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Journalist and writer, Writes on Northeast India, Bangladesh, Myanmar

शनिवार, 20 जुलाई 2013

राजनीति में अच्छे लोग और ट्यूलिप

बांग्लादेश की प्रधानमंत्री शेख हसीना की एक बहन लंदन में रहती हैं। उनका नाम है शेख रेहाना। जब मुजीबुर्रहमान की हत्या हुई थी तब वे जर्मनी में थीं। उसके बाद उनका जीवन काफी कष्ट और संघर्ष से होकर गुजरा। वे बाद में लंदन आ गईं और वहां किल्बर्न नामक इलाके में दो जून के खाने तक का इंतजाम करने के लिए काफी कष्ट किया। बाद में उनका वहीं के एक डाक्टर सिद्दिक से विवाह हो गया। उनके एक बेटी ट्यूलिप है। ट्यूलिप उच्च शिक्षित और आत्मविश्वास से लबरेज युवती है। लेबर पार्टी ने 2015 में होने वाले हाउस आफ कामन्स के चुनाव के लिए किल्बर्न इलाके से ट्यूलिप को मनोनीत किया है। किल्बर्न में बांग्लादेशी मूल के लोगों की अच्छी आबादी है और ट्यूलिप को अपनी जीत का पूरा विश्वास है। वह अपनी मां के साथ अभी से जनसंपर्क अभियान पर निकल पड़ी है।

जिस बात की ओर हम ध्यान आकर्षित करना चाहते हैं वह यह है कि ब्रिटेन में किस तरह राजनीतिक दल दो साल पहले ही अपने उम्मीदवार तय कर देते हैं ताकि वे अपने चुनाव क्षेत्र में जीत हासिल करने के लिए योजनाबद्ध तरीके से काम कर सकें। हमारे यहां अक्सर शिकायत सुनाई देती है कि राजनीति में अच्छे लोग नहीं आते। इसके जायज कारण हैं। हमारे यहां किस चुनाव क्षेत्र से कौन चुनाव लड़ेगा इसका फैसला ऐन वक्त पर किया जाता है। इसमें कोई निर्धारित तरीका नहीं होता। पार्टी के नेता अक्सर मनमानी करते हैं। कम्युनिस्टों को छोड़कर यह बात हर पार्टी पर लागू होती है। ऐन चुनाव के वक्त पर कुछ लोग थैली लेकर मैदान में कूद पड़ते हैं और जो बेचारा कार्यकर्ता टिकट की आस में पांच साल से काम कर रहा था उसे परे धकेल कर खुद टिकट झटक ले जाते हैं। ऐसे अनिश्चित माहौल में अपवादस्वरूप ही अच्छे लोग राजनीति में आएंगे। अनिश्चित परिस्थितियों में वही लोग संघर्ष करना स्वीकार करते हैं जिनका और कहीं कुछ हो नहीं पाता है। अपने स्तर से नीचे उतर कर चमचागिरी भी ऐसे ही लोग कर पाते हैं। अरविंद केजरीवाल की आम आदमी पार्टी ने लीक से हटकर कुछ करने का वादा किया था। लेकिन उसने भी लोकसभा चुनावों के लिए अपने उम्मीदवार घोषित नहीं किए हैं। यानी वहां भी फैसला अंतिम समय में होने वाला है।

लंदन में ट्यूलिप बड़े आत्मविश्वास से कहती है कि मैंने अपने दम पर आज लेबर पार्टी का मनोनयन हासिल किया है। आज बांग्लादेश में मुझे पार्टी का उम्मीदवार का बनाया जाता तो लोग सोचते कि उनकी प्रधानमंत्री मौसी परिवार राज चला रही हैं। लेकिन अच्छा है कि यहां लंदन में ऐसा आरोप नहीं लग पाएगा।

टिप्पणी Posted by MK (mmoohit@rediffmail.com)

अरविन्द केजरीवाल ने उम्मेदवार तय केरने की प्रक्रिया बहुत पेहले ही शुरु कर दी थी और अभी तक वो 30 नाम घोषित कर चुके है. बाकी भी हो जायेगे. पेहली बार नाम चुनने में टाइम तो लगता ही है. और सबसे बड़ी बात की लोग ही उम्मेदवार चुन रहे है.

टिप्पणी Posted by Anandakrishnan Sethuraman (sanantha.50@gmail.com)

भारत में चुनाव के उम्मेदवार रुपये और बदमाशी के आधार पर .एक ही दल में मतभेद. हर दल में कई लोग पदवी के लिये दल को तोड़ना चाहते हैं;मोदी के चुनाव में मत भेद,एडीयूरप्पा के कारण हार'.तमिलनाडु में विजयकांत के एम एल. ए. अलग हो गये; कांग्रेस में कितने विरोध है वासन,चिदंबरम ,तँगबालू;अपने ही पैरों पर कुल्हाड़ी डाल लेते हैं. आज कांग्रेस का समर्थन,कल जेयलाइता का ,फिर करुणानिधि का कम्युनिस्ट पार्त्य सभी नेताओं का विरोध ;सभी का समर्थन. ऐसे ही कयी दल लोगों को परेशान में डाल देते हैं; देश की और आम जनता की चिंता णाःएएण. जातीय दल,धार्मिक दल ,उसमें उपा दल ,देशी मूसलाब,सच्चा मुसलमान,भारतीय लाणगूगे स्पीकिंग मुसलमान,परिवर्तित ईसाई; हम भारतीय हैं ;भारत की उन्नति में हमारी उन्नति ऐसा विचार जब होगा,तभी भारत विश्व का सरताज होगा. ऐसे भारत की कामना खाऱेण्घे.ज़ाY हिन्द; जय भारत भक्ति.

रविवार, 16 जून 2013

पै अंग्रेजी ज्ञान बिन रहत हीन के हीन



हालांकि हम पर कभी लोहिया के अंग्रेजी हटाओ आंदोलन का प्रत्यक्ष प्रभाव नहीं पड़ा, लेकिन आज मैं एक स्कूली बच्चे की मानसिकता की सहज ही कल्पना कर सकता हूं जो अपने पाठ्‌यक्रम में से कोई एक विषय कम होने पर कितना उत्फुल्लित होता होगा। आज भी जब कोई हिंदीवादी या असमियावादी, या बोड़ोवादी अपनी भाषा के पक्ष में दलील देते हुए अपने से बड़ी भाषा-अंग्रेजी, हिंदी या असमिया- को कोसता है तो एक स्कूली बच्चा उनका सबसे बड़ा समर्थक होता होगा। उसे मातृभाषा के आंदोलन में अपना स्कूली बोझ कम होता दिखाई देता है। जब लोहिया ने "अंग्रेजी हटाओ' का नारा दिया तो भले उनका आशय अंग्रेजी को प्रशासन से, न्यायालय से और शिक्षा के माध्यम से हटाने का रहा होगा, लेकिन स्कूली विद्यार्थियों ने इससे एक ही बात समझी होगी कि अब हमें अंग्रेजी भाषा का भारी-भरकम ज्ञान निगलना नहीं होगा।

आज स्थिति काफी बदल चुकी है। आज अंग्रेजी हटाओ के लिए कोई जगह नहीं है। इसके उलट अंग्रेजी पल्प लिटरेचर का एक हस्ताक्षर आज के युवाओं के लिए सेलेब्रिटी है। पता नहीं राजनीतिक पार्टियों को यह बात समझ में आई है या नहीं कि हमारे देश के बहुभाषी होने की कीमत हम अंग्रेजी के रूप में चुका रहे हैं। जो भी हो, एक राजनीतिक कार्यक्रम के रूप में "अंग्रेजी हटाओ' या "हिंदी लाओ' जैसे नारों की उपयोगिता बिल्कुल समाप्त हो चुकी है।

अपनी भाषा को विकसित करने की इच्छा होना एक सहज स्वाभाविक इच्छा है। जिस तरह अपने देश को विकसित करने की इच्छा। लेकिन यह काम जिद भरे राजनीतिक आंदोलनों से नहीं हो सकता। इसके लिए कितने अध्यवसाय की जरूरत होती है, कैसी प्रतिबद्धता चाहिए, किस तरह एक-एक शब्द विकसित करना पड़ता है इस विषय में न जाकर हम इस विरोधाभास जैसी लगने वाली बात को रेखांकित करना चाहेंगे कि अपनी भाषा को विकसित करने की पहली शर्त होती है अपने से बड़ी भाषा का अच्छा ज्ञान होना। हिंदी के लिए यह बड़ी भाषा अंग्रेजी हो सकती है, असमिया के लिए हिंदी हो सकती है, इसी तरह बोड़ो के लिए असमिया हो सकती है। भाषणों में भाषाओं को बहनें कहा जाता है, जबकि व्यवहार में भाषाओं के बीच आपस में सौतनों जैसी ईर्ष्या होती है। अक्सर एक भाषा दूसरी भाषा से कुछ भी सीखने से साफ इनकार कर देती है। क्योंकि दूसरी भाषा से सीखना उसे अपने आत्मसम्मान के विरुद्ध लगता है। और किसी भाषा को अपने से बड़ी समझना? आप क्या बात करते हैं? भाषा के नाम पर हमारे देश में दंगे हुए हैं और आप कहते हैं किसी दूसरी भाषा को अपने से बड़ी भाषा मान लें!

जो भी हो, यदि आप हिंदी की स्थिति देखें तो पाएंगे कि यह भाषा पत्रकारिता, साहित्य, मनोरंजन, विज्ञापन और बोलचाल की भाषा बनकर रह गई है। आज जो ज्ञान का विस्फोट हो रहा है उससे हिंदी का दूर-दूर तक कोई रिश्ता नहीं है। इस बात को जांचने का एक आसान सा तरीका है गूगल का सर्च इंजन। मान लीजिए आप किसी साधारण से प्रश्न का जवाब खोजना चाहते हैं, उदाहरण के लिए आप यह जानना चाहते हैं कि शिमला में ठहरने के लिए कौन-सी अच्छी जगह है। यह जानकारी यदि आप हिंदी में खोजना चाहें तो आपको हो सकता है निराश होना पड़े। लेकिन अंग्रेजी में यदि खोजें तो तुरंत आपके सामने सूचनाओं की थाली सज जाएगी। ऐसी स्थिति में जो लोग अंग्रेजी नहीं जानते वे इंटरनेट का समुचित लाभ नहीं उठा पाते। उनके लिए सूचना क्रांति का आना और नहीं आना बराबर है। उसी तरह जिस तरह अंग्रेजी नहीं जानने वालों के लिए अमरीका में किसी नई धांसू किताब का निकलना और नहीं निकलना बराबर है।

एक राजनेता हाल ही में एक हिंदी संस्था के कार्यक्रम में गए। उनके भाषण का सार यह था कि हिंदी जरूर सीखनी चाहिए क्योंकि जितनी ज्यादा भाषाएं सीखी जा सकें उतना अच्छा है। यह वक्तव्य साफ दिखाता है कि उन्हें भाषाओं के आंतरिक विज्ञान के बारे में ज्यादा जानकारी नहीं है। क्योंकि अधिक से अधिक भाषाएं सीखना एक बात है, और एक ऐसी भाषा सीखना जिसमें विश्व का ज्यादा से ज्यादा ज्ञान एकत्र है बिल्कुल दूसरी बात है। कोई सीख सके तो अच्छी बात है, लेकिन आज जरूरत ज्यादा से ज्यादा भाषाओं के सीखने की नहीं बल्कि ज्यादा से ज्यादा ऐसी भाषा को सीखने की है जो समर्थ है, जिसमें विश्व का ज्ञान समाहित है। जो अपनी भाषा को अत्यधिक प्यार करता है उसके लिए भी अंग्रेजी का अच्छा ज्ञान अनिवार्य है। क्योंकि ऐसा नहीं होने पर वह स्वयं बहुत सारे ज्ञान से अछूता रह जाएगा, और दूसरे वह इस ज्ञान को अपनी भाषा में नहीं ला पाएगा।



बीटीएडी बनने के ठीक बाद एक बोड़ो सभा में जाना हुआ। श्रोताओं में से अधिकतर लोग बोड़ो और असमिया दोनों भाषाएं जानते थे क्योंकि वहां की आबादी मिश्रित आबादी थी। लेकिन बीटीएडी की कमान संभालने वाले नए-नए लोकतांत्रिक राजनीति में आए पूर्व उग्रवादी हाग्रामा मोहिलारी ने कहा कि बचपन से उन्होंने सिर्फ बोड़ो भाषा के माध्यम से पढ़ाई की है, इसलिए वे दूसरी भाषा नहीं जानते। उन्होंने अपना भाषण बोड़ो भाषा में ही दिया। यहां सवाल यह नहीं है कि हम उस भाषण को कितना समझ पाए। सवाल यह है कि उग्र मातृभाषा प्रेम ने हाग्रामा मोहिलारी जैसों की एक पूरी पीढ़ी को अपने आसपास की दुनिया से काट दिया। बोड़ो भाषा अपने विकास के शैशव काल में है। उसमें अभी दुनिया भर का ज्ञान और विद्याएं इकट्ठा नहीं हुए हैं। लेकिन यदि बोड़ो जानने वाले अच्छी असमिया, हिंदी या अंग्रेजी नहीं जानेंगे तो यह ज्ञान बोड़ो भाषा में कौन लाएगा? यह बात हर भारतीय भाषा पर लागू होती है। आज के दिन किसी भी भारतीय भाषा का प्रेमी यदि यह कहता है कि हमें अंग्रेजी की कोई जरूरत नहीं, तो वह अपनी भाषा का प्रेमी नहीं दुश्मन है।

देखें आलेख - अंग्रेजी मैया की जय (नीचे क्लिक करें)
http://binodringania.blogspot.in/2010/11/blog-post.html

मंगलवार, 23 अप्रैल 2013

मीडिया की औकात




असम के मीडिया के बारे में कहा जाने लगा है कि यहां जरूरत से अधिक मीडिया हो गया। जरूरत से अधिक अखबार छप रहे हैं, कई ऐसे हैं जो जीवन रक्षक दवाओं के सहारे चल रहे हैं लेकिन फिर भी चल रहे हैं। यही हाल चैनलों का है। कई ने ठीक से चलना भी नहीं सीखा कि उनके सामने अपने जनम-मरण का सवाल आ गया। कुछ लोगों को इनकी अधिक संख्या को लेकर आपत्ति है। कहते हैं इतने ज्यादा अखबारों और चैनलों की क्या जरूरत है। लेकिन हमारा मानना है कि बीस अखबार होना कोई बुरी बात नहीं है। क्योंकि भारत की तरह असम में भी विभिन्न समुदायों के लोग रहते हैं। उनके विभिन्न दृष्टिकोण हैं। जिस तरह राजनीति में विभिन्न राजनीतिक पार्टियां अपना अस्तित्व बनाए हुए हैं उसी तरह मीडिया में विभिन्न अखबार भी बने रहें तो क्या आपत्ति है। लेकिन सवाल है कि ये बीस अखबार क्या बीस दृष्टिकोण लेकर चल रहे हैं? क्या किसी एक सवाल पर इन अखबारों में बीस अलग-अलग पहलू निकलकर आते हैं? 

अफसोस की बात यही है कि ये बीस अखबार मिलकर एक अखबार का ही काम कर रहे हैं। असम में ऐसे लोग कम ही हैं जो किसी एक विषय पर अपनी सुचिंतित राय रखते हों। इसलिए अधिकांश अखबारों के संपादकीय पृष्ठों तक जाने की जरूरत ही नहीं होती। ये बीस अखबार मिलकर किसी एक भीड़ की तरह काम करते हैं। बातचीत के दौरान एक मित्र ने आरोप लगाया कि हाल ही में उभर कर आया एक "मसीहा' मीडिया की ही उपज है। हमने मित्र को समझाया कि हमारे यहां मीडिया कोई ऐसी चीज नहीं है जो अपने विवेक से निर्णय लेता हो। या जिसके कामों के पीछे कोई पूर्व परिकल्पना हो। यह एक भीड़ की तरह काम करता है। मान लीजिए किसी चौराहे पर कोई एक व्यक्ति कोई हंगामा कर रहा है या कोई हैरतअंगेज हरकत कर रहा है। वहां हमारे जैसे आते-जाने लोग उत्सुकतावश खड़े हो जाएंगे। यदि हंगामा दिलचस्प हुआ तो वहां काफी देर तक रहेंगे। और न हुआ तो आगे अपने काम के लिए निकल जाएंगे। अब हो सकता है कोई आरोप लगाए कि रास्ते पर आने-जाने वाले इन लोगों ने इस हंगामा खड़ा करने वाले की औकात इतनी बढ़ा दी है। लेकिन रास्ते पर गुजरने वाले लोगों ने सिर्फ अपने स्वभाव के अनुकूूल काम किया है। उसके काम के पीछे कोई योजना नहीं है।

यही बात हमारे आज के मीडिया पर लागू होती है। कहीं भी कोई हंगामा खड़ा हो जाए तो वहां मीडिया पहुंचकर उस घटना के महत्व को बढ़ाने में अनजाने में लग जाता है। इसके पीछे कोई योजना नहीं होती। वह एक भीड़ की मानसिकता से काम करता है। भीड़ किसी भी घटना की तह में जाने की कोशिश नहीं करती। यदि मारो-मारो कहकर किसी व्यक्ति को दो-चार लोग पीटने लग जाएं तो बाकी भीड़ भी उसे पीटने पर उतारू हो जाती है। वह उन शुरू में पीटने वाले लोगों की बात पर विश्वास कर लेती है कि पिटने वाला व्यक्ति चोर है।

मीडिया की इस मानसिकता का लाभ कई शातिर दिमाग वालों ने उठाया है। अपने प्रतिद्वंद्वी को फंसाने के लिए उसके विरुद्ध किसी तरह का आपराधिक मामला दायर कीजिए और इसके बाद मीडिया के अपने मित्रों को बुला लीजिए। अपने प्रतिद्वंद्वी को आप बदनाम तो कर ही देंगे साथ ही भविष्य में उसे तंग न करने की एवज में मोटी राशि भी ऐंठ सकते हैं। अधिकांश संवाददाता आज भी यह सोचते हैं कि थाने में रपट का होना ही किसी के विरुद्ध कुछ भी लिखने की पूरी आजादी दे देता है। इसका एक दूसरा रूप भी है। मान लीजिए किसी अस्पताल में किसी की अस्वाभाविक मौत हो गई। आप उस अस्पताल पर इलाज में लापरवाही बरतने का आरोप लगाते हुए वहां जाकर हंगामा कीजिए, साथ ही मीडिया के अपने मित्रों को बुला लीजिए, कैमरों के सामने कुछ तोड़-फोड़ कीजिए। मीडिया वालों के जाने के बाद आप अस्पताल के मालिकों के साथ मोटी रकम का लेन-देन कर सकते हैं। हमारे राज्य में यह एक अचूक नुस्खा है और मीडिया के सहयोग से भयादोहन एक कुटीर उद्योग का रूप लेता जा रहा है।

रोज एक "मसीहा' बनाने का आरोप लगाने वाले मित्र के सामने हमने अरविंद केजड़ीवाल का उदाहरण रखा। कल तक उसे मीडिया की उपज कहा जा रहा था। लेकिन अब जब वे दो सप्ताह तक अनशन पर बैठे रहे तो वही मीडिया कहां गायब हो गया। क्या मीडिया ने आपस में कोई मंत्रणा कर ली कि अब इस "मसीहा' को आगे नहीं दिखाना है। दरअसल इसका कारण है मीडिया की भीड़ मनोवृत्ति। कल तक केजड़ीवाल के तमाशे में रस मिल रहा था। इसे मीडिया वाले न्यूज वैल्यू कहते हैं। आज वह रस खत्म हो गया तो मीडिया भी मोदी बनाम राहुल के बेमतलब विमर्श में व्यस्त हो गया। दो सप्ताह तक अन्न-जल छोड़ने वाले केजड़ीवाल की ओर उसने झांका तक नहीं।

असम में इतने अखबार निकलते हैं लेकिन किसी भी राजनीतिक या सामाजिक प्रश्न पर किन्हीं दो अखबारों की राय में रत्ती भर भी फर्क नहीं मिलता। मीडिया राह चलतों की भीड़ की तरह उसकी ही ओर आकर्षित हो जाता है जिसके फेफड़े ज्यादा मजबूत होते हैं। जो अधिक ऊंची आवाज में चिल्ला सकते हैं। चीख-पुकार बंद होते ही वह भीड़ के लोगों की तरह अपने दूसरे काम पर निकल पड़ता है।

जहां तक असम के मीडिया की बात है, उसने तो सौ प्रतिशत अपने आपको राजनीतिक रूप से सही-सही कहने की सुरक्षित सीमाओं के बीच कैद कर रखा है। अखबारों पर कोई प्रत्यक्ष दबाव नहीं है लेकिन मीडिया का कुल वातावरण इतनी बौद्धिक धार वाला नहीं है कि वह किसी भी मुद्दे की विभिन्न कोणों से चीरफाड़ कर सके। उसकी इतनी औकात कहां कि वह मसीहा बना सके। वह खुद ही लोगों की नजरों से तेजी से गिर रहा है।
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