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Journalist and writer, Writes on Northeast India, Bangladesh, Myanmar

गुरुवार, 18 नवंबर 2010

अंग्रेजी मैया की जय



उत्तर प्रदेश के लखीमपुर खीरी जिले के बनका गांव में इंग्लिश देवी का मंदिर बन रहा है। मंदिर दलित लोग बनवा रहे हैं। खबर चौंकाने वाली नहीं, सोचने को मजबूर करने वाली है। देश की यह गोबर पट्टी ही तो थी, जहां सबसे पहले अंग्रेजी हटाओ का नारा लगा था। इसी पट्टी के लोगों में से कुछ ने हिंदी न जानने वालों की देशभक्ति पर संदेह व्यक्त किया था। इसी पट्टी में ही तो हिंदी-हिंदू-हिंदुस्तानी का नारा उछला था। तो अब क्या हो गया? ठेेठ गंवई लहजे में पूछें तो क्या अकल ठिकाने आ गई?

अध्यात्म की गहराइयों की बात छोड़ दें और एक राह चलते आदमी से पूछें कि आप देवी दर्शन के लिए क्यों जाते हैं, तो वह अमूमन इन्हीं में से कोई जवाब देगा - बेटे की नौकरी के लिए, फैक्टरी की सफलता के लिए, स्वास्थ्य लाभ के लिए, गृहस्थी में शांति के लिए। आदमी चार दिन के लिए दुनिया में आता है लेकिन ये चार दिन भी रोटी, कपड़ा और मकान के बिना नहीं कट सकते। इसके बाद स्वास्थ्य चाहिए, समाज में सम्मान चाहिए, फिर....। यह सूची लंबी होती जाएगी। बात कुल मिलाकर यह है कि लोग हर देवी के पास कुछ प्राप्त करने के लिए जाते हैं। कहते हैं अलग-अलग देवियों के पास अलग-अलग शक्तियां होती हैं। इंग्लिश देवी का जहां तक सवाल है, यह बड़ी चमत्कारिक शक्तियों वाली देवी है। इसने देश को एक सूत्र में बांध दिया। कहते हैं हिंदी बोलने-समझने वालों की संख्या अंग्रेजी वालों से कई गुना है, फिर भी अंग्रेजी का प्रताप है। यही तो चमत्कार है। जिस तमिल भाषी को हिंदी में साम्राज्यवाद का खतरा नजर आता है, वह इंग्लिश देवी की शरण में चला जाता है।

इंग्लिश देवी सबके साथ समान व्यवहार करती है। वह किसी की मातृभाषा नहीं है। सभी लोग इसमें गलतियां करते हैं। जो कम गलत अंग्रेजी बोलता है, वह अंग्रेजी का विद्वान माना जाता है। हिंदी वालों के सामने बुद्धू बनने से तो अच्छा है टूटी-फूटी अंग्रेजी बोल लो, हम अपनी गलत अंग्रेजी बोलेंगे, तुम अपनी गलत अंग्रेजी बोलो। इंग्लिश देवी भोले शंकर की तरह है, छोटी-मोटी गलतियों का बुरा नहीं मानती, यहां अभिनव ओझा जैसे कर्मकांडी ब्राह्मण डंडा लेकर गलतियां पकड़ने के लिए नहीं खड़े रहते।

इंग्लिश देवी रोजगार देती है, सम्मान दिलाती है। कोई दलित भी दो-चार कदम धांसू अंग्रेजी में बोल लेता है तो हिंदी बोलने वाला ब्राह्मण धौंस में आ जाता है। इसके भक्त सारी दुनिया में फैले हैं। ज्यादातर ज्ञान अंग्रेजी में निकल रहा है। उसका एक फीसदी भी हिंदी में आने में दस साल लग जाते हैं। उसकी भी कोई गारंटी नहीं है कि हिंदी में वह आएगा ही। इसलिए हर ज्ञान पिपासु अंग्रेजी की शरण में जाने को बाध्य है।

यूरोप के देश अब तक इस देवी के सामने सर नहीं झुकाते थे। लेकिन अब वे भी अपनी-अपनी देवियों - जर्मन, फ्रेंच के साथ-साथ अंग्रेजी की भी आराधना करने में लगे हैं। कारण यह कि जो किताब आज अंग्रेजी में आई है वह जर्मन और फ्रेंच में आने में साल दो साल तो लग ही जाएंगे। और आज दुनिया जिस तेजी से आगे बढ़ रही है उस तेजी के सामने एक-दो साल बड़ा लंबा समय है। हमारे हिंदी वाले भाई दांतों तले अंगुली दबा लें कि हमारे यहां तो अंग्रेजी में उपलब्ध ज्ञान का पचास साल में भी अनुवाद नहीं हुआ और किसी ने चूं तक नहीं की। ये जर्मनी, फ्रांस वाले किताबी कीड़े होते होंगे या फिर अहमक होंगे जो ज्ञान जैसी चीज के लिए दूसरों की भाषा सीखते हैं (हमारे लिए तो मलेच्छ हैं)।

अब तो भाषा को लेकर अहंकारी चीन और जापान ने भी अंग्रेजी सीखना शुरू कर दिया । स्कूलों में अंग्रेजी एक विषय के तौर पर लेना अनिवार्य कर दिया है। आखिर आने वाली पीढ़ी को इंटरनेट पर दुनिया भर के लोगों से बातचीत करनी है, चिट्ठी-पत्री करनी है, चीनी-जापानी के भरोसे बैठे रहोगे तो कुएं में मेंढक बन जाओगे।

एक उदाहरण है। अक्सर देखा जाता है कि हिंदी पत्रकार बिरादरी में कुछ लोग असम और पूर्वोत्तर के अन्य राज्यों की समस्याओं के बारे में ऐसी बातें करते हैं जो किसी मूर्ख के मुंह पर ही शोभ सकती है। अपने ही देश के बारे में घोर अज्ञानता का कारण यह है कि हिंदी में अब तक असम के बारे में एक भी स्तरीय राजनीतिक पुस्तक उपलब्ध नहीं है। अब जिस आदमी ने अंग्रेजी देवी की कभी आराधना नहीं की, वह अपने ही देश के बारे में सही समझ कैसे विकसित कर सकता है। या तो आप अपनी भाषा में ज्ञान लाइए, या उस भाषा को सीखिए जिसमें वह ज्ञान उपलब्ध है - यह सब न करके मूर्तिभंजकों की तरह "अंग्रेजी हटाओ' का नारा देने का नतीजा यह हुआ है कि देश की हिंदी पट्टी में दो तरह के स्कूल खुल गए हैं। एक आम जनता के लिए, जिन्हें सरकारी स्कूल कहा जाता है। इन स्कूलों में पढ़ने वाला बच्चा अंग्रेजी तो दूर जोड़-घटाव भी ठीक तरह से नहीं सीख पाता। दूसरे हैं, निजी स्कूल, जिन्हें अंग्रेजी स्कूल कहा जाता है। गांवों-कस्बों में ये स्कूल छोटे-मोटे उद्यमी लगाते हैं, जहां सारी जरूरी सुविधाएं उपलब्ध नहीं होतीं। पत्रकार बंधु इनके आगे हमेशा "कुकुरमुत्तों की तरह उग आए' यह वाक्यांश जोड़ना नहीं भूलते। वे यह छिपाना नहीं चाहते कि उन्हें इन स्कूलों का "उगना' पसंद नहीं है। लेकिन गांव-कस्बे-शहर में जिस किसी के पास भी साधन है, वह अपने बच्चे को इन अंग्रेजी स्कूलों में ही भेजना पसंद करते हैं। ऐसे सर्वेक्षण हो चुके हैं, आगे और भी करवा लीजिए, आप पाएंगे कि अधिकांश हिंदी पत्रकारों-लेखकों-प्रोफेसरों के बच्चे अंग्रेजी स्कूलों में पढ़ते हैं। है न अंग्रेजी मैया का चमत्कार।

हिंदी पट्टी वालों ने काफी सालों तक सोचा कि हमारा विकास तो वैसे भी हो जाएगा। इसलिए वे राष्ट्र के, राष्ट्रभाषा के, राष्ट्रीयता के गीत गाते रहे। लेकिन ये गीत बस दक्षिण वालों, आसाम-बंगाल को सुनाने के लिए थे। उनके अपने घर में झांककर देखिए बड़ी दरिद्रता है। किसी राह चलते हिंदी वाले से कोई पूछ ले कि भैया जैसे बंग्ला में सुनील गंगोपाध्याय है, वैसे आपके यहां कौन हैं? इस बात की गारंटी दी जा सकती है कि कोई जवाब नहीं मिलेगा, या यह भी हो सकता है जवाब प्रेम वाजपेयी या रानू या ओमप्रकाश शर्मा मिले। अपनी ही भाषा के महान साहित्यकारों के बारे में अनभिज्ञ हिंदी पट्टी के लोग आज भाषा के मामले में सबसे ज्यादा गरीब हैं। उनमेें से ज्यादातर सिर्फ एक भाषा जानते हैं, जबकि देश के दूसरे राज्यों के ज्यादातर लोग अपनी प्रादेशिक भाषा के अलावा हिंदी और अंग्रेजी भी जानते हैं। उन्हें सीखना पड़ता है। हिंदी वाले भला प्रादेशिक भाषा क्यों सीखे। वे तो राष्ट्रीयता का झंडा लहराने वाले लोग हैं। क्षेत्रीयतावाद से उनका दूर-दूर तक रिश्ता नहीं। अंग्रेजी उन्होंने इसलिए नहीं सीखी क्योंकि इसके दो फायदे हैं। एक तो विदेशी भाषा सीखने की मेहनत से मुक्ति मिल गई, दूसरे देशभक्ति का एक काम हो गया। जैसे असम में किसी हिंदीभाषी को गाली देने से दो लाभ होते हैं- एक तो इलाके में धौंस जम जाती है, दूसरे असमी मां की सेवा हो जाती है। आखिर देश/प्रदेश के प्रति इतना कर्त्तव्य तो होना ही चाहिए।

शनिवार, 30 अक्टूबर 2010

असम में किसे चाहिए आजादी

पिछले तीन दशकों में असम में काफी खून बहा है। मोटे तौर पर तीन कारणों से राज्य में हिंसा हुई। एक बोड़ो आंदोलन, दो असम आंदोलन और तीन अल्फा का स्वाधीनता को लेकर अलगाववादी आंदोलन। हिंसा का कोई तर्क नहीं होता। लेकिन इस हिंसा का संचालकों के पास इसके औचित्य को लेकर किसके पास क्या तर्क हैं इसे देखा जाना चाहिए। बोड़ो समुदाय के पास हो सकता है यह तर्क हो कि इंसानी खून के बदले में बोड़ो समुदाय ने अपनी पहचान हासिल कर ली। असम आंदोलन के नेताओं के पास भी तर्क हो सकते हैं कि तीन हजार से अधिक लोगों की जान के विनिमय में सारे देश का ध्यान असमिया समुदाय की समस्याओं पर गया। बांग्लादेशी घुसपैठ की समस्या हो सकता है असम आंदोलन के बिना भी किसी समय देश के राजनीतिक एजेंडे में सबसे ऊपर आ जाती, लेकिन असम आंदोलन ने इस समस्या को ठीक समय पर देश के सामने रख दिया।

लेकिन अल्फा के द्वारा किए गए खून-खराबे के पक्ष में इसके समर्थक लाख कोशिश करके भी कोई पचने वाला तर्क नहीं दे सकते। स्वाधीनता! असम में स्वाधीनता कौन चाहता है? 1947 में देश के आजाद होने के बाद से 1979 में अल्फा के द्वारा एक और आजादी की मांग उठाए जाने के बीच असम के राजनीतिक विमर्श में कभी भी प्रदेश की स्वाधीनता किसी की जबान पर नहीं रही। 1989-92 के दौरान अल्फा थोड़े दिनों के लिए हीरो बना जब इसके कैडर सिर्फ मारवाड़ी व्यवसायियों और असम में बाहर से आकर काम करने वाले बड़े अधिकारियों से पैसे वसूलते थे। उन दिनों अल्फा को "हमारे लड़के' कहकर संबोधित किया जाता था। जनता की नब्ज पकड़ने में राजनीतिक नेता माहिर होते हैं। अल्फा का जनता के बीच प्रभाव था इसीलिए प्रफुल्ल महंत उसके विरुद्ध कार्रवाई करने से कतराते रहे। महंत के बाद आए हितेश्वर सइकिया अल्फा और आसू दोनों के ही दुश्मन थे। लेकिन अपनी प्रेस वार्ताओं में वे भूल से भी (और लाख कोंचने के बावजूद) अल्फा के खिलाफ कोई शब्द उच्चारित नहीं करते थे। जो कुछ कहना होता था अपने पुलिस अधिकारियों को कहते थे। कथनी और करनी में उनके यहां जितना अंतर था उतना और कहीं नहीं मिलता।

1989-92 का दौर खत्म होने के बाद अल्फा की हथियारों की भूख बढ़ने लगी, साथ-साथ पैसे की भी। सेना के दो-दो अभियान झेल लेने के बाद इसका आत्म-विश्वास बढ़ गया था और इसके नख-दंत असमिया मूल के समुदायों को भी चुभने लगे थे। तब धीरे-धीरे मीडिया में अल्फा की आलोचना होने लगी। लेकिन तब तक मर्ज काफी बढ़ चुका था। विदेशों में हथियारों की मंडी तक उनकी पहुंच हो चुकी थी, म्यांमार में शस्त्र चालन के कोचिंग सेंटरों तक का रास्ता वे पहचान चुके थे। इसलिए जब तक असमिया समाज के एक बड़े वर्ग के बीच यह सहमति बनी कि इस मर्ज की रोकथाम होनी चाहिए, तब तक काफी देर हो चुकी थी - और इसीलिए समाज में असम की स्वाधीनता के एक फीसदी समर्थक भी मौजूद न होने के बावजूद अल्फा का खून-खराबा, हत्याओं का दौर इतने लंबे समय तक जारी रह पाया।

हम चर्चा कर रहे हैं इस बात की कि अल्फा के इस तथाकथित संघर्ष का क्या कोई औचित्य था। ब्रिटिश साम्राज्य में शामिल होने के बाद भारत के अंग के रूप में बने रहने पर राज्य में कभी कोई आपत्ति रही हो इसका उदाहरण ताजा इतिहास में हमें नजर नहीं आता। लेकिन जिस बात पर हम जोर देना चाहते हैं वह यह है कि आज से दो दशक पहले जो लोग स्वाधीनता या अलगाव के नाम पर उदासीनता दिखाते थे वे भी आज सक्रिय रूप से ऐसी किसी विचारधारा का विरोध करते हैं। इसका कारण यह है कि आज बीस साल पहले की अपेक्षा ज्यादा बड़ी संख्या में असम के छात्र दूसरे राज्यों के शिक्षा-संस्थानों में पढ़ते हैं, ज्यादा बड़ी संख्या में असम के युवा भारत के विभिन्न शहरों में नौकरियां करते हैं, ज्यादा बड़ी संख्या में असम के विभिन्न मूल समुदायों के लोग भारतीय सेना के तीनों अंगों में भर्ती हैं, ज्यादा बड़ी संख्या में लोग विशाल भारतीय बाजार के साथ जुड़े हुए हैं और इसका महत्व समझते हैं।

इसलिए असम में आज भावना यह है कि स्वाधीनता एक राजनीतिक बकवास है। लेकिन "लड़कों' ने इतने सालों तक "संघर्ष' किया है तो कुछ ले-देकर समझौता हो जाना चाहिए। यदि असम को अन्य राज्यों के मुकाबले कुछ अतिरिक्त सुविधाएं हासिल हो जाती हैं, तो अल्फा का "संघर्ष' धन्य हो जाएगा। लेकिन क्या यह कहा जा सकेगा कि इतने खून-खराबे और इंसानी जानों की कीमत अदा हो गई? हम ऐसा नहीं समझते। शायद आज के असम में कोई भी ऐसा नहीं समझता। क्योंकि भारतीय लोकतंत्र में स्पेस की इतनी कमी कभी नहीं हुई कि ज्यादा नौकरियां, ज्यादा धन, ज्यादा आरक्षण, संवैधानिक सुरक्षा जैसी चीजों के लिए इतना खून बहाना पड़े, जितना अल्फा ने बहाया है। जब किसी व्यवस्था में शांतिपूर्ण आंदोलन के लिए गुंजाइश न हो, तब वहां हिंसा के पक्ष में दलील की गुंजाइश बनती है। असम आंदोलन को नजदीक से देखने वालों और इसमें हिस्सा लेने वालों को जिस तरह आज अहसास हो रहा है कि केंद्रीय विश्वविद्यालय, आईआईटी जैसी चीजों के लिए तीन हजार से ज्यादा लोगों की जानों की बलि कुछ ज्यादा ही बड़ी कीमत है यदि अंततः विदेशियों को बाहर नहीं निकाला जाता। उसी तरह कल को असम को संविधान के अंतर्गत कुछ सविधाएं देने के एवज में अल्फा के साथ समझौता हो जाए तो यह अहसास होने में ज्यादा वक्त नहीं लगेगा कि इतना तो किसी शांतिपूर्ण आंदोलन से ही हासिल हो जाता।

रविवार, 13 सितंबर 2009

हिंदी दिवस पर अच्छी बातें

हिंदी मुझे उसी तरह सम्मोहक लगती है जैसे आम, चाकलेट या सुबह की चाय। मैं जानता हूं कि हिंदी मीडिया में अभी भी कूड़ा-करकट रहता है, अंधविश्वास को बढ़ाने वाली खबरें रहती हैं, धर्मभीरुता को भुनाने वाला सामान रहता है, राष्ट्रप्रेम को उन्माद बनाने वाले समाचार रहते हैं - लेकिन कहीं हिंदी अखबार मिल जाए तो उस पर नजरें दौड़ाए बिना जी नहीं मानेगा। डाइबिटीज का मरीज जैसे जानता है कि आम खाते ही उसकी सेहत बिगड़ने वाली है, वैसे ही मैं जानता हूं किहिंदी मीडिया से रूबरू होते ही मूड बिगड़ने वाला है, लेकिन इसका कोई उपाय नहीं है। बच्चे को आप लाख हिदायत दें चाकलेट न खाने की, लेकिन वह नहीं मानेगा। बचपन से हमने भी जिस भाषा में सोचा, जीया, जिस भाषा में सपने देखे उस भाषा से अपने लगाव को परिभाषित नहीं कर सकता।
अच्छी बात यह है कि पूर्वोत्तर में हिंदी बढ़ रही है। अच्छी बात इसलिए नहीं कि हिंदी का साम्राज्य बढ़ रहा है, मैं जिस भाषा से प्यार करता हूं उस भाषा का साम्राज्य बढ़ रहा है। अच्छी बात इसलिए कि देश एक संपर्क भाषा विकसित कर रहा है। संविधान में आप लाख अच्छी-अच्छी बातें लिख लें, लेकिन जब लोग हिंदी के विरोध में आत्मदाह करने पर उतारू हों तो आपको उनकी बात भी सुननी होगी, समझनी होगी। देश ने एक समय ऐसी ही समझदारी दिखाई थी। संपर्क भाषा आज नहीं तो कल आ जाएगी, लेकिन देश एक बार टूट गया तो दोबारा जुड़ पाएगा इसकी कोई गारंटी नहीं। (इतिहास में पहली बार सारा सांस्कृतिक भारत एक राजनीतिक इकाई बना है, इस चीज को हम छोटा करके नहीं आंक सकते।) देश आज एक संपर्क भाषा विकसित कर रहा है। कल का वह कल आज आज बनकर आ गया है। आप गुवाहाटी में चलने वाले कोचिंग सेंटरों का चक्कर लगा लीजिए। सभी विद्यार्थी अंग्रेजी माध्यम से परीक्षा देंगे, लेकिन वहां पढ़ाई हिंदी के माध्यम से हो रही है। शिक्षक हिंदी में समझा रहे हैं, बच्चे हिंदी में सवाल पूछ रहे हैं और पीरक्षाएं अंग्रेजी में दे रहे हैंे। इस तरह देश एक संपर्क भाषा का विकास कर रहा है।
अच्छी बात यह है कि इंटरनेट पर हिंदी की उपस्थिति बढ़ रही है। यूनीकोड के फांट आने के बाद सबकुछ सरल होे गया है। विंडोज एक्सपी पर ये फांट मुफ्त मिलते हैं। इन फांट की मदद से आप गूगल पर हिंदी में सर्च करें। गूगल आपको जागरण, हिंदुस्तान, भास्कर, बीबीसी, बिजनेस स्टैंडर्ड की साइटों से आपका मनपसंद विषय हिंदी में लाकर आपके सामने रख देगा। गूगल की मदद से अनुवाद करें। यह अनुवाद सही नहीं होता, लेकिन किसी शब्द के लिए कई विकल्प सुझा देता है। आपकी मदद करता है। यूनीकोड या मंगल फांट की मदद से सीधे हिंदी में ई-मेल करें, चैट करें - कोई परेशानी नहीं। माइक्रोसाफ्ट अपने वर्ड प्रोग्राम में हिंदी स्पेलचेकर, ग्रामर चेकर विकसित करने में जोर-शोर से लगा है। ढेर सारी पत्रिकाएं इंटरनेट पर हिंदी में उपलब्ध हैं।
हिंदी के साथ अच्छी बात यह है कि हिंदी जानने, बोलने, लिखने और पढ़ने वाले सिर्फ हिंदी पट्टी तक सीमित नहीं हैं। यदि पढ़ने-लिखने वाले हिंदीभाषी सिर्फ भोपाल, लखनऊ, पटना, रांची, रायुपर, जयपुर तक सीमित रहते तो हिंदी का भी इंटरनेट पर वही हाल होता, जो इन शहरों में सूचना प्रौद्योगिकी का है। आज भारत के जो शहर आईटी के मामले में आगे बढ़ रहे हैं वे हैं चेन्नई, बंगलोर, मुंबई, पूना, अहमदाबाद, दिल्ली, चंडीगढ़, हैदराबाद। इन शहरों को आप एक रेखा से मिला दें तो उससे जो नक्शा बनेगा वह आज एक अलग भारत है। यहां आईटी के क्षेत्र में आश्चर्यजनक प्रगति हुई है। आईटी के साथ-साथ यहां से हिंदी के विकास का भी रास्ता खुला है। इन शहरों में बैठे प्रोफेशनल्स वेबसाइटों को, साफ्टवेयरों को हिंदी में तब्दील कर रहे हैं। इंटरनेट पर आकर हिंदी चुपचाप विश्व भाषा बन रही है। जितना काम हो-हल्ले के साथ आयोजित किए जाने वाले विश्व हिंदी सम्मेलन नहीं कर पाए, उससे कई गुना ज्यादा काम पिछले सात-आठ सालों में इंटरनेट के माध्यम से हो गया।
हिंदी के साथ अच्छी बात यह है कि जिस क्षेत्र को आज हिंदी पट्टी कहा जाता है, वहां के लोग कभी भी देश के राजनीतिक, बौद्धिक, प्रशासनिक क्षेत्र में हावी नहीं रहे। यदि रहते तो वे हिंदी को लेकर अपने अति उत्साह को प्रदर्शित करते। स्वाधीनता के ठीक बाद का समय शायद वैसा ही समय था, जब हिंदी को लेकर संविधान सभा में मत-विभाजन की नौबत आ गई थी। (हिंदी को लेकर मत विभाजन हिंदी उत्साहियों का अदूरदर्शितापूर्ण कदम था। किसी भी एक राज्य पर जोेर-जबर्दस्ती हिंदी थोपना गलत होता। लगता है आज इस मामले में भारत के राजनेता काफी परिपक्व हो गए हैं। देखिए किस तरह वैट को समझा-बुझाकर सभी राज्यों में लागू करवाया गया!) हिंदी को सारे देश में फैलाने की यदि हिंदी उत्साही कोशिशें करते तो उसके दुष्परिणाम सामने आते ही आते। वो तो देश के राजनीतिक, बौद्धिक, प्रशासनिक नेतृत्व पर हर भौगोलिक क्षेत्र के लोगों का ऐसा संतुलन बना रहा कि अहिंदीभाषी प्रदेशों के कुछ क्षेत्रीयतावादी नेताओं (और असम में अल्फा जैसे विद्रोही संगठनों) द्वारा लगाए जाने वाले हिंदी साम्राज्यवाद आदि के नारों पर कभी किसी ने गौर ही नहीं किया।
हिंदी के साथ अच्छी बात यह है कि इसका साहित्य आज विश्व के समृद्ध साहित्यों में से एक है। हिंदी साहित्य की परिधि हमेशा विस्तृत रही। (याद कीजिए अज्ञेय की नगालैंड और शिलांग की पृष्ठभूमि वाली कहानियां, उधर गुलेरी जी की "उसने कहा था' पंजाबी कहानी है या हिंदी की कहानी!) भले अज्ञानवश कुछ लोग हिंदी को यूपी-बिहार की भाषा कह देते हों, लेकिन हिंदी साहित्य ने हमेशा भारत की आत्मा की खोज करने की कोशिश की है। आज हिंदी में जितनी लघुपत्रिकाएं निकलती हैं उतनी शायद ही अन्य किसी भारतीय भाषा में निकलती होंगी। साहित्य अकादमी की "समकालीन भारतीय साहित्य' के पाठक सारे भारतवर्ष में फैले हैं। इसमें जब आपकी रचना छपती है तो केरल, तमिलनाडु और उड़ीसा से आपको फोन आते हैं और आप इस पत्रिका (और हिंदी) की पहुंच का लोहा मान लेते हैं।
लेकिन हिंदी के सावन में सबकुछ हरा ही हरा नहीं है। यह सचमुच एक सिक्के की तरह है जिसके दो पहलू हैं। हिंदी का कृष्ण पक्ष यह है कि हिंदी पट्टी के लोगों में अपनी भाषा के साहित्य को लेकर प्रेम की कमी है। हिंदी की पुस्तकों का एक संस्करण शायद ही कभी तीन हजार से ऊपर का होता हो। जबकि असमिया भाषा की एक औसत पुस्तक का एक संस्करण एक हजार का होता है तो हिंदी का तो यह पचीस हजार का होना ही चाहिए। हो सकता है हिंदी पुस्तकों की सरकारी खरीद इसका कारण हो, जिसके कारण प्रकाशक पुस्तकों की कीमत बढ़ाकर रखते हैं।
हर बुरी चीज का एक अच्छा कोण होता है। एक तरह से यह अच्छा है कि हिंदी वालों में भाषा को लेकर भावुकता की कमी है, वे जैसे जाति को लेकर, आरक्षण को लेकर, धर्म को लेकर मरने-मारने पर उतारू हो जाते हैं, उस तरह कभी भाषा को लेकर उत्तेजित नहीं होते। यदि हिंदी के भविष्य को हम हिंदी पट्टी तक सीमित कर देखते तो शायद इस तरह के भावनात्मक ज्वार के अच्छे परिणाम सामने आ सकते थे। लेकिन हम हिंदी को और भी महत्वाकांक्षी भविष्य के संदर्भ में देखते हैं। इसे देश भर की संपर्क भाषा बनना है तो मरने-मारने पर उतारू होना गलत होता। तब तो यह अपने इलाके तक सिमट जाती और इतिहास द्वारा सौंपी गई जिम्मेवारी कोे पूरा नहीं कर पाती। हिंदी भारत की संपर्क भाषा बनेगी हिंदीवालों के भावनात्मक ज्वार से नहीं बनेगी, इसे संपर्क भाषा वही लोग बनाएंगे जिनकी मातृभाषा हिंदी नहीं है। इसके लिए धीरे-धीरे चलने की वर्तमान नीति ही सर्वश्रेष्ठ नीति है।
और अंत में, हिंदी में अच्छी बातें हैं इसका मतलब यह कदापि नहीं कि आप अंग्रेजी पढ़ना छोड़ दें। अभी भी आधुनिकता के साथ कदम मिलाए रखने के लिए अंग्रेजी की बैसाखी की सख्त जरूरत है। हो सकता है आज हिंदी दिवस के अवसर पर यह बात अटपटी लगे लेकिन फिर भी मैं कहूंगा कि हिंदी के पांव जब तक मजबूत नहीं हो जाते, किसी को भी अंग्रेजी की बैसाखी को फेंक देने की भूल नहीं करनी चाहिए।