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Journalist and writer, Writes on Northeast India, Bangladesh, Myanmar

बुधवार, 14 जून 2017

चियांग माई- जहां कोई बार-बार जाना चाहेगा


चियांग माई जाने के बाद मेरी चीन जाने की इच्छा खत्म हो गई। कारण यह है कि थाईलैंड के इस उत्तरी हिस्से में पड़ने वाले इस शहर में काफी बड़ी संख्या में चीनी सैलानी आते हैं। दक्षिण चीन की सीमा यहाँ से मात्र दो-तीन सौ किलोमीटर दूर है, हालांकि चीन की सीमा सीधे थाईलैंड की सीमा से सटती नहीं। आपको बर्मा या लाओस से होकर चीन जाना होगा। लोग लाओस होकर ही जाते हैं। 

सबसे नजदीकी चीनी कस्बा जिंगहोंग है, जो चार सौ किलोमीटर दूर पड़ता है, और चीनी शहर कुनमिंग, डाली, चेंगडु आदि के लिए चियांग माई से सीधी हवाई सेवा मिलती है। चियांग माई में चीन का कनसुलेट भी है, जहां से वीसा मिलता है। चियांग माई के शांत, सुंदर और हरे-भरे शहर में समय बिताने के लिए आने वाले चीनी यात्रियों की हमेशा भरमार रहती है। हालांकि उतनी ही संख्या में गोरे पर्यटक भी यहां आते हैं। संख्या के लिहाज से चीनी यात्रियों का इतना अधिक प्रभाव है कि यहां के हर गाइड को चीनी भाषा आती है। दुकानों, होटलों और एयरपोर्ट पर तीन भाषाओं का प्रयोग होता है – थाई, अंग्रेजी और चीनी।

चियांग माई में चीनी यात्रियों को देखकर इस बात का काफी अंदाजा हो जाता है कि चीनी लोगों की पसंद क्या है, वे क्या खाते हैं, कैसे खाते हैं और कैसे तफरीह करते हैं। हर जाति का तफरीह करने का अपना अलग तरीका होता है। जैसे गोरे पर्यटकों को किसी शांत स्थान पर बैठकर घंटों बीयर पीना पसंद होता है। यदि समुद्र तट हो तो तैरना उनका एक प्रमुख शौक है। चियांग माई में पश्चिमी पर्यटकों को पसंद आने वाली दूसरी चीज है जंगल में हाइकिंग करना। चियांग माई बहुत ही सुंदर और जैव-विविधता से भरे वर्षावनों से घिरा हुआ है जहां घूमना और वहां की वनस्पतियों की जानकारी लेना जीवन का एक बहुत ही समृद्ध अनुभव हो सकता है। 

चीनी यात्री अकेले या जोड़े में कम और समूह में ज्यादा आते हैं। यदि बड़े समूह न भी हों तो चार या छह के समूह आपको दिखाई दे जाएंगे। अन्य चीजें यदि गोरे लोगों के समान हों तो इनका एक प्रमुख शौक चियांग माई में खरीदारी करना होता है। चियांग माई में खाना और अन्य सामान काफी सस्ता है, हालांकि यहां बैंकाक की तरह बड़े-बड़े मॉल नहीं हैं। वापसी की फ्लाइट में आप पाएँगे कि चीनी युवक और युवतियों के सूटकेश थाईलैंड से खरीदे सामानों से ठसाठस भरे रहते हैं।

जो बड़ी उम्र के चीनी यात्री होते हैं उनकी रुचि बौद्ध मंदिरों में भी होती हैं। वे बड़ी श्रद्धा के साथ इन मंदिरों के दर्शन करते हैं और वहां अगरबत्ती जलाते हैं और मोम के दियों को पानी में तैराते हैं। यह दिया जलाने की चीनी शैली है। उनके हाथ जोड़कर ईश्वर को प्रणाम करने और हमारे प्रणाम करने के तरीके में एक महीन भेद है जिसे देखकर ही अनुभव किया जा सकता है।

दूसरे थाई शहरों की तरह चियांग माई में भी मसाज पार्लरों की भरमार है। हालांकि यह थाई मालिश कितनी कारगर होती है इसे लेकर अभी भी संदेह का निवारण नहीं हुआ है। मेरा अनुभव यही है कि यह प्रचार के बल पर चलती है और बाहर से आया सैलानी एक नया अनुभव लेने के लिए मालिश करवा लेता है। जहां तक पश्चिमी पर्यटकों का सवाल है उनके लिए दो सौ ब्हात यानी चार सौ रुपए का मोल सिर्फ छह डालर के बराबर है। इतने पैसे में पश्चिमी देशों में आप जैसे-तैसे नाश्ता भर कर सकते हैं। इसलिए मसाज पार्लर में गोरों की भीड़ हो तो आश्चर्य ही क्या।

चियांग माई आने वाले चीनियों को देखकर इस बात का सहज अहसास हो जाता है कि चीन की आबादी किस तरह युवा आबादी है। इनकी तुलना में पश्चिम की आबादी में बुजुर्गों का प्रतिशत बढ़ता जा रहा है। इसीलिए पश्चिम से सैर करने आने वालों में बड़ी उम्र के लोग भी बड़ी संख्या में दिखाई दे जाते हैं। कोई-कोई तो अकेला होता है और लगता है अपनी बोरियत मिटाने यहां आया है। हमें जंगल ले जाने वाला गाइड बताता है कि स्कैंडिनेवियाई देशों, अर्थात स्वीडन और डेनमार्क के कई वृद्ध लोग यहां स्थायी रूप से रहने लग गए हैं। वे यहां जमीन नहीं खरीद सकते लेकिन उन्हें फ्लेट खरीदने की इजाजत है। 

सबसे बड़ी बात यह कि यहां यूरोप की तुलना में अपेक्षाकृत सस्ती नर्सें मिल जाती हैं, जो दिन-रात उनके घर में उनके साथ रहकर ही उनकी देखभाल करती हैं। व्यवसाय की दृष्टि से यह थाई लोगों का अच्छा आईडिया है। एक तरफ पैसा है और दूसरी तरफ काम करने की क्षमता, प्राइवेट नर्सों का यह व्यवसाय ऐसी चीज है जिससे दोनों पक्ष काफी खुश हैं। पूर्वोत्तर भारत, बांग्लादेश, बर्मा, थाईलैंड और दक्षिण चीन के विशेषज्ञ माने जाने वाले जाने-माने स्विडिश पत्रकार बर्टिल लिंटनर का घर भी यहीं हैं। वे किसी समय अपनी शान पत्नी के साथ नगालैंड होकर बर्मा गए थे। उनसे वहां मिलना नहीं हो पाया क्योंकि जब मैं वहां था तो वे बैंकाक गए हुए थे।

उत्तरी थाईलैंड में भी बाकी देश की तरह ही जीवन के हर क्षेत्र में महिलाओं का बोलबाला है। इस बात को इसी से समझा जा सकता है कि जब हम वापस आ रहे थे तो गेस्टहाउस की रिसेप्सनिस्ट, हमारा सामान बाहर लाने में मदद करने वाली लड़की और बड़ी सी जापानी एसयूवी कैब को चलाने वाली ड्राइवर सभी युवतियां थीं। एयरपोर्ट पर घुसते समय हमारे सामान की जांच करने वाली और हमारी तलाशी लेने वाली सुरक्षा कर्मचारी भी महिलाएँ थीं। हालांकि चियांग माई में सभी ड्राइवर महिलाएँ नहीं हैं, अधिकतर पुरुष ही हैं। लगता है यही एकमात्र धंधा है जो थाई महिलाओं ने पुरुषों के लिए छोड़ रखा है।

चियांग माई शहर में घुसते ही इसकी सुंदरता मंत्रमुग्ध कर देती है। यहाँ एक पुराना शहर है जहां अधिकतर सैलानी रुकते हैं, और इसके बाहर बाद में विकसित हुआ नया शहर है। पुराने शहर को चारों ओर से घेरने वाली एक खाई है। खाई को बहुत ही सुंदर ढंग से साफ-सुथरा बनाकर रखा गया है। इसके दोनों ओर से सड़कें गुजरती हैं और पैदल चलने के लिए काफी चौड़ा ट्रैक है। ट्रैफिक बढ़ रहा है लेकिन बैंकाक की तरह यहां बाइक टैक्सियों का अत्याचार नहीं है। शायद बाइक टैक्सी लेने वाले भी उतने अधिक लोग नहीं हैं। ऑफिस जाने की शायद उतनी भागमभाग नहीं है। 

बैंकाक में तो स्थानीय लोगों के लिए बाइक टैक्सी यातायात का एक प्रमुख साधन बन गया है। वहां लोग ट्रेन या बस से अपने घर के पास के स्टेशन या स्टाप पर उतरते हैं और इसके बाद वहां से अपने घर तक के लिए बाइक टैक्सी लेते हैं। चियांग माई में ऐसी बात नहीं है। यहां थाई शैली के तीन पहियों वाले आटो मिल जाते हैं या फिर बड़ी-बड़ी जापानी कारें जिन्हें टैक्सी की तरह चलाया जाता है।

पुराना शहर पब, काफी हाउस आदि से भरा पड़ा है। हर काफी हाउस को पुरानी शैली के लकड़ी के मकान की तरह सजाया हुआ है। अधिकतर मकान दो मंजिला हैं और उनका रंग भी बार्निश के रंग का होता है, आंखों को सुकून और एक पुराने शहर का अहसास देने वाला। 

पुराने शहर की हर गली में होटल और गेस्ट हाउस खुले हैं जिनमें लंबी अवधि तक रहने वाले पर्यटक रहते हैं। शहर में घूमने के लिए साइकिल या स्कूटी दिन भर के लिए किराए पर मिल जाती है। आपको हर गली में शहर का जायजा लेते युवा चीनी और गोरे पर्यटक मिल जाएंगे। लोग अपने घरों को गमलों, फूलों और सुंदर कैक्टस से मनमोहक रूप से सजा कर रखते हैं। दुनिया में कुछ शहर होते हैं जहां आप बार-बार जाना पसंद करेंगे। चियांग माई भी ऐसा ही एक शहर है। घर के इतना करीब।

रविवार, 1 जनवरी 2017

वर्ष 2017 में कुछ पहेलियां सुलझाएं

नया साल देखते-देखते बीत गया। देखते-देखते बीत जाना क्या यह सिर्फ एक अहसास है या सचमुच आज की जिंदगी इतनी मसरूफियत भरी हो गई है कि सबकुछ देखते-देखते बीत जाता है और पता ही नहीं चलता। 

कुछ तो बदलाव आया है समाज में कि जिंदगी पहले की अपेक्षा अधिक व्यस्ततापूर्ण हो गई है। ऐसा नहीं है कि हम अपने बुजुर्गों की अपेक्षा कोई अधिक महत्वपूर्ण काम कर रहे हैं, फिर भी हम अपने-अपने बुजुर्गों की जीवन शैली याद करें तो पाएंगे कि उसमें एक लय थी, जो अब आपाधापी में बदलती जा रही है।

व्यस्तता बढ़ने के दो कारण तो बिल्कुल स्पष्ट हैं। एक, आवागमन और संचार के साधनों का बढ़ जाना। पहले दूर किसी राज्य में कोई आयोजन होता था तो जाने के बारे मे सोचते तक नहीं थे। आजकल सोचते ही नहीं बल्कि अधिकतर मामलों में लोग दूर-दराज के आयोजनों में भाग लेने जाते भी हैं। इसी तरह संचार के माध्यम बढ़ जाने के कारण काफी समय बातचीत में चला जाता है। 

पहले लगता था कि अब फोन नंबर डायल नहीं करना पड़ेगा और बटन दबाते ही मनचाहा नंबर लग जाएगा तो समय बचेगा। लेकिन समय बचा नहीं वह ज्यादा खर्च होने लगा। जैसे ही संचार का कोई नया माध्यम आता है वह आपके पाकिट से थोड़ा समय चुरा कर ले जाता है। फेसबुक, इंस्टाग्राम, व्हाट्सएप – सब पर यह बात लागू होती है।

दूसरा कारण है, आबादी का बढ़ना। साठ और सत्तर के दशकों में आबादी में जो बढ़ोतरी हुई उसका नतीजा आज की आपाधापी में दिखाई देता है। आप अपने माता-पिताओं से तुलना कर देखिए। उनके जितने रिश्तेदार हुआ करते थे, उनकी तुलना में आज की पीढ़ी के रिश्तेदार अधिक मिलेंगे। रिश्तेदारियों का संख्या में बढ़ना भी आज की आपाधापी का एक प्रमुख कारण है। हो सकता है आने वाली पीढ़ी इस अर्थहीन व्यस्तता से बच जाएगी क्योंकि आज जनसंख्या के बढ़ने की गति वापस धीमी हो चुकी है।

अक्सर पूछा जाता है कि ज्ञान प्राप्त करने का सबसे अच्छा तरीका क्या है। मुझे लगता है पहेलियां बुझाना ज्ञान प्राप्त करने का सबसे अच्छा तरीका होता है। उत्तर जानने के पहले आपके दिमाग में प्रश्न आना होगा। कक्षा में शिक्षक आते हैं और पाठ्यक्रम से निकालकर ज्ञान की बौछार करने लगते हैं। 

बहुत कम ही छात्र होते हैं जिन्हें इस अनचाही ज्ञानगंगा में भींगना पसंद होता है। इसकी बजाय यदि छात्र की ओर से ही कोई प्रश्न आए और शिक्षक उनका उत्तर दें तो वैसे उत्तर छात्रों का मस्तिष्क पूरी तरह सोख लेगा और वह जानकारी उनके ज्ञान का हिस्सा बन जाएगी।

वर्ष 2016 इस पहेली का उत्तर खोजने में बीत गया कि भारत की जिस चीज को सारी दुनिया पूजती है उसे भारतवासी क्यों अपने यहां से बहिष्कृत कर देते हैं। पिछले ढाइ हजार सालों में भारत में पैदा हुए जिन दो व्यक्तियों ने दुनिया को मौलिक ज्ञान दिया है वे हैं गौतम बुद्ध और गांधी। 

इन दोनों को भारत के बाहर पूजा जाता है। गौतम बुद्ध ने दुनिया को जो दे दिया उसके बाद एक तरह से और कुछ जानने के लिए बाकी नहीं रह जाता। उस पर अमल करने को छोड़कर। और गांधी ने ऐसे प्रश्नों का सामना किया जिनके उत्तर की अधिक तलाश आने वाली पीढ़ियों को होने वाली है। और पिछले डेढ़ हजार वर्षों में भारत में ऐसा क्या हुआ कि इन दोनों की ही विचारधाराओं को भारत से पूरी तरह बहिष्कृत कर दिया गया। गांधी को तो हमने शारीरिक रूप से ही हमारे बीच से हटा दिया। 

गौतम बुद्ध के बारे में यूनिवर्सिटी के किसी प्रतिभावान छात्र से पूछिए तो ज्यादा संभावना इस बात की है कि वह कहेगा – गौतम बुद्ध बौद्ध धर्म के प्रवर्तक थे, उनकी प्रेरणा से सम्राट अशोक ने बौद्ध धर्म ग्रहण कर लिया। 

लेकिन गौतम बुद्ध के इस धरती पर आने और रहने की घटना सिर्फ एक धर्म प्रवर्तक के जन्म लेने की घटना नहीं है। इसी तरह गांधी के बारे में पूछिए तो लोग आपको बताएंगे कि गांधी हमारे राष्ट्रनायक थे, उन्होंने स्वाधीनता आंदोलन का नेतृत्व किया। लेकिन स्वाधीनता आंदोलन सभी उपनिवेशों में हुए और सबके अपने-अपने राष्ट्रनायक थे। लेकिन गांधी इस समूची दुनिया के लिए अनूठे क्यों थे।

बौद्ध पर्यटकों के भारत आने पर हमें थोड़ी देर के लिए अहसास होता है कि ओह बौद्ध धर्म का जन्म भारत और नेपाल की धरती पर ही हुआ था। लेकिन रोजमर्रा की जिंदगी का ऐसा कोई जीवंत अहसास नहीं है जो यह दिखाता हो कि हम ही गौतम बुद्ध की परंपरा के वारिस हैं। 

इसी तरह गांधी की तस्वीर और गांधी के नाम की पूजा होती है लेकिन गांधी किसलिए गांधी थे यह बहुत कम लोग जानते हैं। आश्चर्य ही क्या कि उनकी विचारधारा को आगे बढ़ाने का काम भारत में कहीं दिखाई नहीं देता।

हम सौभाग्यशाली पीढ़ी हैं कि गूगल नाम का एक महान शिक्षक हमलोगों के पीसी और मोबाइल फोन पर हमेशा हमारे प्रश्नों के उत्तर देने के लिए तत्पर रहता है। यदि आप अंग्रेजी भाषा जानते हैं तो अपने मन में बेशक हजार प्रश्न उदित होने दीजिए। क्योंकि उनका उत्तर खोजने के लिए गूगल हमेशा तत्पर रहेगा। 

गौतम बुद्ध और गांधी के अलावा हमें वर्ष 2016 में इस प्रश्न ने भी बहुत सताया कि हम भारतवासियों में ऐसा क्या था कि हम हमेशा युद्धों में हारते गए, हम कई सदियों तक गुलाम बने रहे। ऐसा क्या था कि अंग्रेजों ने इतने बड़े देश को इतनी सहजता के साथ गुलाम बना लिया। 

आज जब हमें यह जानकारी मिलती है कि अंग्रेज अफसरों की आवासी बस्तियों, जैसे सिविल लाइन्स, और शिमला जैसे शहरों की माल रोड जैसी सड़कों पर भारतीयों का आना-जाना वर्जित था, तो जैसे प्रश्नों की मधुमक्खियां क्यों, क्यों, क्यों कहकर हमें डंक मारने के लिए दौड़ पड़ती है। 

उनसे बचने के लिए जो उत्तर का मरहम हमें चाहिए गनीमत है कि वह हमारे इंटरनेट पर आज उपलब्ध है। अंत में मैं इस प्रश्न को फिर दोहराता हूं – बुद्ध और गांधी को इस देश ने बहिष्कृत क्यों कर दिया। आइए वर्ष 2017 में हम इन दोनों पहेलियों को सुलझाएं।

रविवार, 4 दिसंबर 2016

नोटबंदी और हमारी साधारण बुद्धि


कई बार किसी-किसी प्रश्न पर कोई स्टैंड लेना काफी मुश्किल हो जाता है। उदाहरण के लिए नोटबंदी। इस मुद्दे पर पूरा देश दो हिस्सों में बंटा हुआ है। इस तरह बंटा हुआ है कि दोनों खेमें एक दूसरे की बात सुनना तो दूर एक दूसरे के देशप्रेम और नीयत पर भी शक करते हैं। दोनों अपने आपको एक दूसरे से बढ़कर देशप्रेमी और गरीबों का मसीहा सिद्ध करना चाहते हैं।

किसी प्रश्न पर कोई राय बनाने का मेरा तरीका यह है कि इसमें अपनी साधारण बुद्धि का इस्तेमाल करो, और विशेषज्ञ की भी राय सुनो। लेकिन इन सबके बीच जो कोई भी पड़ता है उनकी राय पर बिल्कुल ध्यान मत दो। जैसे राजनीतिक दलों के बड़े नेता, छुटभैया नेता, सरकारी बाबू, किसी न किसी विचारधारा या कारपोरेट स्वार्थ से जुड़े हुए पेशेवर टिप्पणीकार, स्तंभकार, एंकर। जब आपकी साधारण बुद्धि से निकलने वाले निष्कर्ष से विशेषज्ञ की राय भी मिलती हो तो समझ लीजिए कि आपका सोचना पूरी तरह सही है। लेकिन जब यह राय नहीं मिलती तो आपको अपनी राय बनाने के लिए कुछ समय के लिए रुकना चाहिए। यह देखना चाहिए कि विशेषज्ञ निष्पक्ष तो हैं न और वे अपने विश्लेषण के लिए वैज्ञानिक तरीकों का इस्तेमाल तो कर रहे हैं न।

कहने का तात्पर्य यह है कि जिस बात को आपकी साधारण बुद्धि स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं है वैसी बात को आसानी से मानने के लिये आपको तैयार नहीं होना चाहिए भले ही कहने वाला कितना ही बड़ा व्यक्ति क्यों न हो। मैंने अक्सर पाया है कि अंत में साधारण बुद्धि का फैसला ही सही निकलता है और राजनीतिक विचारधारा से प्रभावित विचार अंततः गलत साबित हो जाते हैं।

एक उदाहरण लेते हैं कम्यूनिज्म का। मोटी-मोटी किताबों ने इसके पक्ष में बातें कहीं और मार्क्स और एंगेल्स जैसे दार्शनिक इसके पक्ष में खड़े थे। आपने कम्यूनिज्म के बारे में मोटी-मोटी किताबें पढ़ी होंगी और सोचा होगा कि क्या इतनी मोटी-मोटी किताबें भी कभी गलत हो सकती हैं? लेकिन आपकी साधारण बुद्धि ने कभी यह भी सोचा होगा कि बिना पैसों की प्रेरणा के कोई किस तरह बढ़-चढ़ कर काम कर पाएगा। लाभ, फायदा या पैसा सबसे बड़ी प्रेरक शक्ति है और उसी के कारण एक व्यक्ति काम कर पाता है। जब सत्तर साल तक रूस में कम्यूनिज्म चलता रहा तो बहुतों को अपनी साधारण बुद्धि पर शक होने लगा होगा कि कहीं मात्र धन को प्रेरक शक्ति मानना उनकी भूल तो नहीं थी। लेकिन अंततः 1989 में रूस में कम्यूनिज्म का खात्मा हो गया और इस साधारण सी बात पर सत्यता की मोहर लग गई कि बिना फायदा होने के लालच के इस दुनिया में कुछ भी नहीं चलता।

हमने कम्यूनिज्म का सिर्फ उदाहरण दिया है। यही बात नाजीवाद और फासीवाद को लेकर सही है। यूरोप में दुनिया की हर समस्या का कारण यहूदियों को बताया गया लेकिन बहुत से लोगों की साधारण बुद्धि को यह बात स्वीकार नहीं हो सकी। अंततः लाखों लोगों की जान जाने के बाद यह बात समझ में आई कि यहूदी कौम को खत्म करने मात्र से किसी देश का भला हो जाएगा, इससे बेहूदी बात दूसरी कोई नहीं है।

नोटबंदी प्रसंग

इतनी लंबी भूमिका हमने इसलिए लिखी है कि कुछ लोग आज किसी व्यक्तित्व के प्रभाव में आकर अपनी साधारण बुद्धि को कोई महत्व नहीं देना चाहते। नोटबंदी के प्रसंग में तीन बातें मुख्य रूप से कही जा रही हैं और हमारी साधारण बुद्धि को ये तीनों बातें पच नहीं पा रही।

एक, कहा जा रहा है कि इससे काला धन रखने वालों के जमा कर रखे हुए करेंसी नोट बरबाद गए और उन्हें बहुत बड़ा धक्का लगा है। हमारी साधारण बुद्धि कहती है कि राजनेताओं को छोड़कर शायद ही कोई अपना काला धन करेंसी के रूप में रखता है। जो थोड़ा-सा दस-बीस या तीस लाख रूपयों का धन आम मध्यवर्गीय लोगों के पास रखा था उसे बाहर लाने के लिए निश्चित रूप से यह योजना नहीं लाई गई थी। तो फिर किसके लिए लाई गई थी? क्या जिनके लिए लाई गई उनमें आपने कहीं भी अफरा-तफरी का माहौल देखा?

दो, कहा जा रहा है कि इससे भ्रष्टाचार मिट जाएगा, या कम हो जाएगा। हमारी साधारण बुद्धि कहती है कि जब तक किसी बाबू के पास विवेकाधीन अधिकार रहेगा, पैसे खाने की गुंजाइश बची रहेगी और पकड़े जाने का डर नहीं रहेगा, तब तक भ्रष्टाचार पर अंकुश नहीं लग सकता। पुराने पांच सौ और एक हजार के नोट नहीं रहे तो भ्रष्ट अधिकारी को दो हजार के नोट लेने से किसने रोका है।

तीन, कहा जा रहा है कि इससे इकानोमी कैशलेस हो जाएगी और आर्थिक वृद्धि के लिए तथा भ्रष्टाचार मिटाने के लिए कैशलेस इकानोमी का होना बहुत जरूरी है। इस बात को सिद्ध करने के लिए हमारी तुलना की जा रही है ऐसे देशों के साथ जो आज आर्थिक रूप से पूरी दुनिया में सबसे आगे हैं। जैसे, स्वीडन, डेनमार्क, सिंगापुर आदि। हमारी साधारण बुद्धि कहती है कि दुनिया के सबसे अग्रणी देशों के साथ हमारी तुलना करना तर्कसंगत नहीं है। हमें भारत की तुलना ऐसे देशों के साथ करनी चाहिए जो हमारे समकक्ष हैं और उनकी वृद्धि हमारी वृद्धि दर के आसपास हैं।

इस तर्क से हम इंडोनेशिया, थाइलैंड और चीन जैसे देशों के साथ हमारी तुलना करते हैं तो पाते हैं हमारी अर्थव्यवस्था में जो नगदी का चलन है वह कोई इतना अधिक नहीं है कि हमारी प्राथमिकता नगदी को खत्म करना ही हो जाए। तथ्य यह भी है कि जो विकसित देश हैं वहां की अर्थव्यवस्था से नगदी अपने आप कम होती गई और अर्थव्यवस्था कैशलेस होती गई। इसका उल्टा सही नहीं है। यानी ऐसा नहीं हो सकता कि आप अर्थव्यवस्था को कैशलेस कर दें और विकास अपने आप आ जाएगा।

एक साधारण बनिया अपनी साधारण बुद्धि का इस्तेमाल करते हुए हमेशा कोस्ट-बेनिफिट रेसियो यानी लागत और उससे होने वाले लाभ के अनुपात का हिसाब लगाता है। सरकारी बाबू और सरकारी अर्थशास्त्री सरकार के किसी भी कदम के समर्थन में हर तरह के तर्क देने के लिए मजबूर हैं। उन्हें उसी के पैसे मिलते हैं। लेकिन एक साधारण बनिया अपनी साधारण बुद्धि से यह सवाल किए बिना नहीं रह सकता कि एक पूर्ण गति से चल रही अर्थव्यवस्था की गति को रोककर जैसे लाभ होने का अनुमान किया जा रहा है क्या वे लाभ अर्थव्यवस्था को हुए नुकसान से अधिक होंगे?

और अंत में प्रार्थना


हमारे दिल की ख्वाहिश यही है कि हमारी साधारण बुद्धि गलत साबित हो, सरकारी विशेषज्ञों के अनुमान सही हों और हमारी अर्थव्यवस्था पहले से अधिक गति प्राप्त करे।