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Journalist and writer, Writes on Northeast India, Bangladesh, Myanmar

शनिवार, 7 जुलाई 2012

हीरू दा का निधन और असमिया के आईने में हिंदी





हीरू दा से सबसे पहले कब कहां मिला याद नहीं, लेकिन उनका जिक्र सबसे पहले कांकरोली, राजस्थान में संबोधन के संपादक कमर मेवाड़ी ने किया था। उन्होंने एक साहित्य सम्मेलन का जिक्र करते हुए कहा था कि आपके यहां से वो आए थे, बिल्कुल दुबले, बिल्कुल साधारण, एक साधारण-सी शर्ट पहने। मैं तुरंत समझ गया कि वे हीरू दा ही होंगे। मैंने कहा- वे हीरेन भट्टाचार्य होंगे। मेवाड़ी जी को भी नाम याद आ गया और वे उनकी साधारणता की असाधारणता के गीत गाने लगे। कोई व्यक्ति अपनी साधारणता को भी चर्चा का विषय कैसे बना सकता है, इसका उदाहरण थे हीरू दा।

एक बार मैं और किशोर जैन उनके घर गए। शायद कोई इंटरव्यू लेने का इरादा था। किशोर जैन ने उनके विषय में कुछ लिखा था, उसे भी वे दिखाना चाहते थे। लिखा हुआ देखकर वे कहने लगे- नाटक करने की क्या जरूरत है। नाटक करिबो ना लागे। जीवन में और साहित्य में वे नाटकीयता और गिमिक्स के सख्त विरोधी थे। चश्मा लाने अंदर गए तो चश्मे का प्रसंग याद आ गया। कहने लगे कि शिवसागर में चश्मा भूल गया था। फिर पीछे-पीछे गाड़ी दौड़ाकर लड़कों ने (कवि सम्मेलन के आयोजकों ने) मोरान में मुझे चश्मा दिया। बुरा भी लगता है लड़कों को लेकर। वे अपने भुलक्कड़ स्वभाव को कोसने लगे।

हमने कहा कि वे अपनी एक-दो कविताएं दे दें हिंदी में अनुवाद कर उनके साक्षात्कार के साथ लगा देंगे। उन्होंने एक कविता निकाल कर दी और कहा-कीजिए, इसका अनुवाद मेरे सामने ही कीजिए। हम दोनों भिड़ गए। हीरू दा की कविताएं छोटी-छोटी होती हैं, भाव भी स्पष्ट होता है, बोधगम्य होती हैं, लेकिन शब्दों के चुनाव में वे काफी सावधान रहते हैं। शब्दों की बात चली तो वे कहने लगे- दिल्ली में एक साइन बोर्ड पर लिखा था ""आम लोगों के लिए नहीं''। तब तक मैं आम का अर्थ एक फल के रूप में ही जानता था। काफी सोचा। आम लोगों के लिए नहीं-क्यों नहीं। फिर आम किसके लिए है। बाद में किसी ने बताया कि आम का मतलब साधारण भी होता है तब बड़ी हंसी आई। उनकी कविताओं में असमिया लोकजीवन से शब्द आते हैं। संस्कृत, तत्सम शब्दों से वे परहेज करते हैं। उन्हें यही डर रहता था कि अनुवादक संस्कृतनिष्ठ और तत्सम शब्दों से भरकर उनकी कविता का रंग-रूप बिगाड़ देंगे। गांव की गोरी अनगढ़ ढंग से लिपिस्टिक लगाएगी तो उसका चेहरा बिगड़ेगा या निखरेगा। एक-एक शब्द पर वे चर्चा करते रहे। - कोई दूसरा शब्द सोचिए- ठीक है बांग्ला का शब्दकोश देख लेते हैं। एक शब्द था ""गोमा आकाश''। बादल छाए आसमान के लिए ये शब्द प्रयुक्त होते हैं। ""गोमा'' के लिए कोई उचित शब्द उस समय नहीं मिला। "मेघाच्छादित' जैसा शब्द देने का तो सवाल ही नहीं था। शाम का वक्त था हमने कवि से विदा मांग ली। बाहर बरामदे में निकले तो देखा कि बादल छाए हुए हैं, मैंने कहा, ""आकाश गोमा हो रखा है।'' कवि हंस दिए।

पिछले साल प्रेस में मिल गए। अपने नए संकलन को लेकर व्यस्त थे। आमुख की सज्जा स्वयं ही डिजायनर के पास बैठकर करवा रहे थे। भाषा, शब्द और वर्तनी को लेकर इतने सजग कि प्रकाशक मित्र दबी जबान में मेरे सामने अपनी खीझ व्यक्त किए बिना नहीं रह सके। काफी कमजोर हो चुके थे। फिर कहा, "चलिए, यह कविता अनुवाद कीजिए जरा।'' उनके साथ बैठकर अनुवाद करना एक अनूठा अनुभव होता था। लेकिन वे यह नहीं पूछते थे कि कहां छपवाएंगे, छपने पर दिखाइएगा। बस एक साथ बैठकर अनुवाद करने का आनंद लेते थे। बाद में कुरेदना उनकी आदत नहीं थी।

प्रकाशक मित्र ने कहा कि अभी चांदमारी में हम काफी पीने गए तो वहां बैयरे ने पहचान लिया। यह सुनकर हाल ही में अस्पताल से निकले कवि हंसने लगे, कहने लगे कि अस्पताल की नर्स भी कह रही थी आपको पहचानती हूं सर। हीरू दा की लोकप्रियता की बात ही अलग है। लेकिन कहीं न कहीं यह असमिया संस्कृति की महानता है जहां जनता अपने साहित्यकारों को अथाह प्यार देती है। भूपेन दा की बात छोड़ भी दें, तो अभी मामोनी रायसम गोस्वामी के निधन पर सारा असम रो पड़ा था। पिछले सप्ताह ही तो एक मंत्री का इंटरव्यू आया था कि वे मुख्यमंत्री नहीं बनना चाहते, हां एक बार असम साहित्य सभा का अध्यक्ष बनने की हसरत जरूर है।
  
साहित्य की समाज में जगह का प्रसंग चला तो ""कभी-कभार'' में अशोक वाजपेयी की लिखी ये पंक्तियां याद आ गईं- ""क्या थे वे सपने? एक तो यही था कि हमारे समय और समाज में साहित्य की जगह और जरूरत बढ़ेगी। हम जानते थे कि हिंदी समाज, जो भी कारण हो, साहित्यप्रेमी समाज नहीं है, पर हमने उम्मीद लगाई थी कि शिक्षा और साक्षरता के विस्तार से साहित्य के पाठक बढ़ेंगे। ऐसा नहीं हुआ ः पढ़ा-लिखा मध्यम वर्ग समृद्धि की अपनी निर्लज्ज चाहत में अपनी मातृभाषा और साहित्य से दूर होता चला गया, जा रहा है। हमारे विश्वविद्यालयों में और अन्यत्र भी हिंदी साहित्य की प्रतिष्ठा कम होती गई है। हालत यह है कि हिंदी अखबारों में ही हिंदी भ्रष्ट हो रही है और उनमें साहित्य के लिए जगह सिकुड़ती जा रही है।''

ऐसा नहीं है कि असमिया समाज में असमिया भाषा के भविष्य को लेकर कम चिंता है और सभी आश्वस्त हैं। यहां भी नई पीढ़ी के असमिया लिखना-पढ़ना नहीं जानने को लेकर गंभीर विमर्श जारी है। लेकिन असमिया में जो स्थिति है उसकी हिंदी से तुलना ही नहीं है। टीवी पर जब दसवीं और बारहवीं के टापर्स के बाइट्‌स आते हैं तो ऐसे बहुतेरे होते हैं जो यह कहते हैं कि हम खाली समय में होमेन बरगोहाईं या रीता चौधरी के उपन्यास या नवकांत बरुवा की कविताएं पढ़कर तरोताजा होते हैं। हिंदी में तो ज्ञानपीठ प्राप्त साहित्यकार को भी टीवी वाले पहचानने से इनकार कर देते हैं। हिंदी की युवा पीढ़ी में दोयम दर्जे के अंग्रेजी उपन्यास मूल अंग्रेजी में या हिंदी अनुवाद के रूप में लोकप्रिय हैं।

मैंने हीरू दा के साथ बैठकर उनकी दो कविताओं में प्रयुक्त असमिया शब्दों के लिए ठीक-ठाक हिंदी प्रतिशब्द खोज लिए। आज भी शाम हो रही थी। हवा में खुनकी बढ़ रही थी। तभी कवि का मोबाइल बज उठा। घर से फोन आया था-दवा समय पर ले ली या नहीं। और हां शाम हो रही है, साथ में भेजी गरम चादर ओढ़ लें। कवि ने झोले से गरम चादर निकाल ली। हंसकर मुझसे कहने लगे- घर वाले चिंता करते हैं। सोचते हैं मैं चादर ओढ़ना भी भूल जाऊंगा। आप ठीक कहते हैं हीरू दा आप भुलक्कड़ नहीं हैं। आप हमारी भावनाओं को पंख लगाना भूल थोड़े जाएंगे।   

(गत 4 जुलाई को कवि हीरू दा का निधन हो गया। वे 80 वर्ष के थे।)

बुधवार, 4 जुलाई 2012

एयरपोर्ट पर तीन मिनट और मीडिया से परहेज



प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और सोनिया गांधी के असम के बाढ़ पीड़ित इलाकों का हवाई सर्वेक्षण करने के बाद गुवाहाटी में मीडिया को ब्रीफ करने का कार्यक्रम था। मुख्यमंत्री सहित असम सरकार के नुमाइंदों के साथ एयरपोर्ट पर ही एक बैठक हुई और इसके बाद प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह, यूपीए अध्यक्ष सोनिया गांधी और मुख्यमंत्री तरुण गोगोई उनके इंतजार में बैठी मीडिया के पास आए। प्रधानमंत्री ने अपने अधिकारियों द्वारा तैयार किया गया एक बयान पढ़ा जिसमें खबर लायक एक ही बात थी कि केंद्र सरकार ने फौरी तौर पर बाढ़ सहायता के लिए पांच सौ करोड़ रुपए मंजूर किए हैं। इस तरह मुश्किल से तीन मिनट में अपना काम निपटा कर मनमोहन सिंह, सोनिया गांधी और तरुण गोगोई बिना पत्रकारों के किसी भी सवाल का जवाब दिए वहां से चले गए।

प्रधानमंत्री के इस व्यवहार ने एक बार फिर यह प्रश्न जेहन में ताजा कर दिया है कि आखिर वे मीडिया के साथ विचारों का आदान-प्रदान करने से इतना परहेज क्यों करते हैं? आखिर वे असम के दौरे पर क्यों आए? यही बताने के लिए न कि असम की विपत्ति के समय नई दिल्ली भी उनके साथ खड़ी है और उन्हें हर तरह की आर्थिक तथा अन्य तरह की मदद देकर उसकी परेशानियां दूर करने के लिए तैयार है! यदि यह सही है तो जनता कोे यह बताने के लिए मीडिया के अलावा उनके पास और कौन सा जरिया है।

कुछ महीनों पहले जब इस बात को लेकर उनकी ज्यादा ही आलोचना होने लगी थी कि वे जनता के साथ सीधे या मीडिया के माध्यम से विचारों का आदान-प्रदान नहीं करते, तब उनका नया प्रेस सलाहकार नियुक्त किया गया। इसके बाद शुरुआत के तौर पर चार चुनिंदा वरिष्ठ पत्रकारों को उन्होंने मुलाकात के लिए बुलाया और उनके साथ लंबा वार्तालाप किया। लेकिन लोगों की यह धारणा गलत निकली कि यह एक शुरुआत मात्र है। वह शुरुआत ही लगता है अंत थी। क्योंकि उसके बाद इस तरह मीडिया के साथ मिलने का कोई कार्यक्रम बाद में नहीं रखा गया।

कहीं बाहर दौरे पर जाने पर हवाई जहाज में अपने साथ गए पत्रकारों के साथ या जहां जाते हैं वहां के स्थानीय पत्रकारों के साथ वार्तालाप के माध्यम से जहां प्रधानमंत्री जनता को यह बता सकते हैं कि सरकार की सोच क्या है, वहीं पत्रकारों के प्रश्नों के माध्यम से जनता की नब्ज भी जान सकते हैं।

इस सरकार की सबसे बड़ी जो कमी अब दिन पर दिन ज्यादा से ज्यादा से खटकने लगी है वह है इसके मुखिया मनमोहन सिंह और सत्ता से दूर रहकर सत्ता संभालने वाली सोनिया गांधी की जनता के प्रश्नों का सामना करने से परहेज करने की प्रवृत्ति। शत्रु को देखते ही रेत में मुंह छिपा लेने वाले पक्षी वाली कहावत इन दोनों पर सटीक बैठती है। हालांकि उन्हें यह समझना चाहिए कि मीडिया शत्रु नहीं है। उल्टे यह उन्हें जनता के साथ संपर्क स्थापित करने का एक अवसर प्रदान करता है। लोकतंत्र में जनता के साथ लगातार सीधे संवाद बनाए रखने का भी अपना महत्त्व है। इसे आप नजरंदाज नहीं करते हुए यह नहीं कह सकते कि हम अपना काम बेहतर तरीके से कर रहे हैं लोग जो सोचते हैं सोचते रहें। आपको अपना नजरिया भी लोगों के सामने लगातार रखते रहना पड़ेगा। लोगों के साथ रिश्ता बनाए रखने के मामले में मुख्यमंत्री तरुण गोगोई माहिर हैं। शायद मुख्यमंत्री का दबाव नहीं होता तो प्रधानमंत्री और यूपीए अध्यक्ष असम का दौरा ही न करते। लेकिन वे कांग्रेस के बुरे समय में लगातार तीसरी बार जीत हासिल करने वाले मुख्यमंत्री को हर तरह से खुश रखना चाहते हैं। हो सकता है एक-दो ही दिन में मुख्यमंत्री प्रेस के प्रतिनिधियों को बुलाकर उस कमी की भरपाई करने की कोशिश करें जो प्रधानमंत्री और सोनिया गांधी के चुप्पे स्वभाव के कारण रह
गई है।

डिब्रूगढ़ के मनोहर वर्मा की टिप्पणी


विनोद रिंगानिया जी ने "शादियों में आडंबर...' का विषय उठाकर फिर समाज की दुखती रग पर हाथ रख दिया है। बहुविवाह के प्रसंग ने तो बड़ी उम्र के "बेचारे' कुंवारों को उदास ही कर दिया। एक अदद पत्नी का जोगाड़ बैठाने में उम्र ढलती जा रही है, वहां बहुविवाह की बात करना गाली जैसा लगता है। ऊंचे संपन्न समझे जाने वाले घरानों को अपनी हैसियत से निचले पायदान पर उतरकर लड़की वालों के यहां प्रस्ताव भिजवाने पड़ रहे हैं। पैसे के बल पर सब कुछ हो जाता तो ऐसी परिस्थितियां क्यों आती? इतना ही नहीं, न चाहते हुए भी समाज अब अंतर्जातीय विवाहों के पक्ष में तैयार होने लगा है। यह परिवर्तन क्या उपायजन्य है? नहीं, लड़कियों के स्थान पर लड़कों की पैदाइश की चाह ही इस दुष्प्रवृत्ति का कुफल है। आज के दिन लड़कियों और उनके अभिभावकों की मानसिकता में भारी बदलाव आया है। अमीर घरानों की चाहत पीछे छूट गई है।

शादियों में आडंबर ने खर्च तो बढ़ाए ही हैं। पूरे समाज की समरसता को भी चोट पहुंचाई है। सब कुछ ठेके पर नाटकीय ठाठ-बाट सज जाते हैं, परिवार के सदस्य म्लान चेहरों पर झूठी मुस्कुराहट के टेटू गुदवाए लकदक पोशाकों में भावहीन पुतले से लगते हैं। जब से पहले की भांति संपर्क बढ़ानेवाले सामाजिक बंधुओं के श्रम-सहयोग की अपेक्षा नहीं रह गई है तब से आत्मीयता का भी अवसान हो गया है। शादी का आयोजन मांगलिक कहलाता तो है, पर कहीं से भी मंगल ध्वनि और यज्ञिक शुभता की सुवास हमारी ग्राह्य-इंद्रियों को सुखद उत्तेजना नहीं दे पाती। मुहूर्त, अमुहूर्त में बदल जाता है। समधियाने की मीठी गालियों और गीतों की रसिकता का स्थान कर्कस आर्केस्ट्रा पर फिल्मी कामुक आइटम-सोंग और उनकी नकल ने ले लिया है।

अब जरा खाने-पीने की तरफ दृष्टि डालते हैं। तरह-तरह के ठंडे-गरम ड्रिंक्स, हाई-टी के नाम पर चाट-पकौड़े, गोल-गप्पे, फलों के कत्तले, खाने में नाना प्रकार के सलाद, मिठाइयां चप, कचौड़ियां, समोसे, चाइनीज अनेकों आकार-प्रकार की रोटियां, दालें, सब्जियां, पुलाव, चावल, कढ़ी, रायता, पापड़, अचार, चीप्स और फिर आइस्क्रीम, क्या नहीं होता? छप्पन भोग की मर्यादा छोटी पड़ गई है, गरिष्ठ पकवानों के शतक सजने लगे हैं। कोई भोजन-भट्ट भी इन सब पकवानों को चखने का पुरुषार्थ नहीं दिखला सकता। लोग दस चीजें भी तबियत से खा लें तो गनीमत समझें। होने को तो बहुत कुछ होता है, परंतु स्वाद और सत्कार दोनों नदारद रहते हैं। सजावटी नकली फूलों की तरह व्यंजन भी सजावटी और नकली से लगते हैं। बची खाद्य-सामग्री का दूसरे दिन तो कोई उपयोग ही नहीं। उपलब्धि के नाम पर एक मेले की सी रेल पेल को वीडियो कैमरे में कैद कर के सहेज लिया जाता है। काश, दस-बीस ही व्यंजन हों पर खाने योग्य हों और साथ में हो आतिथ्य की गरिमा। यह बिना फिजूलखर्ची और आडंबर के हो सकता है। इसलिए कहा गया है-

करिए काज हिसाब से, जासो सुधरे काज।

फीको थोड़े नून ते, अधिक ते खारो नाज।।

कुरीतियों और आडंबर पर नियंत्रण संभव हो सकता है, परंतु प्रारंभ में सादगी के उदाहरण संपन्न और समझदार लोगों को रखने चाहिए। मैं उदाहरण के लिए कहना चाहूंगा कि हमारे यहां डिब्रूगढ़ में मृत्यु-भोज में गरीब-अमीर सभी के यहां एक-सी रसोई बनती है- दिलकुसार, भुजिया, कचौड़ी या दही बड़ा और सब्जी-पूड़ी बस। बड़े-बूढ़ों की पंचायत में बनाए गए इस पचासों वर्ष पुराने मेनू को भंग कर के आडंबर दिखाने का प्रयास अभी तक तो किसी ने नहीं किया। चाहें तो विवाह समारोहों में भी थोड़े हेर-फेर के साथ ऐसा हो सकता है, यदि समाज लोगों पर दबाव बना सके। पूरे समाज की एक सभा बुलाकर निर्णय लिया जाए। निर्णय को प्रचारित किया जाए। फिर समाज की अवहेलना करते हुए जो आडंबर दिखलाए उनका विनम्रतापूर्वक बहिष्कार होना चाहिए। जो नियमों का पालन करे उसको सम्मानित किया जाए।

- मनोहर वर्मा

डिब्रूगढ़

फोन. 9435330298