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Journalist and writer, Writes on Northeast India, Bangladesh, Myanmar
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रविवार, 16 जून 2013

पै अंग्रेजी ज्ञान बिन रहत हीन के हीन



हालांकि हम पर कभी लोहिया के अंग्रेजी हटाओ आंदोलन का प्रत्यक्ष प्रभाव नहीं पड़ा, लेकिन आज मैं एक स्कूली बच्चे की मानसिकता की सहज ही कल्पना कर सकता हूं जो अपने पाठ्‌यक्रम में से कोई एक विषय कम होने पर कितना उत्फुल्लित होता होगा। आज भी जब कोई हिंदीवादी या असमियावादी, या बोड़ोवादी अपनी भाषा के पक्ष में दलील देते हुए अपने से बड़ी भाषा-अंग्रेजी, हिंदी या असमिया- को कोसता है तो एक स्कूली बच्चा उनका सबसे बड़ा समर्थक होता होगा। उसे मातृभाषा के आंदोलन में अपना स्कूली बोझ कम होता दिखाई देता है। जब लोहिया ने "अंग्रेजी हटाओ' का नारा दिया तो भले उनका आशय अंग्रेजी को प्रशासन से, न्यायालय से और शिक्षा के माध्यम से हटाने का रहा होगा, लेकिन स्कूली विद्यार्थियों ने इससे एक ही बात समझी होगी कि अब हमें अंग्रेजी भाषा का भारी-भरकम ज्ञान निगलना नहीं होगा।

आज स्थिति काफी बदल चुकी है। आज अंग्रेजी हटाओ के लिए कोई जगह नहीं है। इसके उलट अंग्रेजी पल्प लिटरेचर का एक हस्ताक्षर आज के युवाओं के लिए सेलेब्रिटी है। पता नहीं राजनीतिक पार्टियों को यह बात समझ में आई है या नहीं कि हमारे देश के बहुभाषी होने की कीमत हम अंग्रेजी के रूप में चुका रहे हैं। जो भी हो, एक राजनीतिक कार्यक्रम के रूप में "अंग्रेजी हटाओ' या "हिंदी लाओ' जैसे नारों की उपयोगिता बिल्कुल समाप्त हो चुकी है।

अपनी भाषा को विकसित करने की इच्छा होना एक सहज स्वाभाविक इच्छा है। जिस तरह अपने देश को विकसित करने की इच्छा। लेकिन यह काम जिद भरे राजनीतिक आंदोलनों से नहीं हो सकता। इसके लिए कितने अध्यवसाय की जरूरत होती है, कैसी प्रतिबद्धता चाहिए, किस तरह एक-एक शब्द विकसित करना पड़ता है इस विषय में न जाकर हम इस विरोधाभास जैसी लगने वाली बात को रेखांकित करना चाहेंगे कि अपनी भाषा को विकसित करने की पहली शर्त होती है अपने से बड़ी भाषा का अच्छा ज्ञान होना। हिंदी के लिए यह बड़ी भाषा अंग्रेजी हो सकती है, असमिया के लिए हिंदी हो सकती है, इसी तरह बोड़ो के लिए असमिया हो सकती है। भाषणों में भाषाओं को बहनें कहा जाता है, जबकि व्यवहार में भाषाओं के बीच आपस में सौतनों जैसी ईर्ष्या होती है। अक्सर एक भाषा दूसरी भाषा से कुछ भी सीखने से साफ इनकार कर देती है। क्योंकि दूसरी भाषा से सीखना उसे अपने आत्मसम्मान के विरुद्ध लगता है। और किसी भाषा को अपने से बड़ी समझना? आप क्या बात करते हैं? भाषा के नाम पर हमारे देश में दंगे हुए हैं और आप कहते हैं किसी दूसरी भाषा को अपने से बड़ी भाषा मान लें!

जो भी हो, यदि आप हिंदी की स्थिति देखें तो पाएंगे कि यह भाषा पत्रकारिता, साहित्य, मनोरंजन, विज्ञापन और बोलचाल की भाषा बनकर रह गई है। आज जो ज्ञान का विस्फोट हो रहा है उससे हिंदी का दूर-दूर तक कोई रिश्ता नहीं है। इस बात को जांचने का एक आसान सा तरीका है गूगल का सर्च इंजन। मान लीजिए आप किसी साधारण से प्रश्न का जवाब खोजना चाहते हैं, उदाहरण के लिए आप यह जानना चाहते हैं कि शिमला में ठहरने के लिए कौन-सी अच्छी जगह है। यह जानकारी यदि आप हिंदी में खोजना चाहें तो आपको हो सकता है निराश होना पड़े। लेकिन अंग्रेजी में यदि खोजें तो तुरंत आपके सामने सूचनाओं की थाली सज जाएगी। ऐसी स्थिति में जो लोग अंग्रेजी नहीं जानते वे इंटरनेट का समुचित लाभ नहीं उठा पाते। उनके लिए सूचना क्रांति का आना और नहीं आना बराबर है। उसी तरह जिस तरह अंग्रेजी नहीं जानने वालों के लिए अमरीका में किसी नई धांसू किताब का निकलना और नहीं निकलना बराबर है।

एक राजनेता हाल ही में एक हिंदी संस्था के कार्यक्रम में गए। उनके भाषण का सार यह था कि हिंदी जरूर सीखनी चाहिए क्योंकि जितनी ज्यादा भाषाएं सीखी जा सकें उतना अच्छा है। यह वक्तव्य साफ दिखाता है कि उन्हें भाषाओं के आंतरिक विज्ञान के बारे में ज्यादा जानकारी नहीं है। क्योंकि अधिक से अधिक भाषाएं सीखना एक बात है, और एक ऐसी भाषा सीखना जिसमें विश्व का ज्यादा से ज्यादा ज्ञान एकत्र है बिल्कुल दूसरी बात है। कोई सीख सके तो अच्छी बात है, लेकिन आज जरूरत ज्यादा से ज्यादा भाषाओं के सीखने की नहीं बल्कि ज्यादा से ज्यादा ऐसी भाषा को सीखने की है जो समर्थ है, जिसमें विश्व का ज्ञान समाहित है। जो अपनी भाषा को अत्यधिक प्यार करता है उसके लिए भी अंग्रेजी का अच्छा ज्ञान अनिवार्य है। क्योंकि ऐसा नहीं होने पर वह स्वयं बहुत सारे ज्ञान से अछूता रह जाएगा, और दूसरे वह इस ज्ञान को अपनी भाषा में नहीं ला पाएगा।



बीटीएडी बनने के ठीक बाद एक बोड़ो सभा में जाना हुआ। श्रोताओं में से अधिकतर लोग बोड़ो और असमिया दोनों भाषाएं जानते थे क्योंकि वहां की आबादी मिश्रित आबादी थी। लेकिन बीटीएडी की कमान संभालने वाले नए-नए लोकतांत्रिक राजनीति में आए पूर्व उग्रवादी हाग्रामा मोहिलारी ने कहा कि बचपन से उन्होंने सिर्फ बोड़ो भाषा के माध्यम से पढ़ाई की है, इसलिए वे दूसरी भाषा नहीं जानते। उन्होंने अपना भाषण बोड़ो भाषा में ही दिया। यहां सवाल यह नहीं है कि हम उस भाषण को कितना समझ पाए। सवाल यह है कि उग्र मातृभाषा प्रेम ने हाग्रामा मोहिलारी जैसों की एक पूरी पीढ़ी को अपने आसपास की दुनिया से काट दिया। बोड़ो भाषा अपने विकास के शैशव काल में है। उसमें अभी दुनिया भर का ज्ञान और विद्याएं इकट्ठा नहीं हुए हैं। लेकिन यदि बोड़ो जानने वाले अच्छी असमिया, हिंदी या अंग्रेजी नहीं जानेंगे तो यह ज्ञान बोड़ो भाषा में कौन लाएगा? यह बात हर भारतीय भाषा पर लागू होती है। आज के दिन किसी भी भारतीय भाषा का प्रेमी यदि यह कहता है कि हमें अंग्रेजी की कोई जरूरत नहीं, तो वह अपनी भाषा का प्रेमी नहीं दुश्मन है।

देखें आलेख - अंग्रेजी मैया की जय (नीचे क्लिक करें)
http://binodringania.blogspot.in/2010/11/blog-post.html

रविवार, 10 जून 2012

ब्लैकमेलिंग ने पत्रकारिता का अधिक नुकसान किया है


आठ साल का बालक। हठात्‌ दोनों पांवों से लकवा आ गया। स्थानीय डाक्टर को दिखाया। लकवा ऊपर की ओर बढ़ता गया, दोनों हाथ चपेट में आ गए। प्राइवेट अस्पताल में भर्ती कराया। लकवा और ऊपर बढ़ा, सांस बन्द होने लगी। आई.सी.यू. में शिफ्ट किया गया और श्वास की नली में छेद कर वेंटीलेटर लगा दिया। डाक्टर ने बताया कोई बीमारी है, ग्यूलेन बारी सिंड्रोम नामक असेंडिंग पैरालिसिस। कोई पुख्ता इलाज नहीं है। लकवा और ऊपर बढ़ना तो बन्द हो गया है स्वतः ही उलटेगा, लेकिन कब तक, कोई कुछ नहीं कह सकता। तब तक वेंटीलेटर से श्वास पर जिन्दा रखना है। बच्चा चैतन्य, खाता-पीता, मुस्कराता, बस हिलडुल नहीं सकता, सांस नहीं ले सकता।


आई.सी.यू में महंगा इलाज, प्रतिदिन हजारों का खर्च। कर्ज लेकर किसी तरह चुकाया, आखिर असमर्थ होने पर बच्चे के पिता ने हाथ जोड़ दिए। साप्ताहिक बिल बढ़ता गया। तकाजा। अस्पताल के फाइनेंस डायरेक्टर ने चिकित्सक के नाम मेमो भेजा कि उनके मरीज का बकाया काफी बढ़ गया है, सेवा शुल्क देने में असमर्थ है और चूंकि यह अस्पताल सशुल्क सेवा ही देता है अतः निश्चयात्मक कारवाई करें। कोशिश की गई बच्चे को सरकारी अस्पताल भेजने की, पर असफल रहे। चिकित्सक ने फाइनेंस डायरेक्टर का मेमो आई.सी.यू. नर्स इंचार्ज को दिखाया और वेंटीलेटर हटाने को कहा। वेंटीलेटर हटाने का मतलब था जीते जागते चैतन्य बच्चे को जैसे गला घोंट कर मार देना। आंखों के सामने नीला पड़े दमघुट मरते देखना। नर्स ने मना कर दिया कहा, वे सब बाहर चली जाएंगी यह कार्य चिकित्सक खुद करें। चिकित्सक कैसे करता। वह नहीं कर सकता तो उसने कैसे सोचा कि नर्सें जिन्होंने दिन-रात बच्चे को खिलाया-पिलाया, नहलाया, बहलाया, वे करेंगी। गला घोंट कर मारेंगी। आखिर फाइनेंस डायरेक्टर को लिखा गया कि न तो वेंटीलेटर हटाया जा सकता है और न ही चिकित्सा बन्द की जा सकती है। सेवा करने वाले यह क्रूरकर्म नहीं कर सकते। शुल्क वसूल करने वालों को क्या करना है वे जाने, उनका काम जाने। वे मालिक हैं।
"एक डाक्टर की डायरी' में श्रीगोपाल काबरा, जयपुर


ऊपर हमने एक डाक्टर की डायरी से यह दृष्टांत उद्धृत किया है ताकि पाठकों को एक पेशेवर की दुविधा का अनुमान हो सके। पत्रकारों को भी ऐसे वाकयों से दो-चार होना पड़ता है, खासकर इलेक्ट्रानिक मीडिया में, जब संचालक आदेश देता है कि किसी नेता, पूंजीपति या सेलेब्रिटी के कपड़े उतार लिए जाएं। छोटे-मोटे घाटे में चलने वाले चैनलों के संचालक तर्क देते होंगे कि ब्लैकमेल नहीं करेंगे तो चैनल चलेगा कैसे? चैनल के संपादक तर्क देते होंगे कि मालिक की आज्ञा का पालन नहीं करेंगे तो बच्चों का पालन कैसे होगा। अक्सर पचास-पचपन के हो रहे संपादकों का यही रोना रहता है कि "बच्चे बड़े हो रहे हैं।' विद्रोह करने के लिए उपरोक्त डाक्टर की तरह बचे रहते हैं सिर्फ ट्रेनी रिपोर्टर जो जब तक शादी नहीं कर लेते तब तक एक चैनल से दूसरे चैनल में आवागमन करते रहते हैं। आखिर एक दिन उनके अंदर के इलेक्ट्रान भी शांत हो जाते हैं और वे भारतीय मीडिया प्रतिष्ठान की जमीनी हकीकत के साथ समझौता कर लेते हैं। तब उनके अंदर का विद्रोह सिर्फ संपादक के साथ बहस करने और भारतीय मीडिया की सारी बुराइयों की जड़ संपादक नामक पद में निहित होना साबित करने तक सीमित हो जाता है।


स्वाधीनता


यह प्रश्न अक्सर उठाया जाता है कि भारतीय मीडिया में पत्रकार को कितनी स्वाधीनता प्राप्त है। जिन दिनों वामपंथ का एक विचारधारा के रूप में बोलबाला था, वामपंथी बुद्धिजीवी गला फाड़कर चिल्लाते थे कि यह बुर्जुवा मीडिया है, इससे आप गरीब और आम जनता की हिमायत की अपेक्षा कैसे रख सकते हैं। वामपंथ का जमाना बीत गया (हालांकि अरुंधती राय को उसका भूत अब भी सता रहा है), लेकिन स्वयं मीडिया के अंदर से ही यह रोना-धोना कम नहीं हुआ है कि उसकी स्वाधीनता पर प्रहार किया जा रहा है।


कौन कर रहा है प्रहार? मीडिया के कुछ लोग नवउदारवादी पूंजीवाद या बाजारवाद की ओर इशारा करते हैं। बाजार ने पत्रकारिता के लिए संसाधन उपलब्ध कराए हैं। उत्पादों के लिए कहीं भीतरी पन्नों पर थोड़ा-बहुत भले लिख दिया जाता होगा, लेकिन आज के युग में सिर्फ विज्ञापनों के बल पर समूचे मीडिया को कोई नियंत्रण में कर लेता होगा, यह सिर्फ एक भ्रम है। बिना संसाधन के कोई अखबार या चैनल कहां होगा इसकी सहज ही कल्पना की जा सकती है- या तो वह किसी राजनीतिक नेता की शरण में जाएगा, या किसी स्थानीय पूंजीपति के पास जो अपनी जेब के पैसे से उसे चलाएगा लेकिन बदले में उससे अपने लिए फायदा भी बटोरेगा, या ब्लैक मेलिंग का रास्ता अपनाएगा, या असमय मौत का शिकार हो जाएगा।


भारतीय मीडिया स्वतंत्र है या नहीं, क्या राजनीतिक दल और पूंजीपति या बाजार इसका गला घोंट रहे हैं- यह देखने के लिए हमें कुछ उदाहरणों को देखना चाहिए। (क) पिछले साल अन्ना हजारे का जबर्दस्त आंदोलन चला। लगभग समूचा मीडिया इस आंदोलन के समर्थन में उतर आया। इस आंदोलन का समर्थन करने से मीडिया हाउसों के किन निहित स्वार्थों की पूर्ति हो रही थी हमें नहीं पता। (ख) आज भारत के अलग-अलग प्रांतों में अलग-अलग पार्टियों की सरकारें हैं। केंद्र में मिलीजुली सरकारें आ रही हैं, आगे भी उसी तरह की सरकारों के आने के आसार हैं। ऐसे में किसी एक पार्टी का समर्थन करने या उसकी कठपुतली बनने पर किसी राष्ट्रीय मीडिया हाउस को फायदे की जगह नुकसान ही ज्यादा होने की संभावना है। (ग) जिन मीडिया हाउसों का खुलेआम किसी विशेष राजनीतिक पार्टी से संबंध रहा है, उन्हें घटती लोकप्रियता के रूप में इसका खामियाजा उठाना पड़ा है।


भारतीय मीडिया की अपनी समस्याएं हैं। ये समस्याएं पश्चिमी देशों या दक्षिण अमरीका के देशों या चीन से भिन्न हैं। भारत में हर संस्था ने अपने मानकों को नीचा किया है। हर संस्था की इज्जत जनता की नजरों में कम हुई है। एक डाक्टर को पहले जैसी इज्जत नहीं मिलती, एक वकील, जज, इंजीनियर, प्राध्यापक- हर पेशेवर धंधे के मानकों में कमी आई है। इसी तरह पत्रकारिता के पेशे में भी मूल्यों का क्षरण हुआ है।


जिस तरह कोई व्यक्ति सिगरेट, शराब और फास्ट फूड के सेवन से स्वयं अपना स्वास्थ्य खराब कर लेता है लेकिन इसका दोष मिलावटी खाद्य सामग्री और प्रदूषित हवा-पानी पर थोपना चाहता है, उसी तरह भारतीय मीडिया की ज्यादातर बीमारियों के कारण स्वयं उसके अंदर हैं। बाहर से यदि उस पर प्रभाव पड़ा भी है तो वह उतना ही है जितना किसी का स्वास्थ्य प्रदूषित हवा-पानी से खराब हो सकता है।


ब्लैक मेलिंग


भारतीय मीडिया की सबसे बड़ी बीमारी है ब्लैक मेलिंग की। ब्लैक मेलिंग ने मीडिया को सबसे ज्यादा बदनाम किया है। इस बीमारी का दोष मीडिया को छोड़कर और किसको दिया जा सकता है? ब्लैक मेलिंग की सबसे खास बात यह है कि एक मीडिया हाउस आपका भयादोहन कर रहा है तो आप अपना स्पष्टीकरण लेकर दूसरे मीडिया हाउस में नहीं जा सकते। क्योंकि हर मीडिया हाउस मीडिया युद्ध थोपे जाने से बचना चाहता है। आखिर किस सरकार, राजनीतिक पार्टी या कारपोरेट हाउस ने कहा है कि मीडिया हाउस या प्रकाशन संस्थान अपने यहां निष्पक्ष अंबुड्‌समान (वह संस्था जो प्रकाशन संस्थान के विरुद्ध शिकायतों की सुनवाई करे) की स्थापना न करे। आज इंटरनेट आने के बाद यह करना बिल्कुल आसान भी हो गया है। शिकायतकर्ता अपनी पहचान छुपाते हुए ई-मेल के जरिए अपनी शिकायत भेज सकता है। लेकिन देश के एक-दो को छोड़कर किसी भी मीडिया संस्थान में ब्लैक मेल की व्याधि से लड़ने की कोई इच्छा दिखाई नहीं देती। चैनलों और अखबारों के स्थानीय संवाददाता लगभग स्वतंत्र रूप से काम करते हैं। कम पारिश्रमिक पर कड़ी मेहनत करने वाले ईमानदार संवाददाताओं की कमी नहीं है। लेकिन कई संवाददाता ऐसे भी होते हैं जो स्थानीय उद्यमियों, सरकारी अधिकारियों से पैसे ऐंठने की जुगत भिड़ाने में ही ज्यादा समय बिताते हैं। लेकिन फिर भी इनके विरुद्ध औपचारिक शिकायत उनके संस्थान के संपादक या प्रबंधन को कभी नहीं की जाती। इसका एक ही कारण समझ में आता है कि आम लोगों को इन संस्थानों के संपादक या प्रबंधन की निष्पक्षता या कार्रवाई करने की इच्छाशक्ति पर शायद भरोसा नहीं है।


नियामक संस्था



हर पेशे के निर्धारित मानकों की रक्षा के लिए उससे संबंधित नियामक संस्थाएं होती हैं। जैसे एलोपैथी चिकित्सकों के लिए मेडिकल कौंसिल आफ इंडिया, वकीलों के लिए बार कौंसिल आदि। इन पेशों में जाने के लिए एक न्यूनतम योग्यता की आवश्यकता होती है और ये नियामक संस्थाएं यह योग्यता देखकर ही उन्हें अपना काम करने का लाइसेंस देती हैं। लेकिन पत्रकारिता एक ऐसा पेशा है जिसमें प्रवेश करने के लिए किसी न्यूनतम योग्यता की आवश्यकता नहीं होती। तभी तो हम देखते हैं कि सिर्फ कंपनी का प्रबंध निदेशक होने के कारण कोई अपने अंग्रेजी अखबार का संपादक बन जाता है जबकि उसे अंग्रेजी का एक वाक्य लिखना भी नहीं आता। क्या आप कल्पना कर सकते हैं कि किसी अस्पताल का मालिक उसका मुख्य चिकित्सक भी बन जाए।

हम केवल यह सोच सकते हैं कि काश पत्रकारों की भी अपनी कोई नियामक संस्था होती, जिसे पत्रकार ही गठित करते और पत्रकार ही संचालित करते। जो पत्रकार बनने के लिए मानक तय करती, जिसकी मान्यता प्राप्त करना किसी भी पत्रकार के लिए सम्मान का कारण होता, जिसके मान्यताप्राप्त संपादक को ही कोई संपादक मानता। लेकिन यह विचार मात्र है जिसके हकीकत बनने की दूर-दूर तक उम्मीद नहीं है। तब तक हम सब मिलकर पत्रकारिता पर हमले के लिए पूंजीवाद, बाजारवाद और कारपोरेट्‌स को दोषी ठहराकर समय व्यतीत कर सकते हैं।


गुणवत्ता


हम हिंदी वाले इस बात की शिकायत करते नहीं थकते कि 56 करोड़ लोगों की भाषा होने के बावजूद हिंदी के अखबारों को राष्ट्रीय अखबार नहीं माना जाता, न ही उन्हें वह सम्मान प्राप्त होता है जो एक प्रादेशिक अंग्रेजी अखबार को भी प्राप्त हो जाता है। इसके लिए हिंदी अखबारों का प्रबंधन और उसके संपादक दोनों ही दोषी हैं। दैनिक भास्कर और दैनिक जागरण जैसे विशाल प्रसार संख्या वाले अखबार आज पर्याप्त धन कमा रहे हैं। इनकी गिनती विश्व के बड़े अखबारों में होती है। लेकिन जहां तक इनकी दृष्टि का सवाल है वह वैश्विक तो क्या राष्ट्रीय भी नहीं हो पाई है।


आज हर बड़े अंग्रेजी अखबार के संवाददाता मध्य पूर्व, न्यूयार्क, वाशिंगटन, लंदन आदि विश्व के प्रमुख शहरों में हैं। लेकिन बड़े हिंदी अखबारों के संवाददाता विदेशों में तो क्या भारत के ही चेन्नई, बंगलुरु, पूना, मुंबई, कोलकाता, हैदराबाद जैसे प्रमुख शहरों में नहीं हैं। आर्थिक गतिविधियों के केंद्र बंगलुरु और मुंबई में संवाददाता रखे बिना ये अखबार आर्थिक जगत की खबरों के लिए किस पर निर्भर रहते होंगे आप सहज ही अनुमान लगा सकते हैं। अंग्रेजी एजेंसियों पर।


गुवाहाटी के हिंदी दैनिकों की ही बात करें तो मुझे याद नहीं आता किसी भी हिंदी दैनिक ने अपने पत्रकारों के लिए आज तक कोई प्रशिक्षण कार्यक्रम आयोजित किया हो। शायद ही किसी संपादक ने अपने संस्थान के प्रबंधन से इसकी आवश्यकता के बारे में चर्चा की होगी। फिर इसमें आश्चर्य क्या कि आज हमारे अपराध संवाददाता एफआईआर और जीडी इंट्री के अंतर को नहीं जानते, संज्ञेय और असंज्ञेय अपराध के अंतर को नहीं जानते। हमारे पूर्वोत्तर के पत्रकारों को संविधान के अनुच्छेद 371 तथा छठी अनुसूची के बारे में विशेष ज्ञान होना चाहिए। इसके लिए संविधान विशेषज्ञों द्वारा एक दिन का प्रशिक्षण कार्यक्रम किया जा सकता है। इनर लाइन परमिट के इतिहास और प्रावधानों की जानकारी होनी चाहिए, जिसके अभाव में हम उन्हें अक्सर कहते सुनते हैं- ""हाय! भारत के ही एक हिस्से में जाने के लिए अनुमति लेनी पड़ती है।''


शायद ही कोई प्रबंधन होगा जो अपने पत्रकारों से कहेगा कि आप अपनी गुणवत्ता बढ़ाने के लिए व्यक्तिगत तौर पर प्रयास न करें। लेकिन ऐसा प्रयास कदाचित ही देखने में आता है। इसके विपरीत देखने को मिलती है भाषा के प्रति लापरवाही, न सीखने की जिद, शब्दकोश न खोलने की जिद, अपना ही अखबार न पढ़ने की जिद।


इस अंधकार और निराशामय वातावरण के लिए प्रबंधन या बाहरी ताकतों को कैसे जिम्मेवार ठहराया जा सकता है।

रविवार, 13 सितंबर 2009

हिंदी दिवस पर अच्छी बातें

हिंदी मुझे उसी तरह सम्मोहक लगती है जैसे आम, चाकलेट या सुबह की चाय। मैं जानता हूं कि हिंदी मीडिया में अभी भी कूड़ा-करकट रहता है, अंधविश्वास को बढ़ाने वाली खबरें रहती हैं, धर्मभीरुता को भुनाने वाला सामान रहता है, राष्ट्रप्रेम को उन्माद बनाने वाले समाचार रहते हैं - लेकिन कहीं हिंदी अखबार मिल जाए तो उस पर नजरें दौड़ाए बिना जी नहीं मानेगा। डाइबिटीज का मरीज जैसे जानता है कि आम खाते ही उसकी सेहत बिगड़ने वाली है, वैसे ही मैं जानता हूं किहिंदी मीडिया से रूबरू होते ही मूड बिगड़ने वाला है, लेकिन इसका कोई उपाय नहीं है। बच्चे को आप लाख हिदायत दें चाकलेट न खाने की, लेकिन वह नहीं मानेगा। बचपन से हमने भी जिस भाषा में सोचा, जीया, जिस भाषा में सपने देखे उस भाषा से अपने लगाव को परिभाषित नहीं कर सकता।
अच्छी बात यह है कि पूर्वोत्तर में हिंदी बढ़ रही है। अच्छी बात इसलिए नहीं कि हिंदी का साम्राज्य बढ़ रहा है, मैं जिस भाषा से प्यार करता हूं उस भाषा का साम्राज्य बढ़ रहा है। अच्छी बात इसलिए कि देश एक संपर्क भाषा विकसित कर रहा है। संविधान में आप लाख अच्छी-अच्छी बातें लिख लें, लेकिन जब लोग हिंदी के विरोध में आत्मदाह करने पर उतारू हों तो आपको उनकी बात भी सुननी होगी, समझनी होगी। देश ने एक समय ऐसी ही समझदारी दिखाई थी। संपर्क भाषा आज नहीं तो कल आ जाएगी, लेकिन देश एक बार टूट गया तो दोबारा जुड़ पाएगा इसकी कोई गारंटी नहीं। (इतिहास में पहली बार सारा सांस्कृतिक भारत एक राजनीतिक इकाई बना है, इस चीज को हम छोटा करके नहीं आंक सकते।) देश आज एक संपर्क भाषा विकसित कर रहा है। कल का वह कल आज आज बनकर आ गया है। आप गुवाहाटी में चलने वाले कोचिंग सेंटरों का चक्कर लगा लीजिए। सभी विद्यार्थी अंग्रेजी माध्यम से परीक्षा देंगे, लेकिन वहां पढ़ाई हिंदी के माध्यम से हो रही है। शिक्षक हिंदी में समझा रहे हैं, बच्चे हिंदी में सवाल पूछ रहे हैं और पीरक्षाएं अंग्रेजी में दे रहे हैंे। इस तरह देश एक संपर्क भाषा का विकास कर रहा है।
अच्छी बात यह है कि इंटरनेट पर हिंदी की उपस्थिति बढ़ रही है। यूनीकोड के फांट आने के बाद सबकुछ सरल होे गया है। विंडोज एक्सपी पर ये फांट मुफ्त मिलते हैं। इन फांट की मदद से आप गूगल पर हिंदी में सर्च करें। गूगल आपको जागरण, हिंदुस्तान, भास्कर, बीबीसी, बिजनेस स्टैंडर्ड की साइटों से आपका मनपसंद विषय हिंदी में लाकर आपके सामने रख देगा। गूगल की मदद से अनुवाद करें। यह अनुवाद सही नहीं होता, लेकिन किसी शब्द के लिए कई विकल्प सुझा देता है। आपकी मदद करता है। यूनीकोड या मंगल फांट की मदद से सीधे हिंदी में ई-मेल करें, चैट करें - कोई परेशानी नहीं। माइक्रोसाफ्ट अपने वर्ड प्रोग्राम में हिंदी स्पेलचेकर, ग्रामर चेकर विकसित करने में जोर-शोर से लगा है। ढेर सारी पत्रिकाएं इंटरनेट पर हिंदी में उपलब्ध हैं।
हिंदी के साथ अच्छी बात यह है कि हिंदी जानने, बोलने, लिखने और पढ़ने वाले सिर्फ हिंदी पट्टी तक सीमित नहीं हैं। यदि पढ़ने-लिखने वाले हिंदीभाषी सिर्फ भोपाल, लखनऊ, पटना, रांची, रायुपर, जयपुर तक सीमित रहते तो हिंदी का भी इंटरनेट पर वही हाल होता, जो इन शहरों में सूचना प्रौद्योगिकी का है। आज भारत के जो शहर आईटी के मामले में आगे बढ़ रहे हैं वे हैं चेन्नई, बंगलोर, मुंबई, पूना, अहमदाबाद, दिल्ली, चंडीगढ़, हैदराबाद। इन शहरों को आप एक रेखा से मिला दें तो उससे जो नक्शा बनेगा वह आज एक अलग भारत है। यहां आईटी के क्षेत्र में आश्चर्यजनक प्रगति हुई है। आईटी के साथ-साथ यहां से हिंदी के विकास का भी रास्ता खुला है। इन शहरों में बैठे प्रोफेशनल्स वेबसाइटों को, साफ्टवेयरों को हिंदी में तब्दील कर रहे हैं। इंटरनेट पर आकर हिंदी चुपचाप विश्व भाषा बन रही है। जितना काम हो-हल्ले के साथ आयोजित किए जाने वाले विश्व हिंदी सम्मेलन नहीं कर पाए, उससे कई गुना ज्यादा काम पिछले सात-आठ सालों में इंटरनेट के माध्यम से हो गया।
हिंदी के साथ अच्छी बात यह है कि जिस क्षेत्र को आज हिंदी पट्टी कहा जाता है, वहां के लोग कभी भी देश के राजनीतिक, बौद्धिक, प्रशासनिक क्षेत्र में हावी नहीं रहे। यदि रहते तो वे हिंदी को लेकर अपने अति उत्साह को प्रदर्शित करते। स्वाधीनता के ठीक बाद का समय शायद वैसा ही समय था, जब हिंदी को लेकर संविधान सभा में मत-विभाजन की नौबत आ गई थी। (हिंदी को लेकर मत विभाजन हिंदी उत्साहियों का अदूरदर्शितापूर्ण कदम था। किसी भी एक राज्य पर जोेर-जबर्दस्ती हिंदी थोपना गलत होता। लगता है आज इस मामले में भारत के राजनेता काफी परिपक्व हो गए हैं। देखिए किस तरह वैट को समझा-बुझाकर सभी राज्यों में लागू करवाया गया!) हिंदी को सारे देश में फैलाने की यदि हिंदी उत्साही कोशिशें करते तो उसके दुष्परिणाम सामने आते ही आते। वो तो देश के राजनीतिक, बौद्धिक, प्रशासनिक नेतृत्व पर हर भौगोलिक क्षेत्र के लोगों का ऐसा संतुलन बना रहा कि अहिंदीभाषी प्रदेशों के कुछ क्षेत्रीयतावादी नेताओं (और असम में अल्फा जैसे विद्रोही संगठनों) द्वारा लगाए जाने वाले हिंदी साम्राज्यवाद आदि के नारों पर कभी किसी ने गौर ही नहीं किया।
हिंदी के साथ अच्छी बात यह है कि इसका साहित्य आज विश्व के समृद्ध साहित्यों में से एक है। हिंदी साहित्य की परिधि हमेशा विस्तृत रही। (याद कीजिए अज्ञेय की नगालैंड और शिलांग की पृष्ठभूमि वाली कहानियां, उधर गुलेरी जी की "उसने कहा था' पंजाबी कहानी है या हिंदी की कहानी!) भले अज्ञानवश कुछ लोग हिंदी को यूपी-बिहार की भाषा कह देते हों, लेकिन हिंदी साहित्य ने हमेशा भारत की आत्मा की खोज करने की कोशिश की है। आज हिंदी में जितनी लघुपत्रिकाएं निकलती हैं उतनी शायद ही अन्य किसी भारतीय भाषा में निकलती होंगी। साहित्य अकादमी की "समकालीन भारतीय साहित्य' के पाठक सारे भारतवर्ष में फैले हैं। इसमें जब आपकी रचना छपती है तो केरल, तमिलनाडु और उड़ीसा से आपको फोन आते हैं और आप इस पत्रिका (और हिंदी) की पहुंच का लोहा मान लेते हैं।
लेकिन हिंदी के सावन में सबकुछ हरा ही हरा नहीं है। यह सचमुच एक सिक्के की तरह है जिसके दो पहलू हैं। हिंदी का कृष्ण पक्ष यह है कि हिंदी पट्टी के लोगों में अपनी भाषा के साहित्य को लेकर प्रेम की कमी है। हिंदी की पुस्तकों का एक संस्करण शायद ही कभी तीन हजार से ऊपर का होता हो। जबकि असमिया भाषा की एक औसत पुस्तक का एक संस्करण एक हजार का होता है तो हिंदी का तो यह पचीस हजार का होना ही चाहिए। हो सकता है हिंदी पुस्तकों की सरकारी खरीद इसका कारण हो, जिसके कारण प्रकाशक पुस्तकों की कीमत बढ़ाकर रखते हैं।
हर बुरी चीज का एक अच्छा कोण होता है। एक तरह से यह अच्छा है कि हिंदी वालों में भाषा को लेकर भावुकता की कमी है, वे जैसे जाति को लेकर, आरक्षण को लेकर, धर्म को लेकर मरने-मारने पर उतारू हो जाते हैं, उस तरह कभी भाषा को लेकर उत्तेजित नहीं होते। यदि हिंदी के भविष्य को हम हिंदी पट्टी तक सीमित कर देखते तो शायद इस तरह के भावनात्मक ज्वार के अच्छे परिणाम सामने आ सकते थे। लेकिन हम हिंदी को और भी महत्वाकांक्षी भविष्य के संदर्भ में देखते हैं। इसे देश भर की संपर्क भाषा बनना है तो मरने-मारने पर उतारू होना गलत होता। तब तो यह अपने इलाके तक सिमट जाती और इतिहास द्वारा सौंपी गई जिम्मेवारी कोे पूरा नहीं कर पाती। हिंदी भारत की संपर्क भाषा बनेगी हिंदीवालों के भावनात्मक ज्वार से नहीं बनेगी, इसे संपर्क भाषा वही लोग बनाएंगे जिनकी मातृभाषा हिंदी नहीं है। इसके लिए धीरे-धीरे चलने की वर्तमान नीति ही सर्वश्रेष्ठ नीति है।
और अंत में, हिंदी में अच्छी बातें हैं इसका मतलब यह कदापि नहीं कि आप अंग्रेजी पढ़ना छोड़ दें। अभी भी आधुनिकता के साथ कदम मिलाए रखने के लिए अंग्रेजी की बैसाखी की सख्त जरूरत है। हो सकता है आज हिंदी दिवस के अवसर पर यह बात अटपटी लगे लेकिन फिर भी मैं कहूंगा कि हिंदी के पांव जब तक मजबूत नहीं हो जाते, किसी को भी अंग्रेजी की बैसाखी को फेंक देने की भूल नहीं करनी चाहिए।