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Journalist and writer, Writes on Northeast India, Bangladesh, Myanmar

रविवार, 6 फ़रवरी 2011

लांक्षन सहना प्रवासी की नियति है



हाल ही में मैं राज्य के बाहर गया। वहां एक साहित्यिक मित्र ने मुझे उलाहना दिया कि आपलोग हिंदी अखबार क्यों निकालते हैं? इस तरह आपलोग मारवाड़ी समाज को असमिया समाज से दूर रखने का काम करते हैं। हिंदी अखबार न होते तो मारवाड़ी लोग असमिया अखबार पढ़ते और असमिया समाज-संस्कृति के ज्यादा निकट जाने का मौका मिलता। यदि हम काफी हाउस या पनवाड़ी की दुकान पर मिले होते तो मैं जोर-शोर से बहस करता, लेकिन किसी के घर अतिथि बनकर गर्मागर्म बहस करने का मौका नहीं था। फिर भी मैंने मिमियाते हुए कहा कि जब हिंदी अखबार नहीं थे, तब मारवाड़ी कौन-सा असमिया अखबार पढ़ते थे। उन दिनों वे सन्मार्ग और दैनिक विश्वमित्र पढ़ा करते थे जिनमें असम के बारे में कुछ नहीं होता था। हमारे मित्र को एतराज था कि मारवाड़ी फैंसी बाजार में अपनी डफली पर अपना राग गाते हैं, उन्होंने फैंसी बाजार को छोटा-सा टापू जैसा बना रखा है। इसीलिए तो स्थानीय लोगों में विद्रोह होता है।

चूंकि मैं वहां कुछ बोल नहीं पाया था, शायद इसीलिए इन प्रश्नों के बीज दिमाग में रह गए और अंकुरित होकर बड़े होते रहे। मैं सोचता रहा कि क्या इसीलिए असमिया समाज में विद्रोह पनपा है! मैं मारवाड़ी समाज के किसी भी स्थानीय समाज के नजदीक जाने, उसकी संस्कृति-भाषा को अपनाने का विरोधी नहीं बल्कि समर्थक हूं। लेकिन यह भी कहता हूं कि यह काम एक स्वाभाविक प्रक्रिया के तौर पर होगा, न कि किसी राजनीतिक कार्यक्रम की तर्ज पर।

फिर यह प्रश्न भी है कि असमिया भाषा-संस्कृति को काफी हद तक अपना लेने वाले समुदायों को क्या संदेह की दृष्टि से नहीं देखा जाता? उदाहरण के लिए नेपाली समुदाय। हमारे मित्र को जिन मुद्दों पर मारवाड़ी समुदाय से शिकायत थी उन मुद्दों पर नेपाली समुदाय उन्हें शिकायत का मौका नहीं देगा। मसलन, वे लोग शहरों में टापू बनाकर नहीं रहते। नेपाली समुदाय असम में खेती और गोपालन से जुड़ा हुआ है, इसलिए गांवों में रहता है। इस समुदाय के लोग असमिया भाषा को मातृभाषा की तरह प्रयोग में लाते हैं। नेपाली समुदाय का असमिया साहित्य में अच्छा योगदान है। हमारे मित्र को संतोष होगा, कि ये लोग अपनी भाषा में समाचार पत्र भी नहीं निकालते, और असमिया पत्र ही पढ़ते हैं। लेकिन इससे क्या नेपाली समुदाय दोषारोपण से बच जाता है?

असमिया समाज-भाषा-साहित्य के सामने संकट हो सकते हैं- इनमें से कई वास्तविक हैं और कुछ काल्पनिक। लेकिन इस संकट को पैदा करने में मारवाड़ी समुदाय की मुझे कोई भूमिका नजर नहीं आती। एक कहानी है- एक मक्खी एक बैल के सींग पर बैठी थी। उसने देखा कि बैल की आंखों से आंसू बह रहे हैं। द्रवित होकर मक्खी ने पूछा- बैल भाई, मेरा भार सहन नहीं हो रहा है तो मैं कहीं और बैठ जाऊँ। कुछ ऐसी ही स्थिति मारवाड़ी समाज की असम में है। मारवाड़ी समुदाय मुश्किल से यहां की जनसंख्या का एक फीसदी होगा। ये एक फीसदी लोग दिन-रात अपने व्यापार में मगन रहते हैं। ये लोग असमिया भाषा सीखे, असमिया संस्कृति के नजदीक जाए तो इनलोगों के लिए ही अच्छा है- लेकिन न जाए तो यह स्थानीय लोगों में असंतोष का कारण बन सकता है यह बात समझ से परे है। मारवाड़ी समाज सिर्फ असम ही नहीं देश के हर राज्य में फैला है। अपने प्रवास के करीब दो सौ सालों के दौरान किसी भी राज्य में इसके द्वारा स्थानीय भाषा-संस्कृति के विरुद्ध कोई काम करने का उदाहरण नहीं मिलता। यह समाज अपनी भाषा को ही संवैधानिक या किसी भी तरह की सरकारी मान्यता दिलाने के लिए कोई प्रयत्न नहीं करता, ऐसा समाज किसी भी अन्य भाषा-संस्कृति के लिए खतरा बनने का तो सवाल ही नहीं।

फिर भी मारवाड़ी लोग अपने स्वभाव के कारण हमेशा रक्षात्मक मुद्रा में खड़े रहते हैं। (व्यावहारिक तौर पर देखें तो यह अच्छा है, लेकिन बौद्धिकता के स्तर पर पीड़ा तो होती ही है)। कोई कहता है तुम बहुत बुरे हो, तब यह अपने गिरेबान में झांकने लग जाता है, कोई कहता है तुम अपने बच्चों को हिंदी क्यों पढ़ाते हो तब यह हिंदी स्कूलों को बुराई की जड़ बताने लग जाता है; कोई कहता है तुम शोषक हो तब यह जनकल्याण के काम गिनाने लग जाता है; कोई कहता है तुम जाहिल हो तब यह अपने समाज के बौद्धिकों के नाम गिनाने लग जाता है; कोई इसे देशद्रोही तक कह देता है तब यह स्वाधीनता संग्राम में मारवाड़ी समाज की भूमिका को गिनाने लग जाता है।

दरअसल हम एक जटिलताओं भरे समाज में रह रहे हैं। एक मारवाड़ी मध्यप्रदेश या उत्तर प्रदेश में रहता है, तब उस पर बहुत सारे प्रश्नों की बौछार नहीं की जाती, लेकिन वही मारवाड़ी जब उड़ीसा या असम में आ जाता है तो उससे इतने सारे सवाल पूछे जाते हैं कि वह अपराध बोध तले पिस जाता है। मध्य देश में मारवाड़ी ठीक है तो पूर्व देश में आकर वह बुरा कैसे हो गया?

कहीं ऐसा तो नहीं कि गालियां सुनना प्रवास की अनिवार्य शर्त होती है! बाहर से आए आदमी को आप सारी बुराइयों की जड़ बता दो, फिर भी वह रक्षात्मक मुद्रा में रहेगा, हाथ जोड़े खड़ा रहेगा, क्योंकि उसे भान है कि वह किस जमीन पर खड़ा है।

मारवाड़ी कैसा दिखता है यह इस बात पर जितना निर्भर करता है कि मारवाड़ी कैसा है, उससे ज्यादा इस बात पर निर्भर करता है कि देखने वाला कौन है? जहां तेज उद्योगीकरण हो रहा है, पूंजी और उद्यमियों का स्वागत किया जाता है वहां मारवाड़ी उद्यमी है और विकास का वाहक है (कर्नाटक)। जहां के लोग अपनी भाषा-संस्कृति-साहित्य की समृद्धि और भविष्य के प्रति आश्वस्त हैं वहां मारवाड़ी एक छोटा-सा अल्पसंख्यक समूह है जिसकी अपनी अलग भाषा-संस्कृति है। वे लोग अपनी भाषा में क्या करते हैं इससे किसी को कोई मतलब नहीं (पश्चिम बंगाल)। जहां के लोग अपनी भाषा-संस्कृति के भविष्य को लेकर आशंकित हैं वहां मारवाड़ियों को अलग दृष्टि से देखा जाता है (असम)।

असम के ज्यादातर मारवाड़ी द्विभाषी हैं। नई पीढ़ी में मारवाड़ी बोली खत्म हो रही है, उसका स्थान हिंदी ले रही है। इस तरह ज्यादातर मारवाड़ी हिंदी और असमिया का मातृभाषा के रूप में व्यवहार करते हैं। ज्यादातर मारवाड़ी शुद्ध असमिया बोलना जानते हैं। असमिया भाषा को इन लोगों ने दिल से अपना लिया है। लेकिन ज्यादातर मारवाड़ी हिंदी हो या असमिया - लिखने-पढ़ने से कोई ताल्लुक नहीं रखते। इसलिए उन्हें असमिया भाषा के प्रति अपने प्रेम को प्रदर्शित करने का अवसर नहीं मिलता। इधर असमिया समाज भाषा व साहित्य को लेकर अति संवेदनशील है। अपनी भाषा-साहित्य-संस्कृति के भविष्य को सुरक्षित करने की यह जद्दोजहद कम -से-कम डेढ़ सौ साल पुरानी है। असमिया संस्कृति के प्रति किसी का नजरिया क्या है, इसे असम में दोस्त और दुश्मन की पहचान के लिए एक संदर्भ बिंदु की तरह इस्तेमाल किया जाता है।

हाल ही में मारवाड़ी समाज से कई असमिया साहित्यकार उभरे हैं। कुछ लोग हिंदी के माध्यम से ही असमिया संस्कृति की सेवा में उतरे हैं। इसका असमिया समाज में अच्छा स्वागत हुआ है। व्यापक मारवाड़ी समाज के असमिया प्रेम को यही वर्ग आगे लेे जा सकता है और उसे संस्थागत रूप दे सकता है।

अपराध बोध से ग्रसित रहने वाले मारवाड़ी भाइयों से संक्षेप में यही कहना चाहूंगा-(1) आप असम की जनसंख्या का एक अति क्षुद्र अंश हैं। जनसंख्या संतुलन को बदलने या राजनीतिक फायदे बटोरने में आपकी कोई भूमिका नहीं है, (2) आप नौकरियों के बाजार पर कोई दबाव नहीं डालते, उल्टे नौकरियां पैदा करते हैं, (3) आप धर्म और कानून से डरने वाले दब्बू लोग हैं, गैर कानूनी काम आपके स्वभाव में नहीं है (अपवाद हर जगह होते हैं), (4) स्थानीय भाषा का अहित कर हिंदी या राजस्थानी को आगे बढ़ाने के लिए आपने आज तक कुछ नहीं किया, आगे भी उम्मीद नहीं है, (5) आप पिछड़े इलाकों में आधुनिक पूंजीवाद के वाहक रहे हैं, (6) आपकी नई पीढ़ियां काफी पढ़-लिख कर यह साबित कर रही है कि आपकी बौद्धिक योग्यता सिर्फ परंपरागत बनियागिरी तक सीमित नहीं है।

जब सच्चाई यह है तब आपको अपराधबोध या हीनता ग्रंथि से ग्रस्त होने की क्या जरूरत है? क्या आप इसलिए हतोत्साहित हो जातेे हैं कि दूसरे समुदाय के दस लोगों के बीच कोई भी आपकी खिल्ली उड़ा देता है और आपके समुदाय के नाम पर वे अपराध जड़ देता है जो आपके समुदाय ने कभी किए ही नहीं। इससे हतोत्साहित होने की जरूरत नहीं, यह हम भारतीयों का स्वभाव है, यहां हर भारतीय समुदाय दूसरे समुदाय का मजाक उड़ाता है और उनके चुटकुले बनाता है। हमें इसके साथ ही जीना सीखना होगा।

गुरुवार, 18 नवंबर 2010

अंग्रेजी मैया की जय



उत्तर प्रदेश के लखीमपुर खीरी जिले के बनका गांव में इंग्लिश देवी का मंदिर बन रहा है। मंदिर दलित लोग बनवा रहे हैं। खबर चौंकाने वाली नहीं, सोचने को मजबूर करने वाली है। देश की यह गोबर पट्टी ही तो थी, जहां सबसे पहले अंग्रेजी हटाओ का नारा लगा था। इसी पट्टी के लोगों में से कुछ ने हिंदी न जानने वालों की देशभक्ति पर संदेह व्यक्त किया था। इसी पट्टी में ही तो हिंदी-हिंदू-हिंदुस्तानी का नारा उछला था। तो अब क्या हो गया? ठेेठ गंवई लहजे में पूछें तो क्या अकल ठिकाने आ गई?

अध्यात्म की गहराइयों की बात छोड़ दें और एक राह चलते आदमी से पूछें कि आप देवी दर्शन के लिए क्यों जाते हैं, तो वह अमूमन इन्हीं में से कोई जवाब देगा - बेटे की नौकरी के लिए, फैक्टरी की सफलता के लिए, स्वास्थ्य लाभ के लिए, गृहस्थी में शांति के लिए। आदमी चार दिन के लिए दुनिया में आता है लेकिन ये चार दिन भी रोटी, कपड़ा और मकान के बिना नहीं कट सकते। इसके बाद स्वास्थ्य चाहिए, समाज में सम्मान चाहिए, फिर....। यह सूची लंबी होती जाएगी। बात कुल मिलाकर यह है कि लोग हर देवी के पास कुछ प्राप्त करने के लिए जाते हैं। कहते हैं अलग-अलग देवियों के पास अलग-अलग शक्तियां होती हैं। इंग्लिश देवी का जहां तक सवाल है, यह बड़ी चमत्कारिक शक्तियों वाली देवी है। इसने देश को एक सूत्र में बांध दिया। कहते हैं हिंदी बोलने-समझने वालों की संख्या अंग्रेजी वालों से कई गुना है, फिर भी अंग्रेजी का प्रताप है। यही तो चमत्कार है। जिस तमिल भाषी को हिंदी में साम्राज्यवाद का खतरा नजर आता है, वह इंग्लिश देवी की शरण में चला जाता है।

इंग्लिश देवी सबके साथ समान व्यवहार करती है। वह किसी की मातृभाषा नहीं है। सभी लोग इसमें गलतियां करते हैं। जो कम गलत अंग्रेजी बोलता है, वह अंग्रेजी का विद्वान माना जाता है। हिंदी वालों के सामने बुद्धू बनने से तो अच्छा है टूटी-फूटी अंग्रेजी बोल लो, हम अपनी गलत अंग्रेजी बोलेंगे, तुम अपनी गलत अंग्रेजी बोलो। इंग्लिश देवी भोले शंकर की तरह है, छोटी-मोटी गलतियों का बुरा नहीं मानती, यहां अभिनव ओझा जैसे कर्मकांडी ब्राह्मण डंडा लेकर गलतियां पकड़ने के लिए नहीं खड़े रहते।

इंग्लिश देवी रोजगार देती है, सम्मान दिलाती है। कोई दलित भी दो-चार कदम धांसू अंग्रेजी में बोल लेता है तो हिंदी बोलने वाला ब्राह्मण धौंस में आ जाता है। इसके भक्त सारी दुनिया में फैले हैं। ज्यादातर ज्ञान अंग्रेजी में निकल रहा है। उसका एक फीसदी भी हिंदी में आने में दस साल लग जाते हैं। उसकी भी कोई गारंटी नहीं है कि हिंदी में वह आएगा ही। इसलिए हर ज्ञान पिपासु अंग्रेजी की शरण में जाने को बाध्य है।

यूरोप के देश अब तक इस देवी के सामने सर नहीं झुकाते थे। लेकिन अब वे भी अपनी-अपनी देवियों - जर्मन, फ्रेंच के साथ-साथ अंग्रेजी की भी आराधना करने में लगे हैं। कारण यह कि जो किताब आज अंग्रेजी में आई है वह जर्मन और फ्रेंच में आने में साल दो साल तो लग ही जाएंगे। और आज दुनिया जिस तेजी से आगे बढ़ रही है उस तेजी के सामने एक-दो साल बड़ा लंबा समय है। हमारे हिंदी वाले भाई दांतों तले अंगुली दबा लें कि हमारे यहां तो अंग्रेजी में उपलब्ध ज्ञान का पचास साल में भी अनुवाद नहीं हुआ और किसी ने चूं तक नहीं की। ये जर्मनी, फ्रांस वाले किताबी कीड़े होते होंगे या फिर अहमक होंगे जो ज्ञान जैसी चीज के लिए दूसरों की भाषा सीखते हैं (हमारे लिए तो मलेच्छ हैं)।

अब तो भाषा को लेकर अहंकारी चीन और जापान ने भी अंग्रेजी सीखना शुरू कर दिया । स्कूलों में अंग्रेजी एक विषय के तौर पर लेना अनिवार्य कर दिया है। आखिर आने वाली पीढ़ी को इंटरनेट पर दुनिया भर के लोगों से बातचीत करनी है, चिट्ठी-पत्री करनी है, चीनी-जापानी के भरोसे बैठे रहोगे तो कुएं में मेंढक बन जाओगे।

एक उदाहरण है। अक्सर देखा जाता है कि हिंदी पत्रकार बिरादरी में कुछ लोग असम और पूर्वोत्तर के अन्य राज्यों की समस्याओं के बारे में ऐसी बातें करते हैं जो किसी मूर्ख के मुंह पर ही शोभ सकती है। अपने ही देश के बारे में घोर अज्ञानता का कारण यह है कि हिंदी में अब तक असम के बारे में एक भी स्तरीय राजनीतिक पुस्तक उपलब्ध नहीं है। अब जिस आदमी ने अंग्रेजी देवी की कभी आराधना नहीं की, वह अपने ही देश के बारे में सही समझ कैसे विकसित कर सकता है। या तो आप अपनी भाषा में ज्ञान लाइए, या उस भाषा को सीखिए जिसमें वह ज्ञान उपलब्ध है - यह सब न करके मूर्तिभंजकों की तरह "अंग्रेजी हटाओ' का नारा देने का नतीजा यह हुआ है कि देश की हिंदी पट्टी में दो तरह के स्कूल खुल गए हैं। एक आम जनता के लिए, जिन्हें सरकारी स्कूल कहा जाता है। इन स्कूलों में पढ़ने वाला बच्चा अंग्रेजी तो दूर जोड़-घटाव भी ठीक तरह से नहीं सीख पाता। दूसरे हैं, निजी स्कूल, जिन्हें अंग्रेजी स्कूल कहा जाता है। गांवों-कस्बों में ये स्कूल छोटे-मोटे उद्यमी लगाते हैं, जहां सारी जरूरी सुविधाएं उपलब्ध नहीं होतीं। पत्रकार बंधु इनके आगे हमेशा "कुकुरमुत्तों की तरह उग आए' यह वाक्यांश जोड़ना नहीं भूलते। वे यह छिपाना नहीं चाहते कि उन्हें इन स्कूलों का "उगना' पसंद नहीं है। लेकिन गांव-कस्बे-शहर में जिस किसी के पास भी साधन है, वह अपने बच्चे को इन अंग्रेजी स्कूलों में ही भेजना पसंद करते हैं। ऐसे सर्वेक्षण हो चुके हैं, आगे और भी करवा लीजिए, आप पाएंगे कि अधिकांश हिंदी पत्रकारों-लेखकों-प्रोफेसरों के बच्चे अंग्रेजी स्कूलों में पढ़ते हैं। है न अंग्रेजी मैया का चमत्कार।

हिंदी पट्टी वालों ने काफी सालों तक सोचा कि हमारा विकास तो वैसे भी हो जाएगा। इसलिए वे राष्ट्र के, राष्ट्रभाषा के, राष्ट्रीयता के गीत गाते रहे। लेकिन ये गीत बस दक्षिण वालों, आसाम-बंगाल को सुनाने के लिए थे। उनके अपने घर में झांककर देखिए बड़ी दरिद्रता है। किसी राह चलते हिंदी वाले से कोई पूछ ले कि भैया जैसे बंग्ला में सुनील गंगोपाध्याय है, वैसे आपके यहां कौन हैं? इस बात की गारंटी दी जा सकती है कि कोई जवाब नहीं मिलेगा, या यह भी हो सकता है जवाब प्रेम वाजपेयी या रानू या ओमप्रकाश शर्मा मिले। अपनी ही भाषा के महान साहित्यकारों के बारे में अनभिज्ञ हिंदी पट्टी के लोग आज भाषा के मामले में सबसे ज्यादा गरीब हैं। उनमेें से ज्यादातर सिर्फ एक भाषा जानते हैं, जबकि देश के दूसरे राज्यों के ज्यादातर लोग अपनी प्रादेशिक भाषा के अलावा हिंदी और अंग्रेजी भी जानते हैं। उन्हें सीखना पड़ता है। हिंदी वाले भला प्रादेशिक भाषा क्यों सीखे। वे तो राष्ट्रीयता का झंडा लहराने वाले लोग हैं। क्षेत्रीयतावाद से उनका दूर-दूर तक रिश्ता नहीं। अंग्रेजी उन्होंने इसलिए नहीं सीखी क्योंकि इसके दो फायदे हैं। एक तो विदेशी भाषा सीखने की मेहनत से मुक्ति मिल गई, दूसरे देशभक्ति का एक काम हो गया। जैसे असम में किसी हिंदीभाषी को गाली देने से दो लाभ होते हैं- एक तो इलाके में धौंस जम जाती है, दूसरे असमी मां की सेवा हो जाती है। आखिर देश/प्रदेश के प्रति इतना कर्त्तव्य तो होना ही चाहिए।

शनिवार, 30 अक्टूबर 2010

असम में किसे चाहिए आजादी

पिछले तीन दशकों में असम में काफी खून बहा है। मोटे तौर पर तीन कारणों से राज्य में हिंसा हुई। एक बोड़ो आंदोलन, दो असम आंदोलन और तीन अल्फा का स्वाधीनता को लेकर अलगाववादी आंदोलन। हिंसा का कोई तर्क नहीं होता। लेकिन इस हिंसा का संचालकों के पास इसके औचित्य को लेकर किसके पास क्या तर्क हैं इसे देखा जाना चाहिए। बोड़ो समुदाय के पास हो सकता है यह तर्क हो कि इंसानी खून के बदले में बोड़ो समुदाय ने अपनी पहचान हासिल कर ली। असम आंदोलन के नेताओं के पास भी तर्क हो सकते हैं कि तीन हजार से अधिक लोगों की जान के विनिमय में सारे देश का ध्यान असमिया समुदाय की समस्याओं पर गया। बांग्लादेशी घुसपैठ की समस्या हो सकता है असम आंदोलन के बिना भी किसी समय देश के राजनीतिक एजेंडे में सबसे ऊपर आ जाती, लेकिन असम आंदोलन ने इस समस्या को ठीक समय पर देश के सामने रख दिया।

लेकिन अल्फा के द्वारा किए गए खून-खराबे के पक्ष में इसके समर्थक लाख कोशिश करके भी कोई पचने वाला तर्क नहीं दे सकते। स्वाधीनता! असम में स्वाधीनता कौन चाहता है? 1947 में देश के आजाद होने के बाद से 1979 में अल्फा के द्वारा एक और आजादी की मांग उठाए जाने के बीच असम के राजनीतिक विमर्श में कभी भी प्रदेश की स्वाधीनता किसी की जबान पर नहीं रही। 1989-92 के दौरान अल्फा थोड़े दिनों के लिए हीरो बना जब इसके कैडर सिर्फ मारवाड़ी व्यवसायियों और असम में बाहर से आकर काम करने वाले बड़े अधिकारियों से पैसे वसूलते थे। उन दिनों अल्फा को "हमारे लड़के' कहकर संबोधित किया जाता था। जनता की नब्ज पकड़ने में राजनीतिक नेता माहिर होते हैं। अल्फा का जनता के बीच प्रभाव था इसीलिए प्रफुल्ल महंत उसके विरुद्ध कार्रवाई करने से कतराते रहे। महंत के बाद आए हितेश्वर सइकिया अल्फा और आसू दोनों के ही दुश्मन थे। लेकिन अपनी प्रेस वार्ताओं में वे भूल से भी (और लाख कोंचने के बावजूद) अल्फा के खिलाफ कोई शब्द उच्चारित नहीं करते थे। जो कुछ कहना होता था अपने पुलिस अधिकारियों को कहते थे। कथनी और करनी में उनके यहां जितना अंतर था उतना और कहीं नहीं मिलता।

1989-92 का दौर खत्म होने के बाद अल्फा की हथियारों की भूख बढ़ने लगी, साथ-साथ पैसे की भी। सेना के दो-दो अभियान झेल लेने के बाद इसका आत्म-विश्वास बढ़ गया था और इसके नख-दंत असमिया मूल के समुदायों को भी चुभने लगे थे। तब धीरे-धीरे मीडिया में अल्फा की आलोचना होने लगी। लेकिन तब तक मर्ज काफी बढ़ चुका था। विदेशों में हथियारों की मंडी तक उनकी पहुंच हो चुकी थी, म्यांमार में शस्त्र चालन के कोचिंग सेंटरों तक का रास्ता वे पहचान चुके थे। इसलिए जब तक असमिया समाज के एक बड़े वर्ग के बीच यह सहमति बनी कि इस मर्ज की रोकथाम होनी चाहिए, तब तक काफी देर हो चुकी थी - और इसीलिए समाज में असम की स्वाधीनता के एक फीसदी समर्थक भी मौजूद न होने के बावजूद अल्फा का खून-खराबा, हत्याओं का दौर इतने लंबे समय तक जारी रह पाया।

हम चर्चा कर रहे हैं इस बात की कि अल्फा के इस तथाकथित संघर्ष का क्या कोई औचित्य था। ब्रिटिश साम्राज्य में शामिल होने के बाद भारत के अंग के रूप में बने रहने पर राज्य में कभी कोई आपत्ति रही हो इसका उदाहरण ताजा इतिहास में हमें नजर नहीं आता। लेकिन जिस बात पर हम जोर देना चाहते हैं वह यह है कि आज से दो दशक पहले जो लोग स्वाधीनता या अलगाव के नाम पर उदासीनता दिखाते थे वे भी आज सक्रिय रूप से ऐसी किसी विचारधारा का विरोध करते हैं। इसका कारण यह है कि आज बीस साल पहले की अपेक्षा ज्यादा बड़ी संख्या में असम के छात्र दूसरे राज्यों के शिक्षा-संस्थानों में पढ़ते हैं, ज्यादा बड़ी संख्या में असम के युवा भारत के विभिन्न शहरों में नौकरियां करते हैं, ज्यादा बड़ी संख्या में असम के विभिन्न मूल समुदायों के लोग भारतीय सेना के तीनों अंगों में भर्ती हैं, ज्यादा बड़ी संख्या में लोग विशाल भारतीय बाजार के साथ जुड़े हुए हैं और इसका महत्व समझते हैं।

इसलिए असम में आज भावना यह है कि स्वाधीनता एक राजनीतिक बकवास है। लेकिन "लड़कों' ने इतने सालों तक "संघर्ष' किया है तो कुछ ले-देकर समझौता हो जाना चाहिए। यदि असम को अन्य राज्यों के मुकाबले कुछ अतिरिक्त सुविधाएं हासिल हो जाती हैं, तो अल्फा का "संघर्ष' धन्य हो जाएगा। लेकिन क्या यह कहा जा सकेगा कि इतने खून-खराबे और इंसानी जानों की कीमत अदा हो गई? हम ऐसा नहीं समझते। शायद आज के असम में कोई भी ऐसा नहीं समझता। क्योंकि भारतीय लोकतंत्र में स्पेस की इतनी कमी कभी नहीं हुई कि ज्यादा नौकरियां, ज्यादा धन, ज्यादा आरक्षण, संवैधानिक सुरक्षा जैसी चीजों के लिए इतना खून बहाना पड़े, जितना अल्फा ने बहाया है। जब किसी व्यवस्था में शांतिपूर्ण आंदोलन के लिए गुंजाइश न हो, तब वहां हिंसा के पक्ष में दलील की गुंजाइश बनती है। असम आंदोलन को नजदीक से देखने वालों और इसमें हिस्सा लेने वालों को जिस तरह आज अहसास हो रहा है कि केंद्रीय विश्वविद्यालय, आईआईटी जैसी चीजों के लिए तीन हजार से ज्यादा लोगों की जानों की बलि कुछ ज्यादा ही बड़ी कीमत है यदि अंततः विदेशियों को बाहर नहीं निकाला जाता। उसी तरह कल को असम को संविधान के अंतर्गत कुछ सविधाएं देने के एवज में अल्फा के साथ समझौता हो जाए तो यह अहसास होने में ज्यादा वक्त नहीं लगेगा कि इतना तो किसी शांतिपूर्ण आंदोलन से ही हासिल हो जाता।