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Journalist and writer, Writes on Northeast India, Bangladesh, Myanmar

रविवार, 19 जून 2016

बर्लिनः दीवार को भूल नहीं पाएगी एक पीढ़ी



जर्मनी की राजधानी बर्लिन में उतरकर वैसा कोई कल्चर शॉक नहीं लगा जैसा कहते हैं पश्चिमी लोगों को एशियाई शहरों, खासकर भारत, में आते ही लगता है। खासकर भारत में आते ही यहां की आबादी उन्हें चौंका देती है। उन्हें सपने में भी यह आभास नहीं होता कि एक देश में इतने लोग हो सकते हैं। हर कहीं कतारें और लाइनें। आपाधापी। यूरोप में ऐसा कुछ नहीं होता। जर्मनी में भी नहीं था।


 इसका हमें पहले से अहसास था। शायद इसीलिए कल्चर शॉक से बच गए। हमारे यहां की तरह आपाधापी नहीं होने के कारण लगता है सबकुछ ठहरा हुआ है। हमारे यहां किसी छुट्टी या हड़ताल के दिन ही इतनी शांति होती है (या उस दिन भी नहीं होती), इसलिए दिमाग में यह बस गया है कि शांति यानी सबकुछ ठहरा हुआ। आपाधापी, धक्कामुक्की, चिल्लपों – यानी सबकुछ तेज गति से चल रहा है। तेज प्रगति।

30 लाख की आबादी वाले बर्लिन में साइकिल वालों की अच्छी खासी तादाद है। साइकिल चलाने के लिए सड़कों के किनारे ही कॉरीडोर बने हुए हैं। ये सड़क से थोड़ा ऊंचे होते हैं, ताकि गाड़ी उस पर न चढ़ पाए, लेकिन इतने भी ऊंचे भी नहीं कि साइकिल से आसानी से सड़क पर नहीं उतरा जा सके। पहली बार पश्चिम जाने वाले किसी भारतीय के लिए हैरत में डाल देने वाली पहली चीज होती है वहां की यातायात व्यवस्था।




 सबकुछ इतना व्यवस्थित कि आप दो-तीन घंटे में ही किसी को भी पूछे बिना वहां अकेले घूमने-फिरने लायक हो जाते हैं। एक ही टिकट से आप मेट्रो, बस और ट्राम में यात्रा कर सकते हैं। मेट्रो से उतरकर बस में चढ़ जाएं, आगे बस नहीं जाती हो तो ट्राम में चढ़ जाएं। बार-बार टिकट कटवाने का झंझट नहीं। पूरे दिन का टिकट कटा लें तो फिर दोनों तरफ जितनी इच्छा यात्रा करें। इसी पैटर्न पर सिंगापुर की यातायात व्यवस्था है।

 इसीलिए उसे पूरब का यूरोपीय शहर कहते हैं। शहर में यातायात के लिए दिन भर के टिकट का 7 यूरो लगता है जबकि महीने भर के पास की कीमत लगभग 80 यूरो है। भारतीय रुपए में बदलें तो यह 6000 रुपए होता है जोकि हमारे लिए बहुत अधिक है।

 लेकिन यदि कीमतों का अंतर समझना है तो एक यूरो को 20 से गुणा करना चाहिए, क्योंकि 20 रुपए में हम जितनी सामग्री खरीद पाते हैं उतनी सामग्री की कीमत वहां लगभग 1 यूरो है। इसे परचेजिंग पॉवर पैरिटी कहते हैं। यह किसी शहर में महंगाई के स्तर को जानने के लिए आसान तरीका है। इस तरह शहर में ट्राम-बस-मेट्रो का संयुक्त मासिक टिकट करीब 1600 रूपयों का हुआ।

 हालांकि पति और पत्नी एक ही पास का इस्तेमाल कर सकते हैं लेकिन फिर भी यह हमारे यहां के लिए बहुत ज्यादा है। क्या इसीलिए हमारे यहां शहरी यातायात व्यवस्था इतने खस्ताहाल में है? क्योंकि व्यवस्था पर जितना खर्च होता है उतना सेवा लेने वालों से वापस नहीं मिलता। अंततः घाटे की भरपाई के लिए सरकार पर निर्भर होना पड़ता है। लेकिन सेवा देने वाली एजेंसी के पक्ष में एक चीज जाती है कि हमारे यहां मेट्रो, बस या ट्रेन किसी भी समय खाली नहीं जाती।

 इसलिए एजेंसी को लागत की पूरी कीमत वापस मिल जाती है। और खड़े होकर, लटक कर यात्रा करने वाले यात्रियों से मिलने वाले पैसे को अतिरिक्त आय समझ लीजिए। वहां कभी भी किसी ट्राम, बस या मेट्रो में मैंने आधी से ज्यादा सीटें भरी हुई नहीं देखी। ट्रेन का टिकट कटवाते समय आपसे पूछा जाएगा कि क्या आप रिजर्वेशन चाहते हैं। यानी ज्यादातर लोगों को रिजर्वेशन की जरूरत नहीं होती।

मुझे लगा कि आप बर्लिन में आंख मूंदकर भी सड़क पर चल सकते हैं। बस सामने ट्रैफिक की हरी और लाल बत्तियों को देखकर चलते रहिए। किसी भारतीय को शुरू शुरू में अजीब लग सकता है कि दूर-दूर तक कोई गाड़ी नहीं होने के बावजूद पैदल लोग बत्ती के हरी होने का इंतजार करते हैं। बत्ती लाल से हरी होने के बाद ही सड़क पार करते हैं।

 एक छोटा बच्चा भी ट्रैफिक की बत्तियों को देखते हुए आसानी से एक जगह से दूसरी जगह जा सकता है। विएना में ट्रैफिक की बत्तियों के ऊपर कैमरे लगे थे। लेकिन हर शहर में औह हर जगह कैमरे नहीं लगे हैं। लोग सिर्फ कैमरों के डर से नियमों का पालन नहीं करते बल्कि वह उनकी आदत में शुमार हो गया है।

म्यूजियमों से भरे बर्लिन में एक म्यूजियम ट्रैफिक की बत्तियों का भी है। ट्रैफिक के सिपाही को वहां एम्पलमैन कहा जाता है। इसलिए इस म्यूजियम का नाम एम्पलमैन्स म्यूजियम है। यहां ट्रैफिक की पुरानी डिजाइन की बत्तियों के अलावा यादगार के लिए संग्रहणीय विभिन्न तरह की सामग्रियों – जैसे कलम, ग्रीटिंग कार्ड, बटुआ, तस्वीरें, टोपियां – को ट्रैफिक की बत्तियों की थीम पर बनाया गया है। सैलानियों के संग्रह के लिए अच्छी चीज है।

एक म्यूजियम का नाम है स्पाई म्यूजियम है। हिटलर और बाद में पूर्वी जर्मनी के कम्यूनिस्ट शासन में चले अत्याचार में खुफिया पुलिस की खास भूमिका रही थी। दरअसल तानाशाही और खुफिया पुलिस का चोली-दामन का साथ है। जहां भी तानाशाही है, राज्यसत्ता का अत्याचार है वहां खुफिया पुलिस की महत्वपूर्ण भूमिका है।

 दरअसल बर्लिन में घूमते हुए आप तीन चीजों को नहीं भूल सकते। हिटलर के समय यहूदियों पर हुआ अत्याचार, 1989 तक जारी रहा जर्मनी और बर्लिन का विभाजन तथा जर्मनी की संसद। जर्मनी की संसद बर्लिन के ठीक बाहर बनी है। जर्मनी में जब पहले पहले लोकतंत्र आया और संसद (रिख्सटाड) बनी तो बर्लिन के राजा ने कहा कि संसद बनाना ही है तो उसे बर्लिन राज्य के बाहर ही बनवाओ। वैसे ही जैसे घर के कूड़े को कोई घर के बाहर पड़ोस में फेंक देता है। बर्लिन का राजा लोकतंत्र को तो रोक नहीं पाया लेकिन संसद को अपने राज्य से बाहर जरूर कर दिया।

हेकेशर मार्केट में पहले के पूर्वी जर्मनी की साफ छाप दिखाई देती है। यहूदियों पर हुए अत्याचार की याद दिलाने वाला एक म्यूजियम है ओटो वाइट्ज का अंधों का कारखाना वाला म्यूजियम। ओटो वाइट्ज नामक जर्मन ने जूतों के ब्रश बनाने का एक कारखाना खोलकर उसमें अंधे यहूदियों को रोजगार दिया था ताकि उनकी जान बच जाए। हालांकि बाद में सभी यहूदी पकड़ लिए गए और उन्हें मार डाला गया।

 इस स्थान को एक म्यूजियम में तब्दील कर दिया गया है ताकि उस कहानी की यादगार सुरक्षित रहे। ओटो वाइट्ज स्पीलबर्ग की मशहूर फिल्म शिंडलर्स लिस्ट के शिंडलर का ही लघु संस्करण था। शिंडलर ने कोई दो-ढाई सौ यहूदियों की जान बचाई थी, जबकि ओटो वाइट्ज के कारखाने में करीब दो दर्जन कारीगर ही थे।

 म्यूजियम में ओटो के साथ सभी कामगारों की तस्वीर भी है। कारखाने के एक कोने में एक कमरा है जिसमें कोई खिड़की या रोशनदान नहीं है। इसमें जाने का दरवाजा एक कपड़ों की आलमारी के पीछे खुलता था। इसमें एक यहूदी परिवार को छुपाकर रखा गया था। हालांकि वह भी अंत में पकड़ा गया था। इस तरह की मन को द्रवित कर देने वाली कहानियां बर्लिन में बिखरी पड़ी हैं या कहें कि जर्मनों ने उन्हें संजोकर रखा है।


कोई अपने इतिहास के कलंकित पन्नों को भी किस तरह संजोकर (लेकिन उन्हें महिमामंडित करके नहीं) रख सकता है इसे जर्मनी से सीखा जा सकता है। बर्लिन की दीवार की याद को ताजा रखने के लिए कहीं-कहीं इस दीवार का एक हिस्सा बिना तोड़े सुरक्षित रख दिया गया है। कहीं-कहीं बीच रास्ते पर कंकड़ों से चिह्न बने हुए दिखाई दे जाएंगे जो यह बताते हैं कि यहां पहले दीवार थी।

 पेवमेंट पर चलते-चलते मेरा मित्र माइक मुझे अचानक नीचे एक छोटी-सी प्लेट दिखाता है। उस पर जर्मन भाषा में उस यहूदी परिवार का नाम लिखा है जो उस स्थान पर पहले रहा करता था। अब उस परिवार के सदस्यों ने इस्राइल से आकर उस स्थान को खोजा और वहां नीचे पटरी पर ही पुलिस के बिल्ले जितनी बड़ी वह प्लेट फिट कर दी। पता नहीं लोगों की ठोकरें खाकर वह प्लेट कब तक बची रहेगी।

रविवार, 12 जून 2016

पोट्सडम की धूप में इतिहास की झलक

आप चाहे तो यहाँ सुन भी सकते है 

यूरोपीय शहरों में सैलानी के तौर पर घूमने वाले यूरोपीय या अमरीकी नागरिकों के लिए आकर्षण का केंद्र वहां के दर्शनीय केंद्र होते हैं, जैसे म्यूजियम और पुराने ऐतिहासिक स्थल। लेकिन जहां तक मुझ जैसे भारतीय पर्यटकों का सवाल है तो सच्चाई यह है कि उनके लिए तो वहां की ट्रैफिक व्यवस्था, समाज व्यवस्था, वहां का आम वास्तुशिल्प, वहां का शिष्टाचार, वहां की ट्रेनें और बसें – ये सब अधिक आकर्षण का केंद्र होते हैं।

अपनी नौ दिन की यूरोपीय यात्रा के दौरान वहां के तीन देशों के चार शहर मेरे लिए नमूने के तौर पर थे और इन शहरों के माध्यम से मैंने यूरोप का अधिक से अधिक अपने अंदर सोखने की कोशिश की।

हर महीने यूरोप-अमरीका की यात्रा पर जाने वालों को यह परम स्वाभाविक लगता होगा कि वहां सड़कों पर आदमी बिल्कुल दिखाई नहीं देते। लेकिन पहली बार पश्चिम जाने वाले के लिए यह किसी सांस्कृतिक धक्के से कम नहीं होता। सड़कों पर इतने कम लोग कि किसी से कुछ पूछना हो तो आप पूछ ही नहीं सकते।

सड़कों पर लोगों की तादाद दिन के तापमान पर काफी हद तक निर्भर करती है। यदि ठंड कम हो तो आपको काफी लोग बाहर मिल जाएंगे वरना ठंड के कारण लोग अंदर रहना ही पसंद करते हैं। 

मौसम यूरोप में बातचीत का एक अहम मुद्दा होता है और अक्सर बातचीत शुरू करने का एक बहाना। हमारे यहां भी मौसम पर काफी बात होती है। लेकिन दोनों में एक फर्क है। हमारे यहां लगभग हमेशा यह कहा जाता है कि ओह, इतनी अधिक गर्मी इससे पहले नहीं पड़ी, या फिर पूर्वोत्तर के राज्यों में यह कहा जाता है इतनी अधिक बारिश पहले कभी नहीं हुई।

लेकिन हमारे यहां तापमान हमारी उम्मीद के अनुसार ही ऊपर-नीचे होता है। जबकि पश्चिमी मौसम का मिजाज पहचानना काफी मुश्किल होता है। आप कहीं दूसरे शहर में दो-तीन दिनों के लिए जाते हैं स्वेटर, जैकेट आदि लेकर और देखते हैं कि वहां तुषारपात यानी स्नोफाल शुरू हो गया। ऐसे में आपकी स्थिति काफी विकट हो जाती है।

मेरी यात्रा का महीना अप्रैल था और दिन के तापमान को 10 – 12 डिग्री के आसपास होना था। लेकिन वापसी के दिन तापमान तेजी के साथ गिरना शुरू हो गया। और वापस आने के बाद मित्रों ने मेल पर बताया कि तापमान काफी नीचे गिर गया और तुषारपात भी हुआ। 


पोट्सडम में सुहानी धूप का एक दिन
धूप को पश्चिम में प्रकृति के तोहफे के तौर पर लिया जाता है। अब समझ में आया कि क्यों पश्चिमी साहित्य में अक्सर ब्राइट सनी डे के बखान के साथ कोई बात शुरू की जाती है। धूप हमारे यहां की तरह वहां साल के बारहों महीने और रोजाना नहीं निकलती। इसलिए धूप निकलने पर उसका आनंद लेने का भी पश्चिम में रिवाज है। 

बर्लिन के पास पुराने प्रुशिया साम्राज्य की राजधानी पोट्सडम में जब मैं किराए की साइकिल से आसापास के इलाके की सैर करने निकला तो उस दिन सौभाग्य से अच्छी धूप निकली थी। पोट्सडम में देखा कि एक ग्रामीण सी दिखती नदी के किनारे लोग एक रेस्तरां के पास आरामकुर्सियों पर लेटे हुए धूप का आनंद ले रहे हैं। वहीं एक बीयर गार्टन में लोग बीयर की चुस्कियां लेकर समय बिता रहे हैं। 

जबकि यह कोई सप्ताहांत नहीं था। जर्मनी में बियर गार्टन की बड़ी महिमा है। चेस्टनट के पेड़ के नीचे घंटों तक बीयर की चुस्कियां लेते लोग आपको किसी भी धूप वाले दिन दिखाई दे जाएंगे।

पोट्सडम का नाम इतिहास में इसलिए भी दर्ज है कि वहीं द्वितीय विश्व युद्ध को समाप्त करने वाली संधि पर हस्ताक्षर हुए थे। विश्व के सभी बड़े राजनीतिक नेता वहां जमा हुए थे। स्टालिन भी आया था। पोट्सडम की किसी ग्रामीण-सी सड़क किनारे बने इन खूबसूरत (आम तौर पर दोमंजिला) भवनों में इन दिनों फिल्म स्टार रहते हैं। कहने का मतलब कि जिनके पास बहुत अधिक पैसा है वैसे लोग। 

जिस मकान में स्टालिन ठहरा था मैंने उसके सामने जाकर फोटो खिंचवाई। उस निर्जन सी सड़क का नाम कार्ल मार्क्स स्ट्रीट रख दिया गया है। पूर्वी जर्मनी के जमाने में यह नाम रखा गया था और दोनों जर्मनी एक होने के बाद भी नाम बदले नहीं गए। बार-बार नाम बदलना कोई अच्छी बात नहीं है। आखिर नाम के माध्यम से भी तो इतिहास का पता चलता है।

पोट्सडम के एक ओर पूर्वी जर्मनी पड़ता है और दूसरी ओर पश्चिमी जर्मनी। लेकिन नदी के पार भी कुछ हिस्सा एक-दूसरे के हिस्से का है। नदी पर जो पुल बने हुए हैं उसका भी आधा-आधा हिस्सा बंटा हुआ था। पुल पर किए गए हरे रंग के फर्क को साफ देखा जा सकता है। 

आधे पुल पर घटिया किस्म का रंग किया हुआ दिखाई देता है वह कम्यूनिस्ट पूर्वी जर्मनी की तरफ का हिस्सा था और दूसरे हिस्सा का रंग ज्यादा चमकदार है। मेरा मित्र माइक मुझे बताते चलता है कि यह देखो यहां-यहां दीवार थी। दीवार कहां-कहां थी उसके चिह्नों को सुरक्षित रखा गया है।

बर्लिन में दीवार की चर्चा के बिना कोई बात पूरी नहीं होती। एक ही शहर, एक ही जाति, एक ही भाषा बोलने वाले लोगों को सिर्फ राजनीति की वजह से अचानक दो भागों में बांट दिया जाता है। इस त्रासदी को हम भारतीय ठीक से नहीं समझ सकते। 

क्योंकि यहां भारत और पाकिस्तान के बंटवारे में दोनों तरफ की आबादी में सांस्कृतिक भेद था। कोई कुछ भी कहे लेकिन अविभाजित भारत के दोनों हिस्सों में ऐसे लोग बहुतायत में थे जो चाहते थे कि बंटवारा हो जाए और आबादी भी अदल-बदल हो जाए। जबकि जर्मनी का बंटवारा बिल्लियों को मूर्ख बनाने वाली बंदरबांट जैसी थी। 

इसलिए जर्मनी (या बर्लिन) के बंटवारे और भारत के बंटवारे में समानता नहीं खोजी जा सकती। जो भी हो, जर्मन लोगों ने इस कटु स्मृति को संजोकर रखा है ताकि आने वाली पीढ़ियां ऐसी त्रासदी को टालने के लिए तैयार रहें।

बंटवारे में मेट्रो ट्रेन (वहां बाह्न कहा जाता है) वहां पूर्वी जर्मनी के हिस्से में आई थी। वह शहर के हिस्से तक जाती और पूर्वी से पश्चिमी बर्लिन जाने वालों को जांच से गुजरना पड़ता। बहुत कम ही लोगों को पूर्वी से पश्चिमी बर्लिन जाने की इजाजत थी। 

जिस स्टेशन पर यह गाड़ियों की बदली होती थी उसे अब हाउस ऑफ टियर्स कहा जाता है, क्योंकि लोग अपने रिश्तेदारों को यहां आंसुओं के साथ विदा करते थे। अब इसे म्यूजियम बना दिया गया है। एक गाइड आपके पास आता है और कहेगा कि सबकुछ मुफ्त है लेकिन आप इतने यूरो दें और आपको और भी अधिक विस्तार से बताया जाएगा। आखिर बिजनेस कहां नहीं है।

मंगलवार, 24 मई 2016

असम में राजनीति के साइड इफेक्ट्स

असम ने भारतीय जनता पार्टी को अभूतपूर्व जीत दिलाकर एक चक्कर पूरा कर लिया है। यह चक्कर जय आई असम से शुरू हुआ और अब भारत माता की जय तक आकर पूरा हुआ है। जय आई असम का मतलब होता है असम माता की जय। असमिया साहित्य में इस नारे या वाक्य की उपस्थिति काफी पहले से है। ज्योतिप्रसाद अगरवाला की कविता से लेकर भूपेन हजारिका के गीतों तक जय आई असम की उपस्थिति हम पाते हैं। लेकिन यह नारा सबसे अधिक लोकप्रिय हुआ 1979 में जब असम के लोगों ने असमिया भाषा और संस्कृति को बचाने के लिए एक जबरदस्त आंदोलन छेड़ा था। इस असमिया डर कि पड़ोसी बांग्लादेश के कारण असम की भाषा और संस्कृति बस कुछ ही दिनों की मेहमान है 1979 में लोगों पर इस कदर हावी हो गया कि उसकी परिणति एक जबरदस्त आंदोलन में हुई। उसी आंदोलन की उपज आज की असम गण परिषद और प्रफुल्ल कुमार महंत हैं।

एक बात गौर करने लायक है कि इस जबरदस्त जनजागरण के बाद 1985 में जो पहला चुनाव हुआ उसमें जनजागरण का नेतृत्व करने वाली शक्ति असम गण परिषद (पार्टी आंदोलन के बाद बनी थी) को इतनी अधिक सीटें नहीं मिली थीं जितनी इस बार भारतीय जनता पार्टी और उसकी सहयोगी असम गण परिषद और बोड़ो पीपुल्स फ्रंट को मिली हैं। हमारा मानना है कि 1985 में असम में रहने वाले गैर-असमिया हिंदुओं तथा जनजातीय समुदायों ने असम गण परिषद का साथ नहीं दिया था जिसके कारण उसे असमिया राष्ट्रवादी आंधी के बीच भी एक-एक सीट के लिए संघर्ष करना पड़ा था। लेकिन इस बार भारतीय जनता पार्टी को इन दोनों समुदायों का भी पूरा समर्थन मिला। इसी की परिणति यह रही है कि पहली बार के लिए असम में किसी चुनावपूर्व गठबंधन को इतनी अधिक सीटें मिल पाईं। मतदान के पैटर्न में आए इस बदलाव को ही हमने जय आई असम से भारत माता की जय तक की यात्रा कहा है।

1985 का चुनाव असमिया पहचान को बचाने के मुद्दे पर लड़ा गया था। पड़ोस में बांग्लादेश के होने और वहां से आने वाले लोगों की सतत धारा के कारण यह मुद्दा काफी पहले से असम में होने वाले किसी भी विमर्श के केंद्र में रहा है। स्वाधीनता के पहले के लेखन में भी हम देखते हैं कि इस मुद्दे का काफी असर था। लेकिन चुनाव में शायद पहली बार 1985 में ही इस मुद्दे की केंद्रीय उपस्थिति रही। इसके बाद मुख्यमंत्री बने प्रफुल्ल कुमार महंत की नाकामयाबियों के कारण लोगों में निराशा फैली। इस निराशा का परिणाम दो तरह से सामने आया। राजनीति से पहचान का मुद्दा गायब हो गया। लोगों को लगने लगा कि अब शायद असमिया भाषा और संस्कृति को बचाने के लिए कुछ नहीं हो सकता। दूसरी ओर, उग्र विचारधारा के एक वर्ग ने अल्फा के माध्यम से अपने विचारों को अभिव्यक्त किया। उनका मानना था कि भारत के हिस्से के रूप में रहकर बांग्लादेशियों के खतरे से हम अपने आपको सुरक्षित नहीं कर सकते। हमें पूर्वोत्तर के दूसरे राज्यों के साथ मिलकर अपना अलग देश बनाना चाहिए। किसी समय असम में इस विचारधारा के समर्थक लोगों की अच्छी खासी संख्या थी। यह वह दौर था जब असम भारत माता की जय के ठीक विपरीत छोर पर खड़ा था।

असम की छवि उस विद्रोही युवक की थी जिसे हर किसी से शिकायत थी। वह अपनी समस्या से सिर्फ अपने बूते पर निपट लेना चाहता था। यह मानसिकता 1979 के असम आंदोलन से शुरू हुई थी। गैर-असमियाभाषी समुदायों के समर्थन की उस आंदोलन में आकांक्षा तो थी, लेकिन उसके दिल में उसके लिए कोई मूल्य नहीं था। यह समर्थन उसे सिर्फ अपने ऊपर लगने वाले संकीर्णता के आरोपों से छुटकारा पाने के लिए चाहिए था। उस दौर के राजनीतिज्ञों ने जय आई असम और भारत माता की जय को दो विपरीत ध्रुवों पर खड़ा कर दिया था। जब जय आई असम के नारे लगते तो चाय बागान के मजदूरों को यह डर सताता कि यह कहीं हमें वापस झारखंड और उड़ीसा भेजने के लिए तो नहीं है। बोड़ो जैसी जनजातियों को डर लगता कि यह कहीं हमारी भाषा को खत्म करने के लिए तो नहीं है।

1979 से शुरू हुआ असमिया पहचान का आंदोलन हालांकि 1985 में समाप्त हो गया लेकिन उसके पीछे काम करने वाली विचारधारा आगे भी जारी रही। यह विचारधारा अपने उग्र से उग्रतम दौर को देख चुकी है और असम उसकी परिणतियों को झेल चुका है। ऐसा भी दौर आया जब उग्रवाद के विरुद्ध चले सैन्य अभियान को लेखकों और पत्रकारों ने असम पर भारत के हमले के रूप में दर्शाने की कोशिश की थी। इस तरह असमिया पहचान को बचाए रखने की जद्दोजहद 1990 के बाद या तो उग्रवादियों के हाथ में चली गई या उसकी आग मंद पड़ गई। आम राजनीति से यह गायब हो गई। लेकिन पिछले करीब एक दशक से हम देखते हैं कि असमिया पहचान को बचाने की यह अकुलाहट फिर से असमिया जनमानस में दिखाई देने लगी। इसका एक कारण बदरुद्दीन अजमल के नेतृत्व में एक ऐसी पार्टी का असम में उत्थान होना था जिसका नेता जमीयत उलेमा ए हिंद जैसे शुद्ध रूप से धर्म आधारित संगठन के भी बड़े पद पर था। लोग आपसी बातचीत में यह चर्चा करने लगे कि क्या बदरुद्दीन अजमल एक दिन असम के मुख्यमंत्री बन जाएंगे। यह किसी व्यक्ति विशेष के विरुद्ध विद्वेष की अभिव्यक्ति नहीं थी बल्कि असम का राजनीतिक नेतृत्व असमियाभाषी समुदाय के हाथ से हमेशा के लिए छिन जाने की उस आंशका के सही होने के कगार पर आने की पीड़ा थी जिसके प्रति स्वाधीनता से पहले के बुद्धिजीवियों ने भी आगाह किया था।

इस समय असम गण परिषद और इसके नेता प्रफुल्ल कुमार महंत की साख कैसी थी इसका अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि अखिस असम छात्र संघ ने प्रफुल्ल कुमार महंत का सार्वजनिक स्थानों पर बहिष्कार करने का आह्वान कर रखा था। महंत असमिया समुदाय के लिए असहनीय हो गए थे क्योंकि उन्होंने अपने मुख्यमंत्रित्व काल में दर्जनों अल्फा उग्रवादियों के नेताओं के परिवार वालों का सफाया करवा दिया था। लोग अल्फा का समर्थन नहीं करते थे लेकिन रात के अंधेरे में नकाबपोश हत्यारे आएं और निरीह परिवार वालों का कत्ल कर जाएं यह भी लोगों के लिए अस्वीकार्य था।

ऐसे ही समय में खाली स्थान को भरने के लिए भाजपा राजनीतिक दृश्यपटल पर आई। भाजपा का असम में काफी पहले से काम चल रहा था। असम के चाय बगीचों में जिन्हें हाल तक कांग्रेस का गढ़ कहा जाता था भाजपा ने चुपचाप काम किया और बगीचे के कई पीढ़ियों से असम में रहने वाले आदिवासी मूल के मजदूरों को कांग्रेस से विमुख कर दिया। जिन समुदायों को असम गण परिषद अपने उत्कर्ष के दिनों में भी अपने साथ नहीं कर पाई वे समुदाय बड़ी आसानी से भाजपा के साथ आ गए। इनमें बंगाली हिंदुओं का नाम लिया जा सकता है क्योंकि पूर्वी पाकिस्तान या बांग्लादेश से आने वाले लोगों हिंदुओं को भारत में शरणार्थी का दर्जा देने का ऐलान भाजपा ने ही किया है। इसकी अस्सी और नब्बे के दशक के उन दिनों से तुलना की जानी चाहिए जब असमिया राष्ट्रवाद का मतलब ही बंगाली हिंदुओं का विरोध करना था।

पिछले दो-तीन सालों से साफ लगने लगा था कि असम में अब मौका मिलते ही लोग भाजपा को सत्ता सौंप देंगे। इसका संकेत पालिका चुनावों और दो साल पहले हुए लोकसभा चुनावों में मिल चुका था। इसका कारण कांग्रेस का दूसरा विकल्प न होना तो था ही, असमिया समुदाय को यह भी लगने लगा कि उसकी पहचान की लड़ाई भारत माता की जय कहकर अधिक प्रभावी ढंग से लड़ी जा सकती है। किसी भी चुनाव के बाद समाज में कटुता फैलने के उदाहरण कई हैं लेकिन असम में हमें यह संभावना दिख रही है कि इन चुनावों के बाद समाज के विभिन्न हिस्सों में एकता बढ़ेगी। धार्मिक आधार पर चुनावों के पहले ध्रुवीकरण निःसंदेह हुआ है लेकिन असमिया समुदाय स्वाभाव से सांप्रदायिक नहीं है इसलिए एक उम्मीद भी है। दूसरी ओर, विगत वर्षों में असम को कई स्तरों पर ध्रुवीकरण के कटु अनुभव से गुजरना पड़ा है। उच्च वर्ण बनाम जनजातीय ध्रुवीकरण, असमिया बनाम गैर-असमिया ध्रुवीकरण जैसे ध्रुवीकरण समाज के लिए घातक तो रहे ही हैं, असमिया पहचान को सुरक्षित करने के एजेंडा को आगे ले जाने में भी सहायक नहीं हुए हैं। असम में भाजपा सरकार के आने के बाद यदि मूल असमिया समुदाय में यह भावना प्रबल होती है कि हमें अपनी समस्याओं का हल जनजातीय समुदायों, गैर-असमियाभाषी समुदायों, चाय बगीचा मजदूर समुदाय और केंद्र सरकार के सहयोग के साथ करना है, तो इसे राजनीति का अच्छा साइड इफेक्ट ही कहा जाएगा।