथित खोजी पत्रकारों ने उस लड़की के बारे में सूचनाएं खोद निकालने में इतनी मेहनत की जितनी उन लोगों ने अपने कैरियर में इससे पहले अन्य किसी समाचार के लिए नहीं की होगी।


इन खोजी पत्रकारों ने उक्त लड़की के मां-बाप, उसके रोजगार, उसके पति, वह किसलिए बार में गई थी, उसका चरित्र कैसा है - ये सारी बातें सविस्तार प्रकाशित की है। केवल इसी लड़की के बारे में ही नहीं, देखा गया है कि राज्य में कई समाचार पत्र यौन उत्पीड़न या बलात्कार आदि की पीड़ित स्त्री की पहचान को गुप्त रखने को महत्वपूर्ण नहीं मानते। किसी भी तरह के नियम और नैतिकता को नहीं मानने की प्रवृत्ति की पराकाष्ठा 9 जुलाई को जीएस रोड कांड का टीवी पर प्रदर्शन था।


इन दिनों देखा गया है कि स्थानीय मीडिया पर - जिसमें प्रिंट और इलेक्ट्रानिक दोनों ही शामिल हैं - नैतिकतावादी बहस और भाषणों की झड़ी-सी लग गई है। लोग राज्य में शराब के अधिक प्रचलन, स्त्रियों के पहनावे और रात में लड़कियों के बाहर निकलने आदि पर ज्यादा ही नैतिकतावादी भाषण देने लग गए हैं, जिसका लब्बोलुवाब यह होता है कि हाय अपना परम नैतिक समाज आज किधर जा रहा है। ऊपर जिन विषयों का उल्लेख किया गया है उन पर बहस और चर्चा हो इस पर किसी को आपत्ति नहीं हो सकती। लेकिन चूंकि इस चर्चा के लिए विचारोत्तेजना का कारण बना है जीएस रोड कांड, इसलिए यह मानने का कारण है कि ऐसी चर्चाएं शुरू करने वालों की मानसिकता अमूमन इस तरह की होती है - ऐसे परिधान पहनेगी तो ऐसे कांड करने वालों का क्या दोष, रात को ये लड़कियां क्या करने को बार में जाती हैं, हमारा समाज आधुनिकता की दौड़ में जिस तरह भाग रहा है उसका यही परिणाम होना था, आदि। हम फिर कहते हैं कि ऐसी चर्चा गलत नहीं है, लेकिन इस विशेष समय में इस दिशा में चिंतन करना उसी तरह गलत है जिस तरह किसी व्यापारी के यहां डकैती हो जाए और उसी समय कहा जाए कि सारी तो ब्लैक मनी है थोड़ी-सी डकैती में चली गई तो क्या हुआ। यह एक तरह से डकैतों का पक्ष लेने के समान है। नैतिकतावादी दिशा में चिंतन करने वाले इस लिहाज से समाज का बहुत बड़ा अहित करते हैं कि वे समाज में हर हालत में कानून और व्यवस्था के बने रहने के महत्त्व को कम करते हैं।


रात को महिलाओं के घूमने और उपयुक्त रूप से वस्त्र पहनने की बात चली तो बताते चलें कि (उदाहरण के तौर पर) दुबई शहर की स्थानीय अरब महिलाएं बुरका पहनकर ही बाहर निकलती हैं लेकिन वहां विदेशियों की संख्या 90 फीसदी है जो लोग बहुत ही कम कपड़ों में दिन और रात किसी भी समय सड़कों पर घूमते हैं। लेकिन मजाल है कि कोई भी उन्हें हाथ भी लगा ले। आप अपनी संस्कृति का पालन करें लेकिन यह नहीं भूलें कि जिस देश में महिलाएं डर के मारे रात को घर से नहीं निकल पाती हों वहां संस्कृति, परंपरा और नैतिकता की बड़ी-बड़ी बातें करना मिथ्याचार के अलावा और कुछ नहीं। जो लोग नारी के वस्त्रों और उसके रात को बार में जाने के औचित्य पर चर्चा कर रहे हैं क्या वे इस बात की गारंटी देते हैं कि अधिक वस्त्र पहनने और रात को घर से बाहर नहीं निकलने पर इस देश में गुवाहाटी कांड जैसा कांड फिर से नहीं घटेगा?

बुधवार, 4 जुलाई 2012

एयरपोर्ट पर तीन मिनट और मीडिया से परहेज



प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और सोनिया गांधी के असम के बाढ़ पीड़ित इलाकों का हवाई सर्वेक्षण करने के बाद गुवाहाटी में मीडिया को ब्रीफ करने का कार्यक्रम था। मुख्यमंत्री सहित असम सरकार के नुमाइंदों के साथ एयरपोर्ट पर ही एक बैठक हुई और इसके बाद प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह, यूपीए अध्यक्ष सोनिया गांधी और मुख्यमंत्री तरुण गोगोई उनके इंतजार में बैठी मीडिया के पास आए। प्रधानमंत्री ने अपने अधिकारियों द्वारा तैयार किया गया एक बयान पढ़ा जिसमें खबर लायक एक ही बात थी कि केंद्र सरकार ने फौरी तौर पर बाढ़ सहायता के लिए पांच सौ करोड़ रुपए मंजूर किए हैं। इस तरह मुश्किल से तीन मिनट में अपना काम निपटा कर मनमोहन सिंह, सोनिया गांधी और तरुण गोगोई बिना पत्रकारों के किसी भी सवाल का जवाब दिए वहां से चले गए।

प्रधानमंत्री के इस व्यवहार ने एक बार फिर यह प्रश्न जेहन में ताजा कर दिया है कि आखिर वे मीडिया के साथ विचारों का आदान-प्रदान करने से इतना परहेज क्यों करते हैं? आखिर वे असम के दौरे पर क्यों आए? यही बताने के लिए न कि असम की विपत्ति के समय नई दिल्ली भी उनके साथ खड़ी है और उन्हें हर तरह की आर्थिक तथा अन्य तरह की मदद देकर उसकी परेशानियां दूर करने के लिए तैयार है! यदि यह सही है तो जनता कोे यह बताने के लिए मीडिया के अलावा उनके पास और कौन सा जरिया है।

कुछ महीनों पहले जब इस बात को लेकर उनकी ज्यादा ही आलोचना होने लगी थी कि वे जनता के साथ सीधे या मीडिया के माध्यम से विचारों का आदान-प्रदान नहीं करते, तब उनका नया प्रेस सलाहकार नियुक्त किया गया। इसके बाद शुरुआत के तौर पर चार चुनिंदा वरिष्ठ पत्रकारों को उन्होंने मुलाकात के लिए बुलाया और उनके साथ लंबा वार्तालाप किया। लेकिन लोगों की यह धारणा गलत निकली कि यह एक शुरुआत मात्र है। वह शुरुआत ही लगता है अंत थी। क्योंकि उसके बाद इस तरह मीडिया के साथ मिलने का कोई कार्यक्रम बाद में नहीं रखा गया।

कहीं बाहर दौरे पर जाने पर हवाई जहाज में अपने साथ गए पत्रकारों के साथ या जहां जाते हैं वहां के स्थानीय पत्रकारों के साथ वार्तालाप के माध्यम से जहां प्रधानमंत्री जनता को यह बता सकते हैं कि सरकार की सोच क्या है, वहीं पत्रकारों के प्रश्नों के माध्यम से जनता की नब्ज भी जान सकते हैं।

इस सरकार की सबसे बड़ी जो कमी अब दिन पर दिन ज्यादा से ज्यादा से खटकने लगी है वह है इसके मुखिया मनमोहन सिंह और सत्ता से दूर रहकर सत्ता संभालने वाली सोनिया गांधी की जनता के प्रश्नों का सामना करने से परहेज करने की प्रवृत्ति। शत्रु को देखते ही रेत में मुंह छिपा लेने वाले पक्षी वाली कहावत इन दोनों पर सटीक बैठती है। हालांकि उन्हें यह समझना चाहिए कि मीडिया शत्रु नहीं है। उल्टे यह उन्हें जनता के साथ संपर्क स्थापित करने का एक अवसर प्रदान करता है। लोकतंत्र में जनता के साथ लगातार सीधे संवाद बनाए रखने का भी अपना महत्त्व है। इसे आप नजरंदाज नहीं करते हुए यह नहीं कह सकते कि हम अपना काम बेहतर तरीके से कर रहे हैं लोग जो सोचते हैं सोचते रहें। आपको अपना नजरिया भी लोगों के सामने लगातार रखते रहना पड़ेगा। लोगों के साथ रिश्ता बनाए रखने के मामले में मुख्यमंत्री तरुण गोगोई माहिर हैं। शायद मुख्यमंत्री का दबाव नहीं होता तो प्रधानमंत्री और यूपीए अध्यक्ष असम का दौरा ही न करते। लेकिन वे कांग्रेस के बुरे समय में लगातार तीसरी बार जीत हासिल करने वाले मुख्यमंत्री को हर तरह से खुश रखना चाहते हैं। हो सकता है एक-दो ही दिन में मुख्यमंत्री प्रेस के प्रतिनिधियों को बुलाकर उस कमी की भरपाई करने की कोशिश करें जो प्रधानमंत्री और सोनिया गांधी के चुप्पे स्वभाव के कारण रह
गई है।