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Journalist and writer, Writes on Northeast India, Bangladesh, Myanmar
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शुक्रवार, 29 नवंबर 2013

सिंगापुर में है एक छोटा बांग्लादेश

सिंगापुर के बारे में भारत में लोग यह तो जानते हैं कि वहां की आबादी में अच्छा खासा हिस्सा भारतीयों का है। भारतीयों के अलावा वहां मलय और चीनी मूल के लोग रहते हैं। लेकिन ज्यादातर लोगों को यह नहीं पता कि वहां बांग्लादेशी लोग काफी संख्या में रहने लगे हैं। सिंगापुर का एक इलाका लिटिल इंडिया कहलाता है। यहां ज्यादातर दुकानें और होटलें भारतीय मूल के लोगों की हैं। कई दुकानें और होटलें काफी पुरानी हैं चौथे और पांचवे दशक की। जैसे कोमल विलास नामक रेस्तरां की कई शाखाएं सिंगापुर में हैं जहां शाकाहारी भोजन मिलता है। सिंगापुर में शाकाहारी भोजन का अच्छा खासा प्रचलन हैक्योंकि यहां भारतीय मूल के जो लोग रहते हैं वे अधिकतर शाकाहारी ही हैं। कोमल विलास की तरह ही आनंद भवन के रेस्तरां की शृंखला है जिसके अंदर शाकाहार का प्रचार करने वाली इबारतें भी लिखी रहती हैं।

कुल 54 लाख की आबादी वाले सिंगापुर में इस समय करीब सत्तर हजार बांग्लादेशी रहते हैं जो वर्क परमिट के आधार पर यहां आए हैं। ये लोग ज्यादातर निर्माण या साफ-सफाई के कामों में नियुक्त हैं। लिटिल इंडिया में जो मुख्य पथ है उसका नाम है सेरंगुन रोड। यहां आप कभी रविवार को जाएं तो आपको भीड़ के कारण रास्ते पर चलने में भी दिक्कत होगी। क्योंकि रविवार को सेरंगुन रोड पर समूचे सिंगापुर में रहने वाले बांग्लादेशी इकट्ठा होते हैं। यह उनके मिलने-जुलने की तय जगह है। एक जानकार बताते हैं कि रविवार को तकरीबन तीस हजार लोग यहां इकट्ठा होते हैं। सभी के हाथों में मोबाइल फोन होते हैं और सभी अपने किसी साथी-रिश्तेदार को फोन मिलाने में व्यस्त रहते हैं। उतनी भीड़ में वे चाहते हैं कि जिससे मिलने की इच्छा लेकर सेरंगुन रोड पर आए हैं वह यह जान ले कि ठीक किस जगह वह खड़े हैं। मिलने के स्थान अक्सर पार्क होते हैं। यहां ये लोग जमीन पर ही बैठ जाते हैं, या फिर पीछे की गली में किसी फुटपाथिया रेस्तरां के सामने जमीन पर।

साफ-सफाई के काम में नियुक्त एक बांग्लादेशी युवक को अमूमन 650 सिंगापुरी डालर की पगार मिलती है जो भारतीय रुपयों में लगभग 32,000 है। शनिवार को आधा दिन और रविवार को पूरी छुट्टी होती है। लेकिन सिंगापुर में जीवन निर्वाह का खर्च भी बहुत है। डालर मिलते हैं तो खर्च भी डालर ही होते हैं। इसमें से यदि कोई कामगार 200 डालर भी बचा ले तो वह उसके घर में करीब 14,000 मासिक बांग्लादेशी टाका के समान हो जाता है। बांग्लादेश में इस समय चल रहे औसत वेतन के लिहाज से यह अच्छी रकम है। ढाका के गारमेंट्‌स उद्योग में काम करने वाले एक औसत कामगार को तीन से चार हजार टाका के बीच वेतन मिलता है।

सिंगापुर में जहां भारतीय सैलानी खर्च करने के लिए जाते हैं वहीं बांग्लादेशी कमाने के लिए जाते हैं। इसीलिए मनी ट्रांसफर करने वाली एजेंसियां अपने पोस्टर और नामपट्ट तथा सूचना पत्र आदि बांग्ला में भी लिखवाने को काफी महत्व देती हैं। दुनिया भर से बांग्लादेशी अपने देश में धन भेजते हैं। इसलिए बांग्लादेश में कभी भी विदेशी मुद्रा की कमी नहीं होती। लिटिल इंडिया में कुछ इलाकों में बांग्लादेशियों का काफी आवागमन है। यह इलाका हालांकि पड़ता लिटिल इंडिया में ही है लेकिन इसे आप लिटिल बांग्लादेश भी कह सकते हैं। यहां की दुकानों में वह सामान आसानी से मिल जाता है जिसे बांग्लादेशी पसंद करते हैं। बांग्लादेशियों की पहली पसंद मोबाइल फोन होती है। मोबाइल की कीमत यहां बांग्लादेश से कम पड़ती है। इसके बाद टीवी का नंबर आता है। एक युवक अपने साथी के साथ काफी समय से एक टीवी को निहार रहा था। शायद वह सोच रहा होगा कि घर जाते समय यह टीवी खरीद कर ले जाऊंगा। बांग्लादेशी इलाके में आकर एक दो पान दुकानें दिखाई देती हैं, पान दुकानें हैं तो साथ में दीवारों पर चूने के दाग तो होने ही हैं। चमकती साफ-सफाई वाले सिंगापुरी बाजारों में वे धब्बे आंखों में चुभते हैं। एक रेस्तरां अपने ग्राहकों को बांग्ला भाषा में सूचना देता है कि यहां हंस का मांस मिलता है।

सिंगापुर की 54 लाख आबादी में से सिर्फ 34-35 लाख ही नागरिक हैं। नागरिकों के बाद स्थायी बासिंदों का नंबर आता है। इनके अधिकार नागरिकों से कम हैं। स्थायी बाशिंदों के बाद अस्थायी रूप से वर्क परमिट पर आने वाले लोगों का नंबर आता है। नागरिकता प्राप्त करने के लिए कुछ शर्तें पूरी करनी पड़ती हैं। हमारे सिंगापुरी मित्र बताते हैं कि हम समरसता या एसिमिलेशन पर जोर नहीं देते। एसिमिलेशन की बजाय हमारा जोर इंटीग्रेशन पर रहता है। यानी आप किसी भी जातीय समुदाय या धर्म से हों लेकिन कुछ साझा सिद्धांतों के प्रति आपकी प्रतिबद्धता होनी ही होगी। देश के प्रति आपके कुछ साझा कर्तव्य हैं जिनका आपको पालन करना ही होगा। एयरपोर्ट तथा अन्य स्थानों पर भारतीय समुदाय के लोग भी अपने अनुपात के अनुसार नौकरियों में दिखाई दे जाते हैं। सचमुच विभिन्न जातीय समुदायों के लोगों का शांतिपूर्ण ढंग से एक देश में रहना और उसे यूरोप के लोगों के लिए भी ईर्ष्या का विषय बना देना आश्चर्य जगाता है,खासकर भारत से गए लोगों के लिए।

सिंगापुर में काम करने वाले लोगों की कमी है। कम वेतन वाले काम करने के लिए लोग नहीं मिलते। जिस रेस्तरां में भारत में चार वेटर होते हैं वैसे ही रेस्तरां में वहां एक ही वेटर होता है। कई स्थानों पर ग्राहक को खुद ही प्लेट को सिंक में रखना पड़ता है। छोटी दुकानों में एक ही व्यक्ति होता है, मैनेजर और सेल्समैन सबकुछ वही। इसीलिए यहां बांग्लादेश से काम करने वाले युवकों को आमंत्रित किया जाता है। वर्क परमिट खत्म होने पर इनके नियोक्ता इनके परमिट की अवधि बढ़वा देते हैं। अवधि न बढ़ने पर इन्हें वापस अपने देश लौट जाना पड़ता है।

लोग बताते हैं कि सिंगापुर से जुड़े मलेशिया में भी बांग्लादेशी कामगार काफी बड़ी संख्या में हैं। करीब छह-सात लाख होंगे। इनमें से कई वहां अवैध रूप से भी पहुंच गए हैं। इन्हें नियमित करने के लिए मलेशिया सरकार काफी कोशिश कर रही है। इसके लिए बांग्लादेश सरकार से भी बातचीत की गई थी। एक बार मामूली-सी फीस लेकर इन्हें अपना नाम पंजीकरण कराने के लिए कहा गया था। इसके बाद बिना पंजीकरण वाले आप्रवासियों के खिलाफ अभियान चलाया गया।

बांग्लादेशियों की बात चली तो संतोसा टापू की एक घटना याद आ गई। वहां एक बांग्लादेशी मिल गए। दाढ़ी और टोपी वाले। उनकी पत्नी पूरी तरह बुर्के से ढकी थीं। मैंने पूछा ढाका में सबकुछ ठीकठाक है न। उन्होंने कहा - जी हां, हम काफी ठीकठाक हैं, मेरा छह माले का मकान है। जब मैंने पूछा कि शांति तो है न, तब वे मेरा आशय समझे। जो भी हो, आपके पास कितना मंजिला मकान है, या कितनी कारें हैं इससे भारत और दक्षिण एशिया में परिवार की समृद्धि मापी जाती है। यूरोपीय लोग इस पर आश्चर्य करते हैं।

शुक्रवार, 14 सितंबर 2012

क्या बांग्लादेश वापस लेगा घुसपैठियों को?

क्या इतिहास अपने आपको दोहराएगा? इस बात का अंदेशा इस कारण हो रहा है कि १९७९ से १९८५ तक चले विदेशी भगाओ आंदोलन की तर्ज पर फिर से लोग सड़कों पर निकल पड़े हैं| १९८५ में इस बात पर सहमति हो गई थी कि २४ मार्च १९७१ के बाद आए बांग्लादेशियों को अवैध माना जाएगा और उन्हें वापस उनके देश भेजने की व्यवस्था सरकार करेगी| यदि बांग्लादेशी प्रव‘जन के विरुद्ध लोगों की भावनाएं फिर से एक बार आंदोलन का रूप लेती है (इसकी उम्मीद कम है), तो क्या इस बार लोग इस संबंध में पहले की अपेक्षा ज्यादा शिक्षित हैं कि क्यों इस दो दशकों से ज्यादा की अवधि में एक भी अवैध बांग्लादेशी को वापस उसके देश नहीं भेजा जा सका | (हम यहां ‘एक भी’ शब्दों का इस्तेमाल इसलिए कर रहे हैं क्योंकि हमारे पास इस बात की सूचना नहीं है कि इस अवधि में बांग्लादेश सरकार ने भारत द्वारा बांग्लादेशी करार दिए गए किसी व्यक्ति को अपना नागरिक मानकर स्वीकार किया है|)

यदि कोई व्यक्ति सचमुच यह जानना चाहता है कि किन कारणों से बांग्लादेशी घुसपैठियों को निकाला नहीं जा सका, तो वह तथ्यों को जानने की कोशिश करेगा और यदि वह जानने का परिश्रम नहीं करना चाहता तो वह कहेगा कि राजनीतिज्ञों की वोट लोलुपता के कारण ऐसा नहीं हो सका| यह सच है कि राजनीतिज्ञों ने कभी नहीं चाहा कि बांग्लादेशी घुसपैठियों के मामले को गंभीरता से लिया जाए| क्योंकि पुलिस और सरकारी एजेंसियां जिस तरह काम करती हैं, उसमें यह नितांत संभव है कि निर्दोष नागरिकों को परेशान किया जाए| कोई भी सरकार बैठे-बिठाए बंग्ला भाषा बोलने वाले हिंदुओं और मुसलमानों को अपना दुश्मन नहीं बनाना चाहेगी| और इस तरह किसी भी अधिकारी को अवैध बांग्लादेशी को खोज निकालने के लिए कुछ भी न करने का संकेत दे दिया जाता है| यह वैसे ही है, जैसे सत्ताधारी दल के गुंडे-बदमाशों पर पुलिस जल्दी से हाथ नहीं डालती| अभी हाईकोर्ट के आदेश पर जब पुलिस ने डी-वोटरों को खोज निकालना शुरू किया, तो खासकर हिंदू बंगालियों में हड़कंप मच गया| आज भी असम के बंग्ला अखबार हिंदू बंगालियों को होने वाली परेशानियों से भरे पड़े रहते हैं| डिटेंशन कैम्पों में कैद कई हिंदू बंगालियों की गाथा आए दिन बंग्ला अखबारों में छपती रहती है| कोर्ट के आदेशों के कारण मु‘यमंत्री डी-वोटर के मुद्दे पर कोई कार्रवाई तो क्या, आश्‍वासन तक देने की स्थिति में नहीं थे| लेकिन फिर भी उन्होंने चुनाव से पहले हिंदू बंगाली समुदाय को गोल-मोल भाषा में आश्‍वासन दे डाला और चुनाव में वोटों की अच्छी फसल काट ली|

अवैध बांग्लादेशियों की समस्या पर आने से पहले यह भी देख लें कि बीटीएडी में हुई हिंसा का लोकसभा चुनावों पर क्या असर पड़ेगा? असम से बाहर क्या होता है, यह अभी देखने वाली बात होगी, लेकिन असम का मुसलमान वोटर एक बार फिर से कांग‘ेस की ओर झुक जाए तो आश्‍चर्य नहीं होना चाहिए| जो मुसलमान वोटर बदरुद्दीन अजमल की पार्टी की ओर झुकने लगा था, वह इस बार तो अवश्य देख रहा होगा कि किस तरह मौलाना अजमल चुप्पी साध गए हैं| या किस तरह वे संकट के समय भी मुंबई-दुबई के चक्कर लगा रहे हैं|

किसी अन्य देश के नागरिक के बारे में तभी यह प्रमाणित किया जा सकता है कि वह अन्य देश का नागरिक है, जब या तो उसके पास ऐसे दस्तावेज पाए जाएं, जैसे पासपोर्ट या फोटो पहचान पत्र, जो उसे उस देश का नागरिक साबित कर सके, या फिर वह स्वयं स्वीकार करे कि वह अमुक देश में अमुक गांव का नागरिक है| जिन लोगों को अब तक न्यायालय के आदेश पर वापस खदेड़ने के लिए सीमा पर ले जाया गया है, उनके बारे में यह तो प्रमाण है कि वह भारत का नागरिक नहीं है, लेकिन क्या हमारी अदालतों ने यह भी प्रमाणित किया है कि वह बांग्लादेश का ही नागरिक है? ऐसा नहीं होने तक हम बांग्लादेश सरकार से इस मुद्दे पर अपनी बात नहीं मनवा पाएंगे और न ही अंतर्राष्ट्रीय मंच पर अपनी बात को तर्कपूर्ण ढंग से रख पाएंगे।

अवैध बांग्लादेशियों की समस्या के जिस पहलु पर सबसे कम ध्यान दिया गया, वह है अवैध बांग्लादेशी प्रमाणित हो चुके व्यक्ति को वापस उसके देश किस तरह भेजा जाएगा| बांग्लादेशियों के मुद्दे पर जो लोग भावनाओं में बहते हैं और सोचते हैं कि सरकार कड़ाई बरते तो उन्हें उनके देश वापस भेजा जा सकता है, उन्हें यदि यह बताया जाए कि ऐसा होना लगभग असंभव है तो उनके उत्साह पर पानी फिर सकता है| बांग्लादेशियों के मुद्दे पर अति उत्साही लोगों को यदि यह बताया जाए कि घुसपैठिया प्रमाणित होने के बाद भी ऐसे लोगों के भारत में ही रह जाने की संभावना है, भले उनके नागरिक अधिकार न रहें - तो उनमें से अधिकांश मानेंगे कि उनकी ऊर्जा एक निरर्थक काम में जाया हो गई| लेकिन ऐसा होने की संभावना ही अधिक है।

किसी अन्य देश के नागरिक के बारे में तभी यह प्रमाणित किया जा सकता है कि वह अन्य देश का नागरिक है, जब या तो उसके पास ऐसे दस्तावेज पाए जाएं, जैसे पासपोर्ट या फोटो पहचान पत्र, जो उसे उस देश का नागरिक साबित कर सके, या फिर वह स्वयं स्वीकार करे कि वह अमुक देश में अमुक गांव का नागरिक है| जिन लोगों को अब तक न्यायालय के आदेश पर वापस खदेड़ने के लिए सीमा पर ले जाया गया है, उनके बारे में यह तो प्रमाण है कि वह भारत का नागरिक नहीं है, लेकिन क्या हमारी अदालतों ने यह भी प्रमाणित किया है कि वह बांग्लादेश का ही नागरिक है? ऐसा नहीं होने तक हम बांग्लादेश सरकार से इस मुद्दे पर अपनी बात नहीं मनवा पाएंगे और न ही अंतर्राष्ट्रीय मंच पर अपनी बात को तर्कपूर्ण ढंग से रख पाएंगे| इसलिए यह तय है कि जिन लोगों को अवैध घुसपैठिया करार दिया जाएगा, वह अंततः भारत में ही राज्यविहीन व्यक्ति के रूप में रह जाएगा| बहुत कम लोगों को मालूम है कि रोहिंग्या मुसलमानों की तरह दो लाख से ऊपर हिंदुओं को बर्मा में राज्यविहीन व्यक्ति करार दे रखा गया है| बर्मा के ब्रिटिश शासन से स्वाधीन होने के बाद ये भारतीय मूल के लोग वहीं रह गए थे| आज उन हिंदुओं को भारत सरकार स्वीकार नहीं कर रही और बर्मा सरकार उन्हें किसी भी तरह का नागरिक अधिकार दे नहीं रही| कुल मिलाकर यही समझ में आता है कि अंतर्राष्ट्रीय सीमाओं की क्रूरता के बारे में आम आदमी को कितनी कम समझ है।