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आज जब शहर की सड़कों से गुजर रहा था तो कालेजी छात्राओं को नारे लगाते सुना - अन्ना तुम संघर्ष करो, हम तुम्हारे साथ हैं। असम में हिंदी में नारे सुनना एक हिंदीप्रेमी के कानों को अच्छा लगता है। राष्ट्रीय पताका, गांधी टोपी, हिंदी भाषा - इन दिनों हवा में राष्ट्रप्रेम घुला हुआ है। असम जैसे प्रदेश में यह सब विशेष रूप से अच्छा लगता है। लेकिन जब नारे के मर्म में जाते हैं तो ध्यान आता है कि इसका क्या मतलब है। एक व्यक्ति 11 दिन से अनशन पर बैठा हुआ है और हम कह रहे हैं कि तुम संघर्ष करो, हम तुम्हारे साथ हैं। एक अनशन पर बैठे हुए व्यक्ति से यह कहना कि तुम संघर्ष करो, 11 दिन अनशन पर पर बैठे एक सम्माननीय व्यक्ति के समर्थकों से, हम सबसे उम्मीद यह होनी चाहिए कि हम उनसे अनशन तोड़ने की प्रार्थना करें। अनशन तोड़कर आगे सघर्ष चलाते रहने की प्रार्थना करें और आगे चलने वाले संघर्ष में साथ देने का वादा करें। अन्ना हजारे ने स्वयं कहा भी है कि उनकी तीन शर्तों पर लोकसभा में चर्चा होने पर वे अनशन तोड़ने के बारे में सोचेंगे लेकिन रामलीला मैदान से नहीं हटेंगे। भ्रष्टाचार के विरुद्ध संघर्ष चलते रहना चाहिए, लेकिन इसके पहले अन्ना के साथियों को चाहिए कि वे अन्ना से अनशन तुड़वाएं।
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इन पंक्तियों के लेखक ने गांधीजी के बारे में सिर्फ किताबों से जाना है। लेकिन जितनी-सी हमें जानकारी है उसके अनुसार गांधीजी जब भी अनशन की घोषणा करते थे उनके निकट सहयोगियों - नेहरू, पटेल आदि - के मुंह सूख जाते थे। वे गांधीजी को अनशन नहीं करने के लिए मनाते थे। यहां एक बात और कहना चाहेंगे। गांधीजी ने बहुत कम ही बार अनशन अपने मुख्य प्रतिपक्ष यानी ब्रिटिश के विरुद्ध किया। उनके अनशन का उद्देश्य अपने देशवासियों या अपने सहयोगियों से कोई बात मनवाना होता था। या फिर किसी ऐसी बात पर वे अनशन करते थे जिसमें ऐसी स्थिति आ जाती थी कि यदि अभी जिद करके इस बात को नहीं मनवाया तो आगे कभी नहीं हो पाएगा। और इससे होने वाले नुकसान की भरपाई कभी नहीं हो पाएगी। उदाहरण के लिए ब्रिटिश सरकार का अनुसूचित जातियों के लिए अलग से निर्वाचन क्षेत्र बनाने का प्रस्ताव। गांधीजी को लगा कि इससे हिंंदू समाज में जो फूट पड़ेगी उसकी भरपाई बाद में कभी नहीं हो पाएगी, इसलिए वे अनशन पर बैठ गए और आंबेडकर को अपनी बात मानने के लिए मजबूर कर दिया। आंबेडकर गांधीजी की रणनीति से काफी नाराज भी हुए। गांधीजी अनशन को नैतिक ताकतों के प्रति अपील करने का एक आध्यात्मिक अस्त्र मानते थे। लेकिन अन्ना और उनकी टीम के वक्तव्यों से यह स्पष्ट है कि वे अपने देश के राजनीतिज्ञों की नैतिकता में विश्वास नहीं करते। वे ठीक ही मंच से उनके धोखाधड़ीपूर्ण तरीकों की आलोेचना कर रहे हैं। उन पर व्यंग्य कस रहे हैं। लेकिन आप अपने प्रतिपक्ष को अनैतिक मानते हैं तो अनशन जैसे आध्यात्मिक अस्त्र (गांधीजी की भाषा में) का इसके लिए प्रयोग करने का कोई अर्थ ही नहीं है। यहीं हम इस बात का उल्लेख करना चाहेंगे कि अन्ना हजारे के समर्थन में देश भर में कई स्थानों पर (गुवाहाटी में भी) कुछ लोगों द्वारा उनके साथ-साथ अनशन किया जा रहा है। ज्यादातर स्थानों पर ऐसे लोग उपेक्षित हैं और कोई उन्हें जाकर समझाता नहीं है कि इस चरम अस्त्र का इस तरह उपयोग न करें। जरूरत है ऐसे लोगों को समझाने और उनकी जान बचाने की।
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अन्ना ने नौ दिन का अनशन पूरा होने पर कहा था कि अभी और नौ दिन तक अनशन करने की उनमें ताकत है। लेकिन उनकी उम्र के एक व्यक्ति के इतनी लंबी अवधि तक अनशन करने के बाद क्या उनका स्वास्थ्य वही रह जाएगा जो आज है! ऐसे मामलों में स्वास्थ्य को फिर से पुरानी स्थिति में आने में कई महीने/साल लग जाते हैं। गांधीजी का स्वास्थ्य भी बाद की अवधि में किए गए अनशन के कारण काफी गिर गया था। लेकिन रामलीला मैदान के जमावड़े से अभी भी भ्रष्टाचार को खत्म करने के नारे तो लग रहे हैं, लेकिन अन्ना से अनशन वापल लेने की अपील नहीं की जा रही है। इसका कारण क्या आंदोलनकारियों का स्वार्थपूर्ण रवैया है (कि अनशन टूटने से पहले सरकार से ठोस आश्वासन ले लिया जाए)? हमारे विचार से अब अन्ना को अनशन तोड़ने के लिए मनाना चाहिए और देश भर में भ्रष्टाचार के खिलाफ उठ खड़े हुए आंदोलन को अन्य तरीकों से आगे चलाया जाना चाहिए।
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ऐसे क्षण आते हैं जब लगता है कि देश की सारी जनता किसी एक मुद्दे पर एकमत है। लोग ऐसे समय किसी भी भिन्न मत को सुनना पसंद नहीं करते। भिन्न मत का रहना और उसके रहने की परिस्थितियों का बना रहना ही किसी लोकतंत्र के असली या नकली होने की पहचान होती है। हो सकता है आपका मत ही सही हो, लेकिन आप यह दावा नहीं कर सकते कि सिर्फ आप ही सही हैं और सौ फीसदी सही हैं। दूसरी बात यह है कि भिन्न मत व्यक्त करने वालों के लिए अक्सर गाली-गलौच वाली भाषा का इस्तेमाल किया जाता है। इस समय शेखर गुप्ता, अरुंधती राय, तवलीन सिंह, शबाना आजमी आदि कई लोगों ने अन्ना के आंदोलन के कई पहलुओं पर अपने मतभेद व्यक्त किए हैं। ये मतभेद सार्वजनिक विमर्श में बने रहते हैं तो हर्ज क्या है, जरूरी नहीं कि उनके लिए अभद्र भाषा का प्रयोग किया जाए।
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देश भर में अन्ना के आंदोलन के लिए उमड़ पड़े जनसैलाब को इस रूप में समझा जाना चाहिए कि यह भ्रष्टाचार के प्रति लोगों के मन में सालों से जमा गुस्से का इजहार है। यह विशेषकर राजनेताओं के खिलाफ भी है। इसे कुछ लोग जनलोकपाल बिल के समर्थन के रूप में पेश करना चाहते हैं। दोनों में फर्क है। लेकिन टीम अन्ना के लोेग इसे जनलोकपाल के प्रति समर्थन बताकर और अन्ना के अनशन की दुहाई देकर अपने बिल को ज्यों का त्यों पारित करवाना चाहते हैं। यह एक तरह का ब्लैकमेल है और इसके नतीजे भविष्य के लिए अच्छे नहीं भी हो सकते हैं। जैसे कि कुछ विधिवेत्ताओं का कहना है कि सरकार और टीम अन्ना, दोनों के बिल अपनी-अपनी अति के शिकार हैं। एक संतुलित कानून नहीं बनाने की परिणतियां इस रूप में सामने आ सकती हैं कि या तो अभियुक्त को अपना बचाव करने और शिकायतकर्ता को धमकाने आदि का ज्यादा ही मौका मिल सकता है (सरकारी बिल) या फिर अभियुक्त को अपना पक्ष रखने का उचित समय पर उचित तरीके से मौका ही नहीं मिले (जनलोकपाल)। यदि यह कानून शिकायत मिलने के साथ ही अभियुक्त को दोषी मानकर आगे बढ़ता है तो इससे निर्दोष लोगों को फंसाया जा सकता है या फंसाने की धमकियां देकर लोग उनसे गलत काम करवा सकते हैं। यह कानून से संबंधित मामला है और अच्छा होता यदि दोनों ही पक्षों की सहमति से देश के कुछ चुनिंदा विधिवेत्ताओं (जैसे राम जेठमलानी) की टीम को अपनी ओर से इस बिल का एक मसौदा बनाने की जिम्मेवारी सौंपी जाती।
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यह सही है कि लोकपाल के मुद्दे को राजनेताओं ने उलझाकर रखा है और कुछ लोग कमर कसे हुए हैं कि किसी भी हालत में इसे पारित नहीं होने देना है। महिला आरक्षण बिल का हस्र हम देख चुके हैं। यानी मुंह से इसका विरोध नहीं करना है लेकिन पारित भी नहीं होने देना है। इसलिए हो सकता है इसी कारण टीम अन्ना में एक तरह की जिद आ गई हो कि इस बार राजनेताओं को अपनी साजिश में सफल नहीं होने देना है। लेकिन यह पुरानी बात हो गई है। भ्रष्टाचार के विरुद्ध इतने बड़े जनांदोलन के बाद किसी भी पार्टी के लिए यह संभव नहीं रह जाएगा कि वह लोकपाल बिल को नियमों की भूलभुलैया में छिपा दे और दिन की रोशनी देखने से वंचित कर दे। इतने बड़े आंदोलन कोे दबाना अब संभव नहीं होगा।
मेरे बारे में
- Binod Ringania
- Journalist and writer, Writes on Northeast India, Bangladesh, Myanmar
रविवार, 28 अगस्त 2011
रविवार, 6 फ़रवरी 2011
लांक्षन सहना प्रवासी की नियति है
हाल ही में मैं राज्य के बाहर गया। वहां एक साहित्यिक मित्र ने मुझे उलाहना दिया कि आपलोग हिंदी अखबार क्यों निकालते हैं? इस तरह आपलोग मारवाड़ी समाज को असमिया समाज से दूर रखने का काम करते हैं। हिंदी अखबार न होते तो मारवाड़ी लोग असमिया अखबार पढ़ते और असमिया समाज-संस्कृति के ज्यादा निकट जाने का मौका मिलता। यदि हम काफी हाउस या पनवाड़ी की दुकान पर मिले होते तो मैं जोर-शोर से बहस करता, लेकिन किसी के घर अतिथि बनकर गर्मागर्म बहस करने का मौका नहीं था। फिर भी मैंने मिमियाते हुए कहा कि जब हिंदी अखबार नहीं थे, तब मारवाड़ी कौन-सा असमिया अखबार पढ़ते थे। उन दिनों वे सन्मार्ग और दैनिक विश्वमित्र पढ़ा करते थे जिनमें असम के बारे में कुछ नहीं होता था। हमारे मित्र को एतराज था कि मारवाड़ी फैंसी बाजार में अपनी डफली पर अपना राग गाते हैं, उन्होंने फैंसी बाजार को छोटा-सा टापू जैसा बना रखा है। इसीलिए तो स्थानीय लोगों में विद्रोह होता है।
चूंकि मैं वहां कुछ बोल नहीं पाया था, शायद इसीलिए इन प्रश्नों के बीज दिमाग में रह गए और अंकुरित होकर बड़े होते रहे। मैं सोचता रहा कि क्या इसीलिए असमिया समाज में विद्रोह पनपा है! मैं मारवाड़ी समाज के किसी भी स्थानीय समाज के नजदीक जाने, उसकी संस्कृति-भाषा को अपनाने का विरोधी नहीं बल्कि समर्थक हूं। लेकिन यह भी कहता हूं कि यह काम एक स्वाभाविक प्रक्रिया के तौर पर होगा, न कि किसी राजनीतिक कार्यक्रम की तर्ज पर।
फिर यह प्रश्न भी है कि असमिया भाषा-संस्कृति को काफी हद तक अपना लेने वाले समुदायों को क्या संदेह की दृष्टि से नहीं देखा जाता? उदाहरण के लिए नेपाली समुदाय। हमारे मित्र को जिन मुद्दों पर मारवाड़ी समुदाय से शिकायत थी उन मुद्दों पर नेपाली समुदाय उन्हें शिकायत का मौका नहीं देगा। मसलन, वे लोग शहरों में टापू बनाकर नहीं रहते। नेपाली समुदाय असम में खेती और गोपालन से जुड़ा हुआ है, इसलिए गांवों में रहता है। इस समुदाय के लोग असमिया भाषा को मातृभाषा की तरह प्रयोग में लाते हैं। नेपाली समुदाय का असमिया साहित्य में अच्छा योगदान है। हमारे मित्र को संतोष होगा, कि ये लोग अपनी भाषा में समाचार पत्र भी नहीं निकालते, और असमिया पत्र ही पढ़ते हैं। लेकिन इससे क्या नेपाली समुदाय दोषारोपण से बच जाता है?
असमिया समाज-भाषा-साहित्य के सामने संकट हो सकते हैं- इनमें से कई वास्तविक हैं और कुछ काल्पनिक। लेकिन इस संकट को पैदा करने में मारवाड़ी समुदाय की मुझे कोई भूमिका नजर नहीं आती। एक कहानी है- एक मक्खी एक बैल के सींग पर बैठी थी। उसने देखा कि बैल की आंखों से आंसू बह रहे हैं। द्रवित होकर मक्खी ने पूछा- बैल भाई, मेरा भार सहन नहीं हो रहा है तो मैं कहीं और बैठ जाऊँ। कुछ ऐसी ही स्थिति मारवाड़ी समाज की असम में है। मारवाड़ी समुदाय मुश्किल से यहां की जनसंख्या का एक फीसदी होगा। ये एक फीसदी लोग दिन-रात अपने व्यापार में मगन रहते हैं। ये लोग असमिया भाषा सीखे, असमिया संस्कृति के नजदीक जाए तो इनलोगों के लिए ही अच्छा है- लेकिन न जाए तो यह स्थानीय लोगों में असंतोष का कारण बन सकता है यह बात समझ से परे है। मारवाड़ी समाज सिर्फ असम ही नहीं देश के हर राज्य में फैला है। अपने प्रवास के करीब दो सौ सालों के दौरान किसी भी राज्य में इसके द्वारा स्थानीय भाषा-संस्कृति के विरुद्ध कोई काम करने का उदाहरण नहीं मिलता। यह समाज अपनी भाषा को ही संवैधानिक या किसी भी तरह की सरकारी मान्यता दिलाने के लिए कोई प्रयत्न नहीं करता, ऐसा समाज किसी भी अन्य भाषा-संस्कृति के लिए खतरा बनने का तो सवाल ही नहीं।
फिर भी मारवाड़ी लोग अपने स्वभाव के कारण हमेशा रक्षात्मक मुद्रा में खड़े रहते हैं। (व्यावहारिक तौर पर देखें तो यह अच्छा है, लेकिन बौद्धिकता के स्तर पर पीड़ा तो होती ही है)। कोई कहता है तुम बहुत बुरे हो, तब यह अपने गिरेबान में झांकने लग जाता है, कोई कहता है तुम अपने बच्चों को हिंदी क्यों पढ़ाते हो तब यह हिंदी स्कूलों को बुराई की जड़ बताने लग जाता है; कोई कहता है तुम शोषक हो तब यह जनकल्याण के काम गिनाने लग जाता है; कोई कहता है तुम जाहिल हो तब यह अपने समाज के बौद्धिकों के नाम गिनाने लग जाता है; कोई इसे देशद्रोही तक कह देता है तब यह स्वाधीनता संग्राम में मारवाड़ी समाज की भूमिका को गिनाने लग जाता है।
दरअसल हम एक जटिलताओं भरे समाज में रह रहे हैं। एक मारवाड़ी मध्यप्रदेश या उत्तर प्रदेश में रहता है, तब उस पर बहुत सारे प्रश्नों की बौछार नहीं की जाती, लेकिन वही मारवाड़ी जब उड़ीसा या असम में आ जाता है तो उससे इतने सारे सवाल पूछे जाते हैं कि वह अपराध बोध तले पिस जाता है। मध्य देश में मारवाड़ी ठीक है तो पूर्व देश में आकर वह बुरा कैसे हो गया?
कहीं ऐसा तो नहीं कि गालियां सुनना प्रवास की अनिवार्य शर्त होती है! बाहर से आए आदमी को आप सारी बुराइयों की जड़ बता दो, फिर भी वह रक्षात्मक मुद्रा में रहेगा, हाथ जोड़े खड़ा रहेगा, क्योंकि उसे भान है कि वह किस जमीन पर खड़ा है।
मारवाड़ी कैसा दिखता है यह इस बात पर जितना निर्भर करता है कि मारवाड़ी कैसा है, उससे ज्यादा इस बात पर निर्भर करता है कि देखने वाला कौन है? जहां तेज उद्योगीकरण हो रहा है, पूंजी और उद्यमियों का स्वागत किया जाता है वहां मारवाड़ी उद्यमी है और विकास का वाहक है (कर्नाटक)। जहां के लोग अपनी भाषा-संस्कृति-साहित्य की समृद्धि और भविष्य के प्रति आश्वस्त हैं वहां मारवाड़ी एक छोटा-सा अल्पसंख्यक समूह है जिसकी अपनी अलग भाषा-संस्कृति है। वे लोग अपनी भाषा में क्या करते हैं इससे किसी को कोई मतलब नहीं (पश्चिम बंगाल)। जहां के लोग अपनी भाषा-संस्कृति के भविष्य को लेकर आशंकित हैं वहां मारवाड़ियों को अलग दृष्टि से देखा जाता है (असम)।
असम के ज्यादातर मारवाड़ी द्विभाषी हैं। नई पीढ़ी में मारवाड़ी बोली खत्म हो रही है, उसका स्थान हिंदी ले रही है। इस तरह ज्यादातर मारवाड़ी हिंदी और असमिया का मातृभाषा के रूप में व्यवहार करते हैं। ज्यादातर मारवाड़ी शुद्ध असमिया बोलना जानते हैं। असमिया भाषा को इन लोगों ने दिल से अपना लिया है। लेकिन ज्यादातर मारवाड़ी हिंदी हो या असमिया - लिखने-पढ़ने से कोई ताल्लुक नहीं रखते। इसलिए उन्हें असमिया भाषा के प्रति अपने प्रेम को प्रदर्शित करने का अवसर नहीं मिलता। इधर असमिया समाज भाषा व साहित्य को लेकर अति संवेदनशील है। अपनी भाषा-साहित्य-संस्कृति के भविष्य को सुरक्षित करने की यह जद्दोजहद कम -से-कम डेढ़ सौ साल पुरानी है। असमिया संस्कृति के प्रति किसी का नजरिया क्या है, इसे असम में दोस्त और दुश्मन की पहचान के लिए एक संदर्भ बिंदु की तरह इस्तेमाल किया जाता है।
हाल ही में मारवाड़ी समाज से कई असमिया साहित्यकार उभरे हैं। कुछ लोग हिंदी के माध्यम से ही असमिया संस्कृति की सेवा में उतरे हैं। इसका असमिया समाज में अच्छा स्वागत हुआ है। व्यापक मारवाड़ी समाज के असमिया प्रेम को यही वर्ग आगे लेे जा सकता है और उसे संस्थागत रूप दे सकता है।
अपराध बोध से ग्रसित रहने वाले मारवाड़ी भाइयों से संक्षेप में यही कहना चाहूंगा-(1) आप असम की जनसंख्या का एक अति क्षुद्र अंश हैं। जनसंख्या संतुलन को बदलने या राजनीतिक फायदे बटोरने में आपकी कोई भूमिका नहीं है, (2) आप नौकरियों के बाजार पर कोई दबाव नहीं डालते, उल्टे नौकरियां पैदा करते हैं, (3) आप धर्म और कानून से डरने वाले दब्बू लोग हैं, गैर कानूनी काम आपके स्वभाव में नहीं है (अपवाद हर जगह होते हैं), (4) स्थानीय भाषा का अहित कर हिंदी या राजस्थानी को आगे बढ़ाने के लिए आपने आज तक कुछ नहीं किया, आगे भी उम्मीद नहीं है, (5) आप पिछड़े इलाकों में आधुनिक पूंजीवाद के वाहक रहे हैं, (6) आपकी नई पीढ़ियां काफी पढ़-लिख कर यह साबित कर रही है कि आपकी बौद्धिक योग्यता सिर्फ परंपरागत बनियागिरी तक सीमित नहीं है।
जब सच्चाई यह है तब आपको अपराधबोध या हीनता ग्रंथि से ग्रस्त होने की क्या जरूरत है? क्या आप इसलिए हतोत्साहित हो जातेे हैं कि दूसरे समुदाय के दस लोगों के बीच कोई भी आपकी खिल्ली उड़ा देता है और आपके समुदाय के नाम पर वे अपराध जड़ देता है जो आपके समुदाय ने कभी किए ही नहीं। इससे हतोत्साहित होने की जरूरत नहीं, यह हम भारतीयों का स्वभाव है, यहां हर भारतीय समुदाय दूसरे समुदाय का मजाक उड़ाता है और उनके चुटकुले बनाता है। हमें इसके साथ ही जीना सीखना होगा।
गुरुवार, 18 नवंबर 2010
अंग्रेजी मैया की जय
उत्तर प्रदेश के लखीमपुर खीरी जिले के बनका गांव में इंग्लिश देवी का मंदिर बन रहा है। मंदिर दलित लोग बनवा रहे हैं। खबर चौंकाने वाली नहीं, सोचने को मजबूर करने वाली है। देश की यह गोबर पट्टी ही तो थी, जहां सबसे पहले अंग्रेजी हटाओ का नारा लगा था। इसी पट्टी के लोगों में से कुछ ने हिंदी न जानने वालों की देशभक्ति पर संदेह व्यक्त किया था। इसी पट्टी में ही तो हिंदी-हिंदू-हिंदुस्तानी का नारा उछला था। तो अब क्या हो गया? ठेेठ गंवई लहजे में पूछें तो क्या अकल ठिकाने आ गई?
अध्यात्म की गहराइयों की बात छोड़ दें और एक राह चलते आदमी से पूछें कि आप देवी दर्शन के लिए क्यों जाते हैं, तो वह अमूमन इन्हीं में से कोई जवाब देगा - बेटे की नौकरी के लिए, फैक्टरी की सफलता के लिए, स्वास्थ्य लाभ के लिए, गृहस्थी में शांति के लिए। आदमी चार दिन के लिए दुनिया में आता है लेकिन ये चार दिन भी रोटी, कपड़ा और मकान के बिना नहीं कट सकते। इसके बाद स्वास्थ्य चाहिए, समाज में सम्मान चाहिए, फिर....। यह सूची लंबी होती जाएगी। बात कुल मिलाकर यह है कि लोग हर देवी के पास कुछ प्राप्त करने के लिए जाते हैं। कहते हैं अलग-अलग देवियों के पास अलग-अलग शक्तियां होती हैं। इंग्लिश देवी का जहां तक सवाल है, यह बड़ी चमत्कारिक शक्तियों वाली देवी है। इसने देश को एक सूत्र में बांध दिया। कहते हैं हिंदी बोलने-समझने वालों की संख्या अंग्रेजी वालों से कई गुना है, फिर भी अंग्रेजी का प्रताप है। यही तो चमत्कार है। जिस तमिल भाषी को हिंदी में साम्राज्यवाद का खतरा नजर आता है, वह इंग्लिश देवी की शरण में चला जाता है।
इंग्लिश देवी सबके साथ समान व्यवहार करती है। वह किसी की मातृभाषा नहीं है। सभी लोग इसमें गलतियां करते हैं। जो कम गलत अंग्रेजी बोलता है, वह अंग्रेजी का विद्वान माना जाता है। हिंदी वालों के सामने बुद्धू बनने से तो अच्छा है टूटी-फूटी अंग्रेजी बोल लो, हम अपनी गलत अंग्रेजी बोलेंगे, तुम अपनी गलत अंग्रेजी बोलो। इंग्लिश देवी भोले शंकर की तरह है, छोटी-मोटी गलतियों का बुरा नहीं मानती, यहां अभिनव ओझा जैसे कर्मकांडी ब्राह्मण डंडा लेकर गलतियां पकड़ने के लिए नहीं खड़े रहते।
इंग्लिश देवी रोजगार देती है, सम्मान दिलाती है। कोई दलित भी दो-चार कदम धांसू अंग्रेजी में बोल लेता है तो हिंदी बोलने वाला ब्राह्मण धौंस में आ जाता है। इसके भक्त सारी दुनिया में फैले हैं। ज्यादातर ज्ञान अंग्रेजी में निकल रहा है। उसका एक फीसदी भी हिंदी में आने में दस साल लग जाते हैं। उसकी भी कोई गारंटी नहीं है कि हिंदी में वह आएगा ही। इसलिए हर ज्ञान पिपासु अंग्रेजी की शरण में जाने को बाध्य है।
यूरोप के देश अब तक इस देवी के सामने सर नहीं झुकाते थे। लेकिन अब वे भी अपनी-अपनी देवियों - जर्मन, फ्रेंच के साथ-साथ अंग्रेजी की भी आराधना करने में लगे हैं। कारण यह कि जो किताब आज अंग्रेजी में आई है वह जर्मन और फ्रेंच में आने में साल दो साल तो लग ही जाएंगे। और आज दुनिया जिस तेजी से आगे बढ़ रही है उस तेजी के सामने एक-दो साल बड़ा लंबा समय है। हमारे हिंदी वाले भाई दांतों तले अंगुली दबा लें कि हमारे यहां तो अंग्रेजी में उपलब्ध ज्ञान का पचास साल में भी अनुवाद नहीं हुआ और किसी ने चूं तक नहीं की। ये जर्मनी, फ्रांस वाले किताबी कीड़े होते होंगे या फिर अहमक होंगे जो ज्ञान जैसी चीज के लिए दूसरों की भाषा सीखते हैं (हमारे लिए तो मलेच्छ हैं)।
अब तो भाषा को लेकर अहंकारी चीन और जापान ने भी अंग्रेजी सीखना शुरू कर दिया । स्कूलों में अंग्रेजी एक विषय के तौर पर लेना अनिवार्य कर दिया है। आखिर आने वाली पीढ़ी को इंटरनेट पर दुनिया भर के लोगों से बातचीत करनी है, चिट्ठी-पत्री करनी है, चीनी-जापानी के भरोसे बैठे रहोगे तो कुएं में मेंढक बन जाओगे।
एक उदाहरण है। अक्सर देखा जाता है कि हिंदी पत्रकार बिरादरी में कुछ लोग असम और पूर्वोत्तर के अन्य राज्यों की समस्याओं के बारे में ऐसी बातें करते हैं जो किसी मूर्ख के मुंह पर ही शोभ सकती है। अपने ही देश के बारे में घोर अज्ञानता का कारण यह है कि हिंदी में अब तक असम के बारे में एक भी स्तरीय राजनीतिक पुस्तक उपलब्ध नहीं है। अब जिस आदमी ने अंग्रेजी देवी की कभी आराधना नहीं की, वह अपने ही देश के बारे में सही समझ कैसे विकसित कर सकता है। या तो आप अपनी भाषा में ज्ञान लाइए, या उस भाषा को सीखिए जिसमें वह ज्ञान उपलब्ध है - यह सब न करके मूर्तिभंजकों की तरह "अंग्रेजी हटाओ' का नारा देने का नतीजा यह हुआ है कि देश की हिंदी पट्टी में दो तरह के स्कूल खुल गए हैं। एक आम जनता के लिए, जिन्हें सरकारी स्कूल कहा जाता है। इन स्कूलों में पढ़ने वाला बच्चा अंग्रेजी तो दूर जोड़-घटाव भी ठीक तरह से नहीं सीख पाता। दूसरे हैं, निजी स्कूल, जिन्हें अंग्रेजी स्कूल कहा जाता है। गांवों-कस्बों में ये स्कूल छोटे-मोटे उद्यमी लगाते हैं, जहां सारी जरूरी सुविधाएं उपलब्ध नहीं होतीं। पत्रकार बंधु इनके आगे हमेशा "कुकुरमुत्तों की तरह उग आए' यह वाक्यांश जोड़ना नहीं भूलते। वे यह छिपाना नहीं चाहते कि उन्हें इन स्कूलों का "उगना' पसंद नहीं है। लेकिन गांव-कस्बे-शहर में जिस किसी के पास भी साधन है, वह अपने बच्चे को इन अंग्रेजी स्कूलों में ही भेजना पसंद करते हैं। ऐसे सर्वेक्षण हो चुके हैं, आगे और भी करवा लीजिए, आप पाएंगे कि अधिकांश हिंदी पत्रकारों-लेखकों-प्रोफेसरों के बच्चे अंग्रेजी स्कूलों में पढ़ते हैं। है न अंग्रेजी मैया का चमत्कार।
हिंदी पट्टी वालों ने काफी सालों तक सोचा कि हमारा विकास तो वैसे भी हो जाएगा। इसलिए वे राष्ट्र के, राष्ट्रभाषा के, राष्ट्रीयता के गीत गाते रहे। लेकिन ये गीत बस दक्षिण वालों, आसाम-बंगाल को सुनाने के लिए थे। उनके अपने घर में झांककर देखिए बड़ी दरिद्रता है। किसी राह चलते हिंदी वाले से कोई पूछ ले कि भैया जैसे बंग्ला में सुनील गंगोपाध्याय है, वैसे आपके यहां कौन हैं? इस बात की गारंटी दी जा सकती है कि कोई जवाब नहीं मिलेगा, या यह भी हो सकता है जवाब प्रेम वाजपेयी या रानू या ओमप्रकाश शर्मा मिले। अपनी ही भाषा के महान साहित्यकारों के बारे में अनभिज्ञ हिंदी पट्टी के लोग आज भाषा के मामले में सबसे ज्यादा गरीब हैं। उनमेें से ज्यादातर सिर्फ एक भाषा जानते हैं, जबकि देश के दूसरे राज्यों के ज्यादातर लोग अपनी प्रादेशिक भाषा के अलावा हिंदी और अंग्रेजी भी जानते हैं। उन्हें सीखना पड़ता है। हिंदी वाले भला प्रादेशिक भाषा क्यों सीखे। वे तो राष्ट्रीयता का झंडा लहराने वाले लोग हैं। क्षेत्रीयतावाद से उनका दूर-दूर तक रिश्ता नहीं। अंग्रेजी उन्होंने इसलिए नहीं सीखी क्योंकि इसके दो फायदे हैं। एक तो विदेशी भाषा सीखने की मेहनत से मुक्ति मिल गई, दूसरे देशभक्ति का एक काम हो गया। जैसे असम में किसी हिंदीभाषी को गाली देने से दो लाभ होते हैं- एक तो इलाके में धौंस जम जाती है, दूसरे असमी मां की सेवा हो जाती है। आखिर देश/प्रदेश के प्रति इतना कर्त्तव्य तो होना ही चाहिए।
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