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Journalist and writer, Writes on Northeast India, Bangladesh, Myanmar

गुरुवार, 15 जून 2017

उत्तरी थाईलैंड – जनजातीय जीवन की एक झलक

उत्तरी थाईलैंड कई जनजातियों की निवासभूमि है। भारत के नगालैंड से जो भूमि शुरू होती है वही बर्मा के पहाड़ी हिस्से से होती हुई उत्तरी थाईलैंड तक जुड़ी हुई है। नक्शे में देखें तो नगालैंड, उत्तरी बर्मा, दक्षिणी चीन, लाओस और उत्तरी थाईलैंड बिल्कुल पास-पास दिखाई देंगे। हालांकि यह सारा इलाका पहाड़ियों और घाटियों से भरा हुआ है। 

असम पर 600 साल तक राज करने वाली आहोम जाति के लोग उत्तरी बर्मा, उत्तरी थाईलैंड और दक्षिण चीन के इसी इलाके में रहने वाली किसी शासक जाति के लोग थे और विद्वानों का मानना है कि वे बर्मा की शान जाति से काफी मिलते-जुलते हैं और आहोम लोगों से ही मिलते-जुलते लोगों का इस इलाके में जगह-जगह राज था। ऐसी ही एक जनजाति है मोंग (Hmong)। 

चियांग माई के आसपास के राज्यों में ये लोग बसे हुए हैं। अब इनकी संख्या थाईलैंड में करीब 56 हजार है। उत्तरी थाईलैंड में रहने वाली अन्य जनजातियां हैं – कारेन, काचिन, लाहु, लिसु, मिएन, म्लाब्री, मोकेन, अखा आदि। चियांग में कई म्यूजियम हैं जहां एक-एक जनजाति के बारे में काफी जानकारी संगृहीत करके रखी गई है। थाईलैंड, चीन, लाओस और विएतनाम में विभिन्न जनजातियों के कुनबों को उनकी वेशभूषा के आधार पर पुकारने का रिवाज है। 

जैसा मोंग जनजाति के अलग-अलग कुनबों को सफेद मोंग, काला मोंग, हरा मोंग आदि कहकर पुकारा जाता है। यह उनकी वेशभूषा के रंग और उस पर किए गए कढ़ाई के काम के आधार पर होता है।

हमारा उत्तरी थाईलैंड के जिस राष्ट्रीय पार्क से होकर ट्रैकिंग करने का कार्यक्रम था वह इसी मोंग जनजाति का इलाका है। चियांग माई से हमारे साथ टूरिस्ट कंपनी की ओर से कारेन जनजाति का गाइड आया था। लेकिन सरकारी नीति के अनुसार इस जंगल से होकर जाने के लिए एक मोंग गाइड साथ होना जरूरी है। कारेन गाइड, कुंग ने बताया कि मैं भी सबकुछ जानता हूँ, जिन पेड़ों और फूल-पत्तियों के बारे में वह बताएगा उनके बारे में मुझे भी उतनी ही जानकारी है। लेकिन पॉलिसी तो पॉलिसी है। बस क्या कहें।

हमारा मोंग गाइड वासे बिल्कुल सीधा-सादा इंसान था। हमारे यहां के किसी नगा गांवबुढ़ा (गांव का मुखिया) से बिल्कुल मिलता-जुलता। अंग्रेजी का एक शब्द भी नहीं जानता था। मैंने उससे उसका नाम पूछा तो वह कुछ समझा नहीं। साथ में उसकी अपनी पारंपरिक दाव थी। कारेन गाइड कुंग भी अपनी कारेन दाव से लैस था। दाव इन जंगलों में हमेशा साथ रहने और साथ देने वाली चीज होती है। 

अपने यहां नगालैंड की तरह। बाद में जंगल में चलते वक्त उनलोगों ने दिखाया कि किस तरह प्यास लगने पर यदि साथ में पानी न हो तो एक खास केले के पेड़ को तने से काट लिया जाता है और उसके अंदर के कोमल तने में पानी मिल जाता है। हमने भी वह पानी चखा।

हमें वासे के साथ बातचीत कारेन गाइड कुंग के माध्यम से करनी पड़ती थी। कुंग उसकी बात को हमारे लिए अंग्रेजी में अनुवाद करके बताता था। मैंने पूछा कि क्या यहां भी गावों में गांव बुढ़ा की प्रथा है। वासे ने जो बताया उससे आभास मिला कि नगालैंड, बर्मा, दक्षिणी चीन, लाओस और इस उत्तरी थाईलैंड में प्रथाएँ आपस में काफी मिलती-जुलती हैं। यहां भी गांवबुढ़ा हैं जिन्हें सरकार से मान्यता प्राप्त है। 

मोंग जनजाति के लोग ऊंचे मचान पर नहीं रहते। नीचे जमीन पर ही रहते हैं। लेकिन लाहु, लिसु आदि कई जनजातियां हैं जो लोग जमीन से थोड़ा ऊंचा मचान बनाकर रहती हैं। मचान के नीचे उनके मवेशी रहते हैं और वे ऊपर से मवेशियों की निगरानी करते रह सकते हैं। असम की कई जनजतियों में भी मचान बनाकर रहने की प्रथा है।

जंगल की ट्रैकिंग जहां से शुरू होती है वहां एक छोटा-मोटा बाजार है। कुंग ने बाजार से कुछ स्ट्राबेरी और केले ले लिए। यहां स्ट्राबेरी की खेती नई-नई शुरू हुई है। मैंने सोचा कि कुंग अपने घर ले जाने के लिए खरीदारी कर रहा है, लेकिन बाद में वे स्ट्राबेरी और केले हमें ही जंगल में खाने को मिले। स्ट्राबेरियां देखने में जितनी सुंदर थीं खाने में भी उतनी ही मीठी थीं। चियांग माई हवाई अड्डे पर बाद में देखा कि हर चीनी युवती के हाथ में स्ट्राबेरियों का तीन किलो का एक-एक पैक था। हम चूक गए।

बाजार में एक स्थान पर निशानेबाजी होती है। मोंग जनजाति का पारंपरिक धनुष और तीर था और सामने निशाना लगाने के लिए संतरा, और दूसरे स्थानीय नींबू लटके हुए थे। एक व्यक्ति को तीन बार निशाना लगाने के लिए दिया जाता है। मैंने अपने जर्मन मित्र हेनिंग को चिढ़ाया कि तुम तो काफी बंदूक चला चुके हो, तुम्हारा निशाना सही होना चाहिए। 

उसके तीनों निशाने गलत लगे। इसके बाद मैंने हाथ आजमाया। सोचा कि जब हेनिंग का यह हाल है तो मेरा तीर तो कहां का कहां जाएगा। पहला निशाना कुछ वैसा ही हास्यास्पद प्रयास था। हमारे गाइड ने बताया कि किस तरह तीन बिंदुओं को आपस में मिलाकर निशाना लगाना है। और आश्चर्य, मेरा तीर संतरे के अंदर था। हालांकि यह मामूली सी बात थी लेकिन इससे पहाड़ पर चढ़ने का मेरा उत्साह बढ़ गया।

बुधवार, 14 जून 2017

चियांग माई- जहां कोई बार-बार जाना चाहेगा


चियांग माई जाने के बाद मेरी चीन जाने की इच्छा खत्म हो गई। कारण यह है कि थाईलैंड के इस उत्तरी हिस्से में पड़ने वाले इस शहर में काफी बड़ी संख्या में चीनी सैलानी आते हैं। दक्षिण चीन की सीमा यहाँ से मात्र दो-तीन सौ किलोमीटर दूर है, हालांकि चीन की सीमा सीधे थाईलैंड की सीमा से सटती नहीं। आपको बर्मा या लाओस से होकर चीन जाना होगा। लोग लाओस होकर ही जाते हैं। 

सबसे नजदीकी चीनी कस्बा जिंगहोंग है, जो चार सौ किलोमीटर दूर पड़ता है, और चीनी शहर कुनमिंग, डाली, चेंगडु आदि के लिए चियांग माई से सीधी हवाई सेवा मिलती है। चियांग माई में चीन का कनसुलेट भी है, जहां से वीसा मिलता है। चियांग माई के शांत, सुंदर और हरे-भरे शहर में समय बिताने के लिए आने वाले चीनी यात्रियों की हमेशा भरमार रहती है। हालांकि उतनी ही संख्या में गोरे पर्यटक भी यहां आते हैं। संख्या के लिहाज से चीनी यात्रियों का इतना अधिक प्रभाव है कि यहां के हर गाइड को चीनी भाषा आती है। दुकानों, होटलों और एयरपोर्ट पर तीन भाषाओं का प्रयोग होता है – थाई, अंग्रेजी और चीनी।

चियांग माई में चीनी यात्रियों को देखकर इस बात का काफी अंदाजा हो जाता है कि चीनी लोगों की पसंद क्या है, वे क्या खाते हैं, कैसे खाते हैं और कैसे तफरीह करते हैं। हर जाति का तफरीह करने का अपना अलग तरीका होता है। जैसे गोरे पर्यटकों को किसी शांत स्थान पर बैठकर घंटों बीयर पीना पसंद होता है। यदि समुद्र तट हो तो तैरना उनका एक प्रमुख शौक है। चियांग माई में पश्चिमी पर्यटकों को पसंद आने वाली दूसरी चीज है जंगल में हाइकिंग करना। चियांग माई बहुत ही सुंदर और जैव-विविधता से भरे वर्षावनों से घिरा हुआ है जहां घूमना और वहां की वनस्पतियों की जानकारी लेना जीवन का एक बहुत ही समृद्ध अनुभव हो सकता है। 

चीनी यात्री अकेले या जोड़े में कम और समूह में ज्यादा आते हैं। यदि बड़े समूह न भी हों तो चार या छह के समूह आपको दिखाई दे जाएंगे। अन्य चीजें यदि गोरे लोगों के समान हों तो इनका एक प्रमुख शौक चियांग माई में खरीदारी करना होता है। चियांग माई में खाना और अन्य सामान काफी सस्ता है, हालांकि यहां बैंकाक की तरह बड़े-बड़े मॉल नहीं हैं। वापसी की फ्लाइट में आप पाएँगे कि चीनी युवक और युवतियों के सूटकेश थाईलैंड से खरीदे सामानों से ठसाठस भरे रहते हैं।

जो बड़ी उम्र के चीनी यात्री होते हैं उनकी रुचि बौद्ध मंदिरों में भी होती हैं। वे बड़ी श्रद्धा के साथ इन मंदिरों के दर्शन करते हैं और वहां अगरबत्ती जलाते हैं और मोम के दियों को पानी में तैराते हैं। यह दिया जलाने की चीनी शैली है। उनके हाथ जोड़कर ईश्वर को प्रणाम करने और हमारे प्रणाम करने के तरीके में एक महीन भेद है जिसे देखकर ही अनुभव किया जा सकता है।

दूसरे थाई शहरों की तरह चियांग माई में भी मसाज पार्लरों की भरमार है। हालांकि यह थाई मालिश कितनी कारगर होती है इसे लेकर अभी भी संदेह का निवारण नहीं हुआ है। मेरा अनुभव यही है कि यह प्रचार के बल पर चलती है और बाहर से आया सैलानी एक नया अनुभव लेने के लिए मालिश करवा लेता है। जहां तक पश्चिमी पर्यटकों का सवाल है उनके लिए दो सौ ब्हात यानी चार सौ रुपए का मोल सिर्फ छह डालर के बराबर है। इतने पैसे में पश्चिमी देशों में आप जैसे-तैसे नाश्ता भर कर सकते हैं। इसलिए मसाज पार्लर में गोरों की भीड़ हो तो आश्चर्य ही क्या।

चियांग माई आने वाले चीनियों को देखकर इस बात का सहज अहसास हो जाता है कि चीन की आबादी किस तरह युवा आबादी है। इनकी तुलना में पश्चिम की आबादी में बुजुर्गों का प्रतिशत बढ़ता जा रहा है। इसीलिए पश्चिम से सैर करने आने वालों में बड़ी उम्र के लोग भी बड़ी संख्या में दिखाई दे जाते हैं। कोई-कोई तो अकेला होता है और लगता है अपनी बोरियत मिटाने यहां आया है। हमें जंगल ले जाने वाला गाइड बताता है कि स्कैंडिनेवियाई देशों, अर्थात स्वीडन और डेनमार्क के कई वृद्ध लोग यहां स्थायी रूप से रहने लग गए हैं। वे यहां जमीन नहीं खरीद सकते लेकिन उन्हें फ्लेट खरीदने की इजाजत है। 

सबसे बड़ी बात यह कि यहां यूरोप की तुलना में अपेक्षाकृत सस्ती नर्सें मिल जाती हैं, जो दिन-रात उनके घर में उनके साथ रहकर ही उनकी देखभाल करती हैं। व्यवसाय की दृष्टि से यह थाई लोगों का अच्छा आईडिया है। एक तरफ पैसा है और दूसरी तरफ काम करने की क्षमता, प्राइवेट नर्सों का यह व्यवसाय ऐसी चीज है जिससे दोनों पक्ष काफी खुश हैं। पूर्वोत्तर भारत, बांग्लादेश, बर्मा, थाईलैंड और दक्षिण चीन के विशेषज्ञ माने जाने वाले जाने-माने स्विडिश पत्रकार बर्टिल लिंटनर का घर भी यहीं हैं। वे किसी समय अपनी शान पत्नी के साथ नगालैंड होकर बर्मा गए थे। उनसे वहां मिलना नहीं हो पाया क्योंकि जब मैं वहां था तो वे बैंकाक गए हुए थे।

उत्तरी थाईलैंड में भी बाकी देश की तरह ही जीवन के हर क्षेत्र में महिलाओं का बोलबाला है। इस बात को इसी से समझा जा सकता है कि जब हम वापस आ रहे थे तो गेस्टहाउस की रिसेप्सनिस्ट, हमारा सामान बाहर लाने में मदद करने वाली लड़की और बड़ी सी जापानी एसयूवी कैब को चलाने वाली ड्राइवर सभी युवतियां थीं। एयरपोर्ट पर घुसते समय हमारे सामान की जांच करने वाली और हमारी तलाशी लेने वाली सुरक्षा कर्मचारी भी महिलाएँ थीं। हालांकि चियांग माई में सभी ड्राइवर महिलाएँ नहीं हैं, अधिकतर पुरुष ही हैं। लगता है यही एकमात्र धंधा है जो थाई महिलाओं ने पुरुषों के लिए छोड़ रखा है।

चियांग माई शहर में घुसते ही इसकी सुंदरता मंत्रमुग्ध कर देती है। यहाँ एक पुराना शहर है जहां अधिकतर सैलानी रुकते हैं, और इसके बाहर बाद में विकसित हुआ नया शहर है। पुराने शहर को चारों ओर से घेरने वाली एक खाई है। खाई को बहुत ही सुंदर ढंग से साफ-सुथरा बनाकर रखा गया है। इसके दोनों ओर से सड़कें गुजरती हैं और पैदल चलने के लिए काफी चौड़ा ट्रैक है। ट्रैफिक बढ़ रहा है लेकिन बैंकाक की तरह यहां बाइक टैक्सियों का अत्याचार नहीं है। शायद बाइक टैक्सी लेने वाले भी उतने अधिक लोग नहीं हैं। ऑफिस जाने की शायद उतनी भागमभाग नहीं है। 

बैंकाक में तो स्थानीय लोगों के लिए बाइक टैक्सी यातायात का एक प्रमुख साधन बन गया है। वहां लोग ट्रेन या बस से अपने घर के पास के स्टेशन या स्टाप पर उतरते हैं और इसके बाद वहां से अपने घर तक के लिए बाइक टैक्सी लेते हैं। चियांग माई में ऐसी बात नहीं है। यहां थाई शैली के तीन पहियों वाले आटो मिल जाते हैं या फिर बड़ी-बड़ी जापानी कारें जिन्हें टैक्सी की तरह चलाया जाता है।

पुराना शहर पब, काफी हाउस आदि से भरा पड़ा है। हर काफी हाउस को पुरानी शैली के लकड़ी के मकान की तरह सजाया हुआ है। अधिकतर मकान दो मंजिला हैं और उनका रंग भी बार्निश के रंग का होता है, आंखों को सुकून और एक पुराने शहर का अहसास देने वाला। 

पुराने शहर की हर गली में होटल और गेस्ट हाउस खुले हैं जिनमें लंबी अवधि तक रहने वाले पर्यटक रहते हैं। शहर में घूमने के लिए साइकिल या स्कूटी दिन भर के लिए किराए पर मिल जाती है। आपको हर गली में शहर का जायजा लेते युवा चीनी और गोरे पर्यटक मिल जाएंगे। लोग अपने घरों को गमलों, फूलों और सुंदर कैक्टस से मनमोहक रूप से सजा कर रखते हैं। दुनिया में कुछ शहर होते हैं जहां आप बार-बार जाना पसंद करेंगे। चियांग माई भी ऐसा ही एक शहर है। घर के इतना करीब।

रविवार, 1 जनवरी 2017

वर्ष 2017 में कुछ पहेलियां सुलझाएं

नया साल देखते-देखते बीत गया। देखते-देखते बीत जाना क्या यह सिर्फ एक अहसास है या सचमुच आज की जिंदगी इतनी मसरूफियत भरी हो गई है कि सबकुछ देखते-देखते बीत जाता है और पता ही नहीं चलता। 

कुछ तो बदलाव आया है समाज में कि जिंदगी पहले की अपेक्षा अधिक व्यस्ततापूर्ण हो गई है। ऐसा नहीं है कि हम अपने बुजुर्गों की अपेक्षा कोई अधिक महत्वपूर्ण काम कर रहे हैं, फिर भी हम अपने-अपने बुजुर्गों की जीवन शैली याद करें तो पाएंगे कि उसमें एक लय थी, जो अब आपाधापी में बदलती जा रही है।

व्यस्तता बढ़ने के दो कारण तो बिल्कुल स्पष्ट हैं। एक, आवागमन और संचार के साधनों का बढ़ जाना। पहले दूर किसी राज्य में कोई आयोजन होता था तो जाने के बारे मे सोचते तक नहीं थे। आजकल सोचते ही नहीं बल्कि अधिकतर मामलों में लोग दूर-दराज के आयोजनों में भाग लेने जाते भी हैं। इसी तरह संचार के माध्यम बढ़ जाने के कारण काफी समय बातचीत में चला जाता है। 

पहले लगता था कि अब फोन नंबर डायल नहीं करना पड़ेगा और बटन दबाते ही मनचाहा नंबर लग जाएगा तो समय बचेगा। लेकिन समय बचा नहीं वह ज्यादा खर्च होने लगा। जैसे ही संचार का कोई नया माध्यम आता है वह आपके पाकिट से थोड़ा समय चुरा कर ले जाता है। फेसबुक, इंस्टाग्राम, व्हाट्सएप – सब पर यह बात लागू होती है।

दूसरा कारण है, आबादी का बढ़ना। साठ और सत्तर के दशकों में आबादी में जो बढ़ोतरी हुई उसका नतीजा आज की आपाधापी में दिखाई देता है। आप अपने माता-पिताओं से तुलना कर देखिए। उनके जितने रिश्तेदार हुआ करते थे, उनकी तुलना में आज की पीढ़ी के रिश्तेदार अधिक मिलेंगे। रिश्तेदारियों का संख्या में बढ़ना भी आज की आपाधापी का एक प्रमुख कारण है। हो सकता है आने वाली पीढ़ी इस अर्थहीन व्यस्तता से बच जाएगी क्योंकि आज जनसंख्या के बढ़ने की गति वापस धीमी हो चुकी है।

अक्सर पूछा जाता है कि ज्ञान प्राप्त करने का सबसे अच्छा तरीका क्या है। मुझे लगता है पहेलियां बुझाना ज्ञान प्राप्त करने का सबसे अच्छा तरीका होता है। उत्तर जानने के पहले आपके दिमाग में प्रश्न आना होगा। कक्षा में शिक्षक आते हैं और पाठ्यक्रम से निकालकर ज्ञान की बौछार करने लगते हैं। 

बहुत कम ही छात्र होते हैं जिन्हें इस अनचाही ज्ञानगंगा में भींगना पसंद होता है। इसकी बजाय यदि छात्र की ओर से ही कोई प्रश्न आए और शिक्षक उनका उत्तर दें तो वैसे उत्तर छात्रों का मस्तिष्क पूरी तरह सोख लेगा और वह जानकारी उनके ज्ञान का हिस्सा बन जाएगी।

वर्ष 2016 इस पहेली का उत्तर खोजने में बीत गया कि भारत की जिस चीज को सारी दुनिया पूजती है उसे भारतवासी क्यों अपने यहां से बहिष्कृत कर देते हैं। पिछले ढाइ हजार सालों में भारत में पैदा हुए जिन दो व्यक्तियों ने दुनिया को मौलिक ज्ञान दिया है वे हैं गौतम बुद्ध और गांधी। 

इन दोनों को भारत के बाहर पूजा जाता है। गौतम बुद्ध ने दुनिया को जो दे दिया उसके बाद एक तरह से और कुछ जानने के लिए बाकी नहीं रह जाता। उस पर अमल करने को छोड़कर। और गांधी ने ऐसे प्रश्नों का सामना किया जिनके उत्तर की अधिक तलाश आने वाली पीढ़ियों को होने वाली है। और पिछले डेढ़ हजार वर्षों में भारत में ऐसा क्या हुआ कि इन दोनों की ही विचारधाराओं को भारत से पूरी तरह बहिष्कृत कर दिया गया। गांधी को तो हमने शारीरिक रूप से ही हमारे बीच से हटा दिया। 

गौतम बुद्ध के बारे में यूनिवर्सिटी के किसी प्रतिभावान छात्र से पूछिए तो ज्यादा संभावना इस बात की है कि वह कहेगा – गौतम बुद्ध बौद्ध धर्म के प्रवर्तक थे, उनकी प्रेरणा से सम्राट अशोक ने बौद्ध धर्म ग्रहण कर लिया। 

लेकिन गौतम बुद्ध के इस धरती पर आने और रहने की घटना सिर्फ एक धर्म प्रवर्तक के जन्म लेने की घटना नहीं है। इसी तरह गांधी के बारे में पूछिए तो लोग आपको बताएंगे कि गांधी हमारे राष्ट्रनायक थे, उन्होंने स्वाधीनता आंदोलन का नेतृत्व किया। लेकिन स्वाधीनता आंदोलन सभी उपनिवेशों में हुए और सबके अपने-अपने राष्ट्रनायक थे। लेकिन गांधी इस समूची दुनिया के लिए अनूठे क्यों थे।

बौद्ध पर्यटकों के भारत आने पर हमें थोड़ी देर के लिए अहसास होता है कि ओह बौद्ध धर्म का जन्म भारत और नेपाल की धरती पर ही हुआ था। लेकिन रोजमर्रा की जिंदगी का ऐसा कोई जीवंत अहसास नहीं है जो यह दिखाता हो कि हम ही गौतम बुद्ध की परंपरा के वारिस हैं। 

इसी तरह गांधी की तस्वीर और गांधी के नाम की पूजा होती है लेकिन गांधी किसलिए गांधी थे यह बहुत कम लोग जानते हैं। आश्चर्य ही क्या कि उनकी विचारधारा को आगे बढ़ाने का काम भारत में कहीं दिखाई नहीं देता।

हम सौभाग्यशाली पीढ़ी हैं कि गूगल नाम का एक महान शिक्षक हमलोगों के पीसी और मोबाइल फोन पर हमेशा हमारे प्रश्नों के उत्तर देने के लिए तत्पर रहता है। यदि आप अंग्रेजी भाषा जानते हैं तो अपने मन में बेशक हजार प्रश्न उदित होने दीजिए। क्योंकि उनका उत्तर खोजने के लिए गूगल हमेशा तत्पर रहेगा। 

गौतम बुद्ध और गांधी के अलावा हमें वर्ष 2016 में इस प्रश्न ने भी बहुत सताया कि हम भारतवासियों में ऐसा क्या था कि हम हमेशा युद्धों में हारते गए, हम कई सदियों तक गुलाम बने रहे। ऐसा क्या था कि अंग्रेजों ने इतने बड़े देश को इतनी सहजता के साथ गुलाम बना लिया। 

आज जब हमें यह जानकारी मिलती है कि अंग्रेज अफसरों की आवासी बस्तियों, जैसे सिविल लाइन्स, और शिमला जैसे शहरों की माल रोड जैसी सड़कों पर भारतीयों का आना-जाना वर्जित था, तो जैसे प्रश्नों की मधुमक्खियां क्यों, क्यों, क्यों कहकर हमें डंक मारने के लिए दौड़ पड़ती है। 

उनसे बचने के लिए जो उत्तर का मरहम हमें चाहिए गनीमत है कि वह हमारे इंटरनेट पर आज उपलब्ध है। अंत में मैं इस प्रश्न को फिर दोहराता हूं – बुद्ध और गांधी को इस देश ने बहिष्कृत क्यों कर दिया। आइए वर्ष 2017 में हम इन दोनों पहेलियों को सुलझाएं।